एकतरफा मोहब्बत
लविश की उम्र चालीस साल थी। शहर में उसका नाम एक बड़े बिजनेसमैन के तौर पर जाना जाता था। कई कंपनियां, आलीशान घर, महंगी गाड़ियां और हर सुविधा उसके पास थी। लेकिन इन सबके बावजूद उसकी जिंदगी में एक खालीपन था, जिसे वह खुद भी ठीक से समझ नहीं पाता था।
फिर एक दिन उसकी मुलाकात लावण्या से हुई।
लावण्या इक्कीस साल की कॉलेज स्टूडेंट थी। हंसमुख, आत्मविश्वासी और अपनी पढ़ाई को लेकर काफी गंभीर। उसे दिखावे वाली जिंदगी बिल्कुल पसंद नहीं थी। वह अपने दम पर कुछ बनना चाहती थी।
लविश की मुलाकात उससे पहली बार एक कॉलेज के कार्यक्रम में हुई, जहां उसकी कंपनी ने विद्यार्थियों के लिए एक स्कॉलरशिप कार्यक्रम रखा था।
लावण्या मंच पर खड़ी होकर अपने प्रोजेक्ट के बारे में बता रही थी।
लविश की नजर अचानक उसी पर जाकर रुक गई।
उसने बहुत सी खूबसूरत लड़कियां देखी थीं, लेकिन लावण्या में उसे कुछ अलग लगा। शायद उसका आत्मविश्वास, शायद उसकी बात करने का तरीका या शायद उसकी आंखों में अपने सपनों को पूरा करने की चमक।
कार्यक्रम खत्म हुआ तो लावण्या अपने दोस्तों के साथ बाहर निकलने लगी।
तभी लविश ने उसे आवाज दी।
“लावण्या?”
वह पलटकर बोली, “जी?”
“तुम्हारा प्रोजेक्ट काफी अच्छा था।”
लावण्या मुस्कुराई।
“थैंक यू।”
“तुम आगे क्या करना चाहती हो?”
“अपना खुद का बिजनेस शुरू करना चाहती हूं।”
लविश के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
“अच्छा सपना है।”
लावण्या ने हंसते हुए कहा, “सपना नहीं सर, प्लान है। सपना होता तो शायद मैं इतनी मेहनत नहीं करती।”
उसकी बात सुनकर लविश कुछ पल चुप रहा।
उस दिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि वह लड़की सिर्फ खूबसूरत नहीं थी, बल्कि उसके अंदर कुछ बनने की जिद भी थी।
समय बीतता गया।
लविश किसी न किसी बहाने कॉलेज के कार्यक्रमों में आने लगा। कभी स्कॉलरशिप की मीटिंग, कभी विद्यार्थियों के प्रोजेक्ट की समीक्षा।
और लगभग हर बार उसकी नजर लावण्या को ही ढूंढती।
लावण्या के लिए लविश सिर्फ एक सम्मानित बिजनेसमैन था।
लेकिन लविश के लिए बात धीरे-धीरे बदल चुकी थी।
उसे लावण्या की छोटी-छोटी बातें याद रहने लगीं।
उसे याद था कि लावण्या चाय में ज्यादा चीनी पसंद नहीं करती।
उसे याद था कि वह बारिश में भीगने के बजाय छतरी लेकर चलती है।
उसे याद था कि परीक्षा के दिनों में वह देर रात तक पढ़ती थी।
लावण्या को इन बातों का अंदाजा तक नहीं था।
एक शाम कॉलेज से निकलते समय लावण्या की मुलाकात लविश से हुई।
“आप यहां?”
लविश ने सहजता से कहा, “बस एक मीटिंग थी।”
लावण्या ने सिर हिलाया।
“अच्छा।”
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर लविश ने पूछा, “तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है?”
“बहुत अच्छी। अगले महीने मेरे फाइनल प्रोजेक्ट की प्रेजेंटेशन है।”
“ऑल द बेस्ट।”
“थैंक यू।”
लावण्या अपने रास्ते चली गई।
लविश उसे जाते हुए देखता रहा।
उसके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन दिल में एक अजीब-सी बेचैनी।
वह जानता था कि दोनों की उम्र में बहुत अंतर है।
वह यह भी जानता था कि लावण्या की जिंदगी अभी शुरू ही हुई थी।
उसके अपने सपने थे, अपनी दुनिया थी।
और शायद सबसे बड़ी बात यह थी कि लावण्या ने कभी उसे उस नजर से देखा ही नहीं था।
फिर भी लविश के दिल में उसके लिए भावनाएं बढ़ती चली गईं।
एक दिन उसके दोस्त समीर ने उससे कहा,
“तू पिछले कुछ महीनों से बदला-बदला सा है। बात क्या है?”
लविश चुप रहा।
समीर ने हंसते हुए कहा, “कहीं प्यार-व्यार तो नहीं हो गया?”
लविश ने कुछ नहीं कहा।
समीर समझ गया।
“कौन है?”
लविश ने धीमे से कहा, “लावण्या।”
समीर कुछ पल चुप रहा।
“वही कॉलेज वाली लड़की?”
“हां।”
“लविश, तू चालीस का है और वो इक्कीस की।”
“मुझे पता है।”
“और क्या उसे भी पता है कि तू उसके बारे में ऐसा सोचता है?”
लविश ने सिर हिला दिया।
“नहीं।”
समीर ने गंभीर होकर कहा,
“तो फिर पहले खुद से पूछ कि तुझे उसका साथ चाहिए या सिर्फ उसकी जिंदगी में अपनी जगह चाहिए। दोनों चीजों में फर्क होता है।”
लविश को उसकी बात दिल पर लगी।
उस रात वह देर तक सो नहीं पाया।
अगले दिन उसने फैसला किया कि वह लावण्या पर अपनी भावनाएं नहीं थोपेगा।
वह उससे प्यार करता था, लेकिन उसके प्यार का मतलब यह नहीं था कि लावण्या भी उसे पसंद करे।
कुछ दिन बाद लावण्या अपनी प्रेजेंटेशन के लिए परेशान थी।
उसका प्रोजेक्ट बार-बार फेल हो रहा था।
लविश को जब पता चला तो उसने सिर्फ इतना कहा,
“अगर तुम्हें किसी सलाह की जरूरत हो तो बता देना। फैसला तुम्हारा होगा।”
लावण्या ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।
“आप सच में मेरी मदद करेंगे?”
“अगर मेरी सलाह तुम्हारे काम आए तो जरूर।”
लावण्या ने उसकी मदद ली।
लविश ने उसे रास्ता दिखाया, लेकिन प्रोजेक्ट खुद नहीं बनाया। उसने हमेशा उसकी मेहनत का सम्मान किया।
कुछ हफ्तों बाद लावण्या का प्रोजेक्ट कॉलेज में सबसे अच्छा चुना गया।
वह खुशी से लविश के पास आई।
“सर! मेरा प्रोजेक्ट सिलेक्ट हो गया।”
लविश मुस्कुराया।
“मुझे पता था तुम कर लोगी।”
लावण्या ने उत्साह में कहा,
“आपकी वजह से हुआ।”
“नहीं,” लविश ने कहा, “मेरी वजह से नहीं। तुमने मेहनत की थी।”
लावण्या के मन में उस दिन लविश के लिए सम्मान और बढ़ गया।
लेकिन प्यार?
वह भावना अभी भी उसके दिल में नहीं थी।
कुछ समय बाद लावण्या को एक बड़ी कंपनी में इंटर्नशिप मिल गई। वह अपने सपनों की तरफ बढ़ने लगी।
लविश दूर से उसकी सफलता देखता रहा।
एक दिन समीर ने फिर पूछा,
“अब भी उससे प्यार करता है?”
लविश मुस्कुराया।
“हां। शायद हमेशा करूंगा।”
“फिर उसे बता क्यों नहीं देता?”
लविश ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,
“क्योंकि प्यार सिर्फ अपनी बात कह देना नहीं होता। कभी-कभी सामने वाले की आजादी को समझना भी प्यार होता है।”
समीर चुप हो गया।
कुछ दिनों बाद लावण्या लविश से मिलने आई।
उसने कहा,
“सर, मुझे एक बात बतानी है। मुझे दूसरी कंपनी से ऑफर मिला है। मैं शायद दूसरे शहर चली जाऊंगी।”
लविश के दिल को जैसे एक पल के लिए झटका लगा।
लेकिन उसने मुस्कुराते हुए कहा,
“तो फिर जाना चाहिए।”
“आपको बुरा नहीं लगेगा?”
“क्यों लगेगा?”
“आपने हमेशा मेरी मदद की है।”
लविश ने कहा,”मैं चाहता हूं कि तुम अपनी जिंदगी अपने तरीके से जियो। अगर मेरी वजह से तुम्हारे कदम रुक गए तो मेरी सारी मदद बेकार हो जाएगी।”
लावण्या की आंखें नम हो गईं।”आप बहुत अच्छे इंसान हैं।”
लविश हल्का-सा मुस्कुराया।
“बस इतना ही काफी है।”
लावण्या चली गई।
दरवाजा बंद होते ही लविश कुछ पल वहीं खड़ा रहा।
उसकी आंखों में दर्द था, लेकिन चेहरे पर सुकून।
उसने अपनी मोहब्बत को पाने की कोशिश नहीं की थी।
उसने उसे आजाद छोड़ दिया था।
क्योंकि लविश समझ चुका था कि सच्ची मोहब्बत हमेशा साथ रहने का नाम नहीं होती।
कभी-कभी किसी की खुशी के लिए पीछे हट जाना भी मोहब्बत होती है।
और लावण्या?
वह अपनी जिंदगी में आगे बढ़ती रही।
शायद उसे कभी पता नहीं चला कि एक चालीस साल का बिजनेसमैन उसे कितनी गहराई से चाहता था।
लेकिन अगर कभी उसे यह बात पता भी चलती, तो शायद वह यही कहती
“लविश ने मुझे पाया नहीं था, लेकिन उसने मुझे मेरी मंजिल तक पहुंचने से कभी रोका भी नहीं।”
और शायद यही उसकी एकतरफा मोहब्बत की सबसे खूबसूरत बात थी।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं