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    बहन की राखी और भाई की मजबूरी

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    बहन की राखी और भाई की मजबूरी

     

    गाँव के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में सीमा अपनी माँ के साथ रहती थी। उसका बड़ा भाई रमेश शहर में मजदूरी करता था। पिता के गुजर जाने के बाद रमेश ही घर की जिम्मेदारी संभाल रहा था।

     

    हर साल रक्षा बंधन पर रमेश किसी भी हालत में घर जरूर आता था। सीमा पूरे साल उस दिन का इंतज़ार करती थी।

     

    इस बार भी रक्षा बंधन से कुछ दिन पहले सीमा ने बाजार से एक सुंदर-सी राखी खरीदी। राखी को देखकर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    वह माँ से बोली,

    “माँ, इस बार भैया आएँगे तो मैं उन्हें यही राखी बाँधूँगी। फिर भैया से अपनी पसंद की मिठाई भी बनवाऊँगी।”

     

    माँ ने मुस्कुराकर कहा,

    “हाँ बेटी, तेरा भैया जरूर आएगा।”

     

    लेकिन माँ के चेहरे की चिंता सीमा से छिपी नहीं थी।

     

    उधर शहर में रमेश एक निर्माण स्थल पर काम कर रहा था। अचानक काम के दौरान उसके पैर में चोट लग गई। डॉक्टर ने कुछ दिनों तक आराम करने की सलाह दी। कई दिनों तक काम न करने के कारण उसकी मजदूरी भी रुक गई।

     

    रमेश के पास घर लौटने के लिए किराए तक के पैसे नहीं थे।

     

    रक्षा बंधन से एक दिन पहले सीमा ने भाई को फोन किया।

     

    “भैया, कब आ रहे हो? मैंने आपके लिए राखी खरीदी है।”

     

    कुछ पल तक रमेश चुप रहा। फिर बोला,

    “सीमा… इस बार शायद मैं घर नहीं आ पाऊँगा।”

     

    सीमा की आवाज़ धीमी हो गई।

    “क्यों भैया?”

     

    रमेश ने अपनी परेशानी छिपाते हुए कहा,

    “बस काम बहुत है। छुट्टी नहीं मिल रही।”

     

    फोन कटने के बाद रमेश की आँखें भर आईं। वह जानता था कि सीमा को उसकी सच्चाई पता चल गई तो वह और दुखी होगी।

     

    अगली सुबह सीमा ने राखी की थाली सजाई। माँ ने पूछा,

    “बेटी, तूने खाना क्यों नहीं खाया?”

     

    सीमा ने कहा,

    “भैया आते तो पहले उन्हें खिलाती।”

     

    दोपहर हो गई। फिर शाम भी होने लगी, लेकिन रमेश नहीं आया।

     

    सीमा बार-बार घर के दरवाजे की ओर देखती रही।

     

    तभी डाकिया एक छोटा-सा पैकेट लेकर आया।

     

    “सीमा के नाम है।”

     

    सीमा ने पैकेट खोला। उसमें एक नई साड़ी, कुछ मिठाई और एक छोटा-सा पत्र था।

     

    पत्र में लिखा था—

     

    “प्यारी सीमा,

    इस बार तेरी कलाई पर राखी बाँधने के लिए मैं सामने नहीं हूँ। इसका मुझे बहुत दुख है। लेकिन मजबूरी ने मुझे रोक लिया। तू मेरी कलाई पर राखी नहीं बाँध पा रही है, फिर भी याद रखना, तेरी राखी का धागा मेरे दिल से बंधा है।

    जल्द ही घर आऊँगा।

    तेरा भैया, रमेश।”

     

    पत्र पढ़ते-पढ़ते सीमा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उसने राखी को अपने सीने से लगा लिया और बोली,

    “माँ, भैया नहीं आए तो क्या हुआ… उनकी मजबूरी तो हमारे साथ ही है।”

     

    माँ ने बेटी को गले लगा लिया।

     

    कुछ दिनों बाद रमेश वापस गाँव आया। उसके हाथ में ज्यादा पैसे नहीं थे, लेकिन बहन के लिए एक छोटी-सी चॉकलेट जरूर थी।

     

    सीमा उसे देखते ही दौड़कर भाई से लिपट गई।

     

    रमेश बोला,

    “माफ कर दे बहना, उस दिन तेरी राखी नहीं बंधवा पाया।”

     

    सीमा ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “भैया, राखी तो उस दिन भी आपके हाथ में बंधी थी… बस धागा मेरी कलाई से नहीं, मेरे दिल से बंधा था।”

     

    रमेश की आँखों में आँसू आ गए।

     

    सीमा ने राखी निकाली और इस बार अपने भाई की कलाई पर बाँध दी।

     

    रमेश ने बहन के सिर पर हाथ रखकर कहा,

    “जब तक मैं हूँ, तुझे किसी चीज़ की कमी नहीं होने दूँगा।”

     

    सीमा मुस्कुराई।

     

    उस दिन दोनों ने समझा कि रक्षा बंधन सिर्फ राखी बाँधने का त्योहार नहीं, बल्कि उस रिश्ते का नाम है जिसमें दूरियाँ और मजबूरियाँ भी भाई-बहन के प्यार को कमजोर नहीं कर सकतीं।

     

    सीख: सच्चे रिश्ते हालात के मोहताज नहीं होते। मजबूरी इंसान को दूर कर सकती है, लेकिन सच्चा प्यार दिलों को हमेशा करीब रखता है।