नकली हंसी हंसते हैं वो
शहर के एक छोटे से मोहल्ले में नंदिनी नाम की एक लड़की रहती थी। उम्र करीब तेईस साल थी। देखने वाले अक्सर कहते, “नंदिनी हमेशा कितनी खुश रहती है।”
वह हर किसी से मुस्कुराकर मिलती। पड़ोसी पूछते तो हंसकर जवाब देती, “सब बढ़िया है।”
कॉलेज में उसकी सहेलियां उसे मजाक में “हंसती हुई नंदिनी” कहती थीं।
लेकिन कोई नहीं जानता था कि उसकी वह हंसी हमेशा सच्ची नहीं होती थी।
नंदिनी के पिता कुछ साल पहले गुजर चुके थे। घर में उसकी मां और छोटा भाई था। पिता के जाने के बाद घर की जिम्मेदारी अचानक बढ़ गई थी।
मां अक्सर बीमार रहती थीं और भाई अभी पढ़ाई कर रहा था।
नंदिनी कॉलेज के साथ-साथ एक छोटी-सी नौकरी भी करती थी।
सुबह घर का काम, फिर कॉलेज, उसके बाद नौकरी और रात को घर लौटकर मां की देखभाल।
फिर भी जब कोई पूछता—
“थक गई?”
वह हंसकर कहती, “मैं इतनी जल्दी थकती नहीं हूं।”
लेकिन रात को कमरे का दरवाजा बंद होते ही वही मुस्कान गायब हो जाती।
वह चुपचाप बिस्तर पर बैठती और खिड़की से बाहर देखती रहती।
कभी-कभी उसकी आंखों से आंसू निकल आते।
वह उन्हें पोंछकर खुद से कहती, “नहीं नंदिनी, रोना नहीं है। मां को पता चल गया तो वह परेशान हो जाएंगी।”
अगली सुबह फिर वही मुस्कान उसके चेहरे पर होती।
कॉलेज में उसकी सबसे अच्छी दोस्त रिया थी।
रिया अक्सर कहती, “तू कभी उदास क्यों नहीं होती?”
नंदिनी हंसते हुए जवाब देती, “क्योंकि उदास होने से समस्या थोड़ी हल हो जाएगी।”
रिया उसकी बात सुनकर हंस देती, लेकिन नंदिनी की आंखों में छिपी थकान उसे दिखाई नहीं देती थी।
एक दिन कॉलेज में नंदिनी की फीस जमा करने की आखिरी तारीख थी। उसके पास पैसे कम थे।
उसने अपने बैग में रखे नोट गिने।
फिर मोबाइल देखा।
मां का संदेश था—
“बेटा, दवा खत्म हो गई है। लौटते समय लेते आना।”
नंदिनी कुछ देर स्क्रीन को देखती रही।
फीस जमा करे या मां की दवा खरीदे?
उसने आंखें बंद कीं।
फिर हल्की मुस्कान के साथ खुद से बोली, “पहले मां। फीस बाद में देख लेंगे।”
उस दिन वह कॉलेज से सीधे मेडिकल स्टोर गई।
दवा खरीदी और घर लौट आई।
रास्ते में उसकी सहेली रिया मिल गई।
रिया ने पूछा, “कहां जा रही है?”
नंदिनी मुस्कुराकर बोली, “घर। मां की दवा लेनी है।”
रिया ने पूछा, “तू ठीक है ना?”
नंदिनी हंस दी।
“मैं बिल्कुल ठीक हूं।”
रिया ने उसकी आंखों को ध्यान से देखा।
“तेरी मुस्कान आज कुछ अलग लग रही है।”
नंदिनी ने तुरंत बात बदल दी।
“चल, तू घर जा। मुझे देर हो रही है।”
वह आगे बढ़ गई।
कुछ दिनों बाद कॉलेज में एक कार्यक्रम था। सभी छात्र-छात्राएं खूब खुश थे।
नंदिनी भी सबसे ज्यादा हंस रही थी।
वह दोस्तों के साथ तस्वीरें खिंचवा रही थी।
तभी कॉलेज का नया प्रोफेसर आदित्य वहां आया।
उसने नंदिनी को कुछ देर देखा।
फिर पास आकर बोला, “आप हमेशा इतनी खुश रहती हैं?”
नंदिनी मुस्कुराई।
“जी।”
आदित्य ने कहा, “अच्छी बात है।”
लेकिन फिर उसने धीरे से पूछा, “लेकिन क्या हमेशा हंसना जरूरी है?”
नंदिनी चौंक गई।
“मतलब?”
“कुछ नहीं।”
आदित्य चला गया।
उस रात नंदिनी उस सवाल के बारे में सोचती रही।
क्या हमेशा हंसना जरूरी है?
अगले दिन आदित्य ने उसे कॉलेज की लाइब्रेरी में अकेले बैठे देखा।
नंदिनी किताब खोलकर बैठी थी, लेकिन पढ़ नहीं रही थी।
आदित्य ने पूछा, “सब ठीक है?”
नंदिनी ने आदत के मुताबिक मुस्कुराते हुए कहा, “जी, सब बढ़िया।”
आदित्य ने कहा, “आपको पता है, हर बार ‘सब बढ़िया’ कहना जरूरी नहीं होता।”
नंदिनी पहली बार चुप हो गई।
उसने नजरें झुका लीं।
आदित्य ने आगे कुछ नहीं पूछा।
कुछ दिनों तक वह बस इतना करता कि जब नंदिनी उदास दिखाई देती तो उसके पास बैठ जाता।
कोई सवाल नहीं।
कोई सलाह नहीं।
बस चुपचाप।
एक दिन नंदिनी का धैर्य टूट गया।
उसकी मां की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई थी। अस्पताल का खर्च बढ़ता जा रहा था। भाई की फीस बाकी थी और उसकी अपनी पढ़ाई भी खतरे में थी।
फिर भी कॉलेज में उसे एक समारोह में मंच पर जाकर मुस्कुराना था।
वह मंच पर गई।
सबने तालियां बजाईं।
उसने मुस्कुराकर सबका अभिवादन किया।
लेकिन मंच से उतरते ही उसकी आंखों में आंसू आ गए।
वह पीछे जाकर बैठ गई।
आदित्य ने उसे देखा।
इस बार नंदिनी मुस्कुराने की कोशिश नहीं कर पाई।
वह बोली, “सर… मैं बहुत थक गई हूं।”
आदित्य शांत रहा।
नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।
“हर कोई सोचता है मैं बहुत खुश हूं। लेकिन मैं हर दिन डरती हूं। मां को कुछ हो गया तो? भाई की पढ़ाई रुक गई तो? मेरी पढ़ाई छूट गई तो?”
आदित्य ने कहा, “रो लेने दीजिए खुद को। हर वक्त मजबूत रहना जरूरी नहीं है।”
नंदिनी बहुत देर तक रोती रही।
उस दिन पहली बार उसने अपनी नकली हंसी के पीछे छिपे सारे दुख को बाहर आने दिया।
धीरे-धीरे हालात बदलने लगे।
कॉलेज ने नंदिनी की फीस के लिए सहायता दी। रिया को भी जब पूरी सच्चाई पता चली तो उसने उसका साथ देना शुरू कर दिया।
रिया ने एक दिन नंदिनी से कहा, “तूने मुझसे सब छिपाया क्यों?”
नंदिनी बोली, “मैं नहीं चाहती थी कि कोई मुझे कमजोर समझे।”
रिया ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “रोना कमजोरी नहीं है। हर समय मुस्कुराते रहना भी जरूरी नहीं।”
नंदिनी की आंखों में आंसू आ गए।
इस बार उसने उन्हें छिपाया नहीं।
कुछ महीनों बाद उसकी मां की तबीयत पहले से बेहतर होने लगी। भाई की पढ़ाई भी चलती रही।
नंदिनी ने अपनी पढ़ाई पूरी की और एक अच्छी नौकरी हासिल कर ली।
एक दिन वही रिया उससे मिलने आई।
रिया ने पूछा, “अब तो सच में खुश है?”
नंदिनी मुस्कुराई।
“हां।”
रिया ने तुरंत कहा, “इस बार वाली मुस्कान नकली तो नहीं?”
नंदिनी हंस पड़ी।
“नहीं। अब मुझे समझ आ गया है कि असली खुशी का मतलब हर समय हंसना नहीं होता। कभी रो लेना, कभी थक जाना और कभी किसी के सामने अपना दुख कह देना भी जिंदगी का हिस्सा है।”
रिया ने उसे गले लगा लिया।
नंदिनी ने खिड़की से बाहर देखा।
उसे अपनी पुरानी जिंदगी याद आई।
वह लड़की जो हर दुख को हंसी के पीछे छिपा देती थी।
अब वह लड़की बदल चुकी थी।
अब वह मुस्कुराती थी तो दिल से मुस्कुराती थी।
और जब दुख होता था, तो उसे छिपाती नहीं थी।
क्योंकि उसने जान लिया था—
हर मुस्कुराता चेहरा खुश नहीं होता। कुछ लोग अपनी तकलीफ छिपाने के लिए भी हंसते हैं। इसलिए किसी की हंसी देखकर यह मत समझिए कि उसके जीवन में कोई दर्द नहीं है। कभी-कभी एक सच्चा सवाल—”तुम सच में ठीक हो?”—किसी की जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा बन सकता है।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं