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  • इकलौता वारिस

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अगस्त्या—इकलौता वारिस

     

    अगस्त्या कपूर नाम ही काफी था। देश की सबसे बड़ी कंपनियों में गिनी जाने वाली कपूर एंड संस का इकलौता वारिस था वह। करोड़ों की संपत्ति, आलीशान बंगला, महंगी गाड़ियां और हर कदम पर लोगों की भीड़—उसकी जिंदगी में ऐसी कोई चीज नहीं थी जो वह खरीद नहीं सकता था।

     

    लेकिन एक चीज थी जिसे वह बिल्कुल नहीं चाहता था—शादी।

     

    अगस्त्या की उम्र तीस साल थी। देखने में शांत, गंभीर और हमेशा अपने काम में डूबा रहने वाला लड़का। सुबह से रात तक कंपनी के काम में लगा रहता। मीटिंग, बिजनेस डील और विदेशों के दौरे उसकी जिंदगी का हिस्सा थे।

     

    उसके पिता, राजीव कपूर, कई बार उससे कह चुके थे—

     

    “बेटा, अब कंपनी की जिम्मेदारियां संभालने के साथ अपनी जिंदगी के बारे में भी सोचो।”

     

    अगस्त्या बिना सिर उठाए फाइल देखता और कहता—

     

    “पापा, मेरी जिंदगी बिल्कुल ठीक चल रही है।”

     

    “लेकिन शादी?”

     

    “नहीं करनी।”

     

    राजीव कपूर हर बार चुप हो जाते।

     

    मां सुमन कपूर भी कई रिश्ते लेकर आईं।

     

    “अगस्त्या, लड़की बहुत अच्छी है। पढ़ी-लिखी है, समझदार है।”

     

    “मां, मुझे शादी नहीं करनी।”

     

    “कम से कम एक बार मिल तो लो।”

     

    “मिलने के बाद भी मेरा जवाब यही रहेगा।”

     

    सुमन परेशान होकर पति से कहतीं—

     

    “समझ नहीं आता इसे शादी से इतनी परेशानी क्यों है।”

     

    राजीव धीरे से कहते—

     

    “किसी पुराने जख्म की वजह होगी।”

     

    दरअसल अगस्त्या के मन में शादी को लेकर एक डर था।

     

    बचपन में उसने अपने माता-पिता के बीच कई बार झगड़े देखे थे। उसके पिता काम में इतने व्यस्त रहते कि मां अक्सर अकेली पड़ जातीं। घर में पैसा बहुत था, लेकिन साथ बैठकर बात करने का समय बहुत कम।

     

    अगस्त्या ने मन ही मन तय कर लिया था—

     

    अगर रिश्ते में प्यार से ज्यादा जिम्मेदारियां और उम्मीदें होती हैं, तो वह ऐसा रिश्ता कभी नहीं बनाएगा।

     

    उसका मानना था कि शादी के बाद इंसान अपनी आजादी खो देता है।

     

    एक दिन कंपनी की बड़ी मीटिंग के बाद राजीव कपूर ने उसे अपने कमरे में बुलाया।

     

    “अगस्त्या, मैं तुम पर शादी का दबाव नहीं डालना चाहता। लेकिन एक बात जरूर कहना चाहता हूं।”

     

    “क्या?”

     

    “हर रिश्ता तुम्हारे बचपन जैसा नहीं होता।”

     

    अगस्त्या चुप रहा।

     

    “तुमने हमारे बीच जो देखा, वह हमारी कहानी थी। जरूरी नहीं कि तुम्हारी कहानी भी वैसी ही हो।”

     

    अगस्त्या ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    कुछ दिनों बाद कपूर एंड संस ने राजस्थान के एक छोटे शहर में नई शाखा खोलने का फैसला किया। कंपनी की एक सामाजिक परियोजना भी वहां चल रही थी, जिसके लिए अगस्त्या को खुद जाना पड़ा।

     

    वहां उसकी मुलाकात मायरा से हुई।

     

    मायरा कंपनी के प्रोजेक्ट से जुड़े एक छोटे स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी।

     

    पहली मुलाकात बिल्कुल साधारण थी।

     

    अगस्त्या ने स्कूल का निरीक्षण करते हुए पूछा—

     

    “यहां बच्चों की संख्या कितनी है?”

     

    मायरा ने रजिस्टर बंद किया।

     

    “लगभग दो सौ।”

     

    “और शिक्षक?”

     

    “सिर्फ पांच।”

     

    अगस्त्या ने हैरानी से कहा—

     

    “इतने कम?”

     

    मायरा मुस्कुराई।

     

    “कम हैं, लेकिन कोशिश ज्यादा है।”

     

    अगस्त्या पहली बार उसकी बात पर मुस्कुराया।

     

    “आप हमेशा इतनी सकारात्मक रहती हैं?”

     

    “नहीं। कभी-कभी मैं भी परेशान होती हूं।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर किसी बच्चे की मुस्कान देख लेती हूं।”

     

    अगस्त्या उसे कुछ पल देखता रहा।

     

    मायरा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    लेकिन उस दिन के बाद वह मायरा को याद करने लगा।

     

    मायरा को अगस्त्या की दौलत से कोई फर्क नहीं पड़ता था। उसे यह भी नहीं पता था कि वह कपूर एंड संस का वारिस है।

     

    एक दिन उसने अगस्त्या से कहा—

     

    “आप हर वक्त इतने गंभीर क्यों रहते हैं?”

     

    “काम की वजह से।”

     

    “काम के अलावा जिंदगी में कुछ नहीं?”

     

    अगस्त्या ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    मायरा हंस पड़ी।

     

    “तो आप बहुत गरीब हैं।”

     

    अगस्त्या चौंका।

     

    “गरीब?”

     

    “हां। जिसके पास पैसा बहुत हो लेकिन खुश रहने का समय न हो, वह मेरे हिसाब से गरीब ही है।”

     

    उस दिन अगस्त्या काफी देर तक उसकी बात सोचता रहा।

     

    धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती बढ़ने लगी।

     

    अगस्त्या को पहली बार महसूस हुआ कि किसी के साथ बैठकर बिना किसी काम के बात करना भी अच्छा लग सकता है।

     

    एक शाम मायरा ने पूछा—

     

    “आप शादी क्यों नहीं करना चाहते?”

     

    अगस्त्या कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने अपने बचपन की बातें बता दीं।

     

    मायरा ने ध्यान से सुना।

     

    उसने कोई सलाह नहीं दी।

     

    बस इतना कहा—

     

    “आपको शादी से नहीं, अपने पुराने डर से परेशानी है।”

     

    अगस्त्या ने उसकी ओर देखा।

     

    “शायद।”

     

    “तो फैसला डर के आधार पर मत कीजिए।”

     

    उसके शब्द अगस्त्या के दिल में उतर गए।

     

    लेकिन जिंदगी हमेशा आसान नहीं होती।

     

    अगस्त्या को अचानक मुंबई वापस बुला लिया गया। कंपनी में एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई थी।

     

    जाने से पहले वह मायरा से मिलने गया।

     

    “मुझे जाना होगा।”

     

    मायरा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तो जाइए। काम जरूरी है।”

     

    “मैं वापस आऊंगा।”

     

    मायरा ने मजाक में कहा—

     

    “क्यों? यहां कोई काम रह गया है?”

     

    अगस्त्या पहली बार खुलकर मुस्कुराया।

     

    “शायद।”

     

    वह मुंबई लौट आया।

     

    कुछ हफ्तों तक दोनों फोन पर बात करते रहे।

     

    लेकिन अगस्त्या की मां को जब उसके और मायरा के बारे में पता चला तो उन्होंने तुरंत पूछा—

     

    “क्या तुम उसे पसंद करते हो?”

     

    अगस्त्या चुप रहा।

     

    “अगस्त्या?”

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “हां।”

     

    सुमन के चेहरे पर खुशी आ गई।

     

    लेकिन फिर अगस्त्या ने कहा—

     

    “लेकिन मैं अभी भी शादी के लिए तैयार नहीं हूं।”

     

    मां ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “बेटा, शादी तभी करना जब तुम्हें लगे कि तुम तैयार हो। सिर्फ इसलिए मत करना कि हम चाहते हैं।”

     

    उसी रात अगस्त्या ने मायरा को फोन किया।

     

    “मायरा, अगर मैं तुमसे कहूं कि मैं तुम्हें पसंद करता हूं, लेकिन शादी से डरता हूं तो?”

     

    मायरा कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “तो मैं तुम्हें शादी के लिए मजबूर नहीं करूंगी।”

     

    अगस्त्या ने राहत की सांस ली।

     

    “सच?”

     

    “हां। रिश्ता दो लोगों का होता है। फैसला भी दोनों का होना चाहिए।”

     

    “और अगर मुझे बहुत समय लग गया तो?”

     

    “मैं इंतजार करने का वादा नहीं कर रही।”

     

    अगस्त्या चुप हो गया।

     

    मायरा हंसकर बोली—

     

    “लेकिन अगर तुम सच में मेरे साथ रहना चाहते हो तो मुझे तुम्हारे डर से लड़ने में कोई परेशानी नहीं।”

     

    उस रात अगस्त्या ने पहली बार समझा कि शादी का मतलब अपनी आजादी खोना नहीं होता।

     

    सही इंसान के साथ शादी का मतलब शायद ऐसा साथी पाना होता है, जिसके सामने अपने डर भी रखे जा सकें।

     

    कुछ महीनों बाद अगस्त्या फिर उस छोटे शहर में गया।

     

    वह सीधे उसी स्कूल पहुंचा।

     

    मायरा बच्चों को पढ़ा रही थी।

     

    कक्षा खत्म होने के बाद अगस्त्या उसके सामने खड़ा था।

     

    मायरा ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “अब किस काम से आए हैं कपूर साहब?”

     

    अगस्त्या ने कहा—

     

    “एक जरूरी बात कहनी है।”

     

    “कहिए।”

     

    “मैं अभी भी शादी से थोड़ा डरता हूं।”

     

    मायरा चुप रही।

     

    अगस्त्या ने आगे कहा—

     

    “लेकिन अब मुझे तुमसे दूर रहने से ज्यादा डर लगता है।”

     

    मायरा की आंखों में मुस्कान आ गई।

     

    “तो?”

     

    अगस्त्या ने कहा—

     

    “तो मैं शादी करना चाहता हूं। लेकिन तुम्हारे साथ। और इस बार किसी डर की वजह से नहीं, अपनी इच्छा से।”

     

    मायरा ने कुछ नहीं कहा।

     

    बस मुस्कुराकर बोली—

     

    “अब आप थोड़े कम गरीब लग रहे हैं।”

     

    अगस्त्या हंस पड़ा।

     

    उसने समझ लिया था कि जिंदगी सिर्फ कंपनी, पैसा और विरासत का नाम नहीं है।

     

    कपूर एंड संस का वारिस होना उसकी पहचान थी, लेकिन मायरा के साथ उसे जो अपनापन मिला, वही उसकी असली दौलत बन गया।

     

    और जिस लड़के ने कभी कहा था कि वह जिंदगी में कभी शादी नहीं करेगा, वही एक दिन अपने पिता के सामने खड़ा होकर बोला—

     

    “पापा, अब शादी की तैयारी शुरू कर दीजिए।”

     

    राजीव कपूर मुस्कुराए।

     

    “लड़की कौन है?”

     

    अगस्त्या ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “वही, जिसने मुझे समझाया कि शादी बंधन नहीं… सही इंसान के साथ एक खूबसूरत साथ हो सकती है।”

  • काश मैं अब भी तुम्हारे करीब होती

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    “कुछ गलतियाँ इंसान की ज़िंदगी बदल देती हैं… और कुछ गलतियाँ पूरी ज़िंदगी पछतावा बनकर साथ चलती हैं।”

     

    रिया और आरव एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। दोनों की मुलाकात कॉलेज में हुई थी। धीरे-धीरे दोस्ती हुई और फिर दोस्ती प्यार में बदल गई। आरव रिया का बहुत ख्याल रखता था। वह हर छोटी-बड़ी खुशी में उसके साथ खड़ा रहता। रिया की तबीयत खराब हो जाए तो पूरी रात जागकर उसकी चिंता करता। उसके जन्मदिन पर अपने हाथों से छोटा-सा गिफ्ट बनाता, क्योंकि उसके पास ज़्यादा पैसे नहीं थे।

     

    रिया भी उससे बहुत प्यार करती थी, लेकिन उसके दिल में एक कमी थी। उसे हमेशा लगता था कि आरव बहुत सीधा-सादा है। उसके पास न महंगी बाइक थी, न स्टाइलिश कपड़े और न ही बड़ा बैंक बैलेंस। धीरे-धीरे उसने दूसरों की बातों पर ध्यान देना शुरू कर दिया। उसकी कुछ सहेलियाँ भी उसे समझातीं कि प्यार से ज़िंदगी नहीं चलती, पैसे भी ज़रूरी होते हैं। यही बातें धीरे-धीरे उसके मन में घर करने लगीं और उसने आरव के सच्चे प्यार से ज़्यादा बाहरी चमक-दमक को महत्व देना शुरू कर दिया।

     

    एक दिन कॉलेज में कबीर नाम का लड़का आया। अमीर परिवार से था, महंगी कार में आता था, हर समय दोस्तों से घिरा रहता था। उसकी बातें सुनकर रिया धीरे-धीरे उसकी तरफ आकर्षित होने लगी।

     

    आरव को यह बदलाव महसूस होने लगा।

     

    “रिया, सब ठीक है ना? तुम पहले जैसी नहीं रहीं।”

     

    रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की।

     

    “कुछ नहीं… बस पढ़ाई का प्रेशर है।”

     

    लेकिन सच कुछ और था।

     

    अब वह आरव के मैसेज देर से पढ़ती, कॉल उठाने से बचती और हर समय कबीर के साथ दिखाई देती। आरव हर दिन खुद को समझाता कि शायद रिया किसी परेशानी में होगी, लेकिन उसके दिल को हर पल यही डर सताता था कि कहीं वह उसे खो न दे।

     

    एक शाम आरव ने उसे पार्क में बुलाया।

     

    “रिया… अगर मुझसे कोई गलती हुई है तो बता दो। मैं खुद को बदल लूंगा, लेकिन यूँ दूर मत जाओ।”

     

    रिया ने बिना उसकी आँखों में देखे कहा,

     

    “आरव… हमें यहीं सब खत्म कर देना चाहिए।”

     

    यह सुनते ही आरव जैसे अंदर से टूट गया।

     

    “क्या… इतना आसान था तुम्हारे लिए?”

     

    रिया बोली,

     

    “हम दोनों एक-दूसरे के लिए नहीं बने हैं।”

     

    असल वजह उसने नहीं बताई कि वह कबीर के साथ रहना चाहती है।

     

    आरव की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन उसने सिर्फ इतना कहा,

     

    “अगर यही तुम्हारी खुशी है… तो मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं। बस खुश रहना।”

     

    उस दिन के बाद दोनों की राहें अलग हो गईं।

     

    कुछ ही दिनों में रिया और कबीर साथ घूमने लगे। महंगे रेस्टोरेंट, लंबी ड्राइव, बड़े-बड़े गिफ्ट… रिया को लगा कि उसने सही फैसला लिया है। उसे लगता था कि अब उसकी हर ख्वाहिश पूरी होगी और यही उसकी नई दुनिया है।

     

    लेकिन कहते हैं, जो रिश्ता दिखावे पर शुरू होता है, वह ज़्यादा दिन नहीं चलता।

     

    धीरे-धीरे कबीर का व्यवहार बदलने लगा। वह घंटों तक रिया के मैसेज का जवाब नहीं देता। मिलने के बहाने टाल देता। पहले जो हर समय उसके साथ रहने की बातें करता था, अब वही उससे दूरी बनाने लगा।

     

    एक दिन रिया ने देखा कि कबीर किसी दूसरी लड़की के साथ हाथ पकड़कर घूम रहा है।

     

    रिया उसके सामने जाकर खड़ी हो गई।

     

    “कबीर… ये सब क्या है?”

     

    कबीर ने बेपरवाही से कहा,

     

    “रिया, प्लीज़ ड्रामा मत करो। मुझे अब तुम्हारे साथ नहीं रहना।”

     

    रिया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

     

    “लेकिन… तुमने तो कहा था कि तुम मुझसे प्यार करते हो।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “मैंने ऐसा कई लड़कियों से कहा है। तुम भी उनमें से एक थीं।”

     

    इतना कहकर वह दूसरी लड़की का हाथ पकड़कर चला गया।

     

    रिया वहीं सड़क किनारे बैठकर फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसने किस इंसान को खो दिया।

     

    उस रात उसने मोबाइल खोला।

     

    आरव की पुरानी तस्वीरें…

     

    पुराने मैसेज…

     

    उसकी भेजी हुई शुभ रात्रि की बातें…

     

    जन्मदिन की शुभकामनाएँ…

     

    सब कुछ पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें भर आईं।

     

    एक मैसेज पर उसकी नज़र रुक गई।

     

    “अगर कभी पूरी दुनिया भी तुम्हारा साथ छोड़ दे… तब भी मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।”

     

    रिया ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।

     

    “मैंने ही तो उस इंसान का साथ छोड़ दिया था…”

     

    अब उसे समझ आया कि सच्चा प्यार महंगे गिफ्ट या बड़ी कार से नहीं, बल्कि परवाह और भरोसे से बनता है।

     

    अगले दिन वह हिम्मत करके आरव के घर पहुँची।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    सामने आरव था।

     

    वह पहले जैसा ही शांत था, लेकिन उसकी आँखों की चमक कहीं खो चुकी थी।

     

    रिया रोते हुए बोली,

     

    “आरव… मुझे माफ़ कर दो। मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। मैंने तुम्हारे प्यार की कद्र नहीं की। अगर हो सके तो मुझे एक मौका और दे दो।”

     

    कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने धीमी आवाज़ में कहा,

     

    “रिया… मैंने तुम्हें दिल से चाहा था। जब तुम गई थीं, उस दिन सिर्फ रिश्ता नहीं टूटा था… मैं भी टूट गया था। कई रातें बिना सोए गुज़ारी हैं मैंने। हर त्योहार, हर खुशी अधूरी लगती थी। लेकिन समय ने मुझे जीना सिखा दिया।”

     

    रिया की सिसकियाँ और तेज़ हो गईं।

     

    “मुझे हर दिन पछतावा होता है। काश… मैं तुम्हें कभी छोड़कर न जाती।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने तुम्हें बहुत पहले माफ़ कर दिया था… क्योंकि प्यार में नफरत करना मैंने सीखा ही नहीं। लेकिन कुछ टूटे हुए रिश्ते फिर जुड़ तो जाते हैं, मगर उनमें पहले जैसा भरोसा कभी वापस नहीं आता।”

     

    रिया समझ गई कि अब बहुत देर हो चुकी है।

     

    उसने आखिरी बार आरव को देखा और भारी कदमों से वहाँ से चली गई।

     

    कई साल बीत गए।

     

    एक दिन बारिश हो रही थी।

     

    रिया बस स्टॉप पर अकेली खड़ी थी। सामने सड़क के उस पार आरव अपनी पत्नी और छोटी-सी बेटी के साथ हँसते हुए चल रहा था।

     

    उसकी बेटी ने दौड़कर आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    आरव मुस्कुराकर उसे गोद में उठा लिया।

     

    वह दृश्य देखकर रिया की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    उसने आसमान की तरफ देखा और खुद से कहा,

     

    “जिस इंसान ने मुझे सबसे ज़्यादा प्यार किया… मैंने उसी का दिल तोड़ दिया। आज उसके पास उसकी खुशियाँ हैं, और मेरे पास सिर्फ मेरी गलती की यादें।”

     

    बारिश की बूँदें उसके आँसुओं में मिल गईं।

     

    वह धीरे से मुस्कुराई, लेकिन उस मुस्कान में दर्द छिपा था।

     

    उसके होंठों से बस एक ही बात निकली—

     

    “काश… मैं अब भी तुम्हारे करीब होती।