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टैग: #तन्हाई #अकेलापन

  • अकेले ही काफी है

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    हम अकेले ही एक-दूसरे के लिए काफी हैं

     

    “अब हमें किसी से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।”

     

    सरला ने खिड़की के बाहर देखते हुए धीमी आवाज में कहा।

     

    सामने कुर्सी पर बैठे उसके पति गोविंद ने चश्मा उतारा और पत्नी की तरफ देखा।

     

    “किससे उम्मीद की तुमने?”

     

    सरला हल्का-सा मुस्कुराई।

     

    “किससे नहीं की?”

     

    गोविंद कुछ नहीं बोले।

     

    दोनों की उम्र सत्तर के पार हो चुकी थी। कभी उनका घर बच्चों की आवाजों से भरा रहता था। सुबह से शाम तक भागदौड़ रहती थी। तीन बच्चे थे—दो बेटे और एक बेटी। गोविंद ने पूरी जिंदगी नौकरी करके बच्चों को पढ़ाया, उनकी जरूरतें पूरी कीं और उनके भविष्य के लिए अपनी छोटी-छोटी खुशियां तक छोड़ दीं।

     

    जब बच्चे बड़े हुए तो तीनों अपने-अपने शहरों में चले गए।

     

    शुरुआत में हर दिन फोन आता था।

     

    “पापा, खाना खा लिया?”

     

    “मां, दवा समय पर लेना।”

     

    “जल्दी ही मिलने आएंगे।”

     

    सरला उन बातों को सुनकर खुश हो जाती।

     

    वह हर बार कहती—

     

    “बस तुम लोग खुश रहो, हमें और क्या चाहिए।”

     

    लेकिन धीरे-धीरे फोन कम होने लगे।

     

    फिर हफ्ते में एक बार।

     

    फिर महीने में।

     

    और आखिरकार कभी-कभी।

     

    एक शाम सरला ने गोविंद से कहा—

     

    “हमने बच्चों को बहुत प्यार दिया था ना?”

     

    गोविंद ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हां।”

     

    “फिर वो इतने दूर कैसे हो गए?”

     

    गोविंद ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    शायद उनके पास भी इस सवाल का जवाब नहीं था।

     

    एक दिन गोविंद अचानक सीढ़ियों से उतरते समय लड़खड़ा गए।

     

    सरला घबरा गई।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं। पैर थोड़ा फिसल गया।”

     

    सरला ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें डॉक्टर के पास जाना चाहिए।”

     

    “कल चलेंगे।”

     

    “कल नहीं। अभी।”

     

    दोनों डॉक्टर के पास गए। डॉक्टर ने कुछ जांचें लिखीं और आराम करने को कहा।

     

    सरला ने उसी रात बड़े बेटे रोहन को फोन किया।

     

    “बेटा, तुम्हारे पापा की तबीयत थोड़ी खराब है।”

     

    रोहन ने चिंतित होकर कहा—

     

    “मां, दवा दिलवा देना। मैं अभी ऑफिस में बहुत व्यस्त हूं। अगले महीने आने की कोशिश करूंगा।”

     

    सरला ने फोन रख दिया।

     

    उसने कुछ नहीं कहा।

     

    गोविंद समझ गए।

     

    “क्या बोला?”

     

    “कुछ नहीं। काम में व्यस्त है।”

     

    कुछ दिनों बाद छोटी बेटी नैना का फोन आया।

     

    “मां, पापा कैसे हैं?”

     

    “अब ठीक हैं।”

     

    “अच्छा हुआ। बच्चों के स्कूल चल रहे हैं, इसलिए अभी आना मुश्किल है।”

     

    सरला ने कहा—

     

    “ठीक है बेटा।”

     

    फोन कट गया।

     

    सरला कुछ देर मोबाइल को देखती रही।

     

    गोविंद ने पूछा—

     

    “दुख हुआ?”

     

    सरला ने सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    लेकिन उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    गोविंद उसके पास आकर बैठ गए।

     

    “रो लो। मेरे सामने रोने में शर्म कैसी?”

     

    सरला ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे बच्चों से शिकायत नहीं है। बस कभी-कभी लगता है कि हमने उन्हें अपने से इतना दूर कर दिया कि अब उन्हें हमारी जरूरत ही नहीं रही।”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “शायद उनकी अपनी जिंदगी है।”

     

    “हां,” सरला ने कहा, “लेकिन क्या हमारी जिंदगी में अब उनका कोई हिस्सा नहीं?”

     

    उस सवाल का जवाब दोनों में से किसी के पास नहीं था।

     

    समय बीतता गया।

     

    एक सर्द रात सरला की तबीयत अचानक खराब हो गई।

     

    गोविंद घबरा गए।

     

    उन्होंने पड़ोसी अमन को फोन किया।

     

    अमन तुरंत आया और दोनों को अस्पताल ले गया।

     

    कुछ घंटों बाद डॉक्टर ने कहा—

     

    “अब खतरा नहीं है, लेकिन इन्हें अकेले नहीं रहना चाहिए।”

     

    गोविंद ने तुरंत बच्चों को फोन किया।

     

    इस बार उन्होंने पहली बार आवाज में शिकायत कर दी।

     

    “बेटा, अपनी मां को देखने आ जाओ।”

     

    रोहन ने कहा—

     

    “पापा, मैं कोशिश करता हूं।”

     

    नैना ने कहा—

     

    “पापा, दो दिन में आने की कोशिश करूंगी।”

     

    छोटे बेटे विवेक ने तो फोन तक नहीं उठाया।

     

    दो दिन गुजर गए।

     

    तीन दिन।

     

    चार दिन।

     

    कोई नहीं आया।

     

    अमन रोज अस्पताल आता रहा।

     

    सरला को जब होश आया तो उसने सबसे पहले पूछा—

     

    “बच्चे आए?”

     

    गोविंद कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “नहीं।”

     

    सरला ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसके चेहरे पर दुख था, लेकिन इस बार उसने आंसू नहीं बहाए।

     

    “गोविंद…”

     

    “हां।”

     

    “अब हमें किसी से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।”

     

    गोविंद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “हां।”

     

    “हम अकेले ही एक-दूसरे के लिए काफी हैं।”

     

    गोविंद ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “बिल्कुल।”

     

    अस्पताल से लौटने के बाद दोनों ने अपनी जिंदगी का तरीका बदल लिया।

     

    उन्होंने किसी बच्चे से नाराजगी नहीं की।

     

    किसी को बुरा नहीं कहा।

     

    बस अपनी उम्मीदें कम कर दीं।

     

    सुबह गोविंद सरला के लिए चाय बनाते।

     

    सरला उनकी दवा समय पर देती।

     

    दोनों साथ बैठकर अखबार पढ़ते।

     

    शाम को छत पर कुर्सियां डालकर घंटों बातें करते।

     

    कभी पुरानी यादें याद करते।

     

    कभी बच्चों के बचपन की तस्वीरें देखते।

     

    एक दिन सरला ने पुराना फोटो एलबम खोला।

     

    उसमें तीनों बच्चे छोटे थे।

     

    रोहन गोविंद की उंगली पकड़े खड़ा था।

     

    नैना सरला की गोद में थी।

     

    विवेक जमीन पर बैठा मुस्कुरा रहा था।

     

    सरला की आंखें भर आईं।

     

    “देखो, कितने छोटे थे।”

     

    गोविंद ने तस्वीर को देखा।

     

    “हमने इन्हें बड़ा कर दिया।”

     

    “और खुद बूढ़े हो गए।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    अमन खड़ा था।

     

    उसके हाथ में दवाइयां थीं।

     

    “अंकल, आंटी, ये दवाइयां ले आया हूं।”

     

    सरला ने कहा—

     

    “बेटा, तुम रोज क्यों परेशान होते हो?”

     

    अमन हंसकर बोला—

     

    “क्योंकि आप दोनों मेरे अपने जैसे हैं।”

     

    सरला ने पहली बार महसूस किया कि रिश्ते हमेशा खून से नहीं बनते।

     

    कुछ रिश्ते व्यवहार से बनते हैं।

     

    कुछ परवाह से।

     

    और कुछ सिर्फ इसलिए बनते हैं क्योंकि कोई बिना किसी स्वार्थ के आपके साथ खड़ा रहता है।

     

    कुछ महीनों बाद रोहन अचानक घर आया।

     

    उसने दरवाजे पर खड़े होकर कहा—

     

    “मां…”

     

    सरला ने उसे देखा।

     

    “आ गए?”

     

    रोहन ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    सरला चुप रही।

     

    रोहन की आंखों में आंसू थे।

     

    “मुझे लगा था कि पैसे भेज देना और फोन कर लेना ही काफी है। लेकिन जब पिछले महीने मेरे ऑफिस में एक सहकर्मी ने अपनी मां को अस्पताल ले जाने के लिए छुट्टी ली, तब मुझे समझ आया कि मां-बाप को सिर्फ पैसों की नहीं, अपने बच्चों की जरूरत होती है।”

     

    सरला ने कुछ नहीं कहा।

     

    गोविंद ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “तुम्हें समझ आ गया, यही बहुत है।”

     

    रोहन रोते हुए अपनी मां के पैरों के पास बैठ गया।

     

    “मैंने आपको अकेला छोड़ दिया।”

     

    सरला ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम हमें छोड़कर गए थे, बेटा। लेकिन मां-बाप बच्चों को छोड़ना नहीं सीखते।”

     

    रोहन ने मां को गले लगा लिया।

     

    कुछ दिनों बाद नैना भी आई।

     

    विवेक भी।

     

    घर फिर से बच्चों की आवाजों से भर गया।

     

    लेकिन इस बार सरला और गोविंद की सोच बदल चुकी थी।

     

    उन्होंने बच्चों से कोई शिकायत नहीं की।

     

    बस इतना कहा—

     

    “अपनी जिंदगी जियो। हमें तुमसे बड़ी-बड़ी चीजें नहीं चाहिए। कभी-कभी फोन कर लिया करो। और अगर हम तुम्हें याद आएं तो मिलने आ जाना।”

     

    विवेक ने कहा—

     

    “पापा, अब हम आपको अकेला नहीं छोड़ेंगे।”

     

    गोविंद मुस्कुराए।

     

    “यह वादा आज मत करो। बस इतना करना कि जब जिंदगी बहुत व्यस्त हो जाए, तब भी हमें याद रखना।”

     

    रात को जब बच्चे सो गए तो सरला और गोविंद बरामदे में बैठे थे।

     

    सरला ने धीमे से पूछा—

     

    “तुम्हें लगता है हमने बच्चों को माफ कर दिया?”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “हमने उन्हें कभी छोड़ा ही नहीं था, तो माफ क्या करना।”

     

    सरला ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “एक बात कहूं?”

     

    “कहो।”

     

    “सच में… हम अकेले ही एक-दूसरे के लिए काफी हैं।”

     

    गोविंद मुस्कुराए।

     

    “हां। लेकिन अगर बच्चे कभी साथ बैठ जाएं, तो अच्छा जरूर लगता है।”

     

    सरला भी मुस्कुरा दी।

     

    उसे समझ आ गया था कि बुढ़ापे में सबसे बड़ी जरूरत किसी से शिकायत करने की नहीं होती।

     

    बस एक ऐसे इंसान की जरूरत होती है जो चुपचाप आपके पास बैठकर कह सके—

     

    “चिंता मत करो, मैं हूं ना।”

     

    और गोविंद और सरला के पास एक-दूसरे के लिए यही सबसे बड़ी दौलत थी।