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  • जुड़ शीतल की मधुर छांव

    जुड़ शीतल की मधुर छांव

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    जुड़ शीतल आई है लेकर,

    ठंडी हवाओं का संदेश,

    धूप की तपिश से थके मन को,

    देती है सुकून विशेष।

    सुबह-सुबह जब सूरज झांके,

    नव किरणों का हो आगमन,

    ठंडे जल की कोमल बूंदें,

    कर दें मन का हर स्पंदन।

    आम के पत्तों से टपके जल,

    हर आंगन को हरियाली दे,

    स्नेह भरे उस ठंडे छींटे से,

    रिश्तों में फिर खुशहाली दे।

    मां के हाथों का वो पानी,

    जब सिर पर हल्के से गिरता है,

    जैसे हर दुख, हर चिंता को,

    धीरे-धीरे वो हरता है।

    बाबा की ममता, दादी की सीख,

    सबमें बसती ठंडी छांव,

    हर बूंद में आशीष समाई,

    हर दिल में जगती नई चाह।

    छोटे-बड़े सब साथ मिलें,

    हंसी-खुशी का मेला हो,

    जुड़ शीतल के इस पर्व में,

    हर दिल में प्रेम का रेला हो।

    मिट्टी की खुशबू भी कहती,

    अब तो मौसम बदला है,

    शीतलता के इस उत्सव में,

    जीवन ने रंग नया भरा है।

    ना कोई गिला, ना कोई शिकवा,

    बस अपनापन का एहसास,

    जुड़ शीतल सिखा जाती है,

    ठंडक में छुपा है विश्वास।

    धरती भी जैसे मुस्काए,

    जब जल से उसका तन भीगे,

    हर बूंद में छुपा आशीष,

    जीवन को नव रंगों से सींचे।

    खेतों में हरियाली लहराए,

    नदियों में मधुर संगीत बहे,

    हर जन-मन में शांति बस जाए,

    जीवन के हर पल रंग सहे।

    सांझ ढले जब दीप जलें,

    मन में मधुर उजियारा हो,

    दिन भर की उस ठंडी छाया का,

    हर चेहरे पर नज़ारा हो।

    पुरखों की ये प्यारी परंपरा,

    आज भी दिलों में बसती है,

    हर साल ये आकर हमको,

    अपनों से फिर जोड़ती है।

    नव जीवन का संदेश लिए,

    हर दुख को पीछे छोड़ती है,

    जुड़ शीतल की हर एक बूँद,

    मन की थकान को तोड़ती है।

    जुड़ शीतल का ये त्यौहार,

    सिर्फ रिवाज नहीं, एक भावना है,

    प्यार, स्नेह और शांति का,

    हर दिल में बसता खजाना है।

    चलो मिलकर इसे मनाएं,

    मन में प्रेम का दीप जलाएं,

    ठंडे जल की हर एक बूँद से,

    जीवन को सुंदर बनाएं। 🌿💧