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टैग: दोस्ती दर्द रोमांच

  • टूटी दोस्ती

    टूटी दोस्ती

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    टूटी दोस्ती

     

    विद्युत और वेदांत। दो नाम जो एक समय में एक ही साँस की तरह जुड़े हुए थे। छोटे से कस्बे की वह गली आज भी वैसी ही है, जहाँ दोनों ने बचपन के अनगिनत दिन बिताए थे। गली के कोने वाला नीम का पेड़ अभी भी खड़ा है, हालाँकि उसकी छाया अब उतनी घनी नहीं रही। उस पेड़ के नीचे बैठकर दोनों ने कितनी कहानियाँ गढ़ी थीं, कितने सपने देखे थे, और कितने वादे किए थे कि हम हमेशा साथ रहेंगे।

     

    विद्युत का घर गली के शुरू में था और वेदांत का बिलकुल आखिर में। दोनों की उम्र में मुश्किल से छह महीने का अंतर था। कक्षा पहली से ही एक ही बेंच पर बैठना शुरू किया था। विद्युत थोड़ा शरारती था भागना, चढ़ना, लड़ना उसकी आदत थी। वेदांत शांत और सोचने वाला। जहाँ विद्युत दीवार फाँदकर स्कूल के बगीचे से आम तोड़ लाता, वहाँ वेदांत खड़ा रहकर पहरा देता और फिर दोनों मिलकर खाते। एक की जेब में यदि पाँच रुपये होते तो दोनों के हिस्से में आ जाते। एक के घर में यदि रोटी कम पड़ती तो दूसरा चुपचाप अपनी थाली से बाँट लेता।

     

    गर्मियों की दोपहरें नीम की छाया में बीततीं। दोनों पत्थरों से घर बनाते, कागज़ की नावें बनाकर नाले में छोड़ते, और शाम को क्रिकेट खेलते। विद्युत हमेशा बल्लेबाज बनना चाहता, वेदांत गेंदबाजी करता। हार-जीत का कोई अर्थ नहीं होता था। हारने वाला भी हँसता और जीतने वाला भी। रात को छत पर लेटकर तारे गिनते। विद्युत कहता, “वेदांत, जब बड़े होंगे तो एक साथ शहर जाएँगे। बड़ा मकान लेंगे, और हमेशा साथ रहेंगे।” वेदांत सिर हिलाता, “हाँ, हमेशा।” उस ‘हमेशा’ में कितना विश्वास था, आज याद करके भी दिल बैठ जाता है।

     

    स्कूल के दिनों में दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे लगते। विद्युत की माँ कहतीं, “वेदांत को बुला ला, वरना तू खाना नहीं खाएगा।” वेदांत के पिता कहते, “विद्युत के बिना तू चुप क्यों रहता है?” दोनों के परिवार भी एक-दूसरे से घुल-मिल गए थे। त्योहार एक साथ मनाए जाते, बीमार होने पर एक के घर का व्यक्ति दूसरे के घर पहुँच जाता।

     

    कक्षा आठवीं तक सब कुछ वैसा ही रहा। फिर धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। विद्युत का परिवार आर्थिक तंगी से गुज़र रहा था। उसके पिता की नौकरी चली गई। घर में तनाव बढ़ गया। विद्युत पहले जैसा खुश नहीं रहता था। वह बातें कम करने लगा। वेदांत पूछता, “क्या हुआ?” विद्युत टाल देता, “कुछ नहीं।” एक दिन विद्युत ने स्कूल की फीस नहीं भरी। मास्टर साहब ने कक्षा में नाम पुकारा। विद्युत का चेहरा लाल हो गया। वेदांत ने उस दिन अपनी जमा पूँजी से फीस भर दी। विद्युत ने कहा था, “मैं वापस कर दूँगा।” वेदांत ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “दोस्तों में हिसाब नहीं होता।”

     

    लेकिन समय के साथ दूरी बढ़ने लगी। विद्युत को ट्यूशन के पैसे कमाने के लिए एक दुकान पर काम करना पड़ा। वह स्कूल के बाद सीधे दुकान चला जाता। वेदांत खेलने जाता, अकेला। पहले तो इंतज़ार करता, फिर आदत पड़ गई। विद्युत थककर घर लौटता, बात करने का मन नहीं होता। वेदांत नई दोस्ती बनाने लगा कक्षा के अन्य लड़कों से। विद्युत को यह अच्छा नहीं लगा। एक दिन उसने कह दिया, “तुम अब हमें भूल गए हो।” वेदांत ने जवाब दिया, “तुम खुद समय नहीं निकालते।” छोटी-सी बात थी, लेकिन दिल में चुभ गई।

     

    कक्षा दसवीं में बात और बिगड़ी। स्कूल में वार्षिक समारोह था। नाटक होना था। दोनों को मुख्य भूमिकाएँ मिलीं। रिहर्सल के दौरान विद्युत बार-बार लेट आता। एक दिन निर्देशक ने उसे डाँटा। वेदांत ने बीच में कहा, “सर, इनके घर की स्थिति ठीक नहीं है। थोड़ी छूट दे दीजिए।” विद्युत को यह बात नागवार गुज़री। शाम को उसने वेदांत से कहा, “मुझे दया की ज़रूरत नहीं। तुम सबके सामने मेरी बेइज़्ज़ती क्यों करते हो?” वेदांत हैरान रह गया। उसने समझाया, “मैंने मदद की थी।” लेकिन विद्युत ने सुनना ही नहीं चाहा। “तुम हमेशा खुद को बड़ा समझते हो। मुझे तुम्हारी सलाह की ज़रूरत नहीं।” उस दिन दोनों में पहली बार तीखी बहस हुई। नीम के पेड़ के नीचे बैठे-बैठे आवाज़ें ऊँची हो गईं। आसपास के लोग सुन रहे थे। विद्युत ने गुस्से में कहा, “दोस्ती खत्म।” वेदांत चुप रहा। उसकी आँखें भर आई थीं, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

     

    उसके बाद दोनों ने एक-दूसरे से बात करना बंद कर दिया। एक ही कक्षा में बैठते, लेकिन नज़रें नहीं मिलाते। पहले जो बेंच साझा करते थे, अब अलग-अलग कोनों में बैठने लगे। दोस्त पूछते, “क्या हुआ तुम दोनों को?” दोनों जवाब देते, “कुछ नहीं।” लेकिन अंदर कुछ टूट चुका था।

     

    बारहवीं के बाद विद्युत ने पढ़ाई छोड़ दी। घर की ज़िम्मेदारी संभालनी थी। वह एक कारखाने में काम करने लगा। वेदांत कॉलेज चला गया शहर। जाने से पहले उसने एक बार विद्युत के घर का चक्कर लगाया। विद्युत बाहर खड़ा था। दोनों की नज़रें मिलीं। वेदांत ने मुँह खोला, कुछ कहना चाहा, लेकिन विद्युत ने मुँह फेर लिया। वेदांत चला गया। उस दिन नीम के पेड़ की पत्तियाँ ज़ोर-ज़ोर से हिल रही थीं, जैसे कोई पुरानी याद झड़ रही हो।

     

    साल बीतते गए। वेदांत ने शहर में अच्छी नौकरी कर ली। शादी हुई, बच्चे हुए। जीवन व्यवस्थित हो गया। लेकिन कभी-कभी रात में नींद नहीं आती तो बचपन याद आ जाता। विद्युत कहाँ होगा? क्या करता होगा? उसने कई बार कस्बे लौटने की सोची, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया। अंदर एक डर था क्या विद्युत अब भी नाराज़ होगा? क्या वह मिलना भी चाहेगा?

     

    विद्युत कस्बे में ही रहा। मेहनत की, छोटे स्तर का व्यापार शुरू किया। शादी हुई, एक बेटा हुआ। जीवन चलता रहा, लेकिन अकेलापन उसका साथी बन गया। वह कभी-कभी नीम के पेड़ के नीचे बैठ जाता। पुरानी बातें याद आतीं कागज़ की नावें, आम के पेड़, छत पर तारे। दिल भारी हो जाता। एक बार उसने वेदांत का नंबर किसी से पूछा। नंबर मिल गया। फ़ोन उठaya, नंबर दबाया, लेकिन कॉल कट कर दी। हिम्मत नहीं हुई।

     

    बीस साल बाद एक दिन वेदांत को अपने पिता की बीमारी की खबर मिली। वह कस्बे लौटा। अस्पताल में पिता भर्ती थे। शाम को वह पुरानी गली में पहुँचा। नीम का पेड़ अभी भी खड़ा था। उसके नीचे एक आदमी बैठा था बाल सफ़ेद, चेहरा थका हुआ। वेदांत ने पहचाना विद्युत। दिल ज़ोर से धड़का। वह पास गया।

     

    “विद्युत…” आवाज़ में कंपन था।

     

    विद्युत ने सिर उठाया। दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। बीस साल का सन्नाटा उनके बीच खड़ा था। वेदांत बोला, “कैसे हो?”

     

    विद्युत ने हल्के से मुस्कुराया, “जी रहा हूँ। तुम?”

     

    “ठीक हूँ।”

     

    बातें रुक-रुक कर हुईं। पुरानी यादों का ज़िक्र किसी ने नहीं किया। जैसे दोनों जानते हों कि वह ज़ख़्म अभी भी कच्चा है। वेदांत ने कहा, “बाबा बीमार हैं। मैं कुछ दिन रुकूँगा।” विद्युत ने सिर हिलाया, “अगर कुछ ज़रूरत हो तो बताना।”

     

    अगले कुछ दिनों में दोनों कभी-कभी मिलते। चाय पीते, मौसम की बात करते, बच्चों की बात करते। लेकिन बचपन वाली वह आसानी नहीं थी। बातों में एक दीवार सी खड़ी रहती। एक शाम वेदांत ने हिम्मत जुटाई। नीम के पेड़ के नीचे बैठे-बैठे बोला, “उस दिन की बात… नाटक वाली… मुझे माफ़ कर दो। मैंने तुम्हें छोटा नहीं समझा था। सिर्फ़ मदद करनी थी।”

     

    विद्युत देर तक चुप रहा। फिर धीरे से बोला, “मैं जानता था। लेकिन उस समय इतना गुस्सा था कि सुन नहीं पाया। घर की हालत, पैसे की तंगी… सब कुछ मिलकर गुस्सा बन गया था। तुम पर निकाल दिया। बाद में पछताया, लेकिन तुम चले गए थे।”

     

    वेदांत की आँखें भर आईं। “मैं भी हठी था। एक बार बात कर लेता।”

     

    दोनों चुप हो गए। हवा में नीम की खुशबू तैर रही थी। विद्युत बोला, “दोस्ती टूट गई थी उस दिन। अब उसे जोड़ा नहीं जा सकता। बहुत समय बीत गया।”

     

    वेदांत ने सिर हिलाया। “हाँ। कुछ चीज़ें वापस नहीं आतीं। बचपन वाली वह बेफिक्री, वह विश्वास… अब कहाँ?”

     

    वे बात करते रहे। पुरानी शरारतें याद कीं, हँसे भी। लेकिन हँसी में वह पुरानापन नहीं था। जैसे कोई पुरानी किताब खोलकर पढ़ रहे हों, जिसके पन्ने पीले पड़ चुके हों।

     

    वेदांत के पिता ठीक हो गए। लौटने का समय आ गया। स्टेशन पर विद्युत पहुँचा। दोनों ने हाथ मिलाया। वेदांत बोला, “ख्याल रखना।” विद्युत ने जवाब दिया, “तुम भी।” ट्रेन चली। विद्युत देर तक प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा रहा।

     

    वापस गली में आकर वह नीम के पेड़ के नीचे बैठ गया। आँखें बंद कीं। यादों का सैलाब आ गया कागज़ की नावें बहती हुई, आम के पेड़ पर चढ़ना, छत पर लेटकर सपने देखना, और वह वादा “हमेशा साथ रहेंगे।” आँखें खुल गईं। पेड़ की पत्तियाँ हिल रही थीं। विद्युत ने धीरे से कहा, “हमेशा… कितना आसान लगता था तब।”

     

    दूर शहर में वेदांत ट्रेन की खिड़की से बाहर देख रहा था। मन में वही बात घूम रही थी। दोस्ती टूट गई थी। सालों बाद मिलना हुआ, बातें हुईं, माफ़ी भी माँगी गई। लेकिन जो टूट चुका था, वह जुड़ नहीं पाया। बस एक हल्की सी गर्माहट रह गई थी पुरानी राख में दबी हुई।

     

    बचपन की दोस्ती अनोखी होती है। उसमें कोई शर्त नहीं होती, कोई हिसाब नहीं होता। बस एक विश्वास होता है कि दूसरा हमेशा रहेगा। लेकिन जीवन के रास्ते कभी-कभी इतने अलग हो जाते हैं कि वह विश्वास टूट जाता है। और एक बार टूट जाए तो फिर चाहे कितनी भी कोशिश कर लो, वह पुराना रूप वापस नहीं आता। बस यादें रह जाती हैं मीठी भी, कड़वी भी। और एक सवाल काश उस दिन थोड़ा और समझदार होते।

     

     

     

    विद्युत और वेदांत की कहानी अब सिर्फ़ यादों में बची है। गली का नीम का पेड़ अभी भी खड़ा है। कभी-कभी शाम को जब हवा चलती है तो लगता है जैसे दो बच्चे अभी भी उसकी छाया में बैठे हों हँस रहे हों, सपने देख रहे हों, और कह रहे हों, “हमेशा साथ रहेंगे।” लेकिन हकीकत में वे दोनों अब अलग-अलग दुनिया में हैं। दोस्ती टूट चुकी है। और कुछ टूटी हुई चीज़ें जीवन भर अधूरी ही रह जाती हैं।

  • संभाल के रखो यार…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    संभाल कर रखो जो भी हासिल है,

     

    *बाद में वो मन्नतों से भी नहीं मिलता दोस्त..*

     

     

    ❤️😇

  • काश उस दिन मैने

    काश उस दिन मैने

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Writer Lakshmi Kumari

    Story titel “काश उस दिन मैंने…”

     

    बारिश की बूंदें आज कुछ ज़्यादा ही तेज़ थीं… जैसे आसमान भी किसी के बिछड़ने का ग़म मना रहा हो। सड़क के किनारे खड़ा अर्जुन भीगता रहा… लेकिन उसे परवाह नहीं थी। उसकी आँखों में खालीपन था… और दिल में सिर्फ एक ही आवाज़ गूंज रही थी।।

     

    “काश उस दिन मैंने अपने दिल की सुन ली होती…”

     

    उसने अपनी मुट्ठी कस ली, सामने कब्रिस्तान था और एक कब्र पर नाम लिखा था “रोहन”

     

    उस नाम को देखते ही उसकी सांसें भारी हो गईं… और यादों का सैलाब उसे बहा ले गया।

     

    कॉलेज का पहला दिन हर तरफ नए चेहरे नई उम्मीदें और थोड़ी सी घबराहट थी।

     

    अर्जुन क्लास के एक कोने में बैठा था… सिर झुकाए… किताब खोलकर। वह हमेशा से ऐसा ही था चुप चाप, सीधा, अपनी दुनिया में रहने वाला लड़का।

     

    तभी किसी ने उसके सामने कुर्सी खींची “भाई, यहाँ बैठ जाऊं? या ये सीट भी तेरी तरह अकेली रहना चाहती है?”

     

    अर्जुन ने सिर उठाया—एक लड़का मुस्कुरा रहा था… आँखों में शरारत और चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    “बैठ जाओ…” अर्जुन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

     

    “वैसे नाम क्या है तेरा? मैं रोहन… कॉलेज का फ्यूचर सुपरस्टार”

     

    अर्जुन हँस पड़ा “मैं अर्जुन… बस एक आम इंसान…”

     

    तभी पीछे से एक धीमी आवाज आई“अगर आम लोगों की बात हो रही है… तो मैं भी शामिल हो सकता हूँ?”

     

    दोनों ने मुड़कर देखा, एक लंबा, शांत लड़का… जिसकी आँखों में गहराई थी।

     

    उसने अपना हाथ आगे “कबीर…” उसने अपना नाम बताया।

     

    बस… वहीं से शुरू हुई एक ऐसी दोस्ती… जो वक्त के साथ और गहरी होती चली गई।

     

    तीनों साथ बैठते साथ हँसते साथ लड़ते और फिर खुद ही मना भी लेते।

     

    एक दिन कैंटीन में बैठे-बैठे रोहन ने कहा “यार, अगर हमारी दोस्ती पर कोई फिल्म बने ना… तो सुपरहिट जाएगी!”

     

    कबीर मुस्कुराया “लेकिन उसका एंडिंग sad नहीं होना चाहिए…”

     

    अर्जुन ने हाथ बढ़ाया “तो वादा करते हैं… हम कभी अलग नहीं होंगे”

     

    तीनों ने एक-दूसरे के हाथ पर हाथ रखा “हमेशा साथ”

     

    सब कुछ सही चल रहा था… जब तक सिया नाम की लड़की उनकी जिंदगी में नहीं आई थी

     

    पहली बार जब सिया क्लास में आई… तो जैसे वक्त थम गया। उसकी आँखों में मासूमियत थी… और मुस्कान में एक सुकून।

     

    धीरे-धीरे तीनों उससे दोस्ती करने लगे… और अनजाने में तीनों के दिल में उसके लिए एक खास जगह बन गई।

     

    लेकिन… किसी ने कुछ कहा नहीं, एक रात हॉस्टल की छत पर बैठे हुए रोहन बोला “यार… मुझे लगता है मैं सिया को पसंद करने लगा हूँ…”

     

    अर्जुन चुप हो गया… क्योंकि वह भी यही महसूस कर रहा था।

     

    कबीर ने हल्की मुस्कान के साथ कहा “तो बता दे उसे…”

     

    लेकिन उसके दिल में हलचल थी क्योंकि वह भी सिया को चाहता था।

     

    तीनों दोस्त… एक ही लड़की से प्यार करने लगे थे… और किसी को इसका अंदाज़ा नहीं था।

     

    कुछ दिनों बाद अर्जुन ने हिम्मत जुटाई और एक चिट्ठी लिखी।

     

    उसके हाथ काँप रहे थे… लेकिन दिल साफ था “सिया मैं तुम्हें पसंद करता हूँ… शायद ये सही समय नहीं है… लेकिन मैं और छुपा नहीं सकता हूं”

     

    उसने वह चिट्ठी कबीर को दी “यार… तू इसे सिया तक पहुँचा दे… मुझसे नहीं होगा…”

     

    कबीर ने चिट्ठी ली… और उसकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी आ गई। वह अकेले में गया… और चिट्ठी को देखा…

     

    कुछ पल के लिए वह चुप रहा… फिर धीरे-धीरे चिट्ठी को फाड़ दिया।

     

    उसके हाथ काँप रहे थे “मुझे माफ कर देना अर्जुन…”

     

    फिर वह अर्जुन के पास आया “यार… सिया ने मना कर दिया…”

     

    अर्जुन की आँखों में एक पल को उम्मीद चमकी… फिर बुझ गई।

     

    “ओह… ठीक है…” उसने मुस्कुराने की कोशिश की… लेकिन उसकी आवाज टूट गई।

     

    उस रात… अर्जुन बहुत रोया।

     

    अब कबीर अपने झूठ में फंस चुका था। कुछ दिनों बाद रोहन ने कहा “मैं सिया को प्रपोज करने वाला हूँ…”

     

    कबीर का दिल फिर से डगमगाया “नहीं… तू नहीं कर सकता…” उसने जल्दी से कहा।

     

    “क्यों?” रोहन ने पूछा, “क्योंकि अर्जुन और सिया एक-दूसरे को पसंद करते हैं…”

     

    रोहन सन्न रह गया “क्या? लेकिन उसने कभी बताया नहीं…”

     

    “शायद वो तुझसे छुपा रहा है…” कबीर ने झूठ को और गहरा कर दिया।

     

    रोहन का चेहरा उतर गया “ठीक है अगर ऐसा है  तो मैं पीछे हट जाऊँगा।”

     

    धीरे-धीरे… तीनों के बीच खामोशी आ गई।

     

    एक दिन…

     

    “तूने मुझसे झूठ क्यों बोला?” रोहन ने अर्जुन से पूछा।

     

    “मुझ से झूठ तो तुम दोनों ने बोला!” अर्जुन चिल्लाया।

     

    “तू सिया से प्यार करता है और मुझे बताया तक नहीं!” रोहन का गुस्सा फूट पड़ा।

     

    अर्जुन हैरान था “क्या? मैंने कब कहा ऐसा?”

     

    कबीर बीच में आया “बस करो”

     

    “तू चुप रह!” दोनों एक साथ बोले।

     

    उस दिन… उनकी दोस्ती बिखर गई।

     

     

    कुछ महीनों बाद रोहन की मुलाकात सिया से हुई। “तुम लोग इतने दूर क्यों हो गए?” सिया ने पूछा।

     

    रोहन ने सब बताया।

     

    सिया चौंक गई “मुझे तो कभी कोई चिट्ठी मिली ही नहीं…”

     

    रोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “क्या…?”

     

    उसे सब समझ आ गया। वह भागा… अर्जुन के पास… सब सच बताने…

     

     

    बारिश हो रही थी… सड़क फिसलन भरी थी…

     

    रोहन जल्दी में था… उसके दिल में सिर्फ एक बात थी।

     

    “मुझे अर्जुन से माफी मांगनी है…”

     

    लेकिन एक तेज़ रफ्तार ट्रक ने रोहर को टक्कर मार दी

     

     

    अर्जुन और कबीर दौड़ते हुए अस्पताल पहुँचे।

     

    रोहन ICU में था… साँसें टूट रही थीं। अर्जुन उसका हाथ पकड़कर रो पड़ा “रोहन उठ जा प्लीज।”

     

    रोहन ने धीरे से आँखें खोलीं “अर्जुन” उसकी आवाज कमजोर थी…

     

    “मुझे… सच पता चल गया…”

     

    अर्जुन की आँखें भर आईं “कुछ मत बोल… तू ठीक हो जाएगा…”

     

    रोहन मुस्कुराया “काश… उस दिन… मैंने अपने दिल की सुन ली होती और तुझसे पूछ लिया होता…”

     

    उसने कबीर की तरफ देखा “और तू… अपने दिल से मत भागना…”

     

    इतना कहकर… उसकी सांस रुक गई।

     

     

    अर्जुन जमीन पर बैठ गया “नहीं रोहन नहीं…”

     

    कबीर फूट-फूट कर रोने लगा “मैंने उसे मार दिया… ये सब मेरी गलती है…”

     

     

    आज अर्जुन और कबीर रोहन की कब्र के सामने खड़े थे।

     

    हवा शांत थी… लेकिन दिलों में तूफान उठा हुआ था।

     

    अर्जुन बोला “काश… उस दिन हम एक बार बैठकर बात कर लेते…”

     

    कबीर रोते हुए बोला “काश… उस दिन मैंने अपने दिल की सुन ली होती… और सच बता दिया होता।”

     

    दोनों ने कब्र पर हाथ रखा “हम तुझे कभी नहीं भूलेंगे।”

     

     

    कुछ कहानियाँ अधूरी रह जाती हैं कुछ गलतफहमियाँ जिंदगी छीन लेती हैं और कुछ पछतावे उम्र भर साथ चलते हैं तीनों की दोस्ती खत्म हो गई…

     

    लेकिन एक सच्चाई हमेशा गूंजती रहेगी “काश उस दिन हमने अपने दिल की सुन ली होती।”