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  • खुद को मिटा दिया

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    क्यों मैंने खुद को मिटा दिया

     

    राधिका हमेशा से हंसने वाली लड़की थी। घर में कोई परेशानी हो, वह मुस्कुराकर कहती, “सब ठीक हो जाएगा।” किसी दोस्त को दुख हो, तो वह रात देर तक उसकी बातें सुनती। मां थकी हुई हों, तो बिना कहे काम संभाल लेती। पिता परेशान हों, तो उनके सामने कभी अपनी चिंता नहीं रखती।

     

    सबको लगता था कि राधिका बहुत मजबूत है।

     

    लेकिन कोई यह नहीं देखता था कि दूसरों को संभालते-संभालते वह खुद अंदर से कितनी थक चुकी थी।

     

    राधिका की उम्र सिर्फ चौबीस साल थी, मगर उसके चेहरे पर उम्र से ज्यादा जिम्मेदारियां दिखाई देती थीं।

     

    एक दिन उसकी छोटी बहन ने पूछा, “दीदी, तुम्हें क्या चाहिए?”

     

    राधिका हंस पड़ी।

     

    “मुझे? कुछ नहीं।”

     

    बहन ने फिर पूछा, “सच में? कभी अपने लिए भी कुछ मांग लिया करो।”

     

    राधिका कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली, “शायद मुझे खुद भी नहीं पता कि मुझे क्या चाहिए।”

     

    उस रात राधिका अपने कमरे में अकेली बैठी थी। सामने आईना था। उसने आईने में खुद को देखा और अचानक उसके मुंह से निकला—

     

    “मैं इतनी बदल क्यों गई?”

     

    कभी उसे किताबें पढ़ने का शौक था। कभी वह घंटों गाने सुनती थी। उसे बारिश में छत पर खड़े होकर भीगना पसंद था। वह छोटी-छोटी बातों पर खुश हो जाती थी।

     

    लेकिन पिछले कुछ सालों में उसने अपनी पसंद को धीरे-धीरे पीछे कर दिया था।

     

    किसी ने कहा, “यह मत करो।”

     

    उसने नहीं किया।

     

    किसी ने कहा, “तुम्हें यह नौकरी करनी चाहिए।”

     

    उसने कर ली।

     

    किसी ने कहा, “घर की जिम्मेदारी पहले है।”

     

    उसने अपनी इच्छाएं छोड़ दीं।

     

    किसी ने कहा, “लोग क्या कहेंगे?”

     

    उसने अपनी आवाज दबा दी।

     

    और धीरे-धीरे एक दिन ऐसा आया जब राधिका को समझ ही नहीं आया कि वह खुद चाहती क्या है।

     

    उसने डायरी निकाली और पहली बार अपने मन की बात लिखी—

     

    “क्यों मैंने खुद को मिटा दिया?”

     

    कलम कुछ देर रुक गई।

     

    फिर उसने लिखा—

     

    “मैंने सबको खुश करने के चक्कर में खुद को ही भूल दिया।”

     

    अगले दिन ऑफिस में राधिका से एक छोटी-सी गलती हो गई। उसके बॉस ने सबके सामने उसे डांट दिया।

     

    “तुमसे इतनी सी बात भी ठीक से नहीं होती?”

     

    राधिका ने सिर झुका लिया।

     

    “सॉरी सर।”

     

    ऑफिस से बाहर निकलते समय उसकी सहेली ने कहा, “तुम हर बात पर सॉरी क्यों बोलती हो?”

     

    राधिका ने हंसने की कोशिश की।

     

    “आदत हो गई है।”

     

    “और अपनी बात कब कहोगी?”

     

    राधिका ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    घर पहुंचकर मां ने कहा, “राधिका, पड़ोस की आंटी के बेटे की शादी है। रविवार को चलना है।”

     

    “मां, रविवार को मुझे आराम करना था।”

     

    मां ने तुरंत कहा, “बस एक दिन की तो बात है।”

     

    राधिका कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन फिर वही पुरानी आदत सामने आ गई।

     

    “ठीक है मां।”

     

    कमरे में जाकर उसने बैग बिस्तर पर फेंका और चुपचाप बैठ गई।

     

    उस दिन पहली बार उसे खुद पर गुस्सा आया।

     

    “मैं हर बार हां क्यों कह देती हूं?”

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मेरी जिंदगी में मेरी इच्छा की कोई जगह क्यों नहीं है?”

     

    अचानक दरवाजे पर उसकी छोटी बहन खड़ी थी।

     

    “दीदी…”

     

    राधिका ने जल्दी से आंसू पोंछे।

     

    “कुछ नहीं हुआ।”

     

    बहन उसके पास बैठ गई।

     

    “हर बार यही कहती हो। लेकिन आज मुझे झूठ मत बोलो।”

     

    राधिका चुप रही।

     

    बहन ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “दीदी, तुमने सबके लिए बहुत कुछ किया है। लेकिन खुद के लिए क्या किया?”

     

    यह सवाल राधिका के दिल में उतर गया।

     

    वह रो पड़ी।

     

    “शायद कुछ भी नहीं।”

     

    बहन ने कहा, “तो अब शुरू करो।”

     

    “क्या?”

     

    “खुद को वापस पाना।”

     

    अगले दिन राधिका ने एक छोटा-सा फैसला लिया।

     

    सुबह उठकर उसने अपना पुराना गिटार निकाला।

     

    धूल साफ की।

     

    कई साल बाद उसने उस पर उंगलियां रखीं।

     

    पहले सुर गलत निकला।

     

    वह हंस पड़ी।

     

    फिर दूसरा सुर बजाया।

     

    कमरे में एक छोटी-सी धुन गूंज उठी।

     

    उसे लगा जैसे उसके अंदर कोई पुराना दरवाजा खुल गया हो।

     

    उस दिन उसने खुद से कहा—

     

    “मुझे परफेक्ट नहीं बनना। मुझे बस फिर से खुद बनना है।”

     

    अब उसने हर बात पर हां कहना बंद कर दिया।

     

    मां ने पूछा, “आज बाजार चलोगी?”

     

    राधिका ने मुस्कुराकर कहा, “आज नहीं मां। आज मुझे अपने लिए थोड़ा समय चाहिए। कल चलेंगे।”

     

    पहले मां को अजीब लगा।

     

    लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने भी समझना शुरू कर दिया कि अपनी इच्छा बताना स्वार्थ नहीं होता।

     

    ऑफिस में भी राधिका ने अपनी बात रखना शुरू किया।

     

    एक दिन बॉस ने कहा, “यह काम आज ही पूरा करना होगा।”

     

    राधिका ने शांत होकर कहा, “मैं कोशिश करूंगी, लेकिन इसे ठीक से करने के लिए मुझे थोड़ा और समय चाहिए।”

     

    पहले वह डरती।

     

    उस दिन नहीं डरी।

     

    धीरे-धीरे उसकी जिंदगी बदलने लगी।

     

    उसने फिर से किताबें पढ़नी शुरू कीं। रविवार को गिटार बजाती। कभी अकेले पार्क में बैठती। अपनी सहेली से मिलती। मां के साथ चाय पीते हुए खुलकर बातें करती।

     

    सबसे बड़ी बात—उसने खुद को दोष देना बंद कर दिया।

     

    एक शाम वही छोटी बहन उसके कमरे में आई।

     

    “दीदी, आज तुम बहुत खुश लग रही हो।”

     

    राधिका मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि आज मुझे मेरी पुरानी राधिका मिल गई।”

     

    बहन ने पूछा, “कहां थी इतने दिन?”

     

    राधिका कुछ पल सोचती रही।

     

    फिर बोली—

     

    “दूसरों की उम्मीदों के नीचे दब गई थी।”

     

    दोनों हंस पड़ीं।

     

    कुछ महीने बाद राधिका ने अपनी पहली छोटी-सी संगीत प्रस्तुति दी। मंच पर जाने से पहले उसके हाथ कांप रहे थे।

     

    उसे लगा, शायद वह नहीं कर पाएगी।

     

    फिर उसे अपनी पुरानी डायरी की वह लाइन याद आई—

     

    “क्यों मैंने खुद को मिटा दिया?”

     

    उसने मन ही मन जवाब दिया—

     

    “अब नहीं।”

     

    वह मंच पर गई।

     

    गिटार उठाया।

     

    और अपनी धुन शुरू कर दी।

     

    तालियां बजने लगीं।

     

    मंच से उतरते समय उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे।

     

    मां ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मुझे नहीं पता था कि मेरी बेटी इतना अच्छा गा सकती है।”

     

    राधिका ने मां के कंधे पर सिर रख दिया।

     

    “मुझे भी नहीं पता था मां… क्योंकि मैंने खुद को मौका ही नहीं दिया था।”

     

    उस रात उसने अपनी डायरी खोली।

     

    पुराने सवाल के नीचे उसने एक नई लाइन लिखी—

     

    “मैंने खुद को इसलिए मिटा दिया था क्योंकि मुझे लगा था कि दूसरों की खुशी मेरी खुशी से ज्यादा जरूरी है। लेकिन अब समझ आया है कि खुद की जिंदगी में खुद की जगह बनाना गलत नहीं है।”

     

    उसने डायरी बंद की।

     

    आईने के सामने खड़ी हुई।

     

    इस बार आईने में उसे कोई थकी हुई लड़की नहीं दिखी।

     

    उसे वही पुरानी राधिका दिखाई दी—जो सपने देखती थी, हंसती थी, गाती थी और छोटी-छोटी चीजों में खुश होना जानती थी।

     

    उसने आईने में देखकर धीरे से कहा—

     

    “मैं वापस आ गई हूं।”

     

    और शायद जिंदगी में सबसे जरूरी बात यही है।

     

    कभी-कभी हम दूसरों के लिए इतना जीने लगते हैं कि खुद को भूल जाते हैं। लेकिन खुद को भूल जाना प्यार नहीं है, और अपनी इच्छाओं को हमेशा दबा देना त्याग नहीं है।

     

    दूसरों की परवाह करो, जरूर करो।

     

    लेकिन अपने दिल की आवाज भी सुनो।

     

    क्योंकि जिंदगी सिर्फ यह पूछने के लिए नहीं मिली कि—

     

    “मैंने दूसरों के लिए क्या किया?”

     

    कभी-कभी खुद से यह भी पूछना चाहिए—

     

    “मैंने अपने लिए क्या किया?”

     

    राधिका ने देर से सही, लेकिन यह सीख लिया था।

     

    उसने खुद को मिटाया नहीं था।

     

    बस कुछ समय के लिए खुद से दूर हो गई थी।

     

    और जब उसने खुद को दोबारा खोज लिया, तब उसे समझ आया—

     

    खुद को खो देना जिंदगी का अंत नहीं होता। खुद को फिर से पाना ही असली शुरुआत होती है।