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टैग: #काबिलियत

  • मोटा आदमी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मोटा आदमी जिसे कोई काम का नहीं समझता

     

    शहर के एक छोटे से मोहल्ले में रमेश नाम का एक आदमी रहता था। उसकी उम्र करीब पैंतीस साल थी। रमेश का शरीर भारी था और उसका वजन बाकी लोगों से ज्यादा था। इसी वजह से मोहल्ले के लोग उसे अक्सर मजाक का निशाना बना लेते थे।

     

    कोई उसे देखकर हंसता तो कोई कहता, “अरे रमेश, तुमसे कौन-सा काम होगा?”

     

    रमेश बाहर से मुस्कुरा देता, लेकिन ऐसी बातें उसके दिल में चुभ जाती थीं।

     

    रमेश बचपन से ही थोड़ा भारी शरीर का था। स्कूल में बच्चे उसे अलग-अलग नामों से बुलाते थे। वह खेल में तेज नहीं था, इसलिए उसे टीम में सबसे आखिर में लिया जाता। समय के साथ उसने लोगों की बातें सुनना तो सीख लिया, लेकिन उन बातों को दिल से निकालना नहीं सीख पाया।

     

    उसके पिता की एक छोटी-सी साइकिल की दुकान थी। पिता के गुजर जाने के बाद रमेश ने दुकान संभाल ली।

     

    दुकान ज्यादा बड़ी नहीं थी, लेकिन रमेश को साइकिलों की अच्छी जानकारी थी। कौन-सा पुर्जा कहां लगेगा, किस आवाज से कौन-सी खराबी है और किस साइकिल में क्या दिक्कत है, वह तुरंत समझ जाता था।

     

    फिर भी मोहल्ले वालों को उसकी काबिलियत दिखाई नहीं देती थी।

     

    एक दिन एक ग्राहक अपनी साइकिल लेकर आया।

     

    उसने रमेश को ऊपर से नीचे तक देखा और बोला, “तुम ठीक करोगे?”

     

    रमेश मुस्कुराया, “हां, क्यों नहीं?”

     

    ग्राहक हंसते हुए बोला, “तुम खुद मुश्किल से चलते हो, साइकिल क्या ठीक करोगे?”

     

    पास खड़े दो लोग भी हंसने लगे।

     

    रमेश कुछ नहीं बोला।

     

    उसने साइकिल उठाई और कुछ ही मिनटों में खराबी ठीक कर दी।

     

    ग्राहक ने साइकिल चलाकर देखी।

     

    “अरे, ठीक तो कर दी!”

     

    रमेश ने कहा, “काम करने के लिए शरीर का आकार नहीं, हुनर चाहिए।”

     

    ग्राहक बिना कुछ बोले चला गया।

     

    एक दिन मोहल्ले में खबर फैली कि पास के मैदान में बच्चों के लिए साइकिल दौड़ होने वाली है। सभी बच्चे तैयारी करने लगे।

     

    रमेश भी मैदान के पास खड़ा बच्चों को देख रहा था।

     

    एक छोटा बच्चा बार-बार गिर रहा था। बाकी बच्चे उसका मजाक उड़ा रहे थे।

     

    रमेश उसके पास गया।

     

    “गिरने से डरोगे तो चलाना कैसे सीखोगे?”

     

    बच्चे ने पूछा, “आप मुझे सिखाओगे?”

     

    रमेश ने मुस्कुराकर कहा, “जरूर।”

     

    अगले कुछ दिनों तक रमेश ने उस बच्चे को साइकिल चलाना सिखाया। बच्चा धीरे-धीरे अच्छा चलाने लगा।

     

    लेकिन मोहल्ले के लोग फिर भी रमेश को गंभीरता से नहीं लेते थे।

     

    एक शाम तेज बारिश शुरू हो गई। सड़क पर पानी भरने लगा। उसी समय मोहल्ले के एक घर में रहने वाली बुजुर्ग महिला की तबीयत अचानक बिगड़ गई।

     

    उनका बेटा शहर से बाहर था।

     

    लोग घर के बाहर जमा हो गए, लेकिन कोई समझ नहीं पा रहा था कि क्या किया जाए।

     

    रमेश तुरंत आगे आया।

     

    उसने पड़ोसी की मदद से महिला को सुरक्षित जगह पहुंचाया और डॉक्टर को बुलाने की व्यवस्था की।

     

    कुछ देर बाद डॉक्टर आ गए।

     

    महिला की हालत संभल गई।

     

    उनके बेटे ने फोन पर रमेश को धन्यवाद दिया।

     

    लेकिन रमेश ने कहा, “धन्यवाद की जरूरत नहीं। पड़ोसी होने का फर्ज था।”

     

    उस दिन कुछ लोगों को पहली बार महसूस हुआ कि जिसे वे बेकार समझते थे, वही मुश्किल समय में सबसे आगे खड़ा था।

     

    फिर भी रमेश के सामने सबसे बड़ी परीक्षा अभी बाकी थी।

     

    कुछ दिनों बाद उसकी दुकान के सामने एक बच्चा रोता हुआ आया।

     

    उसकी साइकिल चोरी हो गई थी।

     

    वह साइकिल उसके पिता ने बड़ी मेहनत से खरीदी थी।

     

    रमेश ने बच्चे को शांत किया और कहा, “तुम चिंता मत करो। हम उसे ढूंढेंगे।”

     

    रमेश ने आसपास की दुकानों से पूछताछ की। उसने लोगों से बात की और आखिरकार उसे पता चला कि साइकिल पास के पुराने गोदाम के पीछे दिखाई गई थी।

     

    वह वहां गया और साइकिल मिल गई।

     

    बच्चा खुशी से रमेश के गले लग गया।

     

    “आप बहुत अच्छे हो!”

     

    रमेश की आंखें नम हो गईं।

     

    उसे लगा जैसे किसी ने पहली बार उसके वजन को नहीं, बल्कि उसके दिल को देखा हो।

     

    कुछ महीनों बाद मोहल्ले में एक बड़ी समस्या आ गई।

     

    मुख्य सड़क पर एक पुराना पुल बारिश के कारण कमजोर हो गया था। रात के समय वहां से गुजरना खतरनाक था।

     

    कई लोग नगर निगम से शिकायत कर चुके थे, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।

     

    रमेश ने हार नहीं मानी।

     

    उसने मोहल्ले के लोगों को इकट्ठा किया और कहा, “अगर हम सब मिलकर लिखित शिकायत देंगे और रास्ते की तस्वीरें दिखाएंगे तो शायद बात जल्दी सुनी जाएगी।”

     

    लोगों ने उसकी बात मान ली।

     

    रमेश ने सबकी मदद से शिकायत तैयार करवाई।

     

    कुछ दिनों बाद अधिकारियों की टीम वहां पहुंची।

     

    पुल की मरम्मत शुरू हुई।

     

    मोहल्ले के लोगों को समझ आने लगा कि रमेश सिर्फ दुकान चलाने वाला आदमी नहीं था। वह समझदार था, मेहनती था और सबसे बढ़कर लोगों की मदद करने वाला था।

     

    एक दिन वही ग्राहक दुकान पर आया जिसने रमेश का मजाक उड़ाया था।

     

    उसने कहा, “रमेश भाई, मुझे आपसे माफी मांगनी है।”

     

    रमेश ने पूछा, “किस बात की?”

     

    “मैं आपको सिर्फ आपके शरीर से पहचानता था। मुझे लगा था कि आप किसी काम के नहीं। लेकिन अब समझ आया कि इंसान को देखकर नहीं, उसके काम देखकर पहचानना चाहिए।”

     

    रमेश मुस्कुराया।

     

    “कोई बात नहीं। बस आगे से किसी को उसके शरीर देखकर मत आंकना।”

     

    कुछ समय बाद रमेश ने अपनी दुकान के बाहर एक छोटा-सा बोर्ड लगाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “यहां साइकिल ही नहीं, हिम्मत भी ठीक की जाती है।”

     

    मोहल्ले के बच्चे अक्सर उसके पास आने लगे। वह उन्हें साइकिल ठीक करना सिखाता, जरूरतमंदों की मदद करता और बच्चों को समझाता कि किसी के रूप या शरीर का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए।

     

    एक दिन वही छोटा बच्चा, जिसे रमेश ने साइकिल चलाना सिखाया था, दौड़ जीतकर आया।

     

    उसने अपनी ट्रॉफी रमेश के हाथ में रख दी।

     

    “ये आपकी है।”

     

    रमेश ने हंसकर कहा, “नहीं, ये तुम्हारी मेहनत है।”

     

    बच्चे ने कहा, “लेकिन अगर आप मुझे नहीं सिखाते तो मैं कभी जीत नहीं पाता।”

     

    रमेश कुछ बोल नहीं पाया।

     

    उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे।

     

    जिस आदमी को कभी मोहल्ला “किसी काम का नहीं” समझता था, आज वही सबके लिए सबसे भरोसेमंद इंसान बन चुका था।

     

    रमेश ने उस दिन आईने में खुद को देखा।

     

    उसे अपना शरीर पहले जैसा ही दिखाई दिया।

     

    लेकिन आज पहली बार उसे अपने अंदर की काबिलियत भी दिखाई दे रही थी।

     

    उसे समझ आ गया था कि दुनिया चाहे जितने नाम दे, इंसान की असली पहचान उसके शरीर से नहीं, उसके कर्म, व्यवहार और दिल से होती है।

     

    और शायद यही उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी जीत थी।