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टैग: #शैतान की कहानी

  • हवेली वाला शैतान

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    हवेली वाला शैतान

     

    एक छोटे से गाँव के बाहर एक पुराना जंगल था। लोग उसे काली घाटी का जंगल कहते थे। दिन में भी वहाँ जाने से लोग डरते थे, क्योंकि जंगल के बीच एक टूटी हुई हवेली खड़ी थी। हवेली की खिड़कियाँ हमेशा बंद रहती थीं और उसके दरवाजे पर मोटी जंग लगी जंजीर लटकती रहती थी।

     

    गाँव में एक बात मशहूर थी।

     

    “उस हवेली में शैतान रहता है।”

     

    लोग कहते थे कि कई साल पहले वहाँ एक रहस्यमयी आदमी आया था। वह किसी से बात नहीं करता था और हमेशा हवेली में बंद रहता था। एक रात अचानक हवेली से अजीब आवाजें आने लगीं। उसके बाद वह आदमी कभी दिखाई नहीं दिया।

     

    तब से लोग उसे शैतान कहने लगे।

     

    गाँव में रहने वाली सोलह साल की राधा इन बातों पर ज्यादा विश्वास नहीं करती थी। उसकी दादी अक्सर उसे जंगल से दूर रहने के लिए कहती थीं।

     

    एक शाम राधा अपनी बकरी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते जंगल के किनारे पहुँच गई। बकरी आगे बढ़ती हुई उसी पुरानी हवेली की तरफ चली गई।

     

    “अरे रुक!” राधा उसके पीछे दौड़ी।

     

    बकरी हवेली के टूटे दरवाजे के अंदर चली गई।

     

    राधा ने डरते हुए अंदर कदम रखा।

     

    अंदर बहुत अंधेरा था।

     

    “मेरी बकरी कहाँ है?”

     

    तभी ऊपर की मंजिल से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    राधा घबरा गई।

     

    वह वापस जाने लगी, तभी पीछे से भारी आवाज आई—

     

    “यहाँ क्यों आई हो?”

     

    राधा पलटकर खड़ी हो गई।

     

    सामने एक लंबा-सा काला साया खड़ा था।

     

    उसका चेहरा अंधेरे में साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    राधा डरते हुए बोली, “मैं… अपनी बकरी लेने आई हूँ।”

     

    साया कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने हाथ से दूसरी तरफ इशारा किया।

     

    “वहाँ है।”

     

    राधा ने देखा, उसकी बकरी सीढ़ियों के पास खड़ी थी।

     

    वह बकरी को लेकर तुरंत बाहर जाने लगी।

     

    तभी साया बोला, “रुको।”

     

    राधा रुक गई।

     

    “गाँव वालों से कहना… इस हवेली के पास मत आना।”

     

    राधा ने पूछा, “क्यों?”

     

    साया ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    राधा वहाँ से भागकर घर पहुँच गई।

     

    उस रात उसने दादी को सब बताया।

     

    दादी का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “तूने उसे देखा?”

     

    “हाँ।”

     

    “कैसा था?”

     

    “पता नहीं दादी। बहुत डरावना था।”

     

    दादी ने तुरंत कहा, “कल से उस जंगल की तरफ बिल्कुल मत जाना।”

     

    लेकिन अगले दिन गाँव में एक और बात फैल गई।

     

    गाँव के मुखिया का बेटा मोहन गायब हो गया था।

     

    लोगों ने कहा, “उसे शैतान उठा ले गया!”

     

    सभी लोग जंगल की तरफ जाने लगे।

     

    राधा भी भीड़ के पीछे-पीछे चल पड़ी।

     

    हवेली के पास पहुँचते ही उसे जमीन पर मोहन की चप्पल दिखाई दी।

     

    लोग डरकर पीछे हट गए।

     

    मुखिया चिल्लाया, “देखा! मैंने कहा था न, यह शैतान ही है!”

     

    कुछ लोगों ने हवेली पर पत्थर फेंकने शुरू कर दिए।

     

    अचानक हवेली की खिड़की खुली।

     

    वही काला साया दिखाई दिया।

     

    “रुक जाओ!”

     

    लोग डरकर पीछे हट गए।

     

    मुखिया बोला, “मेरे बेटे को कहाँ छिपाया है?”

     

    साये ने कहा, “तुम्हारा बेटा यहाँ नहीं है।”

     

    “झूठ!”

     

    तभी राधा ने ध्यान दिया कि साये की आवाज में डर नहीं, बल्कि चिंता थी।

     

    वह आगे बढ़ी।

     

    “अगर मोहन यहाँ नहीं है, तो वह कहाँ है?”

     

    साये ने जंगल के अंदर एक पहाड़ी की ओर देखा।

     

    “पुरानी खदान के पास।”

     

    लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    राधा ने पूछा, “आपको कैसे पता?”

     

    साये ने कहा, “क्योंकि मैं उसे बचाकर वहाँ से लाया था। लेकिन रास्ते में वह बेहोश हो गया।”

     

    मुखिया चौंक गया।

     

    “तो तुमने मेरे बेटे को बचाया?”

     

    साया चुप रहा।

     

    कुछ लोग उसके साथ खदान की ओर चल पड़े।

     

    वहाँ पहुँचकर उन्होंने मोहन को एक सुरक्षित जगह पर पाया। वह डरा हुआ था, लेकिन ठीक था।

     

    मुखिया की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने पूछा, “तुमने मेरे बेटे की जान क्यों बचाई?”

     

    साये ने कहा, “क्योंकि वह बच्चा था। और बच्चों की गलती की सजा उन्हें नहीं मिलनी चाहिए।”

     

    अब लोगों को पहली बार लगा कि शायद कहानी कुछ और है।

     

    राधा ने हिम्मत करके पूछा, “आप असल में हैं कौन?”

     

    साया धीरे-धीरे आगे आया।

     

    उसने अपना चेहरा दिखाया।

     

    वह कोई राक्षस नहीं था।

     

    वह एक बूढ़ा आदमी था, जिसकी आँखों में गहरी उदासी थी।

     

    उसका नाम हरिदास था।

     

    उसने बताया कि कई साल पहले वह इसी गाँव का वैद्य था। एक बीमारी के दौरान उसने गाँव के बहुत से लोगों की मदद की थी। लेकिन एक रात हवेली में आग लग गई। लोगों ने बिना सच जाने उस पर आरोप लगा दिया कि उसने जानबूझकर आग लगाई है।

     

    गाँव वालों ने उसे शैतान कहना शुरू कर दिया।

     

    हरिदास ने गाँव छोड़ने के बजाय हवेली में ही रहना चुना। उसने लोगों से दूरी बना ली, लेकिन चुपचाप जरूरतमंदों की मदद करता रहा।

     

    “मैंने कई बार लोगों को बचाया,” उसने कहा, “लेकिन किसी ने कभी मेरा चेहरा नहीं देखा। इसलिए मेरे बारे में कहानियाँ बनती रहीं।”

     

    राधा की आँखें भर आईं।

     

    “तो आप शैतान नहीं हैं?”

     

    हरिदास हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “शैतान तो लोगों के डर ने मुझे बना दिया था।”

     

    मुखिया ने सिर झुका लिया।

     

    “हमने तुम्हें बिना जाने दोषी समझ लिया।”

     

    हरिदास ने कहा, “गलती मान लेना भी बड़ी बात है।”

     

    उस दिन गाँव वालों ने हवेली के बाहर जमा डर और अफवाहों को खत्म करने का फैसला किया।

     

    कुछ दिनों बाद हवेली को साफ किया गया। वहाँ एक छोटा-सा इलाज का कमरा बनाया गया, जहाँ हरिदास गाँव के लोगों की मदद करने लगा।

     

    राधा रोज उसके पास जाती और दवाइयाँ पहुँचाने में मदद करती।

     

    एक दिन उसने पूछा, “बाबा, आपको कभी बुरा नहीं लगा कि सब आपको शैतान कहते थे?”

     

    हरिदास ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा, “बुरा तो बहुत लगा। लेकिन अगर मैं भी नफरत करने लगता, तो फिर उनमें और मुझमें फर्क क्या रहता?”

     

    राधा मुस्कुराई।

     

    उस दिन के बाद गाँव में एक नई कहावत मशहूर हो गई—

     

    किसी के चेहरे से उसका सच मत तय करो। कभी-कभी जिसे दुनिया शैतान कहती है, उसके अंदर सबसे ज्यादा इंसानियत छिपी होती है।

     

    और पुरानी हवेली?

     

    वह अब डर की जगह नहीं रही थी।

     

    वहाँ हर शाम बच्चों की हँसी सुनाई देती थी।

     

    और हरिदास, जिसे कभी पूरा गाँव “शैतान” कहता था, अब उसी गाँव के लिए सबसे भरोसेमंद इंसान बन चुका था।