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टैग: #प्यार #अहसास

  • रक्षाबंधन

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    रक्षाबंधन की सुबह कबीर अपने कमरे में बैठा पुरानी फाइलों को देख रहा था।

     

    बाहर से उसकी छोटी बहन सिया की आवाज आई—

     

    “भैया! जल्दी बाहर आओ, राखी बांधनी है।”

     

    कबीर ने जल्दी से फाइल बंद कर दी।

     

    “आ रहा हूं।”

     

    सिया पूजा की थाली लेकर बैठी थी। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह शरारती मुस्कान थी।

     

    “आज भी देर से आए।”

     

    कबीर ने हंसते हुए कहा,

     

    “अरे मैडम, भाई हूं आपका, कोई स्कूल का बच्चा नहीं।”

     

    सिया ने कहा,

     

    “मेरे लिए तो आप हमेशा बच्चे ही रहोगे।”

     

    कबीर बैठ गया।

     

    सिया ने तिलक लगाया, मिठाई खिलाई और उसकी कलाई पर सुंदर-सी राखी बांध दी।

     

    फिर वह तुरंत बोली,

     

    “अब गिफ्ट दो।”

     

    कबीर ने जेब से एक छोटा-सा लिफाफा निकाला।

     

    “लो।”

     

    सिया ने खोला।

     

    उसमें पैसे थे।

     

    सिया ने लिफाफा वापस कर दिया।

     

    “नहीं चाहिए।”

     

    कबीर हैरान हुआ।

     

    “हर साल तो गिफ्ट के पीछे पड़ जाती है।”

     

    सिया ने कहा,

     

    “इस बार मुझे कुछ नहीं चाहिए।”

     

    “तबियत तो ठीक है?”

     

    सिया हंस पड़ी।

     

    “बिल्कुल।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “फिर क्या बात है?”

     

    सिया ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “इस बार गिफ्ट मैं दूंगी।”

     

    कबीर हंस पड़ा।

     

    “मुझे?”

     

    “हां।”

     

    “और क्या देगी?”

     

    सिया उठकर अपने कमरे में गई।

     

    कुछ देर बाद वह एक बड़ा-सा लिफाफा लेकर आई।

     

    उसने कबीर के हाथ में रखा।

     

    “खोलो।”

     

    कबीर ने लिफाफा खोला।

     

    अंदर कुछ कागज थे।

     

    उन्हें पढ़ते ही उसका चेहरा बदल गया।

     

    वह कुछ देर तक चुप रहा।

     

    फिर उसने सिया की तरफ देखा।

     

    “ये कहां से मिले?”

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “घर में।”

     

    कबीर के हाथ कांपने लगे।

     

    वे कागज उसके पुराने कॉलेज एडमिशन के थे।

     

    कई साल पहले कबीर को संगीत की पढ़ाई के लिए एक बड़े संस्थान में दाखिला मिला था।

     

    वह बचपन से गायक बनना चाहता था।

     

    उसे गाना बहुत पसंद था।

     

    स्कूल के हर कार्यक्रम में वह हिस्सा लेता।

     

    जब भी घर में कोई मेहमान आता, सिया तुरंत कहती—

     

    “भैया, गाना सुनाओ ना।”

     

    कबीर हंसकर कहता,

     

    “तू मेरी मैनेजर है क्या?”

     

    सिया गर्व से कहती,

     

    “हां।”

     

    लेकिन वह सपना कभी पूरा नहीं हुआ।

     

    उसी समय पिता का काम बंद हो गया था।

     

    घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गई।

     

    सिया की पढ़ाई भी चल रही थी।

     

    कबीर ने बिना किसी से ज्यादा बात किए अपना दाखिला छोड़ दिया।

     

    वह नौकरी करने लगा।

     

    कुछ सालों में पिता की हालत सुधरी, सिया ने पढ़ाई पूरी की और नौकरी करने लगी।

     

    लेकिन कबीर ने फिर कभी अपने सपने की बात नहीं की।

     

    वह कहता,

     

    “अब ये सब बचपन की बातें हैं।”

     

    सिया को हमेशा लगता था कि भाई ने सच में अपने सपने भुला दिए हैं।

     

    लेकिन एक दिन उसने कबीर को कमरे में अकेले पुराने गाने सुनते देखा।

     

    उसकी आंखें बंद थीं।

     

    और वह धीरे-धीरे गुनगुना रहा था।

     

    सिया वहीं रुक गई।

     

    उसे समझ आ गया—

     

    सपना खत्म नहीं हुआ था। बस भाई ने उसे छिपा दिया था।

     

    उसने चुपचाप कबीर के पुराने कागज ढूंढे।

     

    और महीनों तक जानकारी जुटाती रही।

     

    उसने एक स्थानीय संगीत प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में पता किया।

     

    आवेदन किया।

     

    कबीर की पुरानी रिकॉर्डिंग ढूंढी।

     

    उसकी अनुमति के बिना कुछ भी अंतिम नहीं किया, लेकिन जरूरी जानकारी के लिए पिता से मदद ली।

     

    और आखिरकार…

     

    कबीर का चयन एक विशेष संगीत प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए हो गया।

     

    सिया ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “भैया, लिफाफे में आगे का कागज भी देखो।”

     

    कबीर ने दूसरा पत्र निकाला।

     

    उसमें चयन की जानकारी थी।

     

    उसने धीरे से पढ़ा।

     

    फिर दोबारा पढ़ा।

     

    “सिया…”

     

    उसकी आवाज रुक गई।

     

    “ये क्या है?”

     

    सिया ने कहा,

     

    “आपका राखी का गिफ्ट।”

     

    कबीर ने तुरंत कागज वापस कर दिए।

     

    “नहीं।”

     

    सिया ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “मैं अब ये नहीं कर सकता।”

     

    “क्यों नहीं?”

     

    “बहुत देर हो गई।”

     

    सिया ने कहा,

     

    “किसके लिए?”

     

    “सपनों के लिए।”

     

    सिया का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “भैया, सपनों की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।”

     

    कबीर हल्का-सा हंस पड़ा।

     

    “तू बहुत बड़ी बातें करने लगी है।”

     

    सिया ने कहा,

     

    “क्योंकि आपने छोटी बहन को बड़ा होने दिया।”

     

    कबीर चुप हो गया।

     

    सिया की आंखें भर आईं।

     

    “आपको याद है, जब मैं स्कूल में रो रही थी कि मुझे आगे पढ़ने नहीं जाना?”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “आपने कहा था—डर के कारण अपने सपने मत छोड़ना।”

     

    कबीर चुप रहा।

     

    “आज वही बात आपको वापस कर रही हूं।”

     

    कबीर ने नजरें झुका लीं।

     

    “लेकिन घर?”

     

    सिया ने तुरंत कहा,

     

    “घर संभाल लेंगे।”

     

    “पैसे?”

     

    “मैं हूं।”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “हर बार सिर्फ भाई ही क्यों कहे—मैं हूं ना?”

     

    उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “आज मुझे कहने दो।”

     

    कबीर कुछ नहीं बोल पाया।

     

    सिया ने उसके हाथ पकड़ लिए।

     

    “भैया, आपने मेरी पढ़ाई के लिए अपना सपना छोड़ा था।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “मैंने अपनी मर्जी से किया था।”

     

    “हां।”

     

    “तू बोझ नहीं थी।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    सिया की आवाज कांपने लगी।

     

    “लेकिन अब मुझे अपने भाई को देखकर ये नहीं सोचना कि उसने मेरे लिए कुछ अधूरा छोड़ दिया।”

     

    कबीर की आंखें भर आईं।

     

    वह बोला,

     

    “मैंने कभी तुझसे ये उम्मीद नहीं रखी।”

     

    सिया ने कहा,

     

    “ये आपकी उम्मीद नहीं है।”

     

    उसने उसकी राखी वाली कलाई को देखा।

     

    “ये मेरी राखी का वादा है।”

     

    कुछ देर तक कमरे में बिल्कुल शांति थी।

     

    फिर कबीर ने धीरे से पूछा,

     

    “अगर मैं असफल हो गया तो?”

     

    सिया ने कहा,

     

    “तो फिर कोशिश करोगे।”

     

    “और अगर लोग हंसेंगे?”

     

    “तो मैं भी हंस दूंगी।”

     

    कबीर हंस पड़ा।

     

    “बहुत अच्छी बहन है तू।”

     

    सिया ने तुरंत कहा,

     

    “अब पता चला?”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    लेकिन कबीर की आंखों में अब भी आंसू थे।

     

    वह उठकर अपने कमरे में गया।

     

    कुछ देर बाद वह हाथ में एक पुराना माइक लेकर आया।

     

    वह खिलौने जैसा छोटा माइक था।

     

    सिया ने उसे देखते ही पहचान लिया।

     

    “ये अभी तक रखा है?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “तूने दिया था।”

     

    सिया को याद आया।

     

    बचपन में उसने अपनी गुल्लक तोड़कर कबीर के लिए वह माइक खरीदा था।

     

    तब कबीर ने कहा था—

     

    “जब मैं बड़ा गायक बनूंगा, तो पहला गाना तुझे सुनाऊंगा।”

     

    सिया की आंखें भर आईं।

     

    “आपने अपना वादा भूल गए थे।”

     

    कबीर ने माइक की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “शायद नहीं।”

     

    सिया ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “शायद मुझे याद दिलाने के लिए आज की राखी का इंतजार था।”

     

    कुछ महीनों बाद कबीर ने संगीत की ट्रेनिंग शुरू कर दी।

     

    शुरुआत आसान नहीं थी।

     

    काम और ट्रेनिंग साथ संभालनी पड़ती थी।

     

    कभी वह थक जाता।

     

    कभी कहता,

     

    “छोड़ देता हूं।”

     

    तब सिया कहती,

     

    “राखी देखो।”

     

    कबीर अपनी कलाई की तरफ देखता।

     

    “हर बार यही कहेगी?”

     

    “हां।”

     

    “कब तक?”

     

    “जब तक आप खुद अपने सपने से भागना बंद नहीं कर देते।”

     

    धीरे-धीरे कबीर फिर से बदलने लगा।

     

    उसकी आवाज में पहले जैसा आत्मविश्वास लौट आया।

     

    वह छोटे कार्यक्रमों में गाने लगा।

     

    एक दिन उसने घर आकर कहा,

     

    “सिया!”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आज मुझे पहला भुगतान मिला।”

     

    सिया दौड़कर उसके पास आई।

     

    “सच?”

     

    कबीर ने पैसे उसकी तरफ बढ़ाए।

     

    “तेरा गिफ्ट।”

     

    सिया ने तुरंत मना कर दिया।

     

    “नहीं।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    सिया ने कहा,

     

    “मुझे पैसे नहीं चाहिए।”

     

    “तो?”

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “वही सुनना है जो आपने बचपन में कहा था।”

     

    कबीर समझ गया।

     

    उसने कहा,

     

    “पहला गाना?”

     

    सिया ने सिर हिलाया।

     

    कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तैयार हो मैनेजर?”

     

    सिया हंस पड़ी।

     

    “हमेशा।”

     

    कुछ दिनों बाद घर की छत पर दोनों बैठे थे।

     

    सिया ने वही पुराना खिलौना माइक उसके हाथ में दिया।

     

    “लो।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “ये अब भी संभालकर रखा है?”

     

    “क्योंकि मुझे पता था, एक दिन इसकी जरूरत पड़ेगी।”

     

    कबीर ने गाना शुरू किया।

     

    वह कोई बड़ा मंच नहीं था।

     

    न सामने हजारों लोग थे।

     

    बस एक बहन थी।

     

    और उसका भाई था।

     

    गाना खत्म हुआ तो सिया की आंखें नम थीं।

     

    उसने कहा,

     

    “भैया, आज मेरा राखी का गिफ्ट पूरा हुआ।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “कैसे?”

     

    सिया ने कहा,

     

    “क्योंकि इस बार आपने मुझे कुछ खरीदा हुआ नहीं दिया।”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “तो क्या दिया?”

     

    सिया ने उसकी कलाई पर बंधी राखी को छूते हुए कहा,

     

    “आपने मुझे मेरा वही पुराना भाई वापस दे दिया, जिसके पास सपने थे।”

     

    कबीर की आंखें नम हो गईं।

     

    उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    उस दिन दोनों को समझ आया कि रक्षाबंधन सिर्फ रक्षा का त्योहार नहीं है।

     

    कभी-कभी एक बहन भी अपने भाई के सपनों की रक्षा करती है।

     

    और कभी…

     

    राखी का सबसे बड़ा गिफ्ट कोई चीज नहीं होती।

     

    वह किसी अपने को फिर से खुद पर विश्वास करना सिखाना होता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • बहन की राखी और भाई का राज़

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बहन की राखी और भाई का राज़

     

    शहर के एक छोटे से मोहल्ले में सिया अपनी माँ के साथ रहती थी। रक्षाबंधन में बस दो दिन बाकी थे और सिया पूरे घर को सजाने में लगी थी।

     

    लेकिन एक बात उसे अंदर ही अंदर परेशान कर रही थी।

     

    उसका बड़ा भाई आकाश पिछले कुछ महीनों से बहुत बदल गया था।

     

    पहले वह हर छोटी-बड़ी बात अपनी बहन को बताता था। सिया को कोई परेशानी होती तो सबसे पहले आकाश को फोन करती। लेकिन अब आकाश फोन तो करता था, मगर कुछ मिनट बात करके जल्दी से फोन रख देता।

     

    सिया कई बार पूछ चुकी थी,

     

    “भैया, आप मुझसे कुछ छिपा रहे हो क्या?”

     

    आकाश हर बार हंसकर कहता,

     

    “नहीं पगली, ऐसी कोई बात नहीं है।”

     

    लेकिन सिया को यकीन नहीं होता।

     

    इस बार रक्षाबंधन पर उसने आकाश के लिए खुद राखी बनाई थी। राखी के बीच में एक छोटा-सा चांदी का दिल लगा था।

     

    वह राखी हाथ में लेकर मुस्कुराई।

     

    “देखना भैया, इस बार आपसे एक बड़ा गिफ्ट लूंगी।”

     

    माँ ने पीछे से आवाज लगाई,

     

    “पहले भाई को आने तो दे।”

     

    सिया ने हंसकर कहा,

     

    “आएगा क्यों नहीं? उसने खुद कहा है कि इस बार रक्षाबंधन मेरे साथ मनाएगा।”

     

    लेकिन अगले ही दिन आकाश का फोन आया।

     

    “सिया, इस बार शायद मैं घर नहीं आ पाऊंगा।”

     

    सिया कुछ सेकंड चुप रही।

     

    “क्यों?”

     

    “काम बहुत है।”

     

    “आपने वादा किया था।”

     

    “पता है… लेकिन मजबूरी है।”

     

    “आपकी मजबूरी क्या है?”

     

    आकाश चुप हो गया।

     

    फिर बोला,

     

    “राखी संभालकर रखना। मैं जल्दी आने की कोशिश करूंगा।”

     

    फोन कट गया।

     

    सिया को गुस्सा आ गया।

     

    “हर बार यही! जरूर कुछ छिपा रहे हैं।”

     

    उस रात सिया ने तय किया कि वह खुद पता लगाएगी।

     

    अगली सुबह उसने आकाश के पुराने दोस्त करण को फोन किया।

     

    “करण भैया, आपको पता है आकाश भैया इन दिनों इतने परेशान क्यों रहते हैं?”

     

    करण कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “सिया, मुझे नहीं लगता कि मुझे तुम्हें बताना चाहिए।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि आकाश खुद चाहता है कि तुमसे ये बात छिपी रहे।”

     

    सिया का दिल धड़क उठा।

     

    “मतलब कोई बड़ी बात है?”

     

    करण ने धीरे से कहा,

     

    “तुम उससे खुद पूछो।”

     

    “आप बस इतना बता दो कि वो ठीक हैं?”

     

    करण ने जवाब दिया,

     

    “हां, वो ठीक हैं।”

     

    लेकिन इस जवाब ने सिया की चिंता और बढ़ा दी।

     

    रक्षाबंधन की सुबह आ गई।

     

    घर में मिठाई बन रही थी। माँ ने पूजा की थाली सजा दी थी। सिया ने भी नए कपड़े पहन लिए थे।

     

    लेकिन उसका भाई अब तक नहीं आया था।

     

    दोपहर हो गई।

     

    फिर शाम।

     

    सिया बार-बार दरवाजे की तरफ देखती।

     

    माँ ने समझाया,

     

    “बेटा, शायद काम में फंस गया होगा।”

     

    सिया ने धीमे से कहा,

     

    “माँ, मुझे लगता है भैया किसी परेशानी में हैं।”

     

    तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    सिया दौड़कर बाहर गई।

     

    सामने आकाश खड़ा था।

     

    चेहरे पर थकान थी, कपड़े भी सफर की वजह से थोड़े अस्त-व्यस्त थे।

     

    लेकिन हाथ में मिठाई का डिब्बा था।

     

    सिया उसे देखते ही कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “आपने कहा था नहीं आओगे।”

     

    आकाश मुस्कुराया,

     

    “अपनी बहन की राखी छोड़कर कैसे रहता?”

     

    सिया ने उसकी तरफ ध्यान से देखा।

     

    “भैया… आप ठीक तो हो?”

     

    “बिल्कुल।”

     

    “झूठ।”

     

    आकाश हंस पड़ा।

     

    “अंदर चल।”

     

    सिया ने पूजा की थाली तैयार की।

     

    आकाश उसके सामने बैठ गया।

     

    सिया ने तिलक लगाया, आरती की और फिर अपनी बनाई हुई राखी निकाली।

     

    उसने राखी आकाश की कलाई पर बांध दी।

     

    “अब बताइए।”

     

    आकाश ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “आपका राज़।”

     

    आकाश की मुस्कान अचानक गायब हो गई।

     

    माँ भी चुप हो गईं।

     

    आकाश ने कुछ देर अपनी राखी को देखा।

     

    फिर जेब से एक पुराना लिफाफा निकाला।

     

    उसने लिफाफा सिया की तरफ बढ़ाया।

     

    “इसे खोल।”

     

    सिया ने लिफाफा खोला।

     

    अंदर कुछ कागज थे।

     

    वह उन्हें पढ़ने लगी।

     

    उसकी आंखें अचानक बड़ी हो गईं।

     

    “ये क्या है?”

     

    आकाश ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हारे कॉलेज की फीस की रसीदें।”

     

    सिया ने हैरानी से पूछा,

     

    “लेकिन मेरी फीस तो…”

     

    “पिछले दो साल से मैं भर रहा हूं।”

     

    सिया कुछ बोल नहीं पाई।

     

    “माँ ने कहा था कि अब घर की हालत ऐसी नहीं कि तुम्हारी पढ़ाई का पूरा खर्च उठा सकें। मैंने सोचा, जब तक मैं हूं, तुम्हारी पढ़ाई नहीं रुकेगी।”

     

    सिया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “लेकिन आपने मुझे बताया क्यों नहीं?”

     

    आकाश मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तू अपनी पढ़ाई को लेकर कभी चिंता न करे।”

     

    सिया ने सिर झुका लिया।

     

    फिर अचानक उसकी नजर आकाश के हाथ पर पड़ी।

     

    उसकी कलाई पर हल्की चोट का निशान था।

     

    “ये कैसे हुआ?”

     

    आकाश ने हाथ पीछे कर लिया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “भैया!”

     

    आकाश चुप रहा।

     

    सिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “सच बताइए।”

     

    आकाश ने लंबी सांस ली।

     

    “कुछ दिन पहले काम से लौटते समय रास्ते में गिर गया था।”

     

    “और आपने मुझे बताया तक नहीं?”

     

    “तू परेशान हो जाती।”

     

    सिया की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मैं आपकी बहन हूं। आपकी परेशानी में परेशान होने का हक भी मेरा है।”

     

    आकाश कुछ नहीं बोला।

     

    तभी माँ ने धीमे से कहा,

     

    “सिया, अभी एक बात और है जो तुझे नहीं पता।”

     

    सिया ने माँ की तरफ देखा।

     

    माँ ने कहा,

     

    “तेरे भैया ने पिछले महीने अपनी बाइक बेच दी।”

     

    “क्या?”

     

    सिया ने आकाश की तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    आकाश चुप रहा।

     

    माँ बोलीं,

     

    “तेरे कॉलेज की आगे की पढ़ाई और हॉस्टल की फीस के लिए।”

     

    सिया की आंखों से आंसू लगातार बहने लगे।

     

    वह आकाश के पास जाकर बैठ गई।

     

    “भैया… आपको बाइक बहुत पसंद थी ना?”

     

    आकाश मुस्कुराया।

     

    “थी।”

     

    “फिर बेच दी?”

     

    “बाइक दोबारा खरीदी जा सकती है।”

     

    “लेकिन…”

     

    “लेकिन मेरी बहन की पढ़ाई का समय दोबारा नहीं आएगा।”

     

    सिया ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।

     

    “आप इतने अच्छे क्यों हो?”

     

    आकाश ने हंसकर कहा,

     

    “क्योंकि तू इतनी परेशान करने वाली बहन है।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    लेकिन सिया का मन अभी भी भारी था।

     

    उसने राखी वाली कलाई को अपने हाथों में लिया।

     

    “भैया, आज मैं भी आपको एक वादा करूंगी।”

     

    “क्या?”

     

    “मैं आपकी मेहनत बेकार नहीं जाने दूंगी।”

     

    आकाश ने उसे देखा।

     

    “मतलब?”

     

    “मैं खूब पढ़ूंगी। अपने पैरों पर खड़ी होऊंगी। और एक दिन आपको वो सब वापस दूंगी जो आपने मेरे लिए छोड़ा है।”

     

    आकाश ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे तुझसे कुछ वापस नहीं चाहिए।”

     

    “लेकिन मुझे देना है।”

     

    “क्यों?”

     

    सिया ने उसकी राखी की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “क्योंकि आपने मेरी कलाई पर नहीं, मेरी जिंदगी पर भरोसे का धागा बांधा है।”

     

    आकाश की आंखें भी नम हो गईं।

     

    उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “बस एक बात याद रखना।”

     

    “क्या?”

     

    “जिंदगी में कितनी भी मुश्किल आए, अपने सपनों से समझौता मत करना।”

     

    सिया ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “वादा।”

     

    कुछ साल बाद सिया ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली।

     

    उसे एक अच्छी नौकरी मिल गई।

     

    पहली तनख्वाह मिलते ही वह बाजार गई और एक डिब्बा लेकर घर लौटी।

     

    आकाश ने पूछा,

     

    “क्या लाई है?”

     

    सिया ने डिब्बा उसकी तरफ बढ़ाया।

     

    अंदर एक सुंदर घड़ी थी।

     

    आकाश ने हैरानी से पूछा,

     

    “मेरे लिए?”

     

    सिया ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “उस बाइक की जगह तो नहीं ले सकती जो आपने मेरे लिए बेच दी थी… लेकिन ये आपकी मेहनत की पहली छोटी-सी वापसी है।”

     

    आकाश की आंखें भर आईं।

     

    सिया ने उसकी कलाई देखी।

     

    वही कलाई, जिस पर सालों पहले उसने एक छोटी-सी राखी बांधी थी।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “भैया, आपका राज़ मुझे बहुत देर से पता चला।”

     

    आकाश मुस्कुराया।

     

    “और अब?”

     

    “अब समझ आया कि कुछ भाई अपनी बहन को सिर्फ राखी का तोहफा नहीं देते…”

     

    वह कुछ पल रुकी।

     

    “वे अपनी जिंदगी का एक हिस्सा उसके सपनों के नाम कर देते हैं।”

     

    आकाश ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    और उस दिन सिया को एहसास हुआ—

     

    राखी का धागा कलाई पर कुछ पल के लिए बंधता है, लेकिन भाई का प्यार पूरी जिंदगी साथ रहता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं