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  • गरीब बहन की राखी

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    गरीब बहन की राखी

     

    रक्षाबंधन का त्योहार आने वाला था। पूरे गांव में खुशी का माहौल था। हर घर में मिठाइयां बन रही थीं और बाजार रंग-बिरंगी राखियों से सजे हुए थे।

     

    लेकिन गांव के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में रहने वाली गुड़िया के घर में कोई खुशी नहीं थी।

     

    गुड़िया बहुत गरीब थी। उसके माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं थे। उसका छोटा भाई मोहन ही उसका एकमात्र सहारा था। मोहन शहर में मजदूरी करता था और बड़ी मुश्किल से दोनों का गुजारा चलता था।

     

    रक्षाबंधन से एक दिन पहले गुड़िया बाजार गई। उसने कई सुंदर राखियां देखीं, लेकिन उनके दाम सुनकर चुपचाप वापस लौटने लगी।

     

    रास्ते में उसकी नजर एक छोटी-सी साधारण राखी पर पड़ी। दुकानदार ने कहा,

    “बहन, ये सिर्फ दस रुपये की है।”

     

    गुड़िया ने अपनी मुट्ठी खोली। उसके पास केवल आठ रुपये थे।

     

    वह उदास होकर बोली,

    “भैया, दो रुपये कम हैं… क्या मैं ये राखी आठ रुपये में ले सकती हूं?”

     

    दुकानदार ने उसकी आंखों में आंसू देखे और मुस्कुराकर राखी उसके हाथ में रख दी।

     

    “ले जा बेटी, आज ये राखी मेरी तरफ से।”

     

    गुड़िया की आंखें खुशी से भर आईं।

     

    अगले दिन सुबह मोहन घर पहुंचा। उसके कपड़े पुराने थे और चेहरा थकान से भरा हुआ था।

     

    गुड़िया ने मुस्कुराते हुए उसकी कलाई पर राखी बांधी और बोली,

    “भैया, मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है। बस ये राखी है… और मेरा ढेर सारा प्यार।”

     

    मोहन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने बहन को गले लगाते हुए कहा,

    “तूने मुझे दुनिया की सबसे कीमती चीज दी है, गुड़िया। ये राखी मेरे लिए सोने से भी ज्यादा कीमती है।”

     

    गुड़िया ने पूछा,

    “भैया, तुम मेरे लिए क्या लाए हो?”

     

    मोहन कुछ नहीं बोला। उसने अपनी जेब से एक छोटा-सा पैकेट निकाला।

     

    गुड़िया ने पैकेट खोला तो उसमें नई चप्पल थी।

     

    गुड़िया हैरान होकर बोली,

    “भैया! ये कितने की है?”

     

    मोहन मुस्कुराया,

    “बहन के लिए चीजों की कीमत नहीं देखी जाती।”

     

    गुड़िया की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    कुछ दिन बाद मोहन को शहर में एक अच्छी नौकरी मिल गई। उसकी मेहनत देखकर मालिक ने उसे स्थायी काम दे दिया।

     

    मोहन ने सबसे पहले अपनी बहन को शहर बुलाया और कहा,

    “अब मेरी बहन को गरीबी में नहीं रहना पड़ेगा।”

     

    गुड़िया मुस्कुराई और बोली,

    “मुझे महंगे कपड़े या बड़ा घर नहीं चाहिए भैया। बस हर रक्षाबंधन पर मेरी कलाई में राखी बंधवाने के लिए तुम मेरे पास रहना।”

     

    मोहन ने बहन का हाथ पकड़कर कहा,

    “जब तक मेरी सांस चलेगी, मैं तेरी रक्षा का वादा निभाऊंगा।”

     

    उस दिन दोनों भाई-बहन की आंखों में आंसू थे, लेकिन उन आंसुओं में दुख नहीं, बल्कि प्यार और भरोसा था।

     

    सीख:

    राखी की कीमत उसके धागे या उसकी कीमत से नहीं होती। राखी की असली कीमत भाई-बहन के प्यार, विश्वास और एक-दूसरे के साथ खड़े रहने में होती है।