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  • एक लड़की का श्राप

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जिस लड़की को मिला श्राप — पानी पिया तो जिंदगी छिन जाएगी

     

    एक छोटे से गांव में नैना नाम की सोलह साल की लड़की रहती थी। वह बहुत हंसमुख और दयालु थी। गांव में कोई भी परेशान होता, नैना उसकी मदद करने पहुंच जाती। उसे पानी से बहुत प्यार था। गांव के पुराने कुएं से पानी भरकर लाना उसे अच्छा लगता था और गर्मियों में वह अक्सर नदी के किनारे बैठकर घंटों बातें करती।

     

    लेकिन एक दिन उसकी जिंदगी अचानक बदल गई।

     

    गांव के बाहर एक बहुत पुराना मंदिर था। लोग कहते थे कि उस मंदिर के पास शाम के बाद नहीं जाना चाहिए। वहां एक पुराना पत्थर रखा था, जिस पर अजीब निशान बने थे।

     

    एक शाम नैना अपनी छोटी बकरी को ढूंढते-ढूंढते मंदिर तक पहुंच गई।

     

    “मुन्नी! कहां चली गई?”

     

    बकरी मंदिर के पीछे खड़ी थी।

     

    नैना उसे पकड़ने आगे बढ़ी तभी उसकी नजर मंदिर की सीढ़ियों के पास बैठे एक बूढ़े साधु पर पड़ी।

     

    साधु ने नैना को देखते ही कहा, “बेटी, यहां से चली जाओ।”

     

    नैना घबरा गई।

     

    “बाबा, मैं अपनी बकरी लेने आई हूं।”

     

    साधु ने गंभीर होकर कहा, “बकरी ले जाओ, लेकिन इस जगह की कोई चीज अपने साथ मत ले जाना।”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “जी बाबा।”

     

    वह बकरी को लेकर लौटने लगी, लेकिन तभी उसके पैर के पास रखा एक छोटा मिट्टी का कटोरा गिर गया। उसमें से थोड़ा पानी जमीन पर फैल गया।

     

    नैना ने अनजाने में कटोरा उठाकर पास रख दिया।

     

    साधु अचानक उठ खड़े हुए।

     

    “रुको!”

     

    नैना डर गई।

     

    “क्या हुआ बाबा?”

     

    साधु ने कटोरे को देखा और फिर नैना की ओर।

     

    उनका चेहरा चिंता से भर गया।

     

    “तुमने इसे छू लिया?”

     

    “जी… लेकिन मैंने कुछ नहीं किया।”

     

    साधु ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “बहुत देर हो चुकी है।”

     

    नैना समझ नहीं पाई।

     

    “क्या हुआ?”

     

    साधु ने कहा, “इस कटोरे का पानी साधारण पानी नहीं था। वर्षों पहले यहां एक श्राप बांधा गया था। जो भी इस पानी को अपने शरीर के भीतर लेगा, उसके जीवन पर संकट आ जाएगा।”

     

    नैना के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “लेकिन मैंने तो पानी पिया ही नहीं!”

     

    साधु ने राहत की सांस ली।

     

    “तुमने नहीं पिया, इसलिए अभी उम्मीद है।”

     

    नैना ने पूछा, “तो अब क्या होगा?”

     

    साधु ने कहा, “श्राप तुम तक पहुंच चुका है, लेकिन वह तभी पूरा होगा जब तुम किसी स्रोत का पानी अपने शरीर में लोगी।”

     

    नैना की आंखें फैल गईं।

     

    “मतलब मैं पानी नहीं पी सकती?”

     

    साधु ने सिर झुका लिया।

     

    “जब तक श्राप का रहस्य नहीं टूटता।”

     

    नैना भागती हुई घर पहुंची।

     

    मां ने उसे देखा तो पूछा, “क्या हुआ? इतनी घबराई क्यों हो?”

     

    नैना ने सारी बात बता दी।

     

    मां ने पहले इसे डर समझा, लेकिन जब नैना ने मंदिर और साधु के बारे में बताया तो मां उसे लेकर गांव के बुजुर्ग हरिदास के पास गईं।

     

    हरिदास ने बात सुनी तो उनका चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “यह वही श्राप है।”

     

    मां ने पूछा, “आप जानते हैं इसके बारे में?”

     

    हरिदास बोले, “बहुत साल पहले गांव में एक लालची जमींदार रहता था। उसने मंदिर के पवित्र जल को अपने कब्जे में करने की कोशिश की थी। तब मंदिर के रक्षक ने उसे चेतावनी दी थी कि जो इस जल का गलत इस्तेमाल करेगा, वह कभी पानी का सच्चा सुख नहीं पा सकेगा।”

     

    नैना ने पूछा, “लेकिन इसका मुझसे क्या संबंध है?”

     

    हरिदास बोले, “शायद तुम्हें इसलिए चुना गया है क्योंकि तुमने उस कटोरे को बिना किसी लालच के उठाया था। श्राप तुम्हें डराकर नहीं, तुम्हारी परीक्षा लेकर आया है।”

     

    नैना ने दृढ़ होकर कहा, “तो मुझे इसका रास्ता ढूंढना होगा।”

     

    अगले दिन नैना मंदिर पहुंची।

     

    साधु वहीं बैठे थे।

     

    नैना ने पूछा, “बाबा, श्राप कैसे टूटेगा?”

     

    साधु ने कहा, “मुझे पूरी जानकारी नहीं है। लेकिन मंदिर की दीवार पर एक पुराना शिलालेख है।”

     

    दोनों मंदिर के अंदर गए।

     

    दीवार पर धूल से ढका एक संदेश लिखा था—

     

    “जिसे जीवन चाहिए, वह जीवन देने का रास्ता खोजे। जिस दिन स्वार्थ खत्म होगा, उसी दिन श्राप कमजोर होगा।”

     

    नैना देर तक उस संदेश को देखती रही।

     

    “इसका मतलब क्या है?”

     

    साधु बोले, “शायद तुम्हें किसी ऐसे काम की तलाश करनी होगी जिसमें तुम्हारा अपना लाभ न हो।”

     

    नैना ने पूरे गांव के बारे में सोचना शुरू किया।

     

    तभी उसे याद आया कि गांव के कई गरीब परिवार गर्मियों में पानी के लिए बहुत दूर जाते थे। गांव का पुराना तालाब भी सूखने लगा था।

     

    नैना ने फैसला किया कि वह तालाब को साफ करवाएगी।

     

    उसने गांव के बच्चों को बुलाया।

     

    “अगर हम सब मिलकर तालाब साफ करें तो शायद पानी फिर जमा हो सके।”

     

    कुछ बच्चों ने हामी भर दी।

     

    धीरे-धीरे बड़े लोग भी जुड़ने लगे।

     

    नैना खुद सबसे आगे काम करने लगी।

     

    लेकिन उसके मन में डर था।

     

    हर बार जब कोई पानी की बात करता, उसका दिल घबरा जाता।

     

    एक दिन उसकी छोटी सहेली बोली, “नैना, तुम इतनी परेशान क्यों रहती हो?”

     

    नैना ने सच बता दिया।

     

    सहेली ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “डर मत। हम तुम्हारे साथ हैं।”

     

    कई दिनों की मेहनत के बाद तालाब की सफाई पूरी हुई।

     

    अगली बारिश में तालाब पानी से भर गया।

     

    पूरा गांव खुश हो गया।

     

    लोगों ने कहा, “नैना ने कमाल कर दिया।”

     

    लेकिन नैना चुप थी।

     

    उसे शिलालेख की बात याद आ रही थी—

     

    “जिसे जीवन चाहिए, वह जीवन देने का रास्ता खोजे।”

     

    उसी रात वह फिर मंदिर गई।

     

    साधु ने उसे देखते ही मुस्कुराकर कहा, “अब तुम समझ गई हो।”

     

    “क्या?”

     

    “श्राप पानी का नहीं था। श्राप उस लालच का था जिसने पानी को अपना अधिकार समझ लिया था।”

     

    नैना की आंखों में चमक आ गई।

     

    “तो क्या मैं अब सुरक्षित हूं?”

     

    साधु ने कहा, “यह तुम खुद जानोगी।”

     

    नैना ने सामने रखे साफ पानी के पात्र को देखा।

     

    कई दिनों से उसके मन में पानी को लेकर डर था।

     

    साधु ने कहा, “डर के कारण जिंदगी रुकती नहीं। समझ के साथ आगे बढ़ना ही साहस है।”

     

    नैना ने कुछ पल सोचा।

     

    फिर गांव के लोगों को याद किया, जिन्होंने उसके साथ तालाब साफ किया था।

     

    उसने समझ लिया कि असली श्राप उसके डर में था।

     

    तभी मंदिर के अंदर तेज प्रकाश हुआ।

     

    दीवार पर बने पुराने निशान धीरे-धीरे मिटने लगे।

     

    साधु ने मुस्कुराकर कहा, “श्राप टूट गया।”

     

    नैना की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

     

    वह घर लौटी और मां से लिपट गई।

     

    मां ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “मां, आज मुझे समझ आया कि डर हमें उतना नहीं रोकता जितना हम खुद डर को अपने ऊपर हावी होने देते हैं।”

     

    कुछ दिनों बाद गांव में एक नया नियम बना।

     

    तालाब का पानी किसी एक व्यक्ति का नहीं होगा।

     

    वह पूरे गांव का होगा।

     

    नैना अक्सर तालाब के किनारे बैठती और पानी की लहरों को देखती।

     

    एक दिन उसकी सहेली ने पूछा, “तुम यहां इतनी देर क्यों बैठती हो?”

     

    नैना मुस्कुराकर बोली—

     

    “क्योंकि कभी मुझे पानी से डर लगता था। अब यही पानी मुझे याद दिलाता है कि जिंदगी में सबसे बड़ा श्राप डर है और सबसे बड़ी ताकत उम्मीद।”

     

    उस दिन से नैना ने गांव के बच्चों को एक बात हमेशा सिखाई—

     

    किसी डर को अपनी जिंदगी का मालिक मत बनने देना। कई बार जिस चीज से हम सबसे ज्यादा डरते हैं, उसी के पीछे हमारी सबसे बड़ी सीख छिपी होती है।

     

    और पुराने मंदिर की दीवार पर जहां कभी श्राप लिखा था, वहां अब केवल एक नई पंक्ति दिखाई देती थी—

     

    “जीवन बांटने वाला कभी अकेला नहीं पड़ता।”