महादेव और उनका भोला भक्त
हिमालय की पहाड़ियों से दूर एक छोटा-सा गाँव था—देवगाँव। गाँव बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन वहाँ के लोग भगवान शिव के बड़े भक्त थे। गाँव के बीचों-बीच एक बहुत पुराना शिव मंदिर था। मंदिर की दीवारें पुरानी थीं, छत पर जगह-जगह घास उग आई थी, लेकिन शिवलिंग के सामने जलता दीपक कभी बुझता नहीं था।
उसी गाँव में भोला नाम का एक गरीब युवक रहता था। उसका नाम भले ही भोला था, लेकिन उसका दिल भी बिल्कुल भोला था। वह किसी के साथ बुरा नहीं करता था और भगवान शिव को अपना सबसे बड़ा सहारा मानता था।
भोला के पास धन नहीं था। उसके पास खेती के लिए थोड़ी-सी जमीन थी, जिस पर वह मेहनत करके अपना और अपनी बूढ़ी माँ का पेट पालता था।
हर सुबह वह सूरज निकलने से पहले उठता, नदी से पानी भरकर लाता और शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर जल चढ़ाता।
मंदिर के पुजारी अक्सर कहते, “भोला, तुम रोज इतनी सुबह क्यों आते हो? कभी देर से भी आ जाया करो।”
भोला हंसकर कहता, “पंडित जी, महादेव के पास जाने में देर कैसी?”
पुजारी मुस्कुरा देते।
भोला की एक खास आदत थी। वह भगवान शिव से कभी अपने लिए धन या बड़ा घर नहीं मांगता था।
वह हमेशा कहता—
“महादेव, मेरी माँ को स्वस्थ रखना। मेरे गाँव के किसी इंसान को भूखा मत रखना। बाकी जो है, मैं संभाल लूँगा।”
एक साल गाँव में बारिश बहुत कम हुई। खेत सूखने लगे। तालाब में पानी कम हो गया। किसानों के चेहरों पर चिंता साफ दिखाई देने लगी।
भोला की फसल भी खराब होने लगी।
उसकी माँ ने कहा, “बेटा, इस बार फसल नहीं हुई तो घर चलाना मुश्किल हो जाएगा।”
भोला ने माँ को ढांढस देते हुए कहा, “चिंता मत करो माँ। भोलेनाथ सब ठीक करेंगे।”
लेकिन इस बार परेशानी बढ़ती गई।
गाँव के कई घरों में अनाज खत्म होने लगा।
एक दिन गाँव के मुखिया ने घोषणा की, “जिसके पास अनाज बचा है, वह जरूरतमंदों की मदद करे।”
भोला के घर में भी बहुत कम अनाज था। उसकी माँ ने चुपचाप अपना हिस्सा बचाकर पड़ोस की एक विधवा महिला को दे दिया।
भोला ने पूछा, “माँ, आपने अपना खाना क्यों दे दिया?”
माँ बोलीं, “बेटा, भूखे को खाना देना महादेव की सेवा है।”
भोला मुस्कुरा दिया।
अगले दिन उसने भी अपने घर में बचा थोड़ा-सा अनाज गाँव के गरीब परिवारों में बाँट दिया।
उस रात उसकी माँ ने पूछा, “अब हमारे लिए क्या बचा?”
भोला हँसकर बोला, “महादेव हैं ना।”
माँ ने उसे देखा।
“बेटा, भगवान पर भरोसा अच्छी बात है, लेकिन मेहनत भी करनी चाहिए।”
भोला ने सिर हिलाया।
अगले दिन वह गाँव के सूखे तालाब के पास गया। उसने देखा कि तालाब पूरी तरह मिट्टी से भर गया था।
उसने सोचा, “अगर बारिश हुई तो पानी कहाँ जमा होगा?”
उसने फावड़ा उठाया और अकेले तालाब की सफाई शुरू कर दी।
लोग उसे देखकर हँसने लगे।
एक आदमी बोला, “भोला, तू अकेला पूरा तालाब साफ करेगा?”
भोला हँसकर बोला, “मैं अकेला शुरू तो कर सकता हूँ।”
वह सुबह से शाम तक काम करता रहा।
दूसरे दिन दो बच्चे उसके साथ आ गए।
तीसरे दिन तीन किसान।
धीरे-धीरे पूरा गाँव उसके साथ जुड़ गया।
कुछ दिनों में तालाब काफी गहरा और साफ हो गया।
लेकिन आसमान अब भी साफ था।
बारिश का कोई नामोनिशान नहीं था।
एक शाम भोला मंदिर पहुँचा।
उसने शिवलिंग के सामने बैठकर कहा, “महादेव, मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है। अब जो ठीक समझो, वही करना।”
उस रात भोला को एक सपना आया।
उसने देखा कि एक साधु उसके सामने खड़े हैं।
साधु ने कहा, “भक्त, तुम भगवान से क्या मांगते हो?”
भोला बोला, “कुछ नहीं।”
साधु ने पूछा, “कुछ भी नहीं?”
“बस इतना कि मेरे गाँव के लोग सुरक्षित रहें।”
साधु मुस्कुराए।
“अगर तुम्हें धन मिल जाए तो?”
भोला बोला, “जरूरतमंदों में बाँट दूँगा।”
“अगर तुम्हें बहुत बड़ा घर मिल जाए?”
“जिसके पास घर नहीं है, उसे दे दूँगा।”
साधु ने पूछा, “और अगर भगवान स्वयं तुम्हारे सामने आ जाएँ?”
भोला की आँखों में चमक आ गई।
“तो उनके चरणों में बैठकर बस यही कहूँगा कि मुझे हमेशा उनकी सेवा करने लायक बनाए रखें।”
साधु मुस्कुराए और धीरे-धीरे गायब हो गए।
सुबह भोला की आँख खुली।
उसे अपना सपना याद था।
वह मंदिर पहुँचा।
जैसे ही उसने मंदिर का दरवाजा खोला, वहाँ उसे एक अजनबी साधु बैठे दिखाई दिए।
भोला ने उन्हें प्रणाम किया।
साधु ने पूछा, “तुम रोज यहाँ आते हो?”
“जी।”
“क्या मांगते हो?”
भोला ने मुस्कुराकर कहा, “कुछ नहीं।”
साधु ने कहा, “तो फिर यहाँ क्यों आते हो?”
भोला बोला, “जिससे प्रेम हो, उसके पास जाने के लिए कोई मांग जरूरी नहीं होती।”
साधु उसकी ओर देखते रहे।
फिर उन्होंने पूछा, “अगर तुम्हें अपने लिए कुछ मांगने का मौका मिले तो?”
भोला ने कुछ पल सोचा।
“तो मैं माँ की लंबी उम्र मांगूँगा।”
साधु बोले, “अपने लिए कुछ नहीं?”
“मेरी खुशी तो माँ की खुशी में है।”
साधु ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया।
“तुम सच में भोले हो।”
भोला मुस्कुरा दिया।
तभी मंदिर के अंदर तेज प्रकाश फैल गया।
भोला ने आँखें बंद कर लीं।
कुछ क्षण बाद उसने आँखें खोलीं तो साधु वहाँ नहीं थे।
शिवलिंग के सामने एक बेलपत्र रखा था, जबकि मंदिर में उस समय कोई और मौजूद नहीं था।
भोला की आँखों से आँसू निकल आए।
वह समझ गया कि उसके महादेव ने उसकी परीक्षा ली थी।
उसी समय बाहर आसमान में बादल गरजने लगे।
कुछ ही देर में तेज बारिश शुरू हो गई।
गाँव के लोग खुशी से घरों से बाहर निकल आए।
बारिश का पानी सीधे उसी साफ किए गए तालाब में भरने लगा।
किसानों के चेहरे पर खुशी लौट आई।
भोला मंदिर के बाहर खड़ा बारिश देख रहा था।
उसकी माँ उसके पास आईं।
“देखा बेटा, महादेव ने सुन ली।”
भोला मुस्कुराया।
“माँ, महादेव ने सिर्फ हमारी प्रार्थना नहीं सुनी। उन्होंने हमें यह भी सिखाया कि प्रार्थना के साथ कर्म करना जरूरी है।”
कुछ महीनों बाद गाँव की फसल अच्छी हुई।
गाँव में फिर खुशियाँ लौट आईं।
मुखिया ने भोला को सम्मानित करना चाहा, लेकिन उसने मना कर दिया।
उसने कहा, “मैंने कुछ नहीं किया। मैंने तो बस वही किया जो मेरे महादेव मुझे सिखाते हैं।”
पुजारी ने मुस्कुराकर कहा, “यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी खूबी है भोला।”
सालों बाद भी देवगाँव में भोला की कहानी सुनाई जाती रही।
लोग कहते थे कि महादेव अपने भक्तों की परीक्षा जरूर लेते हैं, लेकिन सच्चे भक्त की पहचान उसकी मांगों से नहीं, उसके कर्मों से होती है।
भोला ने कभी महादेव से धन नहीं मांगा।
उसने कभी अपने लिए महल नहीं मांगा।
उसने केवल दूसरों की खुशी मांगी।
और शायद इसी वजह से महादेव ने उसे वह दिया जो किसी धन से नहीं खरीदा जा सकता—
अटूट विश्वास।
आज भी देवगाँव के उस पुराने शिव मंदिर में सावन के दिनों में जब घंटियाँ बजती हैं, तो बुजुर्ग बच्चों को भोला की कहानी सुनाते हैं और कहते हैं—
“महादेव को पाने के लिए बड़ा भक्त बनने की जरूरत नहीं। बस मन सच्चा रखो, कर्म अच्छे रखो और किसी जरूरतमंद की मदद करने से कभी पीछे मत हटो। भोलेनाथ अपने भोले भक्त का हाथ कभी नहीं छोड़ते।”
और मंदिर में फिर वही आवाज गूंजती है—
“हर हर महादेव!”

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं