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  • डायन का महल

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    डायन का महल

     

    राजस्थान के एक छोटे से गाँव के पास घने बसी झाड़ियों के बीच एक विशाल और खंडहर जैसा महल था। गाँव वाले उसे “डायन का महल” कहते थे। कहते थे कि वहाँ सौ सालों से एक भयानक डायन रहती है। रात होते ही महल की टूटी खिड़कियों से लाल रोशनी निकलती थी, और कभी-कभी किसी औरत के रोने की आवाज़ पूरे जंगल में गूंज जाती थी।

     

    गाँव का कोई भी इंसान उस महल की तरफ जाने की हिम्मत नहीं करता था। बच्चों को भी बचपन से यही सिखाया जाता था कि अगर कभी गलती से भी उस जंगल में चले गए, तो डायन उन्हें हमेशा के लिए अपने महल में कैद कर लेगी।

     

    उसी गाँव में सत्रह साल का एक लड़का रहता था, जिसका नाम वीर था। वह बाकी लोगों से अलग था। उसे हर बात का सच जानने की आदत थी। उसे हमेशा लगता था कि हर डर के पीछे कोई न कोई राज ज़रूर छिपा होता है।

     

    एक दिन उसकी छोटी बहन गुड़िया जंगल में लकड़ियाँ बीनने गई, लेकिन शाम तक वापस नहीं लौटी। पूरे गाँव में हड़कंप मच गया। लोगों ने बिना खोजे ही कह दिया, “उसे डायन उठा ले गई। अब वह कभी वापस नहीं आएगी।”

     

    लेकिन वीर ने हार नहीं मानी। उसने अकेले ही अपनी बहन को ढूँढ़ने का फैसला किया। गाँव वालों ने बहुत रोका, मगर उसने किसी की बात नहीं सुनी।

     

    रात होते ही वह एक मशाल और अपनी दादी का दिया हुआ ताबीज लेकर जंगल की ओर निकल पड़ा। जंगल में अजीब सी खामोशी थी। पेड़ों के बीच से ठंडी हवा गुजर रही थी, मानो कोई उसका पीछा कर रहा हो।

     

    कुछ देर बाद उसे दूर एक विशाल महल दिखाई दिया। उसकी टूटी हुई दीवारों पर बेलें उगी हुई थीं। लोहे का बड़ा दरवाज़ा अपने आप चरमराता हुआ खुल गया।

     

    वीर ने हिम्मत करके अंदर कदम रखा।

     

    महल के अंदर हर तरफ धूल जमी थी, लेकिन हैरानी की बात यह थी कि बीच का रास्ता बिल्कुल साफ था, जैसे कोई रोज़ वहाँ से गुजरता हो। अचानक ऊपर की मंज़िल से पायल की आवाज़ सुनाई दी।

     

    वीर धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। तभी उसके सामने सफेद कपड़ों में एक बूढ़ी औरत दिखाई दी। उसके लंबे सफेद बाल थे और आँखें हल्की नीली चमक रही थीं।

     

    औरत ने धीमी आवाज़ में कहा,

    “तुम यहाँ क्यों आए हो?”

     

    वीर ने डरते हुए कहा,

    “मैं अपनी बहन को लेने आया हूँ।”

     

    औरत मुस्कुराई।

    “लोग मुझे डायन कहते हैं, लेकिन किसी ने कभी मेरा सच जानने की कोशिश नहीं की।”

     

    इतना कहकर वह अचानक हवा में गायब हो गई।

     

    वीर घबरा गया, लेकिन उसने आगे बढ़ना जारी रखा। एक कमरे में उसे कई पुराने चित्र दिखाई दिए। उनमें एक सुंदर रानी की तस्वीर थी। तस्वीर के नीचे लिखा था—’रानी मृणालिनी’।

     

    तभी पीछे से वही आवाज़ आई,

    “वही मेरा असली नाम है।”

     

    वीर ने पलटकर देखा। इस बार वह बूढ़ी औरत नहीं, बल्कि एक बेहद सुंदर रानी उसके सामने खड़ी थी।

     

    रानी ने कहा,

    “सैकड़ों साल पहले मैं इसी राज्य की रानी थी। मैं लोगों की सेवा करती थी। लेकिन राज्य का लालची मंत्री सिंहासन चाहता था। उसने पूरे राज्य में यह अफवाह फैला दी कि मैं डायन हूँ। लोगों ने बिना सच जाने मुझे जिंदा महल में कैद कर दिया। मरते समय मैंने बस एक श्राप दिया कि जब तक कोई निडर इंसान मेरे सच पर विश्वास नहीं करेगा, तब तक मेरी आत्मा इस महल से मुक्त नहीं होगी।”

     

    वीर सब कुछ समझ चुका था।

     

    उसी समय महल ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगा। चारों तरफ काली परछाइयाँ दिखाई देने लगीं। वे असली बुरी आत्माएँ थीं, जो वर्षों से इस महल में कैद थीं।

     

    उनका सरदार गरजा,

    “अगर रानी आज़ाद हो गई, तो हमारा अंत हो जाएगा!”

     

    सैकड़ों काली परछाइयाँ वीर की ओर बढ़ने लगीं।

     

    वीर ने अपनी दादी का दिया हुआ ताबीज़ कसकर पकड़ लिया। अचानक ताबीज़ से तेज़ सुनहरी रोशनी निकली। वह रोशनी पूरे महल में फैल गई। एक-एक करके सारी काली परछाइयाँ राख बनकर गायब होने लगीं।

     

    लेकिन तभी सबसे बड़ी परछाईं ने गुड़िया को पकड़ लिया।

     

    वीर पूरी ताकत से दौड़ा और अपनी बहन का हाथ पकड़ लिया। दोनों ज़मीन पर गिर पड़े।

     

    रानी ने अपनी आखिरी शक्ति इकट्ठी की और आसमान की ओर हाथ उठाया। महल के ऊपर तेज़ सफेद प्रकाश फैल गया। देखते ही देखते सारी बुरी शक्तियाँ हमेशा के लिए खत्म हो गईं।

     

    महल पूरी तरह शांत हो गया।

     

    रानी मुस्कुराई।

     

    “आज तुमने केवल अपनी बहन को नहीं बचाया, बल्कि मुझे भी सदियों के श्राप से मुक्त कर दिया।”

     

    इतना कहते ही उनका शरीर चमकने लगा और कुछ ही पलों में वह प्रकाश बनकर आकाश में विलीन हो गईं।

     

    वीर और गुड़िया महल से बाहर निकल आए।

     

    सुबह जब दोनों गाँव पहुँचे, तो सब लोग उन्हें देखकर हैरान रह गए।

     

    वीर ने गाँव वालों को पूरी सच्चाई बताई। पहले तो किसी ने विश्वास नहीं किया, लेकिन जब सभी लोग महल तक पहुँचे, तो वहाँ अब कोई डरावनी जगह नहीं थी। टूटी दीवारों के बीच सुंदर फूल खिल चुके थे। महल के ऊपर उड़ते सफेद कबूतर मानो बता रहे थे कि अब वहाँ कोई श्राप नहीं बचा।

     

    गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उन्होंने कहा,

    “हमारे पूर्वजों ने बिना सच जाने एक निर्दोष रानी को डायन कह दिया। सबसे बड़ा पाप अंधविश्वास होता है।”

     

    उस दिन के बाद किसी ने उस जगह को डायन का महल नहीं कहा।

     

    अब लोग उसे “रानी मृणालिनी का महल” कहने लगे।

     

    हर साल गाँव वाले वहाँ दीप जलाते, फूल चढ़ाते और बच्चों को एक ही बात सिखाते

     

    “किसी इंसान का फैसला अफवाहों से नहीं, बल्कि सच जानकर करना चाहिए। कई बार जिसे दुनिया राक्षस समझती है, वह सबसे बड़ा पीड़ित होता है।”

     

    समय बीतता गया। वीर बड़ा होकर गाँव का सबसे सम्मानित युवक बना। उसने उस महल को फिर से बनवाया और उसे एक ऐसी जगह बना दिया जहाँ दूर-दूर से लोग इतिहास और सच्चाई जानने आते थे। महल के मुख्य द्वार पर पत्थर की एक पट्टिका लगाई गई, जिस पर लिखा था—

     

    “डर से बड़ा सच होता है, और सच से बड़ी कोई शक्ति नहीं।”

     

    कहते हैं, आज भी पूर्णिमा की रात उस महल की सबसे ऊँची खिड़की पर सफेद रोशनी दिखाई देती है। लेकिन अब लोग उससे डरते नहीं। वे मानते हैं कि वह रानी मृणालिनी की पवित्र आत्मा है, जो इस बात की

    गवाही देती है कि झूठ चाहे कितने भी वर्षों तक राज करे, अंत में जीत हमेशा सच की ही होती है।