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टैग: #प्यार #दर्द #बेकारी

  • प्यार में धोखा

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    जिसने किया सच्चा प्यार

     

    राघव तीस साल का एक सफल बिजनेसमैन था। कभी उसके नाम से पूरा शहर उसे पहचानता था। करोड़ों का कारोबार, आलीशान बंगला, महंगी गाड़ियाँ और बैंक बैलेंस… उसके पास हर वह चीज़ थी जिसकी लोग सिर्फ कल्पना करते हैं। लेकिन इतनी दौलत होने के बाद भी उसके दिल में एक खालीपन था। वह चाहता था कि कोई उसे उसके पैसों के लिए नहीं, बल्कि उसके दिल के लिए प्यार करे।

     

    एक दिन उसकी मुलाकात नंदिनी से हुई। नंदिनी खूबसूरत होने के साथ-साथ बातों की भी बहुत तेज थी। वह इतनी मीठी बातें करती कि सामने वाला आसानी से उस पर भरोसा कर ले। राघव भी उसके प्यार में पूरी तरह डूब गया।

     

    धीरे-धीरे दोनों रोज मिलने लगे। नंदिनी हर बार कहती, “राघव, तुम मेरी जिंदगी हो। तुम्हारे बिना मैं अधूरी हूँ।”

     

    ये बातें सुनकर राघव का दिल खुशी से भर जाता। उसने पहली बार किसी पर इतना भरोसा किया था।

     

    कुछ महीनों बाद नंदिनी ने उससे कहा, “मम्मी की तबीयत बहुत खराब है। इलाज के लिए पैसों की जरूरत है।”

     

    राघव ने बिना कुछ पूछे लाखों रुपये दे दिए।

     

    फिर कभी उसने बिजनेस शुरू करने के लिए पैसे मांगे, कभी फ्लैट खरीदने के लिए, तो कभी किसी रिश्तेदार की मदद के नाम पर। हर बार राघव ने मुस्कुराते हुए उसकी मदद की। उसे लगता था कि आखिर वह अपनी होने वाली पत्नी के लिए ही तो सब कर रहा है।

     

    धीरे-धीरे राघव ने अपनी कई प्रॉपर्टी, निवेश और कंपनी के शेयर भी नंदिनी के नाम कर दिए।

     

    दो साल गुजर गए।

     

    एक शाम राघव ने एक खूबसूरत अंगूठी खरीदी और नंदिनी के पास पहुंचा।

     

    वह मुस्कुराते हुए बोला, “अब हमें शादी कर लेनी चाहिए।”

     

    नंदिनी का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उसने ठंडी आवाज़ में कहा, “शादी? मैं तुमसे शादी क्यों करूँ?”

     

    राघव हैरान रह गया।

     

    “लेकिन… तुम तो मुझसे प्यार करती हो।”

     

    नंदिनी हंस पड़ी।

     

    “मैंने तुमसे नहीं, तुम्हारे पैसों से प्यार किया था। अब मेरे पास सब कुछ है। तुम्हारी जरूरत खत्म हो चुकी है।”

     

    इतना कहकर उसने एक अमीर आदमी का हाथ पकड़ा और वहां से चली गई।

     

    राघव वहीं जमीन पर बैठ गया। उसकी आंखों के सामने सब खत्म हो चुका था।

     

    कुछ ही दिनों में उसे पता चला कि उसके नाम पर भारी कर्ज भी चढ़ चुका है। कंपनी हाथ से निकल गई। बंगला बिक गया। बैंक अकाउंट खाली हो गए।

     

    जिस इंसान ने दूसरों की मदद की थी, आज वही खुद मदद मांगने लायक भी नहीं बचा।

     

    धीरे-धीरे वह सदमे में डूब गया।

     

    उसका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा।

     

    वह सड़कों पर भटकने लगा। कभी किसी पार्क में बैठ जाता, कभी किसी मंदिर की सीढ़ियों पर रात गुजार देता।

     

    उसके बाल बिखरे रहते, कपड़े फटे हुए थे और चेहरे पर हमेशा खोई हुई नजरें रहतीं।

     

    वह हर आने-जाने वाली लड़की को देखकर बस एक ही नाम पुकारता—

     

    “नंदिनी… तुम लौट आई क्या?”

     

    लोग उसे पागल समझकर हंसते।

     

    कुछ बच्चे उसके पीछे पत्थर फेंकते।

     

    कुछ लोग मोबाइल निकालकर वीडियो बनाते और मजाक उड़ाते।

     

    लेकिन किसी ने उसके टूटे हुए दिल को समझने की कोशिश नहीं की।

     

    एक दिन तेज बारिश हो रही थी।

     

    राघव सड़क किनारे भीगा हुआ बैठा था। कई दिनों से उसने ठीक से खाना भी नहीं खाया था।

     

    उसी समय वहां से पच्चीस साल की एक लड़की गुजरी।

     

    उसका नाम मीरा था।

     

    मीरा बचपन से अनाथ थी। उसने अनाथ आश्रम में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की थी और अब एक छोटे अस्पताल में नर्स की नौकरी करती थी।

     

    उसने जैसे ही राघव को देखा, उसके कदम वहीं रुक गए।

     

    उसकी आंखों में दया नहीं, अपनापन था।

     

    वह पास आई और धीरे से बोली,

    “भैया… आपने कुछ खाया है?”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा, लेकिन कुछ बोला नहीं।

     

    मीरा पास की दुकान से खाना और पानी लेकर आई।

     

    राघव पहले तो चुपचाप उसे देखता रहा, फिर धीरे-धीरे खाना खाने लगा।

     

    उस दिन के बाद मीरा रोज उसी रास्ते से आने लगी। हर शाम वह उसके लिए खाना लेकर आती, दवा लाती और कुछ देर उसके पास बैठती।

     

    उसे नहीं पता था कि यह आदमी कौन है। बस इतना जानती थी कि यह इंसान बहुत गहरे दर्द में है।

     

    एक दिन राघव तेज बुखार में सड़क पर बेहोश हो गया।

     

    मीरा घबरा गई।

     

    उसने लोगों से मदद मांगी, लेकिन कोई आगे नहीं आया।

     

    आखिर वह अकेले ही एक रिक्शा बुलाकर राघव को अस्पताल ले गई।

     

    वहीं से उसकी जिंदगी बदलने लगी…

     

    अस्पताल में डॉक्टर ने राघव की जांच करने के बाद कहा, “इन्हें सिर्फ बुखार नहीं है, ये बहुत गहरे मानसिक सदमे से भी गुजर रहे हैं। अगर इनकी ठीक से देखभाल नहीं हुई तो इनकी हालत और बिगड़ सकती है।”

     

    मीरा ने बिना एक पल सोचे कहा, “इनका इलाज शुरू कीजिए डॉक्टर साहब।”

     

    डॉक्टर ने पूछा, “इनके घर वाले कहाँ हैं?”

     

    मीरा कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “आज से मैं ही इनकी जिम्मेदारी हूँ।”

     

    इलाज के बाद मीरा राघव को अपने छोटे-से किराए के घर ले आई। घर में सिर्फ एक कमरा था, एक छोटी-सी रसोई और कुछ जरूरी सामान। लेकिन उस छोटे से घर में अपनापन बहुत था।

     

    पड़ोसियों ने तरह-तरह की बातें बनानी शुरू कर दीं।

     

    “एक अनजान पागल आदमी को घर में रख लिया है।”

     

    “कल को कोई मुसीबत आ गई तो?”

     

    लेकिन मीरा ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया।

     

    वह रोज समय पर राघव को दवा देती, खाना खिलाती और उससे बातें करने की कोशिश करती। कई बार राघव घंटों तक चुप बैठा रहता। कभी अचानक रोने लगता, तो कभी नंदिनी का नाम लेकर चीख उठता।

     

    मीरा बस उसके पास बैठ जाती और कहती, “रो लो… कभी-कभी आँसू ही सबसे बड़ी दवा होते हैं।”

     

    धीरे-धीरे कई महीने बीत गए।

     

    राघव की हालत पहले से काफी बेहतर होने लगी। अब वह लोगों को पहचानने लगा था। एक दिन उसने पहली बार मीरा से पूछा,

     

    “तुम मेरे लिए इतना सब क्यों कर रही हो? मैं तुम्हारा कौन लगता हूँ?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते। कभी-कभी इंसानियत भी दो अजनबियों को अपना बना देती है।”

     

    राघव की आँखें भर आईं।

     

    उसने कांपती आवाज़ में अपनी पूरी कहानी मीरा को सुनाई। कैसे उसने अपने प्यार पर भरोसा किया, कैसे सब कुछ उसके नाम कर दिया और कैसे उसी इंसान ने उसे सड़क पर ला खड़ा किया।

     

    सब सुनने के बाद मीरा ने सिर्फ इतना कहा,

     

    “गलती तुम्हारी नहीं थी। तुमने प्यार किया था, सौदा नहीं।”

     

    ये शब्द राघव के दिल में उतर गए।

     

    उसने उसी दिन फैसला किया कि वह अब अपनी जिंदगी फिर से शुरू करेगा।

     

    मीरा ने उसकी हिम्मत बढ़ाई। उसने अपने कुछ जान-पहचान वालों से बात की और राघव को एक छोटी कंपनी में नौकरी दिलवा दी।

     

    राघव ने पूरी ईमानदारी से काम करना शुरू किया। वह सुबह से रात तक मेहनत करता। धीरे-धीरे लोगों का भरोसा फिर से जीतने लगा।

     

    कुछ सालों बाद उसने अपनी बचत से एक छोटा-सा कारोबार शुरू किया। इस बार उसने हर कदम बहुत सोच-समझकर रखा।

     

    उसका काम धीरे-धीरे बढ़ने लगा।

     

    एक दिन उसने अपनी पहली कमाई से मीरा के लिए एक साधारण-सी साड़ी खरीदी।

     

    मीरा ने साड़ी हाथ में लेकर मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “ये मेरे लिए दुनिया का सबसे कीमती तोहफा है।”

     

    राघव बोला,

     

    “क्योंकि इसमें करोड़ों रुपये नहीं, मेरी मेहनत और तुम्हारे विश्वास की खुशबू है।”

     

    समय के साथ दोनों एक-दूसरे के और करीब आ गए।

     

    एक शाम राघव उसी सड़क पर मीरा को ले गया, जहाँ उसने पहली बार उसे खाना खिलाया था।

     

    वह घुटनों के बल बैठ गया और जेब से एक छोटी-सी अंगूठी निकालते हुए बोला,

     

    “जब सबने मेरा साथ छोड़ दिया था, तब तुमने मेरा हाथ थामा। मेरे पास अब पहले जैसी दौलत नहीं है, लेकिन एक सच्चा दिल जरूर है। क्या तुम मेरी जिंदगी का हिस्सा बनोगी?”

     

    मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    वह मुस्कुराकर बोली,

     

    “मैंने तुमसे कभी तुम्हारी दौलत की वजह से प्यार नहीं किया। मुझे तो उस इंसान से प्यार हो गया, जो टूटकर भी किसी से नफरत करना नहीं सीख पाया।”

     

    राघव ने कांपते हाथों से उसे अंगूठी पहना दी।

     

    कुछ दिनों बाद दोनों की बहुत सादगी से शादी हुई। न कोई शोर, न कोई दिखावा। सिर्फ कुछ अपने लोग और ढेर सारी दुआएँ।

     

    शादी के बाद राघव और मीरा ने मिलकर एक छोटा-सा सेवा केंद्र शुरू किया, जहाँ सड़क पर रहने वाले बेसहारा लोगों को मुफ्त खाना, कपड़े और दवाइयाँ दी जाती थीं। राघव जब भी किसी टूटे हुए इंसान को देखता, उसे अपना पुराना समय याद आ जाता। वह हर किसी से कहता, “मुश्किल वक्त हमेशा नहीं रहता, लेकिन हिम्मत रखने वाले लोग जरूर टिके रहते हैं।” मीरा उसके साथ खड़ी मुस्कुराती रहती। दोनों ने मिलकर कई अनाथ बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा उठाया। अब उनकी सबसे बड़ी खुशी दौलत कमाना नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी में उम्मीद की नई किरण जगाना बन चुकी थी।

     

    कुछ समय बाद राघव ने उसी अनाथ आश्रम में एक बड़ा पुस्तकालय बनवाया, जहाँ मीरा ने अपना बचपन बिताया था। उसने वहाँ पढ़ने वाले हर बच्चे की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने का संकल्प लिया। जब बच्चों ने उसे “राघव भैया” कहकर गले लगाया, तो उसकी आँखें भर आईं। उसे लगा कि भगवान ने उससे सब कुछ छीनकर उसे उससे भी बड़ी दौलत दे दी है लोगों की दुआएँ और मीरा जैसा सच्चा जीवनसाथी।

     

    एक दिन मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे राघव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अगर उस दिन मुझे धोखा न मिलता, तो शायद मैं कभी सच्चे प्यार की पहचान नहीं कर पाता।”

     

    मीरा ने उसका हाथ थाम लिया और बोली,

    “भगवान कभी-कभी हमारी राह मुश्किल जरूर बनाते हैं, लेकिन मंजिल हमेशा खूबसूरत देते हैं।”

     

    राघव ने आसमान की ओर देखा। उसके चेहरे पर इस बार दर्द नहीं, सुकून था।

     

    उसे आखिरकार वह मिल चुका था जिसकी तलाश उसे बरसों से थी सच्चा प्यार, जो पैसों से नहीं, दिल से किया जाता है।