- गाँव जहाँ कभी किसी बच्चे का जन्म नहीं होता था
राजस्थान की ऊँची-नीची पहाड़ियों के बीच बसा एक छोटा-सा गाँव था अंधेरपुर। देखने में यह गाँव बिल्कुल साधारण था। चारों तरफ हरियाली, मिट्टी के घर, मंदिर की घंटियों की आवाज़ और खेतों में मेहनत करते लोग। लेकिन इस गाँव का एक ऐसा नियम था, जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह जाता था।
उस गाँव की ज़मीन पर कभी किसी बच्चे का जन्म नहीं होता था।
अगर किसी औरत को गर्भ ठहर जाता, तो जैसे ही सातवाँ या आठवाँ महीना शुरू होता, पूरे परिवार वाले उसे शहर ले जाते। वहीं अस्पताल में बच्चे का जन्म कराया जाता और कुछ दिनों बाद माँ और बच्चा वापस गाँव लौट आते।
गाँव के बाहर वालों को यही बताया जाता कि गाँव में अस्पताल नहीं है, इसलिए ऐसा किया जाता है। लेकिन गाँव के लोग जानते थे कि इसके पीछे एक ऐसा राज़ छिपा है, जिसके बारे में कोई खुलकर बात नहीं करता।
इसी गाँव में नई-नई शादी होकर आई थी जानवी। वह पढ़ी-लिखी, समझदार और बहुत ही सरल स्वभाव की लड़की थी। शादी के कुछ महीनों बाद जब उसे पता चला कि वह माँ बनने वाली है, तो पूरा परिवार खुशी से झूम उठा। लेकिन उसी खुशी के साथ सबके चेहरों पर एक अजीब-सा डर भी उतर आया।
एक रात जानवी ने अपनी सास से पूछा,
“माँ जी… मैं कई दिनों से देख रही हूँ कि सब लोग किसी बात को लेकर परेशान हैं। आखिर बात क्या है?”
सास ने गहरी साँस ली और बोली,
“बेटी… समय आने पर तुम्हें शहर ले जाया जाएगा। बस इतना याद रखना कि इस गाँव में कोई बच्चा पैदा नहीं होता।”
जानवी ने हैरानी से पूछा,”लेकिन क्यों?”
सास ने उसकी तरफ देखा और बोली,
“इस सवाल का जवाब हमारे पास भी नहीं है… बस यही परंपरा है।”
अब जानवी की बेचैनी और बढ़ गई। उसे लगा कि ज़रूर कोई बहुत बड़ा राज़ छिपाया जा रहा है।
एक दिन वह गाँव की सबसे बुज़ुर्ग महिला दादी कमला के पास पहुँची।
“दादी, मुझे सच जानना है। आखिर ऐसा क्यों होता है?”
दादी कमला ने चारों तरफ देखा, फिर धीमी आवाज़ में बोलीं,
“अगर सच सुनना चाहती हो, तो आज रात पुराने बरगद के पेड़ के पास आ जाना।”
रात गहरा चुकी थी। पूरा गाँव सो चुका था। जानवी धीरे-धीरे बरगद के पास पहुँची। वहाँ दादी पहले से उसका इंतज़ार कर रही थीं।
दादी ने कहना शुरू किया,”आज से करीब सौ साल पहले इस गाँव में धरा नाम की एक दाई रहती थी। पूरे इलाके में उससे अच्छा प्रसव कोई नहीं कराता था।”
“एक दिन गाँव के ज़मींदार की बहू को प्रसव पीड़ा हुई। धरा ने पूरी कोशिश की, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। माँ और बच्चा दोनों नहीं बच सके।”
“ज़मींदार गुस्से से पागल हो गया। उसने अपनी गलती छिपाने के लिए पूरे गाँव के सामने धरा को दोषी ठहरा दिया।”
“बिना कोई सबूत, बिना कोई सुनवाई… लोगों ने धरा को ज़िंदा जला दिया।”
जानवी की आँखों से आँसू निकल आए।
दादी की आवाज़ भर्रा गई।
“मरते समय धरा ने बस इतना कहा था…”
‘जिस मिट्टी ने मेरे साथ अन्याय देखा है, अब इस मिट्टी पर किसी बच्चे की पहली साँस कभी नहीं गूँजेगी।’
“उस दिन के बाद जो भी बच्चा इस गाँव में पैदा हुआ… वह कुछ ही मिनटों में मर गया।”
“पहले किसी ने यकीन नहीं किया, लेकिन जब कई नवजात बच्चों की मौत हो गई, तब पूरे गाँव ने फैसला किया कि अब कोई भी बच्चा इस गाँव में पैदा नहीं होगा।”
जानवी सारी रात सो नहीं पाई।
समय बीतता गया। उसका नौवाँ महीना शुरू होने वाला था। परिवार वाले शहर जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि अचानक लगातार कई दिनों तक इतनी तेज़ बारिश हुई कि गाँव की सभी सड़कें टूट गईं।
नदियाँ उफान पर थीं।
शहर जाने का कोई रास्ता नहीं बचा था।पूरा गाँव डर से काँप उठा।
लोग कहने लगे,
“अगर इस बार बच्चा यहीं पैदा हुआ… तो फिर वही होगा जो हमेशा होता आया है।”
इसी बीच जानवी को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई।
घर में अफरा-तफरी मच गई।
कोई भगवान से प्रार्थना कर रहा था, कोई रो रहा था।
दादी कमला ने जानवी का हाथ पकड़कर कहा,
“डरना मत बेटी… जो होगा, देखा जाएगा।”
कुछ घंटों बाद पूरे घर में एक मासूम बच्चे के रोने की आवाज़ गूँज उठी।
सभी लोग साँस रोककर खड़े थे।
एक मिनट…
दो मिनट…
पाँच मिनट…
दस मिनट…
लेकिन बच्चा बिल्कुल स्वस्थ था।
किसी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
तभी अचानक ज़मीन ज़ोर से काँपी।
पुराना बरगद बीच से टूटकर गिर पड़ा।
उसकी जड़ों के नीचे से एक पुराना लोहे का संदूक दिखाई दिया।
गाँव वालों ने उसे बाहर निकाला।
उसके अंदर कुछ सोने के गहने और एक पुरानी डायरी रखी थी।डायरी ज़मींदार की थी।
गाँव के मास्टर जी ने उसे पढ़ना शुरू किया।
उसमें लिखा था “धरा निर्दोष थी। मेरी बहू की मौत मेरी लापरवाही से हुई थी। मैंने अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए पूरे गाँव के सामने धरा को दोषी बना दिया। अगर कभी यह डायरी किसी को मिले… तो धरा से माफ़ी माँग लेना।”
यह सुनते ही पूरे गाँव में सन्नाटा छा गया।
जिस औरत को सौ साल तक लोग दोषी मानते रहे…
वह तो बिल्कुल बेगुनाह थी।
हर किसी की आँखों से आँसू बहने लगे।
अगले दिन पूरे गाँव ने उसी जगह धरा की याद में एक छोटी-सी समाधि बनाई।
सबने हाथ जोड़कर उससे माफ़ी माँगी।
उस रात गाँव के कई लोगों ने एक जैसा सपना देखा।
सफेद कपड़ों में एक औरत मुस्कुराते हुए गाँव से दूर जा रही थी।
जाते-जाते उसने कहा—
“अब किसी माँ की गोद सूनी नहीं रहेगी।”
कुछ महीनों बाद गाँव की दूसरी बहू भी गर्भवती हुई।
इस बार किसी ने उसे शहर नहीं भेजा।
सबके दिलों में डर तो था, लेकिन उम्मीद उससे कहीं ज़्यादा थी।
समय आया…
और पूरे गाँव की मौजूदगी में एक और बच्चे का जन्म हुआ।
इस बार भी बच्चा बिल्कुल स्वस्थ था।
उस दिन पूरे गाँव में ढोल बजे।
हर घर में मिठाइयाँ बाँटी गईं।मंदिर में दीप जलाए गए।
लोगों की आँखों में खुशी के आँसू थे।
जिस गाँव में कभी बच्चों की किलकारी सुनना एक सपना था…
आज वही गाँव मासूम हँसी से गूँज रहा था।
तब से अंधेरपुर की पहचान डर से नहीं, बल्कि एक सीख से होने लगी
किसी बेगुनाह के साथ किया गया अन्याय कभी खत्म नहीं होता, जब तक सच सामने आकर न्याय न दिला दे।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं