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टैग: #डरावनी कहानी

  • कदमों की आवाज

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    कदमों की आवाज

     

    रात के करीब बारह बज रहे थे। पूरे गांव में सन्नाटा पसरा था। सिर्फ राघव के पुराने मकान में ऊपर जाती लकड़ी की सीढ़ियां थीं, जो हर रात किसी के कदमों की आवाज से गूंजती थीं।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    पहले एक कदम।

     

    फिर दूसरा।

     

    फिर तीसरा।

     

    और फिर अचानक सब शांत।

     

    राघव उस आवाज से पिछले तीन महीने से परेशान था।

     

    मकान उसे अपने नाना से मिला था। नाना की मौत के बाद राघव अपनी पत्नी नंदिनी के साथ वहां रहने आया था।

     

    पहली रात ही नंदिनी ने पूछा था,

     

    “राघव, ऊपर कोई गया है क्या?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “नहीं, ऊपर तो कोई है ही नहीं।”

     

    नंदिनी ने हंसकर कहा,

     

    “तो फिर आवाज कैसी थी?”

     

    राघव ने बात टाल दी।

     

    लेकिन अगली रात फिर वही हुआ।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज नीचे से ऊपर जा रही थी।

     

    नंदिनी ने राघव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “ये आवाज सीढ़ियों से आ रही है।”

     

    राघव ने टॉर्च उठाई और सीढ़ियों के पास गया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ने लगा।

     

    पहली सीढ़ी।

     

    दूसरी।

     

    तीसरी।

     

    जैसे ही वह पांचवीं सीढ़ी पर पहुंचा, ऊपर से किसी के भागने की आवाज आई।

     

    ठक-ठक-ठक-ठक!

     

    राघव ने तुरंत टॉर्च ऊपर की।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    लेकिन सीढ़ियों के आखिरी पायदान पर एक छोटी-सी लाल रिबन पड़ी थी।

     

    राघव ने उसे उठा लिया।

     

    नंदिनी ने पूछा,

     

    “ये किसकी है?”

     

    राघव कुछ देर उसे देखता रहा।

     

    “पता नहीं।”

     

    अगली सुबह राघव गांव के सबसे बुजुर्ग आदमी गोविंद काका के पास गया।

     

    उसने घर की बात बताई।

     

    काका का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उन्होंने पूछा,

     

    “क्या तुम्हें सीढ़ियों पर कोई रिबन मिली?”

     

    राघव चौंक गया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    काका कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “उस घर की सीढ़ियों की आवाज नई नहीं है।”

     

    “मतलब?”

     

    “करीब बीस साल पहले तुम्हारी नाना की बेटी… तुम्हारी मौसी आरती… इसी घर में रहती थी।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “मेरी तो कोई मौसी नहीं थी।”

     

    गोविंद काका ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “तुम्हें यही बताया गया था।”

     

    राघव का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “सच क्या है?”

     

    काका ने धीमी आवाज में कहा,

     

    “आरती एक रात ऊपर के कमरे में गई थी। उसके बाद वह कभी नीचे नहीं आई।”

    “क्या हुआ था उसके साथ?”

     

    काका ने सिर झुका लिया।

     

    “उस रात भी सीढ़ियों पर कदमों की आवाज आई थी।”

     

    राघव के हाथ से रिबन गिरते-गिरते बची।

    “फिर?”

     

    “तुम्हारे नाना ने कहा कि आरती घर छोड़कर चली गई। लेकिन गांव वालों को यकीन नहीं हुआ।”

     

    राघव घर वापस लौट आया।

     

    उसने उसी दिन ऊपर का बंद कमरा खोलने का फैसला किया।

     

    कमरे के दरवाजे पर पुराना ताला लगा था।

     

    चाबी उसे नाना की अलमारी से मिली।

     

    ताला खुलते ही धूल की मोटी परत हवा में उड़ गई।

     

    कमरे के अंदर एक पुरानी लकड़ी की मेज, कुछ किताबें और दीवार पर लगी एक तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    उसके बालों में लाल रिबन लगी थी।

    राघव का दिल बैठ गया।

     

    वह रिबन बिल्कुल वही थी जो उसे सीढ़ियों पर मिली थी।

     

    तस्वीर के नीचे लिखा था आरती उम्र 12 साल।

    नंदिनी ने तस्वीर देखते हुए पूछा,“ये तुम्हारी मौसी हैं?”

     

    राघव ने धीरे से सिर हिलाया।

    “शायद…”

     

    तभी कमरे के बाहर से आवाज आई।

    ठक… ठक… ठक…

     

    दोनों जम गए।

    आवाज सीढ़ियों से आ रही थी।

     

    नंदिनी ने फुसफुसाकर कहा,

    “राघव… कोई ऊपर आ रहा है।”

     

    कदम धीरे-धीरे ऊपर आ रहे थे।

    ठक…ठक…ठक…

     

    राघव ने दरवाजे की ओर देखा।

    कदम दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गए।

     

    कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

    फिर दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई।

     

    टक… टक…

    नंदिनी डरते हुए पीछे हट गई।

     

    राघव ने हिम्मत करके दरवाजा खोला।

    बाहर कोई नहीं था।

    लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान सीढ़ियों से शुरू होकर कमरे के अंदर आ रहे थे।

    और जाकर तस्वीर के सामने खत्म हो रहे थे।

     

    राघव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    अब तस्वीर में आरती के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

    उसकी आंखें जैसे सीधे राघव को देख रही थीं।

     

    उसी रात राघव ने नाना की पुरानी डायरी ढूंढ निकाली।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था

    “मैंने आरती को नहीं मारा। लेकिन उसे बचाया भी नहीं।”

     

    राघव की आंखें फैल गईं।

    अगली लाइन पढ़कर उसके हाथ कांपने लगे।

     

    “उस रात आरती ने सीढ़ियों पर किसी को देखा था। वह डरकर ऊपर भागी। मैं उसके पीछे गया। लेकिन मैंने जो देखा, उसके बाद मैं खुद डर गया।”

     

    आगे का पन्ना फटा हुआ था।

     

    राघव ने पूरी डायरी उलट-पलट दी।

    आखिर में एक छोटी-सी पर्ची मिली।

     

    उस पर लिखा था“जिस रात कदमों की आवाज सुनाई दे, सीढ़ियों पर पीछे मुड़कर मत देखना।”

    राघव ने नंदिनी को कुछ नहीं बताया।

     

    लेकिन उसी रात ठीक बारह बजे फिर आवाज शुरू हो गई।

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज बहुत तेज थी।

    राघव और नंदिनी नीचे कमरे में बैठे थे।

     

    आवाज धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे आने लगी।ठक… ठक… ठक…

    नंदिनी ने राघव का हाथ पकड़ लिया।

    “राघव… ये नीचे आ रही है।”

    राघव ने सीढ़ियों की तरफ देखा।

     

    अंधेरे में किसी की परछाई दिखाई दी छोटी-सी।

    जैसे कोई बच्ची धीरे-धीरे सीढ़ियां उतर रही हो।

     

    राघव के मुंह से अचानक निकला,

    “आरती?”

    परछाई रुक गई।

     

    फिर एक धीमी आवाज आई,“भैया…”

     

    राघव की आंखों में आंसू आ गए।

    “तुम्हें क्या हुआ था?”

     

    आवाज आई,मैं गिरी नहीं थी…

     

    राघव ने पूछा,तो?

    “मुझे धक्का दिया गया था।”

     

    नंदिनी ने राघव की तरफ देखा“किसने?”

     

    कुछ पल तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर जवाब आया“नाना ने नहीं…”

     

    राघव की सांस रुक गई।

    “फिर किसने?”

     

    परछाई ने धीरे से अपना हाथ ऊपर उठाया।

    और सीढ़ियों के ऊपर खड़े एक आदमी की ओर इशारा किया।

     

    राघव ने पलटकर देखा।

    ऊपर उसके नाना खड़े थे।

    लेकिन वह तो बीस साल पहले मर चुके थे।

    राघव पीछे हट गया।

     

    नाना की परछाई धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे आने लगी।

     

    आरती की आवाज फिर सुनाई दी“उन्होंने मुझे नहीं धक्का दिया था…”

    राघव ने कांपते हुए पूछा,“फिर?”

    “उन्होंने मुझे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    नाना की परछाई के हाथ में एक पुरानी लालटेन थी।

    अचानक राघव को सब समझ आने लगा।

     

    उस रात आरती सीढ़ियों से गिर गई थी। नाना उसे बचाने दौड़े थे। लेकिन आरती गंभीर रूप से घायल हो गई थी।

     

    नाना उसे अस्पताल ले जाने के बजाय डर गए।

    क्योंकि उसी समय घर के पुराने कागजों में एक बड़ा राज छिपा था आरती ने नाना को किसी जमीन के धोखे का सच पता चलते सुन लिया था।

     

    नाना डर गए कि अगर आरती बच गई तो सबको सच बता देगी।

    उन्होंने मदद बुलाने में देर कर दी।

    और आरती चली गई।

     

    नाना ने पूरी जिंदगी यह सच छिपाए रखा।

    तभी पुलिस की गाड़ी की आवाज बाहर सुनाई दी।

    राघव ने चौंककर दरवाजा खोला।

    उसने अपने नाना की डायरी पुलिस को सौंप दी।

    सालों पुराना सच सामने आ गया।

     

    अगली रात पहली बार उस घर की सीढ़ियों पर कोई कदमों की आवाज नहीं आई।

    राघव और नंदिनी चैन की सांस लेकर सोने चले गए।

    लेकिन आधी रात को राघव की नींद अचानक खुल गई। ठक… ठक… ठक…

    वही आवाज।

    वह धीरे से बिस्तर से उठा।सीढ़ियों की तरफ देखा।

    इस बार वहां कोई परछाई नहीं थी।

    बस आखिरी सीढ़ी पर लाल रिबन पड़ी थी।

    राघव ने उसे उठाया।

    तभी पीछे से एक बच्ची की बहुत धीमी आवाज आई“भैया…”

    राघव पलटा।वहां कोई नहीं था।

    लेकिन दीवार पर लगी आरती की पुरानी तस्वीर में अब उसके साथ एक और बच्चा खड़ा था।

    वह बच्चा बिल्कुल राघव जैसा दिख रहा था।

    तस्वीर के नीचे एक नई तारीख लिखी थी“अगली रात…”

    और उसके नीचे सिर्फ तीन शब्द थे“सीढ़ियां फिर गिनना।”