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श्रेणी: दर्द भरी कहानी

जीवन में मिले, समाज, प्यार , परिवार,रिश्ते, अपने,किस्मत, से मिली ठोकरें,धोखा दर्द से कराहती बयां करती हुई शानदार कहानियां ।

  • महफ़िल से गुजर गए…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    कभी एक जान होने का दावा करने वाले,

    *आज अनजान बनकर महफ़िल से गुज़र गए।*💕💕💕

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • किस्मत मे नहीं होते…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    फिर सुबह ये एहसास हुआ मुझे,

    कुछ रिश्ते साथ होकर भी साथ नहीं होते,

     

    जो ख्वाबों में भी हाथ छोड़ जाए,

    वो अक्सर किस्मत में नहीं होते…!!

    🥀✨

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • बचपन की दुल्हन

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    राजस्थान के एक छोटे से गांव देवगढ़ में हर सुबह सूरज की पहली किरणें पीले रेतीले टीलों को सुनहरा रंग दे जाती थीं। मिट्टी के घरों, बकरियों की मिमियाहट, और औरतों के गीतों से गूंजता गांव बहुत सुंदर लगता था, लेकिन उस सुंदरता के पीछे छुपा था एक ऐसा सच, जिसे सबने परंपरा का नाम दे रखा था — बाल विवाह।

    इसी गांव में रहती थी फुलवा, मात्र 9 साल की एक चंचल और होशियार लड़की। उसकी आंखों में सपने थे — पढ़ने के, उड़ने के, और कुछ कर दिखाने के। लेकिन गांव की पुरानी परंपराओं को उसकी इच्छाओं से कोई मतलब नहीं था।

    फुलवा अपने मिट्टी के आंगन में गुड़ियों की शादी खेल रही थी, जब उसकी मां गोमती ने उसे बुलाया, “फुलवा, ज़रा जल्दी आ, तेरे लिए कुछ खास बात है।”

    फुलवा दौड़ती हुई आई और देखा कि घर के आंगन में गांव के कुछ बड़े लोग बैठे हैं। उसकी मां, पिता बंशीलाल, और एक अजनबी परिवार वहां मौजूद था।

    कुछ ही पलों में बात समझ आ गई — फुलवा की सगाई हो रही थी। उसका रिश्ता तय हो चुका था 12 साल के मोहन से, जो पास के गांव बाडमेर का था।

    फुलवा ने पूछा, “पर मां, ये लोग कौन हैं? ये सब क्या हो रहा है?”

    मां ने मुस्कुराकर कहा, “तेरी शादी की बात चल रही है बिटिया। तू अब बड़ी हो गई है।”

    फुलवा को कुछ समझ नहीं आया, पर गुड़ियों की शादी की तरह अपनी शादी का ख्याल सुनकर वो थोड़ा मुस्कुरा दी, उसे लगा जैसे कोई खेल हो रहा हो।

    शादी का मंडप सजा, ढोल-नगाड़ों की आवाज़ें आईं, और गुड़ियों की शादी खेलने वाली फुलवा खुद किसी के घर की बहू बन गई। शादी के बाद विदाई की रात जब उसे मोहन के साथ उसके गांव ले जाया गया, तब असल जिंदगी की कठोरता सामने आई।

    मोहन का परिवार कठोर और रूढ़िवादी था। उसकी सास चंदा देवी हर बात में दोष निकालती। “बहू है, काम सीखो, खाना बनाओ, पानी भरो… अब किताबों का वक्त नहीं।”

    फुलवा को स्कूल जाने की इजाजत नहीं थी। उसके हाथ में अब किताब की जगह झाड़ू और बेलन था।

    मोहन खुद एक सीधा-सादा लड़का था। वह भी समझ नहीं पाता था कि कैसे दो बच्चों की ज़िंदगी एक झूठी परंपरा के बोझ तले कुचल दी गई है।

    एक दिन गांव में एक नई मास्टरनी आई — नीला दीदी, जो शहर से पढ़ी-लिखी थी। उन्होंने गांव की लड़कियों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया। वो घर-घर जाकर माताओं को समझातीं कि “लड़कियों का पढ़ना जरूरी है, ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।”

    फुलवा ने दूर से नीला दीदी को देखा। उसे लगा जैसे कोई सपना उसके सामने आ गया हो।

    जब नीला दीदी उसके घर आईं और चंदा देवी से बात करने लगीं, तो फुलवा ने हिम्मत करके कहा, “दीदी, मैं पढ़ना चाहती हूं।”

    उसकी सास ने तुरंत झाड़ू उठाकर कहा, “बहू हो, अपने काम से काम रखो। पढ़ाई का क्या काम? घर चलाना सीखो।”

    लेकिन उस दिन फुलवा की आंखों में पहली बार एक चिंगारी जली थी।

    रात को जब मोहन और फुलवा बात कर रहे थे, फुलवा ने धीरे से पूछा, “मोहन, क्या हम बच्चे हैं?”

    मोहन ने सिर झुका लिया, “हां, शायद हैं।”

    “तो फिर ये शादी क्यों?”

    मोहन बोला, “क्योंकि हमारे मां-बाप ने कहा कि यही रीत है।”

    “लेकिन क्या रीत से बड़ा हमारा सपना नहीं हो सकता?” फुलवा ने पूछा।

    ये सवाल मोहन के दिल में भी गूंजने लगे। धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती होने लगी। वो अब मिलकर सोचने लगे कि कैसे इस परिस्थिति से बाहर निकला जाए।

    6. कानून की दस्तक

    एक दिन गांव में एक NGO की महिला आईं। उन्होंने बताया कि बाल विवाह गैरकानूनी है और सरकार इसके खिलाफ कड़े कदम उठा रही है। उन्होंने कई बालिकाओं को बाल विवाह से बचाया है।

    फुलवा और मोहन ने हिम्मत कर उन महिलाओं से मिलकर अपनी बात कही। पहली बार किसी ने उन्हें पूरी सहानुभूति से सुना।

    फुलवा ने रोते हुए कहा, “मुझे स्कूल जाना है। मुझे बच्चा बनने दो, अभी बहू नहीं बनना है।”

    NGO की टीम ने केस दर्ज करवाया। गांव में हड़कंप मच गया। बंशीलाल और चंदा देवी जैसे लोगों को यह अपनी इज्जत पर हमला लगा।

    “लड़की हाथ से निकल गई,” बंशीलाल ने गुस्से में कहा।

    लेकिन कानून ने इस बार परंपरा को झुका दिया। फुलवा और मोहन की शादी को शून्य घोषित किया गया। उन्हें अलग कर दिया गया, और दोनों को बाल संरक्षण गृह में भेजा गया जहां वे अपनी पढ़ाई पूरी कर सकते थे।

    समय बीता। फुलवा ने जमकर पढ़ाई की। उसे स्कॉलरशिप मिली और वह जयपुर के एक स्कूल में दाखिल हुई। वहीं मोहन ने भी कड़ी मेहनत से आगे बढ़ना शुरू किया।

    कभी गुड़ियों से शादी खेलती फुलवा, अब बाल विवाह विरोधी अभियान की पोस्टर गर्ल बन गई थी। स्कूलों में, सभाओं में, मंचों पर वह अपनी कहानी सुनाती।

    “मैं भी एक बालिका वधू थी,” वह कहती, “पर मैंने सपने चुने, बेड़ियां नहीं।

    कुछ साल बाद फुलवा देवगढ़ वापस लौटी, पर अब वह वही मासूम लड़की नहीं थी। वह समाज सुधारक, प्रेरक वक्ता और बाल अधिकारों की संरक्षक बन चुकी थी।

    उसके आते ही गांव में खलबली मच गई। कुछ लोग अब भी नाक भौं सिकोड़ते थे, पर ज़्यादातर ने अपनी सोच बदल ली थी।

    नीला दीदी ने गर्व से कहा, “आज गांव की बच्चियां फुलवा की तस्वीर देखकर पढ़ाई का सपना देखती हैं।”

    फुलवा ने एक स्कूल खोला — “बालिका शिक्षा केंद्र”, जहां वह गरीब और वंचित लड़कियों को मुफ्त पढ़ाती थी।

    बंशीलाल, जो कभी बदलाव का विरोध करता था, अब चुपचाप अपनी पोती को स्कूल भेजते समय फुलवा की तस्वीर पर फूल चढ़ाता था।

    एक दिन फुलवा को एक चिट्ठी मिली। वह मोहन की थी। उसने लिखा:

    “फुलवा, जब हम बच्चे थे, तो हमें शादी के नाम पर बांध दिया गया था। पर आज, मैं एक शिक्षक हूं और हर बच्ची को यही सिखाता हूं कि वह अपनी ज़िंदगी खुद चुने। तुमने जो रास्ता दिखाया, वही मेरा भी रास्ता बन गया। धन्यवाद — तुम्हारा बचपन का दोस्त, मोहन।”

    फुलवा की आंखों से आंसू बह निकले। उन्हें पोंछते हुए उसने आसमान की तरफ देखा — अब वहां सिर्फ बादल नहीं थे, सपनों के रंग भी थे।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • कोई पत्थर नहीं…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    मुझको इतना भी ना तरसा बात करने के लिए ,

     

    मै भी इंसान हु कोई पत्थर नहीं ।।।

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • बुरा ही रहूँगा…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    मौत से ठीक, एक दिन पहले तक,,

     

    मैं भी सबके लिए, बुरा ही रहूंगा…✍️

     

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • संतोष और नीतू की प्यार भरी कहानी ❤️

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    एक छोटे से गाँव में संतोष नाम का लड़का रहता था।
    वह बहुत सीधा, मेहनती और सबकी मदद करने वाला था। उसी गाँव में नीतू नाम की लड़की रहती थी। नीतू पढ़ाई में तेज और दिल की बहुत अच्छी थी।

    दोनों की पहली मुलाकात गाँव के मेले में हुई।
    संतोष अपने दोस्तों के साथ घूम रहा था और नीतू अपनी सहेलियों के साथ आई थी। अचानक भीड़ में नीतू का दुपट्टा हवा में उड़ गया। संतोष ने तुरंत पकड़ लिया और मुस्कुराकर उसे वापस दे दिया।

    नीतू ने धीरे से कहा—

    “धन्यवाद…”

    बस वहीं से दोनों की कहानी शुरू हो गई। ❤️

    धीरे-धीरे दोनों रोज़ बात करने लगे।
    कभी खेतों के रास्ते, कभी स्कूल के पास, तो कभी मंदिर के बाहर उनकी मुलाकात हो जाती थी।

    संतोष नीतू का बहुत ख्याल रखता था।
    अगर नीतू उदास होती, तो वह उसे हँसाने की पूरी कोशिश करता।

    एक दिन संतोष ने हिम्मत करके कहा—

    “नीतू, मैं तुम्हारे बिना अपनी जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकता।”

    नीतू मुस्कुराई और बोली—

    “मैं भी तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, संतोष।”

    लेकिन उनकी राह आसान नहीं थी।
    घरवालों को यह रिश्ता पसंद नहीं था। दोनों ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने सपनों के लिए मेहनत की और अपने परिवार को समझाया।

    आखिरकार दोनों परिवार मान गए और संतोष और नीतू की शादी पूरे गाँव में धूमधाम से हुई। 🎉❤️

    सीख:
    सच्चा प्यार हमेशा धैर्य, भरोसा और सम्मान मांगता है।

     
     
     

    Vikky Vinay

  • अपने काफ़ी है रुलाने के लिए..

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    दुनिया मे आये है तो मुस्कुराना सीख लीजिये दोस्त.

     

    रुलाने के लिए तो अपने रिश्तेदार ही काफ़ी है.. 🥹🥹

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • माँ…

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    माँ की ममता और बलिदान की एक छोटी और भावुक कहानी:

    ​एक बेटा अपनी माँ से बहुत नफरत करता था क्योंकि उसकी माँ की एक आँख नहीं थी। उसे अपनी माँ के ‘अधूरे चेहरे’ से शर्म आती थी। वह बड़ा हुआ, खूब पढ़ा-लिखा और शहर जाकर एक बड़ा आदमी बन गया। उसने शादी कर ली और अपनी माँ को गाँव में ही अकेला छोड़ दिया।

    ​सालों बाद, जब माँ अपने पोते-पोतियों से मिलने शहर पहुँची, तो बेटे ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया और चिल्लाकर कहा, “तुम यहाँ क्यों आई हो? तुमने मेरे बच्चों को डरा दिया, यहाँ से चली जाओ!”

    ​माँ चुपचाप वापस लौट गई। कुछ महीनों बाद माँ की मृत्यु हो गई। जब बेटा गाँव पहुँचा, तो उसे माँ की एक चिट्ठी मिली, जिसमें लिखा था:

    ​”मेरे प्यारे बेटे, शायद तुम्हें याद नहीं, पर जब तुम बहुत छोटे थे, तब एक एक्सीडेंट में तुम्हारी एक आँख फूट गई थी। एक माँ होने के नाते मैं तुम्हें एक आँख से नहीं देख सकती थी, इसलिए मैंने अपनी एक आँख तुम्हें दे दी। मुझे गर्व है कि तुम मेरी आँख से इस खूबसूरत दुनिया को देख रहे हो।”

    ​बेटा फूट-फूट कर रोने लगा, लेकिन अब माँ वापस आने वाली नहीं थी।

    ​सीख (Moral)

    ​माँ का प्यार निस्वार्थ होता है। हम अक्सर उनकी अहमियत तब समझते हैं जब वो हमसे दूर चली जाती हैं। समय रहते उनके प्यार और बलिदान का सम्मान करें।

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • निगाहें👀उनकी भी चेहरे से हटती नही..❤️

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    वो आँखों से यूँ शरारत करती है….💖अपनी अदा से भी कयामत करती है,,,निगाहें👀 उनकी भी चेहरे से हटती नही….💖और वो हमारी नजरों से शिकायत करती है।।❤️🔵🔵🔴🔴❤️❤️❤️🔴❤️🔵🔴🔵❤️

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • उसका भाग्य मे ना होना…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    उसका भाग्य मे ना होना भी भाग्य ही है शायद… ✍️✍️

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇

    जो हमसे दूर हुए..

    हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏