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  • भाई की कलाई पर बंधा वादा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाई की कलाई पर बंधा वादा

    रक्षाबंधन आने में बस दो दिन बाकी थे। पूरे घर में त्योहार की तैयारियां चल रही थीं, लेकिन काव्या के मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी।

     

    वह बार-बार अपना फोन देखती और फिर रख देती।

     

    उसे अपने भाई रोहन के फोन का इंतजार था।

     

    रोहन पिछले पांच साल से दूसरे शहर में नौकरी करता था। पहले वह हर रक्षाबंधन पर घर जरूर आता था, लेकिन पिछले साल काम की वजह से नहीं आ पाया था।

     

    इस बार उसने काव्या से वादा किया था—

     

    “इस रक्षाबंधन पर चाहे कुछ भी हो जाए, मैं घर जरूर आऊंगा।”

     

    काव्या को भाई की बात पर पूरा भरोसा था।

     

    वह बाजार से राखी खरीदने की बजाय खुद राखी बना रही थी।

     

    उसने लाल और सुनहरे धागे में मोती लगाए और बीच में एक छोटा-सा लकड़ी का अक्षर लगाया—

     

    “भैया”

     

    माँ ने उसे देखा तो मुस्कुराते हुए बोलीं,

     

    “इतनी मेहनत क्यों कर रही है? बाजार से अच्छी-सी राखी ले आती।”

     

    काव्या ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “बाजार की राखी तो कोई भी बांध देगा माँ, लेकिन ये राखी सिर्फ मेरे भैया के लिए है।”

     

    माँ कुछ नहीं बोलीं।

     

    बस बेटी के सिर पर हाथ फेर दिया।

     

    काव्या और रोहन बचपन से ही बहुत करीब थे।

     

    पिता के गुजर जाने के बाद रोहन ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियां भी संभाल ली थीं।

     

    उस समय रोहन सिर्फ सत्रह साल का था।

     

    काव्या उससे चार साल छोटी थी।

     

    एक दिन काव्या ने स्कूल की फीस के लिए रोते हुए कहा था,

     

    “भैया, अगर फीस नहीं भरी तो मैडम मुझे स्कूल से निकाल देंगी।”

     

    रोहन ने उसकी आंखों के आंसू पोंछते हुए कहा था,

     

    “तू बस पढ़ाई कर। तेरी पढ़ाई कभी नहीं रुकेगी।”

     

    अगले दिन रोहन अपनी पसंद की घड़ी बेचकर उसकी फीस भर आया था।

     

    काव्या को सालों बाद यह बात पता चली थी।

     

    उसने तब रोहन से पूछा था,

     

    “आपने मुझे बताया क्यों नहीं?”

     

    रोहन हंसकर बोला था,

     

    “भाई अपनी बहन से हिसाब थोड़ी करता है।”

     

    उस दिन से काव्या के लिए रोहन सिर्फ भाई नहीं था।

     

    वह उसका सबसे बड़ा सहारा था।

     

    रक्षाबंधन की सुबह काव्या जल्दी उठ गई।

     

    उसने घर सजाया।

     

    माँ ने मिठाई बनाई।

     

    काव्या ने पूजा की थाली तैयार की।

     

    लेकिन दोपहर हो गई और रोहन नहीं आया।

     

    काव्या ने फोन लगाया।

     

    फोन बंद था।

     

    उसका चेहरा उतर गया।

     

    माँ ने कहा,

     

    “शायद रास्ते में होगा।”

     

    काव्या ने धीरे से कहा,

     

    “लेकिन भैया ने कहा था सुबह तक पहुंच जाएंगे।”

     

    शाम होने लगी।

     

    बाहर आसमान में काले बादल छा गए।

     

    बारिश शुरू हो गई।

     

    काव्या दरवाजे के पास बैठ गई।

     

    उसकी आंखें रास्ते पर टिकी थीं।

     

    तभी फोन की घंटी बजी।

     

    काव्या ने तुरंत फोन उठाया।

     

    “हैलो भैया!”

     

    लेकिन सामने रोहन नहीं था।

     

    एक अनजान आदमी की आवाज आई।

     

    “क्या आप रोहन की बहन हैं?”

     

    काव्या का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “जी… क्या हुआ?”

     

    “आप घबराइए मत। रोहन का रास्ते में एक्सीडेंट हुआ है। उन्हें अस्पताल लाया गया है।”

     

    काव्या के हाथ कांपने लगे।

     

    “वो ठीक हैं?”

     

    “डॉक्टर इलाज कर रहे हैं।”

     

    फोन कट गया।

     

    काव्या ने तुरंत माँ को बताया।

     

    दोनों अस्पताल के लिए निकल पड़े।

     

    अस्पताल पहुंचते ही काव्या डॉक्टर के पास भागी।

     

    “डॉक्टर साहब, मेरे भैया… रोहन…”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “उनकी हालत गंभीर थी, लेकिन अभी हम उनका इलाज कर रहे हैं। आपको हिम्मत रखनी होगी।”

     

    काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    वह अस्पताल के बाहर बैठ गई।

     

    उसके हाथ में अब भी वही राखी थी।

     

    वह राखी को देखकर फुसफुसाई,

     

    “भैया… आपने वादा किया था।”

     

    कुछ देर बाद एक नर्स बाहर आई।

     

    उसने काव्या को एक छोटा-सा बैग दिया।

     

    “ये सामान रोहन के पास था।”

     

    काव्या ने बैग खोला।

     

    उसमें रोहन का फोन, बटुआ और एक छोटा-सा डिब्बा था।

     

    काव्या ने डिब्बा खोला।

     

    उसमें एक सुंदर-सी चांदी की पायल थी।

     

    साथ में एक छोटी-सी पर्ची थी।

     

    काव्या ने कांपते हाथों से पर्ची खोली।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मेरी छोटी बहन के लिए। इस बार राखी पर उसे खाली हाथ नहीं छोड़ूंगा।”

     

    काव्या फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    “भैया… मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस आप ठीक होकर मेरे सामने आ जाओ।”

     

    माँ ने उसे गले लगा लिया।

     

    कई घंटे बीत गए।

     

    आखिरकार डॉक्टर बाहर आए।

     

    “अब खतरा कम है। उन्हें होश आने में थोड़ा समय लगेगा।”

     

    काव्या ने राहत की सांस ली।

     

    अगली सुबह रोहन ने धीरे-धीरे आंखें खोलीं।

     

    सामने काव्या बैठी थी।

     

    उसकी आंखें पूरी रात रोने से लाल थीं।

     

    रोहन ने कमजोर आवाज में कहा,

     

    “तू… यहां क्यों बैठी है?”

     

    काव्या ने गुस्से से उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि आप अपना वादा निभाने आए थे ना?”

     

    रोहन हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “मैंने कहा था… रक्षाबंधन पर घर आऊंगा।”

     

    “और अस्पताल में आकर बैठ गए!”

     

    दोनों कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर रोहन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “राखी लाई है?”

     

    काव्या की आंखें फिर भर आईं।

     

    उसने धीरे से राखी निकाली और रोहन की कलाई पर बांध दी।

     

    राखी बांधते हुए उसने कहा,

     

    “आज मैं आपसे एक और वादा चाहती हूं।”

     

    रोहन ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “अब कभी अपनी जिंदगी को इतना जोखिम में नहीं डालोगे कि मुझे तुम्हें खोने का डर लगे।”

     

    रोहन कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “वादा।”

     

    काव्या ने उसकी कलाई पकड़ ली।

     

    “पक्का?”

     

    “पक्का।”

     

    रोहन ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “और तू भी एक वादा कर।”

     

    “क्या?”

     

    “चाहे जिंदगी कितनी भी मुश्किल हो जाए, तू अपनी पढ़ाई और अपने सपने कभी नहीं छोड़ेगी।”

     

    काव्या ने सिर हिलाया।

     

    “वादा।”

     

    उस दिन अस्पताल के कमरे में दो वादे हुए।

     

    एक भाई ने अपनी बहन की जिंदगी में हमेशा रहने का वादा किया।

     

    और एक बहन ने अपने सपनों को कभी न छोड़ने का।

     

    कुछ महीने बाद रोहन पूरी तरह ठीक होकर घर लौट आया।

     

    काव्या ने अपनी पढ़ाई पूरी की और उसे अपनी पसंद की नौकरी भी मिल गई।

     

    एक दिन रोहन ने उसकी अलमारी में वही पुरानी राखी देखी।

     

    “ये अभी तक संभालकर रखी है?”

     

    काव्या मुस्कुराई।

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    काव्या ने राखी को हाथ में लेते हुए कहा,

     

    “क्योंकि ये सिर्फ राखी नहीं है भैया।”

     

    रोहन ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    काव्या ने उसकी तरफ देखकर कहा,

     

    “ये उस दिन का सबूत है जब मेरी कलाई पर नहीं… आपकी कलाई पर एक वादा बंधा था।”

     

    रोहन मुस्कुराया।

     

    उसने अपनी कलाई की तरफ देखा।

     

    राखी तो कब की टूट चुकी थी।

     

    लेकिन उस राखी का वादा आज भी दोनों के दिल में वैसे ही बंधा हुआ था।

     

    क्योंकि भाई-बहन का रिश्ता धागे से नहीं, भरोसे से बंधता है। और जब उस रिश्ते में सच्चा वादा हो, तो वक्त भी उसे कमजोर नहीं कर पाता।