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  • उस छुट्टी वाले दिन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    उसे छुट्टी वाले दिन जो हुआ

     

    रवि एक साधारण परिवार का 17 साल का लड़का था। वह पढ़ाई में ठीक था, लेकिन उसे सबसे ज्यादा पसंद था अपने दादाजी के साथ समय बिताना। दादाजी गाँव में बने पुराने घर में रहते थे। घर बड़ा था, मगर उसमें अब पहले जैसी चहल-पहल नहीं रही थी।

     

    रवि की स्कूल की छुट्टियाँ चल रही थीं। रोज सुबह वह देर तक सोता, दोस्तों के साथ घूमता और शाम को दादाजी के पास बैठकर उनकी पुरानी बातें सुनता।

     

    एक दिन दादाजी ने कहा, “कल छुट्टी है, अगर समय हो तो मेरे साथ पुराने घर चलना।”

     

    रवि ने हँसते हुए पूछा, “वही बंद पड़ा कमरा भी दिखाएँगे?”

     

    दादाजी कुछ पल चुप रहे।

     

    “हाँ… लेकिन अकेले उस कमरे में मत जाना।”

     

    रवि को यह बात थोड़ी अजीब लगी।

     

    “क्यों?”

     

    दादाजी ने बस इतना कहा, “कल बताऊँगा।”

     

    अगली सुबह रवि जल्दी उठ गया। दादाजी के साथ वह पुराने घर पहुँचा। घर गाँव के आखिरी छोर पर था। कई साल से वहाँ कोई नहीं रहता था।

     

    जैसे ही दरवाजा खोला गया, रवि ने चारों तरफ देखा। पुराने सामान, लकड़ी की अलमारी और दीवारों पर लगी धुंधली तस्वीरें अब भी वैसी ही थीं।

     

    दादाजी एक कमरे की सफाई करने लगे।

     

    रवि की नजर उसी बंद कमरे पर थी।

     

    कमरे के दरवाजे पर पुराना ताला लगा था।

     

    रवि ने पूछा, “दादाजी, इसमें ऐसा क्या है जो आप इसे हमेशा बंद रखते हैं?”

     

    दादाजी ने जवाब नहीं दिया।

     

    कुछ देर बाद उन्होंने कहा, “मैं सामने वाले कमरे में हूँ। तुम बाहर ही रहना।”

     

    रवि ने सिर हिला दिया।

     

    लेकिन दादाजी के जाते ही उसे अंदर से हल्की-सी आवाज सुनाई दी।

     

    टक… टक… टक…

     

    रवि का ध्यान दरवाजे की तरफ गया।

     

    वह धीरे-धीरे उसके पास पहुँचा।

     

    आवाज फिर आई।

     

    टक… टक…

     

    रवि ने दरवाजे पर कान लगाया।

     

    अंदर जैसे कोई लकड़ी की चीज खिसका रहा था।

     

    उसका दिल तेज धड़कने लगा।

     

    उसे दादाजी की बात याद आई, लेकिन जिज्ञासा भी बढ़ती जा रही थी।

     

    तभी उसे जमीन पर एक पुरानी चाबी दिखाई दी।

     

    रवि ने चाबी उठाई।

     

    वह उसी कमरे के ताले में लग गई।

     

    उसने कुछ पल सोचा।

     

    फिर ताला खोल दिया।

     

    दरवाजा चरमराते हुए खुला।

     

    अंदर धूल से भरा कमरा था। एक पुरानी मेज, लकड़ी की पेटी और दीवार के पास एक बड़ा आईना रखा था।

     

    रवि ने चारों तरफ देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    तभी उसकी नजर मेज पर रखी एक डायरी पर पड़ी।

     

    डायरी के ऊपर लिखा था—

     

    “जिसे यह मिले, वह इसे पूरा पढ़े बिना घर से न जाए।”

     

    रवि ने डायरी उठा ली।

     

    पहले पन्ने पर उसके दादाजी का नाम लिखा था।

     

    रवि चौंक गया।

     

    वह डायरी पढ़ने लगा।

     

    उसमें दादाजी की जवानी के दिनों की बातें थीं। उन्होंने लिखा था कि कई साल पहले इसी घर में उनके छोटे भाई मोहन के साथ एक घटना हुई थी।

     

    मोहन अचानक घर से गायब हो गया था।

     

    गाँव वालों ने बहुत खोजा, लेकिन उसका कोई पता नहीं चला।

     

    रवि को यह बात पहले कभी नहीं बताई गई थी।

     

    तभी पीछे से आवाज आई।

     

    “तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    रवि डरकर पलटा।

     

    दादाजी दरवाजे पर खड़े थे।

     

    रवि ने घबराकर डायरी उनकी तरफ बढ़ा दी।

     

    “दादाजी… इसमें क्या लिखा है?”

     

    दादाजी कुछ देर तक डायरी को देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने गहरी साँस ली।

     

    “मुझे पता था एक दिन तुम्हें यह सब पता चल ही जाएगा।”

     

    रवि ने पूछा, “क्या मोहन दादा सच में गायब हुए थे?”

     

    दादाजी ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ। लेकिन वह मरे नहीं थे।”

     

    रवि की आँखें फैल गईं।

     

    “फिर कहाँ गए थे?”

     

    दादाजी ने उसे पास बैठाया।

     

    “उस समय हमारे परिवार में जमीन को लेकर झगड़ा हुआ था। मोहन बहुत गुस्से में घर छोड़कर चला गया था। उसने कहा था कि वह वापस आएगा, लेकिन कभी नहीं आया।”

     

    रवि ने डायरी का अगला पन्ना खोला।

     

    वहाँ एक पता लिखा था।

     

    दादाजी ने उसे देखकर कहा, “यह पता मुझे भी कई साल बाद मिला था। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।”

     

    रवि ने पूछा, “आपने उन्हें खोजा नहीं?”

     

    दादाजी की आँखें नम हो गईं।

     

    “खोजा था बेटा। बहुत खोजा था। लेकिन कोई सुराग नहीं मिला।”

     

    तभी बाहर आँगन से कुछ गिरने की आवाज आई।

     

    दोनों बाहर निकले।

     

    वहाँ एक पुराना लकड़ी का संदूक पड़ा था, जो शायद ऊपर रखे सामान से गिर गया था।

     

    रवि ने संदूक उठाया।

     

    उसके नीचे एक पीला लिफाफा पड़ा था।

     

    लिफाफे पर लिखा था—

     

    “भैया के नाम।”

     

    दादाजी के हाथ काँपने लगे।

     

    उन्होंने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक पत्र था।

     

    पत्र मोहन का था।

     

    उसमें लिखा था कि वह घर छोड़कर शहर चला गया था। उसने नई जिंदगी शुरू की और वर्षों तक अपने परिवार से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से बात नहीं हो पाई।

     

    पत्र के अंत में एक पता था।

     

    दादाजी कुछ देर तक चुप बैठे रहे।

     

    रवि ने कहा, “दादाजी, हमें उन्हें ढूँढ़ना चाहिए।”

     

    दादाजी ने कमजोर आवाज में कहा, “अब बहुत साल हो चुके हैं।”

     

    रवि ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “लेकिन अगर वो कहीं हैं, तो उन्हें भी तो अपने परिवार की याद आती होगी।”

     

    दादाजी ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

     

    अगले दिन दोनों उस पते पर गए।

     

    पता एक छोटे शहर के पुराने मोहल्ले का था।

     

    बहुत पूछने के बाद उन्हें एक बुजुर्ग व्यक्ति के बारे में पता चला, जो पास के घर में रहते थे।

     

    रवि और दादाजी उस घर के सामने पहुँचे।

     

    दादाजी ने दरवाजे पर दस्तक दी।

     

    एक बुजुर्ग व्यक्ति बाहर आए।

     

    दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर दादाजी की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “मोहन…”

     

    वह बुजुर्ग व्यक्ति भी स्तब्ध रह गए।

     

    “भैया?”

     

    दोनों भाई वर्षों बाद एक-दूसरे के सामने खड़े थे।

     

    रवि चुपचाप यह सब देख रहा था।

     

    मोहन ने उसे देखा और पूछा, “यह कौन है?”

     

    दादाजी ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह मेरा पोता रवि है।”

     

    मोहन ने रवि को गले लगा लिया।

     

    “तुमने मुझे मेरे भाई से मिला दिया।”

     

    रवि मुस्कुराया।

     

    उस दिन की छुट्टी उसके जीवन की सबसे यादगार छुट्टी बन गई।

     

    वह सुबह घर से केवल घूमने निकला था, लेकिन शाम तक उसने अपने परिवार का एक खोया हुआ रिश्ता वापस पा लिया था।

     

    घर लौटते समय दादाजी ने कहा, “आज समझ आया कि उस पुराने कमरे को बंद रखना सही नहीं था।”

     

    रवि ने पूछा, “क्यों?”

     

    दादाजी बोले, “कुछ दरवाजे डर की वजह से बंद कर दिए जाते हैं। लेकिन उन्हें खोलने पर कभी-कभी पुराना दर्द नहीं, बल्कि अधूरी खुशी मिलती है।”

     

    रवि ने मुस्कुराकर कहा, “और अगर मैं उस दिन छुट्टी पर घर से बाहर घूमने चला जाता तो?”

     

    दादाजी हँस पड़े।

     

    “तो शायद आज हम मोहन को नहीं ढूँढ़ पाते।”

     

    रवि ने आसमान की ओर देखा।

     

    उसे लगा कि कभी-कभी जिंदगी की सबसे खास घटनाएँ उन्हीं दिनों में होती हैं, जिन्हें हम साधारण समझकर शुरू करते हैं।

     

    उस छुट्टी वाले दिन रवि को न कोई बड़ा खजाना मिला, न कोई चमत्कार हुआ।

     

    उसे उससे भी कीमती चीज मिली—एक बिछड़ा हुआ रिश्ता, जो वर्षों बाद फिर से परिवार का हिस्सा बन गया।

     

    और उस दिन के बाद रवि ने छुट्टियों को कभी सिर्फ आराम के दिन नहीं समझा। उसे पता चल गया था कि कभी-कभी एक साधारण-सी छुट्टी भी पूरी जिंदगी की कहानी बदल सकती है।