🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

टैग: जिसे हम लड़ाई समझते रहे

  • जिसे हम लड़ाई समझते रहे

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    जिसे हम लड़ाई समझते रहे

     

    “तुमने फिर मेरी किताब छुपाई?”

     

    सिया ने गुस्से में आरव के कमरे का दरवाज़ा खोलते हुए पूछा।

     

    आरव बिल्कुल आराम से कुर्सी पर बैठा था और उसके हाथ में वही किताब थी, जिसे सिया पिछले दस मिनट से पूरे घर में ढूंढ रही थी।

     

    “मैंने नहीं छुपाई,” आरव ने मासूम चेहरा बनाते हुए कहा, “बस तुम्हारी किताब को थोड़ी देर के लिए मुझसे मिलने का मौका दिया था।”

     

    सिया ने उसे घूरकर देखा।

     

    “आरव!”

     

    “क्या?”

    “तुम कभी बड़े नहीं हो सकते?”

     

    आरव हंस पड़ा।

    “और तुम कभी गुस्सा करना बंद नहीं कर सकती?”

     

    सिया ने उसके हाथ से किताब छीनी और पैर पटकती हुई बाहर जाने लगी।

     

    “वैसे गणित का होमवर्क कर लिया?” आरव ने पीछे से पूछा।

     

    सिया अचानक रुक गई।

     

    “तुम्हें कैसे पता कि नहीं किया?”

     

    “तुम्हारी शक्ल देखकर।”

     

    “तुम बहुत परेशान करते हो!”

     

    “पता है।”

     

    “फिर भी नहीं सुधरते?”

     

    आरव ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम्हारे साथ रहने की आदत है।”

     

    सिया कुछ पल उसे देखती रही। फिर बिना कुछ बोले वहां से चली गई।

     

    लेकिन उस दिन आरव की वह बात उसके मन में बहुत देर तक घूमती रही।

     

    आरव और सिया बचपन से एक-दूसरे को जानते थे। उनके घर आमने-सामने थे और दोनों की जिंदगी में एक-दूसरे की मौजूदगी हमेशा से थी। बचपन में उनकी लड़ाई किसी भी बात पर शुरू हो जाती थी।

     

    कभी आरव सिया की चोटी खींच देता।

     

    कभी सिया उसकी कॉपी पर पेन से मूंछें बना देती।

     

    कभी आरव उसका टिफिन खा जाता और मासूम बनकर कहता, “मुझे लगा ये मेरा है।”

     

    सिया गुस्से में कहती, “तुम्हें हर चीज़ अपना ही क्यों लगती है?”

     

    आरव हंसते हुए जवाब देता, “क्योंकि तुम मेरी पड़ोसन हो।”

     

    “तो?”

     

    “तो पड़ोसी की चीज़ें आधी अपनी होती हैं।”

     

    “मैं कोई चीज़ नहीं हूं!”

     

    “हां, तुम तो पूरी आफत हो।”

     

    और फिर दोनों लड़ते-लड़ते खुद ही हंसने लगते।

     

    समय बीतता गया। बचपन पीछे छूट गया। स्कूल खत्म हुआ और कॉलेज शुरू हो गया। उनकी लड़ाइयां अब भी खत्म नहीं हुई थीं, बस उनका तरीका बदल गया था।

     

    पहले आरव सिया की चोटी खींचता था, अब उसके हाथ से फोन छीनकर भाग जाता था।

     

    पहले सिया उसकी कॉपी फाड़ देती थी, अब उसके सोशल मीडिया पर अजीब-अजीब तस्वीरें लगा देती थी।

     

    लेकिन इन सबके बीच कुछ धीरे-धीरे बदल रहा था।

     

    अब अगर आरव एक दिन सिया से बात न करे, तो सिया को अजीब-सा लगने लगता।

     

    वह खुद से पूछती, “आज ये चुप क्यों है?”

     

    फिर खुद ही जवाब देती, “मुझे क्या फर्क पड़ता है?”

     

    लेकिन फर्क पड़ता था।

     

    बहुत ज्यादा।

     

    एक दिन कॉलेज से लौटते समय सिया का पैर सड़क पर फिसल गया। वह गिरते-गिरते बची। आरव ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “देखकर नहीं चल सकती?”

     

    सिया ने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा, “मैं ठीक हूं।”

     

    “हां, दिख रहा है। गिरते-गिरते भी तुम्हें अपनी अकड़ की चिंता है।”

     

    “तुम मदद कर रहे हो या ताना मार रहे हो?”

     

    “दोनों।”

     

    सिया ने उसे देखा।

     

    आरव अब भी उसका हाथ पकड़े हुए था।

     

    कुछ पल दोनों चुप रहे।

     

    फिर सिया ने धीरे से अपना हाथ छुड़ा लिया।

     

    “छोड़ो।”

     

    आरव ने तुरंत हाथ छोड़ दिया।

     

    लेकिन उस दिन दोनों के बीच कुछ बदल गया था।

     

    सिया ने पहली बार महसूस किया कि आरव का हाथ पकड़ना उसे बुरा नहीं लगा था।

     

    बल्कि अच्छा लगा था।

     

    बहुत अच्छा।

     

    लेकिन उसने इस एहसास को समझने की कोशिश नहीं की।

     

    क्योंकि आरव और सिया के बीच प्यार जैसी कोई चीज़ हो सकती है, यह सोच भी उन्हें अजीब लगती थी।

     

    वे तो बचपन से लड़ते आए थे।

     

    कुछ दिनों बाद आरव की तबीयत खराब हो गई। सिया को पता चला तो वह शाम को उसके घर पहुंच गई।

     

    आरव बिस्तर पर लेटा था।

     

    सिया दरवाज़े पर खड़ी होकर बोली, “क्या हुआ?”

     

    आरव ने आंखें खोलकर उसे देखा।

     

    “तुम?”

     

    “हां, मैं। तुम्हें देखने आई हूं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम बीमार हो।”

     

    “तो?”

     

    “तो क्या?”

     

    “तुम्हें मेरी चिंता हो रही है?”

     

    सिया ने तुरंत मुंह बनाया।

     

    “बिल्कुल नहीं। मैं तो बस देखने आई हूं कि तुम सच में बीमार हो या नाटक कर रहे हो।”

     

    आरव हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें मेरी चिंता होती है।”

     

    “बिल्कुल नहीं।”

     

    “होती है।”

     

    “नहीं होती।”

     

    “बहुत होती है।”

     

    “चुप रहो!”

     

    आरव हंसने लगा, लेकिन हंसते-हंसते खांस पड़ा।

     

    सिया का चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “आरव!”

     

    वह उसके पास बैठ गई।

     

    “पानी चाहिए?”

     

    आरव ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    सिया ने उसे पानी दिया और फिर उसका माथा छूकर बोली, “तुम्हें बुखार है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा, “तुम मेरे लिए इतनी परेशान क्यों हो रही हो?”

     

    सिया कुछ पल चुप रही।

     

    उसके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

     

    वह बस धीरे से बोली, “पता नहीं।”

     

    और शायद यही सच था।

     

    उसे सच में नहीं पता था।

     

    आरव ठीक हो गया, लेकिन उसके बाद उनके बीच कुछ बदल गया।

     

    अब वे पहले की तरह लड़ते तो थे, लेकिन लड़ाई के बाद दोनों एक-दूसरे को देखने लगते।

     

    आरव कभी-कभी बिना किसी वजह के सिया के घर के बाहर खड़ा रहता।

     

    सिया खिड़की से उसे देखकर पूछती, “क्या चाहिए?”

     

    आरव कहता, “कुछ नहीं।”

     

    “फिर यहां क्यों खड़े हो?”

     

    “पता नहीं।”

     

    और दोनों कुछ देर चुप रहते।

     

    कभी-कभी उन्हें खुद समझ नहीं आता था कि वे एक-दूसरे के पास क्यों रहना चाहते हैं।

     

    जब आरव कहीं बाहर जाता, तो सिया बार-बार अपना फोन देखती।

     

    जब सिया किसी दोस्त के साथ ज्यादा देर बात करती, तो आरव का मूड खराब हो जाता।

     

    “क्या हुआ?” सिया पूछती।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “फिर मुंह क्यों बना रखा है?”

     

    “मैंने कब मुंह बनाया?”

     

    “अभी बना रखा है।”

     

    “तुम्हें बहुत ध्यान रहता है मेरे चेहरे का।”

     

    “क्योंकि तुम हर समय अजीब शक्ल बनाते रहते हो।”

     

    “तुम जल रही हो क्या?”

     

    “तुमसे? बिल्कुल नहीं।”

     

    “मैंने तो पूछा भी नहीं था।”

     

    सिया चुप हो जाती और आरव मुस्कुराने लगता।

     

    लेकिन दोनों के दिल में कुछ ऐसा था, जिसका नाम वे नहीं जानते थे।

     

    एक शाम दोनों छत पर बैठे थे। सिया चुपचाप सामने देख रही थी।

     

    आरव ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “तुम्हारा ‘कुछ नहीं’ हमेशा बहुत कुछ होता है।”

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “तुम मुझे इतना जानते कब से हो?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “पता नहीं।”

     

    “तुम्हें कुछ पता भी है?”

     

    आरव हल्का-सा हंसा।

     

    “हां।”

     

    “क्या?”

     

    “जब तुम परेशान होती हो तो ज्यादा चुप हो जाती हो। जब तुम्हें डर लगता है तो गुस्सा करने लगती हो। और जब तुम खुश होती हो तो बिना वजह बहुत बोलती हो।”

     

    सिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैं हमेशा बोलती हूं।”

     

    “हां, वो भी सही है।”

     

    सिया हंस दी।

     

    आरव भी मुस्कुराया।

     

    कुछ देर दोनों चुप बैठे रहे।

     

    वह चुप्पी अजीब नहीं थी।

     

    अच्छी थी।

     

    सुकून देने वाली।

     

    सिया ने धीरे से पूछा, “आरव?”

     

    “हां?”

     

    “अगर मैं कभी बहुत दूर चली गई तो?”

     

    आरव ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “कहां?”

     

    “कहीं भी।”

     

    “तो वापस आ जाना।”

     

    “अगर नहीं आ पाई तो?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर धीमे से बोला, “तो मैं लेने आ जाऊंगा।”

     

    सिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने जवाब देने के लिए मुंह खोला, लेकिन कुछ कह नहीं पाया।

     

    क्यों?

     

    वह खुद नहीं जानता था।

     

    बस इतना जानता था कि सिया अगर उससे दूर चली गई, तो उसकी जिंदगी में कुछ बहुत जरूरी चीज़ कम हो जाएगी।

     

    शायद उसकी सबसे बड़ी लड़ाई।

     

    शायद उसकी सबसे अच्छी दोस्त।

     

    या शायद कुछ और।

     

    समय आगे बढ़ता गया।

     

    आरव और सिया की जिंदगी में बहुत कुछ बदला, लेकिन उनका रिश्ता नहीं बदला।

     

    वे आज भी लड़ते थे।

     

    छोटी-छोटी बातों पर बहस करते थे।

     

    एक-दूसरे को चिढ़ाते थे।

     

    लेकिन अब दोनों को एक-दूसरे की आदत हो चुकी थी।

     

    ऐसी आदत, जिसके बिना दिन अधूरा लगता था।

     

    एक दिन आरव ने सिया से पूछा, “तुम्हें कभी लगता है कि हम दोनों कुछ ज्यादा ही साथ रहते हैं?”

     

    सिया ने उसे देखा।

     

    “तुम्हें कोई परेशानी है?”

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर?”

     

    आरव ने धीरे से कहा, “बस पूछ रहा था।”

     

    सिया कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली, “तुम्हारे बिना रहना मुश्किल होगा।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    सिया तुरंत संभल गई।

     

    “मतलब… लड़ने के लिए कोई और मिलेगा नहीं न।”

     

    आरव मुस्कुरा दिया।

     

    “हां, मैं भी यही सोच रहा था।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    लेकिन उस हंसी के पीछे एक सच्चाई थी।

     

    वे दोनों एक-दूसरे से प्यार करने लगे थे।

     

    बस उन्हें इसका एहसास नहीं था।

     

    उन्हें लगता था कि यह दोस्ती है।

     

    आदत है।

     

    रोज़ की लड़ाई है।

     

    एक-दूसरे की चिंता करने की आदत है।

     

    लेकिन शायद प्यार हमेशा अचानक नहीं होता।

     

    कभी-कभी प्यार धीरे-धीरे आता है।

     

    बचपन की छोटी-छोटी लड़ाइयों के साथ।

     

    किसी की किताब छुपाने से।

     

    किसी का टिफिन चुराने से।

     

    किसी के बीमार होने पर बिना बुलाए उसके घर पहुंच जाने से।

     

    और फिर एक दिन अचानक पता चलता है कि जिस इंसान से हम सबसे ज्यादा लड़ते हैं, वही हमारे लिए सबसे ज्यादा जरूरी बन चुका है।

     

    कुछ साल बाद आरव और सिया की शादी तय हो गई।

     

    दोनों परिवारों में खुशी का माहौल था।

     

    लेकिन सिया उस दिन सुबह से ही बहुत चुप थी।

     

    आरव ने उसे देखा तो पूछा, “क्या हुआ?”

     

    सिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारा ‘कुछ नहीं’ आज भी बहुत कुछ है।”

     

    सिया ने उसे घूरकर देखा।

     

    “आज भी परेशान करोगे?”

     

    “आदत है।”

     

    सिया की आंखें भर आईं।

     

    आरव का चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “अरे… रो क्यों रही हो?”

     

    सिया ने अपनी आंखें पोंछते हुए कहा, “पता नहीं।”

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “आज तो तुम्हें खुश होना चाहिए।”

     

    सिया ने उसे देखा।

     

    “हां… खुश हूं।”

     

    “फिर रो क्यों रही हो?”

     

    सिया कुछ बोल नहीं पाई।

     

    शायद उसे अपने बचपन की सारी बातें याद आ रही थीं।

     

    वह लड़का, जो उसकी चोटी खींचकर भाग जाता था।

     

    जो उसका टिफिन खा जाता था।

     

    जो उसे हर बात पर परेशान करता था।

     

    जो उसके दुखी होने पर खुद परेशान हो जाता था।

     

    जिसके साथ उसने अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत साल बिताए थे।

     

    आज वही आरव उसका जीवनसाथी बनने वाला था।

     

    शादी के दिन जब सिया दुल्हन बनकर मंडप में आई, तो आरव उसे देखकर कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप हो गया।

     

    सिया ने भी उसकी तरफ देखा।

     

    वही आरव।

     

    वही आंखें।

     

    वही मुस्कान।

     

    बस आज उसके चेहरे पर बचपन वाली शरारत थोड़ी कम थी।

     

    पंडित जी ने मंत्र पढ़ने शुरू किए।

     

    दोनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा।

     

    सिया की आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।

     

    आरव ने धीरे से पूछा, “तुम रो क्यों रही हो?”

     

    सिया ने आंसुओं के बीच हल्की-सी मुस्कान दी।

     

    “पता नहीं।”

     

    आरव धीरे से बोला, “आज भी तुम्हें कुछ पता नहीं?”

     

    सिया ने उसे देखा।

     

    फिर धीरे से बोली, “शायद आज पता चल गया।”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “क्या?”

     

    सिया की आंखों से आंसू फिर बह निकले।

     

    “कि मैं तुमसे बचपन से ही प्यार करती थी।”

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर हल्के से मुस्कुराया।

     

    “मुझे भी आज ही पता चला।”

     

    “झूठे।”

     

    “सच में।”

     

    “तुम तो हमेशा कहते थे कि मैं आफत हूं।”

     

    “हां, हो।”

     

    सिया ने आंसुओं के बीच मुस्कुराते हुए कहा, “फिर शादी क्यों कर रहे हो?”

     

    आरव ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    “क्योंकि पूरी जिंदगी इस आफत के साथ लड़ना है।”

     

    सिया हंसते-हंसते रो पड़ी।

     

    फेरे शुरू हुए।

     

    हर फेरे के साथ सिया आरव की ओर देखती रही।

     

    उसकी आंखों से आंसू रुक ही नहीं रहे थे।

     

    आरव कभी उसे देखता, कभी मुस्कुराता, कभी चुपचाप उसकी आंखों से आंसू पोंछ देता।

     

    सिया उसे देखती रही।

     

    उसे याद आ रहा था—

     

    वह छोटा-सा लड़का, जो उसकी चोटी खींचकर भाग जाता था।

     

    वह लड़का, जिससे वह हर छोटी बात पर लड़ती थी।

     

    वह लड़का, जिसके बिना एक दिन भी अब अधूरा लगता था।

     

    आज वही उसके सामने बैठा था।

     

    उसका हाथ थामे।

     

    उसके साथ सात फेरे ले रहा था।

     

    सिया की आंखों से आंसू बहते रहे।

     

    आरव ने धीरे से उसका हाथ दबाया।

     

    सिया ने उसकी ओर देखा।

     

    आरव ने बिना कुछ कहे मुस्कुराकर उसे भरोसा दिया।

     

    और उस पल सिया समझ गई—

     

    कुछ रिश्ते अचानक प्यार नहीं बनते।

     

    वे बचपन से धीरे-धीरे हमारे साथ बड़े होते हैं।

     

    पहले लड़ाई बनकर।

     

    फिर दोस्ती बनकर।

     

    फिर आदत बनकर।

     

    और एक दिन…

     

    चुपचाप प्यार बन जाते हैं।

     

    आरव और सिया ने कभी नहीं जाना कि उन्हें एक-दूसरे से प्यार कब हुआ था।

     

    शायद उस दिन…

     

    जब आरव ने पहली बार सिया की चोटी खींची थी।

     

    या उस दिन…

     

    जब सिया उसके बीमार होने पर बिना बुलाए उसके घर पहुंची थी।

     

    या फिर उन हजारों छोटी-छोटी लड़ाइयों के बीच…

     

    जिन्हें वे हमेशा लड़ाई समझते रहे।

     

    लेकिन सच तो यह था—

     

    उनकी हर लड़ाई में थोड़ा-सा प्यार छुपा था।

     

    और आखिरकार उसी प्यार ने उन्हें एक-दूसरे का बना दिया।