🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

टैग: जिसे सबने डायन कहा

  • जिसे सबने डायन कहा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    गांव के आखिरी छोर पर एक पुराना-सा घर था। उस घर की सबसे ऊपरी मंजिल पर एक कमरा था, जिसकी खिड़की हमेशा बंद रहती थी। उस कमरे में पिछले सात सालों से एक औरत कैद थी।

     

    उसका नाम था गौरी।

     

    गांव वाले उसे डायन कहते थे।

     

    उसके अपने घरवाले उसे मनहूस कहते थे।

     

    और उसके ससुराल वाले उसे अपने बेटे और पोते की कातिल कहते थे।

     

    लेकिन सच क्या था… यह सिर्फ गौरी जानती थी।

     

    और शायद उसका भगवान।

     

    सात साल पहले गौरी की शादी राघव से हुई थी। राघव गांव के सबसे बड़े जमींदार का इकलौता बेटा था। गौरी गरीब घर की लड़की थी, मगर उसके चेहरे पर ऐसी मासूमियत थी कि राघव पहली नजर में ही उसे अपना दिल दे बैठा था।

     

    शादी के बाद गौरी ने उस घर को अपना सब कुछ मान लिया।

     

    राघव उसे बहुत प्यार करता था।

     

    “गौरी, अगर कभी मेरे और तुम्हारे बीच कोई आए ना… तो तुम मेरा हाथ मत छोड़ना,” राघव अक्सर उससे कहता।

     

    गौरी हंसकर कहती, “आप कैसी बातें करते हैं? मैं तो आपके साथ सात जन्मों तक चलने वाली हूं।”

     

    उनकी जिंदगी में एक साल बाद एक बेटा आया।

     

    छोटा-सा मन्नु।

     

    राघव तो जैसे पागल हो गया था अपने बेटे के प्यार में।

     

    “देखना गौरी, हमारा मन्नु बहुत बड़ा आदमी बनेगा।”

     

    गौरी मुस्कुराकर कहती, “नहीं… पहले ये बड़ा होकर अच्छा इंसान बनेगा।”

     

    उनकी जिंदगी में खुशियां थीं।

     

    लेकिन कुछ लोग उनकी खुशी से खुश नहीं थे।

     

    राघव का छोटा भाई विक्रम हमेशा चाहता था कि जायदाद उसके हाथ आए। मगर राघव के रहते यह कभी संभव नहीं था।

     

    एक रात राघव शहर से लौट रहा था।

     

    अगली सुबह उसकी लाश सड़क के किनारे मिली।

     

    उसकी हत्या हो चुकी थी।

     

    गांव में मातम छा गया।

     

    गौरी का तो जैसे संसार ही खत्म हो गया।

     

    वह राघव की लाश से लिपटकर चीखती रही।

     

    “उठिए ना… आपने कहा था मेरा हाथ कभी नहीं छोड़ेंगे… फिर मुझे अकेला छोड़कर क्यों चले गए?”

     

    लेकिन राघव कभी नहीं उठा।

     

    उस दिन के बाद गौरी के लिए हर सांस सजा बन गई।

     

    और फिर एक महीने बाद उसका बेटा मन्नु भी अचानक बीमार पड़ गया।

     

    गौरी रात-दिन उसके सिरहाने बैठी रही।

     

    “बेटा… आंखें खोलो ना… मां यहीं है।”

     

    लेकिन गांव में अफवाह फैलने लगी।

     

    “पहले पति मरा… अब बेटा भी मर रहा है।”

     

    “ये औरत मनहूस है।”

     

    “इसके घर में कदम रखते ही मौत आती है।”

     

    फिर एक दिन मन्नु भी दुनिया छोड़ गया।

     

    गौरी ने अपने बेटे को अपनी गोद में उठाया और पागलों की तरह चीखती रही।

     

    “मेरा बच्चा मरा नहीं है… ये झूठ है… मेरा मन्नु मुझे छोड़कर नहीं जा सकता!”

     

    उसके ससुर ने उसे धक्का देकर कहा,

     

    “तू डायन है!”

     

    गौरी जमीन पर गिर पड़ी।

     

    “बाबा… मैं मां हूं… अपने बच्चे को कैसे मार सकती हूं?”

     

    “तूने ही मेरे बेटे को खाया… तूने ही मेरे पोते को मारा!”

     

    गौरी चीखती रही।

     

    “नहीं!”

     

    लेकिन उस घर में किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।

     

    राघव की मौत का इल्जाम भी उसके सिर डाल दिया गया।

     

    लोगों ने कहा कि गौरी ने अपने पति की संपत्ति के लिए उसे मरवा दिया।

     

    और बेटे की मौत के बाद तो पूरा गांव उसके खिलाफ हो गया।

     

    उसे घर के एक कमरे में बंद कर दिया गया।

     

    वह कमरा किसी जेल से भी बदतर था।

     

    न खिड़की खुलती थी।

     

    न धूप आती थी।

     

    न किसी को उससे बात करने की इजाजत थी।

     

    दिन में एक बार उसके सामने खाना फेंक दिया जाता।

     

    कभी-कभी उसकी सास दरवाजे के बाहर खड़ी होकर कहती,

     

    “तेरी वजह से मेरा बेटा गया… मेरा पोता गया… तू मर क्यों नहीं जाती?”

     

    गौरी चुपचाप दीवार से टिककर बैठी रहती।

     

    वह रोती नहीं थी।

     

    क्योंकि रोते-रोते उसकी आंखों के आंसू खत्म हो चुके थे।

     

    उसके पास बस एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    राघव और मन्नु की।

     

    वह रोज उस तस्वीर को अपने सीने से लगाकर कहती,

     

    “मैंने नहीं मारा तुम्हें… भगवान की कसम, मैंने नहीं मारा।”

     

    सात साल गुजर गए।

     

    गौरी के बाल सफेद हो गए।

     

    चेहरा सूख गया।

     

    लेकिन उसकी आंखों में आज भी वही दर्द था।

     

    एक रात तेज बारिश हो रही थी।

     

    गौरी अपने कमरे में बैठी तस्वीर को देख रही थी।

     

    तभी बाहर से कुछ आवाजें आईं।

     

    विक्रम किसी आदमी से बात कर रहा था।

     

    “अब सात साल हो गए हैं। उस कमरे में पड़ी औरत को कौन याद रखता है?”

     

    दूसरे आदमी ने कहा,

     

    “लेकिन अगर उसे सच पता चल गया तो?”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “वो सच जानकर भी क्या कर लेगी? सब उसे डायन मानते हैं।”

     

    गौरी का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    वह दरवाजे के पास जाकर खड़ी हो गई।

     

    विक्रम की आवाज फिर आई।

     

    “राघव को मैंने मारा था। अगर वो जिंदा रहता तो सारी जायदाद मेरे हाथ से चली जाती।”

     

    गौरी के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    फिर वह बोला,

     

    “और मन्नु… उसे भी उसी दवा से मारा था। डॉक्टर ने कहा था कि बच्चा बच सकता है, लेकिन मैंने पैसे देकर उसे इलाज नहीं करने दिया।”

     

    गौरी का शरीर कांपने लगा।

     

    उसका बच्चा बीमारी से नहीं मरा था।

     

    उसे मारा गया था।

     

    और सात साल तक उसकी मां को कातिल कहा गया।

     

    गौरी ने दरवाजा पीटना शुरू कर दिया।

     

    “दरवाजा खोलो!”

     

    विक्रम चौंक गया।

     

    “कौन है?”

     

    “दरवाजा खोलो! मैंने सब सुन लिया है!”

     

    विक्रम कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने नौकरों को आवाज दी।

     

    लेकिन तभी बाहर पुलिस की गाड़ी रुकने की आवाज आई।

     

    गौरी के कमरे के सामने एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

     

    वह राघव का पुराना दोस्त था।

     

    सात साल पहले वह शहर चला गया था। कुछ दिन पहले ही लौटकर उसे सारी सच्चाई पता चली थी।

     

    उसने पुलिस को सब बता दिया था।

     

    विक्रम पकड़ा गया।

     

    सच सामने आ गया।

     

    राघव की हत्या।

     

    मन्नु की हत्या।

     

    और गौरी पर लगाए गए सारे झूठे इल्जाम।

     

    गौरी के ससुर उसके सामने हाथ जोड़कर खड़े थे।

     

    “बहू… हमें माफ कर दे।”

     

    गौरी उन्हें देखती रही।

     

    उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    “आपने मुझे सात साल तक इस कमरे में बंद रखा।”

     

    ससुर रो पड़े।

     

    “हमसे गलती हो गई।”

     

    गौरी ने तस्वीर को सीने से लगाते हुए कहा,

     

    “गलती?”

     

    उसकी आवाज टूट गई।

     

    “गलती तो एक दिन की होती है बाबा… आपने मेरी पूरी जिंदगी ही छीन ली।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    गौरी ने तस्वीर में राघव और मन्नु को देखा।

     

    “देखो… आज सबको पता चल गया कि तुम्हारी मां बेगुनाह थी।”

     

    फिर वह धीरे से मुस्कुराई।

     

    “लेकिन तुम दोनों होते ना… तो मुझे कभी खुद को साबित करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।”

     

    वह कमरे से बाहर निकली।

     

    सात साल बाद पहली बार उसके पैरों पर धूप पड़ी।

     

    गौरी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी।

     

    लेकिन उसके भीतर का अंधेरा अब भी वहीं था।

     

    क्योंकि सच सामने आ गया था…

    मगर उसका पति वापस नहीं आया।

    उसका बेटा वापस नहीं आया।और उसके जीवन के वो सात साल भी कभी वापस नहीं आने वाले थे।

    गांव वालों ने उसे डायन कहा था।

    घरवालों ने उसे कातिल कहा था।

    लेकिन वह सिर्फ एक पत्नी थी…

    एक मां थी…

    जो अपने पति और बेटे को खोने के बाद भी सात साल तक जिंदा रही।

     

    सिर्फ इसलिए…

     

    ताकि एक दिन दुनिया को बता सके कि वह बेगुनाह थी।