श्रेणी: कहानी

दिल से दिल तक पहुंचने वाली एहसास कहानी बनती है।

  • 💞💞प्यार का नशा.. 💞💞पार्ट 5

    💞💞प्यार का नशा.. 💞💞पार्ट 5

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    कहानी अब आगे,

     

     

    अमानत, ” नहीं अंकल ऐसा मत कहिये मे आपका एक एक रुपया दे दूंगी बस कुछ समय और दे दीजिये मुझे बस काम मिलने ही वाला है आप मेरी बात को समझने की कोशिश कीजिये, आप यहाँ से निकाल देंगे तो मे कहा जाउंगी pls अंकल ऐसा मत करिये!”

     

    मकान मलिक, ” मे तो ऐसा ही करूँगा बहुत झेल लोया तुम दोनों का नतक अब अभी के अभी निकलो मेरे घर से पेसो की तो उम्मीद ही नहीं है तुम फातिचरों से निकलो मेरे घर से,

     

        ये कहते हुए मकान मालिक अपन कुछ गुंडों को घर खाली करवाने का इशारा करता है,

     

    अमानत बार बार हाथ जोरती है की उसे कुछ समय दे दे वो कुछ न कुछ कर लेगी उसे जॉब मिल जायेगा पर उसकी एक भी नहीं सुनी जाती है,

     

    आखिर मे अमानत और उसकी छोटे से भाई व्योम लो सामान के साथ बाहर फेक दिया जाता है और वाह से जाने लो कह दिया जाता है,

     

    अमानत के पास और कोई भी ऑप्शन नहीं रहता है तो उसे जाना ही परता है पर कहा जाय क्या करें उसे कुछ भी समझ नहीं आता है, वो अपने भाई के सामने ये सब नहीं दिखा सकती थी इसीलिए वो कहती है की वो इससे भी अच्छे घर मे जाएगी और सब ठीक हो जायेगा व्योम को सब कुछ दिलवाने का उसका जो सपना था वो एक ही पल मे टूट जाता है |”

     

    बिच सरक पर चलते हुए उसके भाई को प्यास लग जाती है, अमानत के पास बोटोल नहीं रहता है जिस कारण ओ परेशान हो जाती है और यहाँ वहा ढूंढती है, तभी उसे एक ठेले वाला दिखाई देता है और वो उससे पानी लेके अपने भाई व्योन को पिलाती है |”

     

    अमानत, ” तू ठीक है न व्योम? “

     

    व्योम, ” हाँ दीदी मे ठीक हु आप जब तक हो मुझे क्या होगा पर मे आपके लिए बोझ सा हो गया हु न आपको मेरे लिए कितना परेशान होना परता है न पता नहीं मे कब आपकी मदद के लिए बनूँगा सायद अंकल न सही कहते है मे न कामचोर हु तभी तो मे आपके दूँखों का कारण बन गया हु |”

     

    अमानत, ” नहीं नहीं व्योम ऐसा कुछ भी नहीं है तू ये सब मत सोच देख भगवान जब एक दरवाजा बंद करते है न तो उन्होंने पहले ही दूसरा दरवाजा सोच रखा होता है, तू देखना सब सही हो जायेगा तू बस अपने मन से न ये सबा वहम निकल दे समझ!”

     

    व्योम, ” आप सच कह रही है दीदी!”

     

    अमानत, ” तो ज्या तेरी बहन क्या तुझसे झूठ कहेगी भला!!

     

    अमानत अपने भाई को समझा देती है पर उसे खुद कुछ समझ नहीं आता है की आखिर अब करें क्या,

     

    अमानत, ” अच्छा रुक तू यही पर मे तेरे लिए कुछ खाने को लाती हु तुझे भूख लग गया होगा न,

     

    व्योम दीदी की बात पर सर हिला देता है क्युकी उसे सच मे भूख लग गयी थी, अमानत जैसे ही कुछ खाने को लाने के लिए ठेले के पास जाती है की तभी व्योम की नजर सड़क पर परी एक बेलून पर जाता है और वो उसे लेने के लिए बिच सड़क पर चला जाता है |”

     

     

    … to be continue…

  • अच्छे इंसान की पहचान…

    अच्छे इंसान की पहचान…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    स्त्री की भावनाएं सराय जैसी नहीं हैं

    कि कोई भी आया , रूका और चला गया

    स्त्री की भावनाएं मनमोहक महल जैसी हैं

    जिसमें या तो कोई आ नहीं सकता

    और यदि आ जाए

    तो फिर जीवन भर जा नहीं सकता

    एक औरत में अगर आपको कुछ जानना हैं

    तो मौन को पढ़िए..

    सुन्दरता देखनी हैं

    तो सादगी में ढूंढिए

    और खुशी देखनी हैं

    तो बंधनों से मुक्त करिये ….इससे बेहतर आप किसी स्त्री को समझ नहीं सकते. इसीलिए आप एक अच्छे स्त्री की संतान  है इसका पता बस ऐसे ही लग सकता है की आप दूसरे स्त्री को कितना समझते है और उसे कितना सम्मान देते है.. आपके कर्म ही आपको ऊंचा उठती है इसीलिए ज़ब भी कुछ कीजिये एक बार खुद से जरूर पूछिए क्या ये सही है.. और फिर ज़ब आपके अंदर से जवाब आये तो वो काम बिना डरे कर दीजिये.. पर इस बात का खास ध्यान रखे की आपके कारण किसी को तकलीफ ना हो.. क्योकि इस दुनिया मे गम देना आसान है पर किसी को ख़ुशी देना बहुत मुश्किल…तो किसी के चेहरे की ख़ुशी की वजह बने ना की उनकी तकलीफो की…✍️✍️

     

  • 💞💞प्यार का नशा…💞💞 पार्ट 4

    💞💞प्यार का नशा…💞💞 पार्ट 4

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    कहानी अब आगे,

    •  

    रिशाल के चेहरे पर थकान के निशान कम होने लगते हैं और वह आराम से बैठ जाता है। वरुणा अग्निहोत्री की देखभाल से वह अपने तनाव को भूलने लगता है।

    वरुणा अग्निहोत्री रिशाल के माथे की मालिश करती हैं और कहती हैं, “देखो, बेटा। माँ का प्यार कितना अच्छा होता है। तुम्हें कभी भी अपनी माँ की देखभाल की जरूरत नहीं होती।”

    रिशाल मुस्कराता है और कहता है, “हाँ, माँ। तुम सबसे अच्छी माँ हो।”

    वरुणा अग्निहोत्री रिशाल के चेहरे को देखती हैं और मुस्कराती हैं। वह रिशाल के माथे को चूम लेती हैं और कहती हैं, “मेरा बेटा मुझे सबसे प्यारा है।” सबका ख्याल रहता है इसको और सबकी फ़िक्र भी रहती है, रभी तो मेरा बेटा सबसे अच्छा है इस दुनिया मे जो किसी के आँखों मे आंसू भी नहीं आने देता है |”

    माँ की बाते सुन कर RA को अमानत के आंसू याद आ जाते है उसे याद आ जाता है की आज ही तो वो किसी के दर्द के कारण बना था |” 

    रिशाल को अपनी माँ का प्यार और लाड मिलती है, लेकिन उसका मन जो अमानत के आँखों के आंसू को सोचता है, वह सोचता है कि क्या वह अमानत से मिलने के लिए जा सकता है,

    वरुणा अग्निहोत्री रिशाल के चेहरे को देखती हैं और प्यार से पूछती हैं, “बेटा, आखिर बात क्या है? तुम इतना टेंशन में क्यों लग रहे हो? तुम्हारी माँ हूँ, तुम मुझे कुछ भी बता सकते हो।”

    रिशाल: (हिचकिचाते हुए) “कुछ नहीं, माँ। बस काम की तनाव है।”

    वरुणा अग्निहोत्री: (प्यार से) “नहीं, बेटा। तुम मुझे नहीं बता सकते कि यह सिर्फ काम की तनाव है। तुम्हारी आँखें बता रही हैं कि कुछ और है। तुम्हारे दिल में क्या है, बताओ मुझे।”

    रिशाल: (माँ की बात सुनकर) “माँ… मैं नहीं जानता कि मैं क्या कहूँ।”

    वरुणा अग्निहोत्री: (प्यार से) “बेटा, तुम मुझे कुछ भी बता सकते हो। मैं तुम्हारी माँ हूँ। मैं तुम्हें कभी भी निराश नहीं करूँगी। तुम्हारे लिए मैं हमेशा यहाँ हूँ।”

    रिशाल वरुणा अग्निहोत्री की बात सुनकर अपने दिल की बात बताने की सोचता है, लेकिन वह अभी भी हिचकिचाता है…

    क्या Ra बता पायेगा अपने माँ को अपने दिल मे हो रही इस हलचल को??

    क्या वरुणा अग्निहोत्री करेंगी सपोर्ट अमानत को??

    क्या Ra मागेगा माफ़ी अमानत से??

    क्या होगा अमानत का रिएक्शन?? 

    ( मकान मालिक), अमानत के किराये का घर, सुबह के 10:00 बजे,

    मकान मालिक, ” दरवाजा खोलो, कामचोरो… अभी तक क्या सोये हुए हो… मेरा पैसा दो कब से आ आकर थक चूका हु या तो पैसा दो या फिर अपने कामचोर भाई को लेके यहां से दफा हो जाओ!”

    अमानत दरवाजे पर आवाज़ सुन अपने भाई को कहती है, ” तू फ़िक्र ना कर सब सही हो जायेगा ये अंकल तो ऐसे ही कहते है हमेशा तुम ये खाना खत्म कर और स्कूल के लिए तैयार हो जाओ मे बात कर के आती हु ठीक है |”

    व्योम, ” ठीक है, दीदी,

    अमानत दरवाजा खोल बाहर आ जाती है और दरवाजे को लगा देती है,

    मकान मालिक, ” ये लो आ गयी कामचोर भाई की बहन जिसे करना तो कुछ नहीं है बस बहाना जितना बनवा लो आज न कोई भी बहाना नहीं चलेगा मुझे मेरा किराया चाहिए तो चाहिए वरना ये बोरिया बिस्तर लेके यहां से दफा हो जाओ अभी के अभी मुझे दूसरा किरायदार मिल गया है जो तुमसे ज़्यदा ही पैसे देने को तैयार है, और समय पर भी देने को तैयार है समझी ..

    .. to be continue…

  • 💞💞प्यार का नशा… पार्ट 3💞💞

    💞💞प्यार का नशा… पार्ट 3💞💞

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    कहानी अब आगे,

    वरुणा देवी रिशाल के चेहरे को देखती हैं और पूछती हैं, “रिशाल, क्या हुआ? तुम कहीं और ही लग रहे हो।”

    रिशाल जल्दी से अपने आप को संभालता है और कहता है, “माँ, मीटिंग तो ठीक रही। बस थोड़ा थकान है।”

    वरुणा देवी रिशाल की बात मानती हैं और कहती हैं, “ठीक है, बेटा। तुम आराम करो। 

    लेकिन रिशाल का मन अमानत के साथ ही रहता है। वह सोचता है कि क्या वह अमानत से मिलने के लिए जा सकता है, वह अमानत की मासूमियत और उसकी आँखों में आंसू को याद करता है और उसके लिए अपने दिल में एक अजीब सा हलचल महसूस करता है…:

    वरुणा देवी रिशाल के चेहरे को जब देखती हैं तो उसे लगता है कि वह किसी बात से परेशान है। वह रिशाल के पास जाती हैं और पूछती हैं, “रिशाल, क्या सब ठीक है? तुम्हारे चेहरे पर तनाव दिख रहा है। क्या तुम मुझे कुछ बताना चाहते हो?”

    रिशाल वरुणा देवी की बात सुनता है, लेकिन वह कुछ नहीं बताता। वह जल्दी से एक बहाना बनाता है और कहता है, “माँ, मेरा सर दर्द कर रहा है। मुझे लगता है कि मैं थोड़ा थक गया हूँ। मैं कुछ देर अकेले में आराम करना चाहता हूँ।”

    रिशाल अपने हाथ में रखे हुए अमानत के बाल के टुकड़े को देखता है और सोचता है,

    वरुणा अग्निहोत्री जब अपने बेटे के सर दर्द की बात सुनती है, तो तुरंत घर के नौकर, रामू को आवाज़ लगाती है, “रामू, रामू! जल्दी आओ और मुझे तेल लेकर आओ। रिशाल को सर दर्द हो रहा है।”

    रामू वरुणा देवी की आवाज़ सुनकर जल्दी से आता है और पूछता है, “मैम, कौन सा तेल लाऊं? कोकोनट का या बदाम का?”

    वरुणा देवी कहती हैं, “बदाम का तेल लाओ। और जल्दी करो। रिशाल को आराम करना है ।”

    रामू बदाम का तेल लेकर आता है और वरुणा देवी को देता है। वरुणा देवी तेल को लेकर रिशाल के कमरे में जाती हैं और उसके सर पर तेल से मालिश करने को कहती हैं, 

    वरुणा अग्निहोत्री रिशाल के माथे की मालिश करने के लिए कहती हैं, “बेटा, मैं तुम्हारे माथे की मालिश कर दूँ। इससे तुम्हारा सर दर्द कम होगा।”

    लेकिन रिशाल मना कर देता है, “नहीं, माँ। मैं ठीक हूँ। तुम्हें परेशान नहीं होना चाहिए।”

    वरुणा अग्निहोत्री रिशाल की बात नहीं मानती और कहती हैं, “नहीं, बेटा। तुम्हारी सेहत मेरे लिए सबसे इम्पोर्टेन्ट है। मैं तुम्हारे माथे की मालिश करूँगी।”

    वरुणा अग्निहोत्री रिशाल को अपने पैरों के पास बैठने के लिए कहती हैं और खुद बेड पर बैठ जाती हैं। वह रिशाल के माथे पर तेल लगाती हैं और धीरे-धीरे मालिश करने लगती हैं, 

    रिशाल अपनी माँ की चम्पी से खुश होता है, लेकिन उसका मन अमानत के साथ ही रहता है। वह सोचता है कि क्या वह अमानत से मिलने के लिए जा सकता है, 

    वरुणा अग्निहोत्री रिशाल के माथे की मालिश करती हैं और कहती हैं, “बेटा, तुम्हें आराम करना चाहिए । मैं तुम्हारे लिए खाना भिजवा दूंगी ऊपर ही । तुम्हें कुछ नहीं करना है। बस आराम करो।”

    रिशाल वरुणा देवी की बात मानता है और आराम करने लगता है। लेकिन उसके मन मे अमानत के साथ बीते पल ही रहता है…

    वरुणा अग्निहोत्री की चम्पी धीरे-धीरे रिशाल को भी अच्छा लगने लगता है।

    .. to be continue….

     

  • 💞💞प्यार का नशा पार्ट 2 💞💞

    💞💞प्यार का नशा पार्ट 2 💞💞

    पढ़ने का समय : 3 मिनट
    • कहानी अब आगे,

    अमानत ने रिशाल की बात सुनी और उसकी आँखों में आंसू आ गए।

     “मुझे माफ कर दीजिए, मैं आपको नहीं जानती थी। मैं सिर्फ अपने भाई के साथ घूमने आई थी, और उसकी साथ खेलते हुए बस गलती से आपसे टकरा गयी मे माफ़ी मांगती हु pls माफ कर दीजिये “

    रिशाल ने अमानत को देखा और उसकी मासूमियत को देखकर उसका गुस्सा थोड़ा कम हो गया । लेकिन फिर भी वो अपने गुस्से को कण्ट्रोल नहीं कर पाया और वो गुस्सा अमानत पर निकल दी उसे काफ़ी कुछ सुना कर |” 

    अमानत ने रिशाल की बात सुनी जिससे उसके आँखों में आंसू आ गए। वह अपने भाई के साथ वहाँ से चली गई, लेकिन रिशाल की बातें उसके दिल में बस गईं…

    रिशाल ने अमानत को वहाँ से जाने दिया और अपनी मीटिंग में चला गया। लेकिन उसका मन अमानत के साथ ही था। वह अमानत की मासूमियत और उसकी आँखों में आंसू देखकर थोड़ा परेशान हो गया था।

    मीटिंग खत्म होने के बाद, रिशाल अपने घर चला गया। लेकिन उसका मन अमानत के बारे में ही सोच रहा था। वह अपनी शर्ट के बटन को देखकर अचानक रुक गया। उसमें एक बाल फंसा हुआ था, जो अमानत का था।

    रिशाल को वो बाल को देख, अमानत की याद आ जाती है और वो उसी मे खो जाता है । वह सोच रहा था कि क्या उसने अमानत के साथ ठीक बर्ताव किया था। उसने अमानत को रुला दिया था, और अब उसे इसका अफसोस हो रहा था।

    रिशाल ने अपनी शर्ट उतारी और उस बाल को अपने हाथ में लिया। वह अमानत के बारे में सोच रहा था, और उसकी मासूमियत को याद कर रहा था।

    तभी एंट्री होती है, 

    वरुणा देवी, रिशाल की माँ, कमरे में आती हैं और रिशाल को अपने हाथ में कुछ पकड़े हुए देखती हैं। वह उसके पास जाती हैं और पूछती हैं,

    वरुणा अग्निहोत्री, “क्या है यह, रिशाल? तुम क्या कर रहे हो?”

    रिशाल जल्दी से उस बाल के टुकड़े को अपने हाथ में छिपा लेता है और कहता है, “कुछ नहीं, माँ। बस एक छोटी सी चीज़।”

    वरुणा देवी को लगता है कि रिशाल कुछ छिपा रहा है, लेकिन वह कुछ नहीं कहतीं। वह रिशाल के चेहरे को देखती हैं और पूछती हैं, “क्या हूआ सब ठीक है न , रिशाल? तुम थोड़े परेशान लग रहे हो।”

    रिशाल वरुणा देवी को देखता है और मुस्कराता है, “हाँ, माँ। सब ठीक है। बस थोड़ा थकान है।”

    वरुणा देवी रिशाल की बात मानती हैं और कहती हैं, “ठीक है, बेटा। तुम आराम करो। मैं तुम्हारे लिए चाय मंगवा देती हूँ।”

    जैसे ही वरुणा देवी जाती हैं, रिशाल अपने हाथ में छिपाए हुए बाल के टुकड़े को देखता है और अमानत के बारे में सोचता है। वह सोचता है कि क्या वह अमानत से मिलने के लिए जा सकता है और उससे माफ़ी मांग सकता है, क्युकी कहीं न कहीं उसने गुस्से मे अमानत को कुछ ज़्यदा ही सुना दिया था और अब RA को उसकी लिए गिलट हो रहा था |” 

    वरुणा देवी रिशाल के लिए चाय लाती है और रिशाल के पास आकर बैठती हैं और पूछती हैं, “आज की मीटिंग कैसी रही, रिशाल? क्या हूआ सब ठीक रहा न ?”

    रिशाल को माँ की मीटिंग की बात सुन जुहू बिच पर हुई इंसिडेंट अमानत की याद आ जाती है और वह उसी में खो जाता है। वह वरुणा देवी की बात को सुनता है, लेकिन उसका मन अमानत के साथ ही रहता है।

    … to be continue….

  • “👉 संगिनी “💖

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    बरसात की हल्की-हल्की फुहारें शहर की सड़कों को जैसे कोई पुराना गीत सुना रही थीं। हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू घुली हुई थी, और उसी खुशबू के बीच खड़ा था आरव—अपनी छतरी को थामे, जैसे किसी का इंतज़ार कर रहा हो।

    वो इंतज़ार किसी साधारण व्यक्ति का नहीं था, बल्कि उसकी “संगिनी” का था—मीरा।

    मीरा… एक नाम, जो उसके दिल में धड़कनों की तरह बस गया था।

    आरव और मीरा की मुलाकात कोई फिल्मी अंदाज़ में नहीं हुई थी। न कोई टकराना, न कोई किताब गिरना। उनकी कहानी शुरू हुई थी एक साधारण-सी लाइब्रेरी में, जहाँ दोनों किताबों के बीच अपने-अपने ख्वाब ढूंढने आते थे।

    पहली बार जब आरव ने मीरा को देखा था, वो खिड़की के पास बैठी थी। बारिश की बूंदें कांच पर गिर रही थीं, और वो अपनी डायरी में कुछ लिख रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी, जैसे वो इस दुनिया में होते हुए भी कहीं और हो।

    आरव ने कई बार चाहा कि वो उससे बात करे, लेकिन हर बार कुछ न कुछ उसे रोक देता। शायद झिझक, या शायद डर कि कहीं वो उस खूबसूरत खामोशी को तोड़ न दे।

    लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

    एक दिन, मीरा की डायरी अचानक उसके हाथ से गिर गई। आरव पास ही खड़ा था, उसने तुरंत डायरी उठाकर उसे दी।

    “थैंक यू,” मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा।

    उस मुस्कान में कुछ ऐसा था, जिसने आरव के दिल को छू लिया।

    “तुम… रोज़ यहां आती हो?” आरव ने हिम्मत जुटाकर पूछा।

    मीरा ने हल्का-सा सिर हिलाया, “हाँ, ये जगह मुझे सुकून देती है।”

    उस दिन से शुरू हुई उनकी बातचीत धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गई।

    दोनों घंटों साथ बैठते, किताबों पर चर्चा करते, और कभी-कभी बस चुपचाप खिड़की से बाहर गिरती बारिश को देखते रहते।

    मीरा को कविताएं लिखना पसंद था, और आरव को उन कविताओं को पढ़ना।

    “तुम्हारी कविताओं में इतनी गहराई क्यों होती है?” एक दिन आरव ने पूछा।

    मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, “क्योंकि हर शब्द में एक अधूरी कहानी छुपी होती है।”

    आरव को ये जवाब हमेशा सोच में डाल देता।

    धीरे-धीरे, उसे एहसास होने लगा कि मीरा सिर्फ उसकी दोस्त नहीं रही। वो उसकी आदत बन गई थी। उसकी हर सुबह, हर शाम, हर ख्वाब में बस मीरा ही थी।

    लेकिन मीरा… वो हमेशा थोड़ी रहस्यमयी रहती।

    कभी बहुत करीब, तो कभी अचानक दूर।

    एक दिन, जब बारिश हो रही थी, दोनों लाइब्रेरी से बाहर निकले।

    “चलो, आज बिना छतरी के भीगते हैं,” मीरा ने अचानक कहा।

    आरव हैरान था, “तुम्हें बारिश पसंद है?”

    “बहुत… क्योंकि ये हर दर्द को धो देती है,” मीरा ने आसमान की ओर देखते हुए कहा।

    दोनों भीगते हुए सड़क पर चलते रहे। उस दिन, पहली बार आरव ने मीरा का हाथ पकड़ा।

    मीरा ने उसे नहीं रोका।

    उस पल में, जैसे समय ठहर गया था।

    लेकिन हर खूबसूरत कहानी में एक मोड़ जरूर आता है।

    कुछ दिनों बाद, मीरा अचानक लाइब्रेरी आना बंद कर दी।

    आरव हर दिन उसका इंतज़ार करता, लेकिन वो नहीं आई।

    उसने फोन किया, मैसेज किए—लेकिन कोई जवाब नहीं।

    उसकी दुनिया जैसे थम गई थी।

    एक दिन, आखिरकार उसे मीरा का एक मैसेज मिला—

    “मुझसे मिलने मत आना… ये हमारी आखिरी बात है।”

    आरव के हाथ कांप गए।

    “क्यों?” उसने तुरंत जवाब दिया।

    लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

    दिन बीतते गए, और आरव अंदर से टूटता गया।

    उसे समझ नहीं आ रहा था कि मीरा ने ऐसा क्यों किया।

    आखिरकार, उसने तय किया कि वो सच्चाई जानकर ही रहेगा।

    वो मीरा के घर पहुंचा।

    दरवाजा उसकी माँ ने खोला।

    “तुम आरव हो?” उन्होंने पूछा।

    “जी…”

    उनकी आंखों में आंसू थे।

    “मीरा… अब इस शहर में नहीं है,” उन्होंने धीमे से कहा।

    आरव का दिल जैसे रुक गया।

    “क्या मतलब?”

    उन्होंने उसे अंदर बुलाया और एक डायरी उसके हाथ में दी।

    “ये उसने तुम्हारे लिए छोड़ी है।”

    आरव ने कांपते हाथों से डायरी खोली।

    उसमें लिखा था—

    “आरव,

    अगर तुम ये पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि मैं तुमसे बहुत दूर जा चुकी हूं।

    मैंने तुम्हें सच नहीं बताया… क्योंकि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती थी।

    मुझे एक गंभीर बीमारी है, और मेरे पास ज्यादा समय नहीं है।

    मैं नहीं चाहती थी कि तुम मुझे इस हालत में देखो।

    तुम्हारी जिंदगी में सिर्फ खुशियां होनी चाहिए, दर्द नहीं।

    तुम मेरी सबसे खूबसूरत याद हो… और हमेशा रहोगे।

    तुम्हारी संगिनी,

    मीरा।”

    हर शब्द के साथ आरव की आंखों से आंसू गिरते गए।

    अब उसे समझ आया कि मीरा क्यों दूर हो गई थी।

    लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

    कुछ महीनों बाद…

    वही लाइब्रेरी, वही खिड़की, वही बारिश।

    आरव अकेला बैठा था, हाथ में मीरा की डायरी लिए।

    वो हर दिन वहां आता, जैसे मीरा अब भी वहीं बैठी हो।

    उसने धीरे से डायरी खोली और एक नई कविता लिखी—

    “तुम गई नहीं हो,

    तुम यहीं कहीं हो…

    हर बारिश की बूंद में,

    हर खामोशी के सुकून में।

    तुम मेरी संगिनी थी,

    हो… और हमेशा रहोगी।”

    उसने खिड़की से बाहर देखा।

    बारिश अब भी हो रही थी।

    और उस बारिश में, उसे ऐसा लगा जैसे मीरा मुस्कुरा रही हो।

    क्योंकि कुछ प्यार कहानियां खत्म नहीं होतीं…

    वो बस यादों में बदल जाती हैं—हमेशा के लिए।

  • अंत की शुरुआत

    अंत की शुरुआत

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    गाँव का नाम था ‘सपनों की नगरी’। यहाँ लोग अपने अपने सपनों के पीछे भागते थे। इस गाँव की रौनक वहाँ के चौक में लगी हाट से होती थी, जहाँ हर सप्ताह स्थानीय किसान अपनी उपज बेचने आते थे। लेकिन इस हाट से सभी का ध्यान खींचता था एक छोटा सा पत्थर का मंदिर, जिसे ‘सपनों का मंदिर’ कहा जाता था। मान्यता थी कि इस मंदिर में जो भी व्यक्ति सच्चे मन से अपनी इच्छाएँ माँगता, उसकी इच्छाएँ पूरी होती थीं।

    रीता, एक जिज्ञासु और साहसी लड़की थी, जो अपने सपनों को साकार करने के लिए जी जान से मेहनत कर रही थी। उसकी एक साल की छोटी बहन, नीतू, हमेशा उसकी छाया बनकर रहती थी। रीता का सपना एक दिन एक बड़ी विद्या केंद्र खोलने का था, जहाँ गाँव के सारे बच्चे पढ़ाई कर सकें। उसके पास कुछ इरादा और सपने थे, लेकिन पैसे और संसाधनों की कमी ने उसके रास्ते में रुकावट डाल रखी थी।

    एक दिन, रीता ने तय किया कि वह सपनों के मंदिर में जाकर अपनी इच्छा मांगेगी। उसने सोचा, “अगर मेरी इच्छा पूरी हो जाए और मुझे धन मिल जाए, तो मैं गाँव के बच्चों के लिए एक अच्छा स्कूल खोल सकूंगी।” वह डरती थी, लेकिन उसकी इच्छा ने उसे साहस दिया।

    वह मंदिर पहुँची और आँखें बंद करके प्रार्थना करने लगी। “हे भगवान, मुझे अपने सपने को पूरा करने के लिए मदद करो। कृपया मुझे धन और संसाधन दो ताकि मैं अपनी बहन और दोस्तों के लिए एक स्कूल खोल सकूं।”

    तभी अचानक एक हल्की ऊर्जा फैली। रीता ने आँखें खोलीं और देखा कि उसके पास एक पुराना आदमी खड़ा था। वह उसे देखकर मुस्कुराया। “बेटी, मैंने तुम्हारी प्रार्थना सुनी। लेकिन तुम्हें यह समझना होगा कि सपने सच करने के लिए केवल इच्छाएँ माँगने से नहीं, बल्कि मेहनत और संकल्प से पूरे होते हैं।”

    रीता ने गंभीरता से उसकी बात सुनी। “लेकिन कैसे, बाबाजी? मुझे नहीं पता कि मैं कहाँ से शुरू करूँ।”

    बाबाजी ने कहा, “तुम्हारे सपने की शुरुआत यहीं से होती है, अपने इरादे और मेहनत से। जो तुम्हारी असली यात्रा है, वही अंत हैं।”

    रीता ने उसकी बात सुनी और सोचने लगी। बाबाजी ने कहा, “तुम्हें तुम्हारी यात्रा में साहस और सहारा देने के लिए कुछ कदम उठाने होंगे।”

    रीता ने अगले दिन से अपनी योजना बनाने की ठानी। उसने गाँव में बच्चों के लिए एक छोटे से ट्यूशन क्लास खोला। वह जानती थी कि यह एक चुनौतीपूर्ण काम होगा, लेकिन उसने कभी हार मानने की सोची नहीं। उसने अपने घर के आँगन में ही ट्यूशन क्लास शुरू किया।

    पहला दिन आया। बहुत कम बच्चे आए। उन्हें शिक्षिका की कमी के कारण डर लगा। लेकिन रीता ने निराश नहीं हुई। उसने अपने तरीके से सबको तंग करने के बजाय प्यार से पढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ाया। धीरे-धीरे, बच्चे आने लगे। उसकी मेहनत रंग लाई।

    कुछ महीने बाद, राजू, जो गाँव का सबसे गरीब लड़का था, उसके पास आया। “दीदी, मैं भी पढ़ना चाहता हूँ, लेकिन मेरे पास पैसे नहीं हैं।” रीता ने उसे देखा और कहा, “कोई बात नहीं राजू, तुम यहाँ आ सकते हो। पढ़ाई भी मुफ्त होगी।”

    इस तरह, गाँव के और भी बच्चे आने लगे। रीता ने उनके लिए न केवल शिक्षा का आदान-प्रदान किया, बल्कि उनके जीवन में सकारात्मकता भरने का कार्य किया। उसकी कड़ी मेहनत से अब गाँव के बच्चों में शिक्षा के प्रति रुचि जागृत हुई।

    एक दिन, रीता ने सोचा कि उसे अब एक बड़ी जगह की आवश्यकता है।

    रीता ने अपने छोटे ट्यूशन क्लास से जो सफलता प्राप्त की थी, उसके बल पर उसने एक योजना बनाई। वह सोचने लगी, “अगर मैं एक बड़ी जगह की व्यवस्था कर सकूं, तो और भी बच्चे यहाँ पढ़ने आ सकते हैं।” लेकिन उसे समझ आ गया कि इसके लिए उसे अधिक संसाधनों की जरूरत होगी।

    वह अपनी छोटी बहन नीतू को लेकर फिर से सपनों के मंदिर गई। वहाँ पहुँचकर उसने फिर से प्रार्थना की। “हे भगवान, मुझे मार्गदर्शन दो। मैं कड़ी मेहनत करूँगी, लेकिन मुझे एक अच्छी जगह की आवश्यकता है।” प्रार्थना के बाद, उसने अपने दोस्तों और पड़ोसियों से बात करने का निर्णय लिया।

    गाँव के बुजुर्गों के पास जाकर उसने बताया कि वह बड़ा स्कूल खोलने का इरादा रखती है। गाँव के लोगों ने उसके जज़्बे की सराहना की, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इसके लिए बड़ा धन और जमीन की आवश्यकता होगी।

    तब उसने एक विचार किया। “यदि मैं यहाँ के सभी किसानों से संपर्क करूँ और उनसे कहूँ कि वे अपनी फसलें स्कूल के विकास के लिए योगदान दें, तो शायद यह काम आसान हो सकता है।”

    वह गाँव में सबसे पहले अपने पड़ोसी किसान, चंदर भैया के पास गई। “चंदर भैया, क्या आप मेरी बात सुन सकते हैं? मैं गाँव में एक स्कूल खोलना चाहती हूँ और इसके लिए आपकी मदद की आवश्यकता है। क्या आप अपनी फसल में से थोड़ा सा दान कर सकते हैं?”

    चंदर भैया ने उसकी बात सुनी और कहा, “बेटी, यह बहुत अच्छा विचार है। मैं अपनी फसल का एक हिस्सा तुम्हें दूंगा। लेकिन बस यह सुनिश्चित करो कि तुम बच्चों को अच्छी शिक्षा दें।”

    रीता को चंदर भैया का समर्थन मिला। उसके बाद, उसने धीरे-धीरे और किसानों से संपर्क किया और आश्चर्यजनक रूप से गाँव के कई किसानों ने उसकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया। कुछ ने अनाज दिया, जबकि कुछ ने पैसे।

    एक महीने के भीतर, रीता के पास कुछ पैसे इकट्ठा हो गए, और अब उसे जमीन के लिए सोचना था। वह गांव के बाहर एक छोटे से खाली मैदान की ओर गई, जो पहले से ही इस्तेमाल नहीं हो रहा था। उसने अपने विचार को वहाँ के निवासियों के सामने रखा।

    “अगर हम यह जगह एक स्कूल के लिए इस्तेमाल करें, तो यह सारे गाँव के बच्चों के भविष्य के लिए बेहतर होगा। हम यहाँ खेतों से मिली फसल को बेचकर स्कूल के लिए अनुदान इकट्ठा कर सकते हैं।”

    गाँव के लोग रीता के उत्साह से प्रभावित हुए और उन्होंने सामूहिक रूप से यह जगह स्कूल के लिए देने का निर्णय लिया। अब रीता को यकीन हो गया था कि उसकी मेहनत और इरादे रंग लाने लगे थे।

    अब रीता ने प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर दिया। उसने एक बोर्ड का निर्माण किया और उसमें स्कूल का नाम ‘सपनों का स्कूल’ रखा। उसके बाद, उसने बच्चों के लिए ट्यूशन स्टाफ का चयन किया। गाँव में और भी कई शिक्षित लोग थे, जिन्होंने रीता के लिए मदद करने का आश्वासन दिया।

    वित्तीय मदद प्राप्त करने के लिए, उन्होंने एक कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय लिया। गाँव के लोग उत्सुकता से कार्यक्रम में शामिल हुए, जिसमें नितू ने एक नृत्य पेश किया और अन्य बच्चों ने गीत गाए।

    इस कार्यक्रम का उद्देश्य गाँव वाले को स्कूल के महत्व और शिक्षा के लाभों के बारे में जागरूक करना था। जैसे ही कार्यक्रम समाप्त हुआ, गाँव के प्रमुख ने घोषणा की, “हम सभी को मिलकर सपनों के स्कूल को सफल बनाना होगा।”

    कार्यक्रम के बाद, रीता ने गाँव के लोगों से फिर से संपर्क किया और अपनी जरूरतों के बारे में बताया। गाँव के लोगों ने अपना-अपना सहयोग देने का वादा किया।

    अब स्टाफ में शिक्षक और शिक्षिकाओं की भर्ती शुरू हुई। कई लोग आगे आए और अपने अनुभव साझा किए।

    ऐसे ही रीता अंत से शुरुआत की एक सपने की जो उसने पूरा भी किया।

    Lakshmi Kumari 

     

     

     

  • ” बस एक सनम चाहिए “…💖💖

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    शाम का वक्त था। हल्की-हल्की ठंडी हवा बह रही थी, और आसमान में ढलता हुआ सूरज जैसे किसी अधूरी कहानी का आख़िरी पन्ना लिख रहा हो। शहर की भीड़-भाड़ से दूर, उस पुराने पार्क की एक बेंच पर आरव चुपचाप बैठा था। उसकी आँखों में एक अजीब-सी खालीपन था—जैसे बहुत कुछ खो चुका हो, या शायद अभी तक कुछ पाया ही न हो।

    आरव हमेशा से ही थोड़ा अलग था। उसे भीड़ में रहना पसंद नहीं था, पर अकेलापन भी उसे खा जाता था। वह अक्सर सोचता था—क्या ज़िंदगी में सच में किसी “एक” इंसान की ज़रूरत होती है? कोई ऐसा, जो सिर्फ तुम्हारा हो… जो बिना कहे सब समझ जाए।

    उसी सोच में डूबा हुआ वह आसमान को देख रहा था कि तभी पास से एक मधुर आवाज़ आई—

    “क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?”

    आरव ने चौंक कर देखा। सामने एक लड़की खड़ी थी—सफेद सूट में, बालों को हल्के से बांधे हुए, और आँखों में एक अजीब-सी चमक। वह मुस्कुरा रही थी।

    “हाँ… हाँ, बिल्कुल,” आरव ने थोड़ा झिझकते हुए कहा।

    लड़की उसके पास बैठ गई। कुछ देर तक दोनों चुप रहे। फिर उसने कहा,

    “आप रोज़ यहाँ आते हैं, ना?”

    आरव ने हैरानी से पूछा, “आपको कैसे पता?”

    “मैं भी रोज़ आती हूँ,” उसने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “बस… आप शायद ध्यान नहीं देते।”

    आरव को थोड़ा अजीब लगा, लेकिन अच्छा भी। “मैं आरव हूँ,” उसने कहा।

    “मीरा,” उसने जवाब दिया।

    उस दिन के बाद से दोनों की मुलाकातें रोज़ होने लगीं। पहले छोटी-छोटी बातें होती थीं—मौसम, किताबें, पसंद-नापसंद। फिर धीरे-धीरे बातों का दायरा बढ़ता गया। अब वे अपने सपनों, डर, और बीते हुए दर्द तक की बातें करने लगे थे।

    मीरा बहुत अलग थी। वह हर छोटी चीज़ में खुशी ढूंढ लेती थी—गिरते हुए पत्ते, उड़ते हुए परिंदे, या फिर बारिश की पहली बूंद। आरव को उसके साथ समय बिताना अच्छा लगने लगा था। उसकी ज़िंदगी में जैसे रंग वापस आने लगे थे।

    एक दिन मीरा ने पूछा,

    “तुम्हें सबसे ज्यादा किस चीज़ की कमी महसूस होती है?”

    आरव कुछ देर चुप रहा, फिर बोला,

    “एक ऐसा इंसान… जो बिना शर्त प्यार करे। जो मुझे जैसे हूँ वैसे ही अपनाए। बस… एक सनम चाहिए।”

    मीरा ने उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में कुछ अलग था उस दिन।

    “अगर वो मिल जाए, तो क्या करोगे?” उसने धीरे से पूछा।

    “उसे कभी जाने नहीं दूंगा,” आरव ने तुरंत जवाब दिया।

    मीरा मुस्कुराई, लेकिन उसकी मुस्कान में हल्की-सी उदासी थी।

    “हर किसी की किस्मत में वो नहीं होता, आरव।”

    दिन बीतते गए। अब आरव को मीरा का इंतज़ार रहने लगा था। अगर वह एक दिन भी नहीं आती, तो उसे बेचैनी होने लगती। उसे एहसास हो रहा था कि वो मीरा से प्यार करने लगा है।

    एक शाम, जब हल्की बारिश हो रही थी, आरव ने हिम्मत जुटाई।

    “मीरा, मुझे तुमसे कुछ कहना है।”

    “हम्म?” मीरा ने उसकी तरफ देखा।

    “मुझे लगता है… नहीं, मैं यकीन से कह सकता हूँ… कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”

    बारिश की बूंदें तेज़ हो गई थीं। मीरा चुप थी। उसकी आँखें नम हो गई थीं।

    “कुछ तो कहो, मीरा…” आरव ने घबराते हुए कहा।

    मीरा ने गहरी सांस ली।

    “काश… तुम ये बात पहले कहते।”

    “क्या मतलब?” आरव का दिल धड़कने लगा।

    “मतलब ये कि… अब बहुत देर हो चुकी है,” मीरा की आवाज़ कांप रही थी।

    “देर? क्यों? क्या हुआ?” आरव ने बेचैनी से पूछा।

    मीरा ने अपने बैग से एक लिफाफा निकाला और उसे दे दिया।

    “ये पढ़ लेना… सब समझ आ जाएगा।”

    इतना कहकर वह उठी और धीरे-धीरे बारिश में भीगती हुई वहाँ से चली गई। आरव उसे रोक भी नहीं पाया।

    कंपकंपाते हाथों से उसने लिफाफा खोला। उसमें एक चिट्ठी थी—

    “प्रिय आरव,

    जब तुम ये चिट्ठी पढ़ रहे होगे, तब शायद मैं तुमसे बहुत दूर जा चुकी होऊँगी।

    मुझे तुमसे पहली मुलाकात में ही लग गया था कि तुम वही इंसान हो, जिसकी मुझे तलाश थी। लेकिन मेरी ज़िंदगी में एक सच्चाई थी, जिसे मैं तुम्हें बताने से डरती रही।

    मुझे एक गंभीर बीमारी है… डॉक्टरों ने कहा है कि मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है।

    मैं नहीं चाहती थी कि तुम मुझसे प्यार करो, क्योंकि मैं तुम्हें अधूरा छोड़कर जाना नहीं चाहती थी। लेकिन मैं खुद को तुमसे दूर भी नहीं रख पाई।

    तुम्हारे साथ बिताया हर पल मेरे लिए जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा रहा है।

    तुम कहते थे ना—‘बस एक सनम चाहिए’?

    काश… मैं वही बन पाती, हमेशा के लिए।

    लेकिन अब मुझे जाना होगा।

    एक वादा करना—मेरे जाने के बाद भी तुम जीना मत छोड़ना। किसी और को अपनी जिंदगी में आने देना। क्योंकि तुम प्यार के लायक हो… पूरा, सच्चा और हमेशा रहने वाला प्यार।

    तुम्हारी,

    मीरा”

    चिट्ठी पढ़ते ही आरव की दुनिया जैसे रुक गई। उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वह उसी बेंच पर बैठा रहा, घंटों तक… जैसे समय थम गया हो।

    अगले दिन वह अस्पतालों में, सड़कों पर, हर जगह मीरा को ढूंढता रहा। लेकिन वह कहीं नहीं मिली। जैसे वो कभी थी ही नहीं—सिर्फ एक खूबसूरत सपना।

    महीने बीत गए। आरव फिर उसी पार्क में जाने लगा, उसी बेंच पर बैठने लगा। लेकिन अब वह पहले जैसा नहीं था। उसके चेहरे पर एक दर्द था, लेकिन साथ ही एक सुकून भी—क्योंकि उसने सच्चा प्यार महसूस किया था, भले ही थोड़े समय के लिए।

    एक दिन, जब वह बेंच पर बैठा था, एक छोटी-सी लड़की उसके पास आई।

    “भैया, ये आपके लिए है,” उसने एक छोटा सा फूल देते हुए कहा।

    “किसने भेजा?” आरव ने पूछा।

    लड़की ने मुस्कुराकर आसमान की तरफ इशारा किया और दौड़ती हुई चली गई।

    आरव ने फूल को देखा और हल्के से मुस्कुरा दिया। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वो दर्द के नहीं, बल्कि यादों के थे।

    उसने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा—

    “तुमने कहा था ना, मुझे जीना होगा… मैं जी रहा हूँ, मीरा। लेकिन तुम्हें कभी भूल नहीं पाऊँगा।”

    हवा फिर से बहने लगी थी। पेड़ के पत्ते सरसराने लगे थे, जैसे कोई धीमे से गुनगुना रहा हो—

    “बस एक सनम चाहिए…”

    और उस दिन आरव को समझ आया—

    कभी-कभी ज़िंदगी हमें वो नहीं देती जो हम चाहते हैं…

    लेकिन वो हमें वो एहसास ज़रूर देती है, जो हमें हमेशा के लिए बदल देता है।

    मीरा उसकी ज़िंदगी में आई, थोड़े समय के लिए…

    लेकिन उसने उसे सिखा दिया कि सच्चा प्यार वक्त का मोहताज नहीं होता।

    आरव अब भी उस पार्क में जाता है। कभी-कभी मुस्कुराता है, कभी आँखें नम हो जाती हैं।

    लेकिन अब वह अकेला नहीं है—

    क्योंकि उसके दिल में एक कहानी बस गई है…

    एक अधूरी, लेकिन बेहद खूबसूरत कहानी—

    जिसमें उसे सच में “बस एक सनम” मिला 

  • मेरी पहली कुकिंग

    मेरी पहली कुकिंग

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रविवार की सुबह थी। घर में बड़ा ही शांत माहौल था। मम्मी मंदिर गई हुई थीं, पापा अखबार पढ़ते-पढ़ते सोफे पर ही खर्राटे मार रहे थे, और छोटा भाई सोनू मोबाइल में गेम खेलते-खेलते दुनिया से बेखबर था।

    मैं किचन के दरवाजे पर खड़ी होकर सबको देख रही थी। अचानक मेरे दिमाग में एक खतरनाक… नहीं-नहीं… “महान” आइडिया आया।

    “आज मैं खाना बनाऊंगी ओर सब को खुश कर दुगी!”

    बस फिर क्या था… मेरे इस फैसले से मुझे तो बहुत खुशी हो रही थी, लेकिन मुझे नहीं पता था कि कुछ ही घंटों बाद घर वालों की हालत ऐसी होने वाली है कि वे भगवान से प्रार्थना करेंगे, “हे प्रभु, इसे दोबारा किचन में मत भेजना!”

    मैंने पूरे आत्मविश्वास से एक थाली ओर चम्मच लेकर पीटते हुए ऐलान किया “सुनो सब लोग! आज का खाना मैं बनाऊंगी।”

    पापा ने आधी नींद में ही पूछा “कौन… खाना बनाएगा…?”

    “मैं!” खुशी से ताली बजाते ही कहा,  इतना सुनते ही पापा की नींद ऐसे गायब हुई जैसे मोबाइल से बैटरी।

    मम्मी भी तभी मंदिर से लौट आई थीं। उन्होंने जैसे ही मेरी बात सुनी, उनके हाथ से प्रसाद की थाली लगभग गिर ही गई।

    “क्या कहा तुमने?”

    मैं खुशी से मम्मी के पास जाके कहा, “मम्मी… आज मैं खाना बनाऊंगी। आपको आराम दूंगी।”

    मम्मी ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं कोई बहुत बड़ा मजाक कर रही हूं।

    “बेटा… तुम्हें पता है किचन में गैस कैसे जलाते हैं?”

    मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा, “यूट्यूब है ना मम्मी! और chatgtp गुरु भी तो है”

    अब तो घर में सन्नाटा छा गया।

    सोनू धीरे से बोला, “मम्मी… आज हम लोग बाहर खाना खा लें क्या?”

    लेकिन अब तो मैं ठान चुकी थी। मैं सीधे किचन में घुस गई। सबसे पहले मैंने सोचा, क्या बनाऊं?

    बहुत सोचने के बाद मैंने chatgtp  पूछा , पर उसकी आधी बातें मेरे दिमाग से निकल गई फिर मैने खुद ही फैसला किया, आलू की सब्जी और रोटी,

    वैसे मेरा मन तो था सही पनीर और पलाऊ, लेकिन फिर सोचा अरे अरे रुक जा पहले दिन ही इतना अच्छा खिलाओगी तो सब को हार्डटेक ही ना आ जाए।

    इसलिए आलू की सब्जी और रोटी बनाने का फैसला किया।  मैंने मोबाइल निकाला और यूट्यूब पर वीडियो चालू किया “5 मिनट में स्वादिष्ट आलू की सब्जी कैसे बनाएं।”

    वीडियो देखकर मुझे लगा, “बस इतना सा काम है?” वो तो में यू चुटकी बजाते ही कर लूंगी। लेकिन असली फिल्म तो अब शुरू होने वाली थी।

    मैंने गैस जलाई… पहले ही कोशिश में “फूsss…” की आवाज आई और मैं डरकर दो कदम पीछे कूद गई।

    बाहर से पापा की आवाज आई , “सब ठीक है ना?”

    मैं बोली “हां हां सब… कंट्रोल में है!”

    हालांकि कंट्रोल में कुछ भी नहीं था। फिर मैंने कड़ाही चढ़ाई और उसमें तेल डाला। अब वीडियो में कहा गया —

    “तेल गर्म होने दें।”

    मैंने इंतजार किया… लेकिन मुझे लगा तेल तो बहुत देर से गर्म हो रहा है, तो मैंने गैस पूरी तेज कर दी।

    बस फिर क्या था… तेल इतना गर्म हो गया कि जैसे ही मैंने जीरा डाला —

    छन्न्न्न्न!!!!

    तेल उछल कर बाहर आने लगा। मैं घबरा गई और चिल्लाई, “मम्म्म्म्म्मी!” मम्मी दौड़कर आईं। “क्या हुआ?”

    मैं बोली, “ये तेल मुझ पर हमला कर रहा है!”

    मम्मी ने माथा पकड़ लिया। “अरे गैस कम कर!”

    मैंने जल्दी से गैस कम की और फिर किसी तरह आलू डाल दिए। अब अगला स्टेप था मसाले डालना।

    लेकिन यहाँ से कहानी और मजेदार होने वाली थी।वीडियो में बोला गया, “एक चम्मच नमक डालें।”

    मैंने नमक का डिब्बा उठाया… लेकिन पता नहीं कैसे मेरा हाथ फिसला और पूरा नमक कड़ाही में गिर गया।

    मैंने सोचा “कोई बात नहीं… पानी डाल देंगे।” मैंने आधा जग पानी डाल दिया।

    अब आलू की सब्जी नहीं… आलू का सूप बन गया था।

    तभी सोनू किचन में आया। “दीदी… क्या बना रही हो?”

    मैंने गर्व से कहा, “आलू की सब्जी।”

    वह कड़ाही में देखकर बोला, “ये तो लग रहा है आलू तैरने की प्रैक्टिस कर रहे हैं।”

    मैंने उसे घूरकर देख कर बोली “बाहर जा!”

    अब बारी थी रोटी बनाने की। मैंने आटा निकाला और गूंधना शुरू किया। लेकिन मुझे अंदाजा नहीं था कि आटे में पानी कितना डालना होता है।

    मैंने थोड़ा पानी डाला… फिर लगा सूखा है… और पानी डाल दिया… फिर लगा अभी भी सूखा है… और पानी डाल दिया। कुछ ही देर में आटा नहीं… आटे का दलदल बन गया। मेरा हाथ उसमें फंस गया था।

    सोनू फिर आया और बोला “दीदी… ये रोटी बनेगी या दीवार की पेंट?”

    मैंने गुस्से में कहा “अगर और एक शब्द बोला ना… तो तुझे ही बेल कर तवे पर डाल दूंगी। और उसे भी नहीं सुधरा तो दीवार समझ के इसी आटे से पेंट कर दुगी”

    सोनू डर कर भाग गया मैंने किसी तरह आटा संभाला और रोटी बेलने लगी।

    पहली रोटी बनी… लेकिन वह गोल नहीं थी। वह भारत के नक्शे जैसी लग रही थी।

    दूसरी रोटी… वह ऑस्ट्रेलिया जैसी लग रही थी।

    तीसरी रोटी… वह तो पता नहीं किस ग्रह का नक्शा थी।

    मम्मी चुपचाप दरवाजे से देख रही थीं।

    उन्होंने पापा से धीरे से कहा “आज भूखे रहना पड़ेगा।”

    आखिरकार खाना तैयार हो गया।

    मैंने गर्व से सबको टेबल पर बुलाया। “आइए… आज का स्पेशल खाना तैयार है!”

    पापा, मम्मी और सोनू ऐसे बैठ गए जैसे कोई परीक्षा देने जा रहे हों। सबसे पहले पापा ने सब्जी चखी।

    जैसे ही उन्होंने पहला निवाला खाया… उनका चेहरा अचानक बदल गया। आंखें बड़ी हो गईं। पसीना आने लगा।

    मैंने पूछा, “कैसी है?”

    पापा बोले, “बेटा… नमक थोड़ा… ज्यादा है।” सोनू ने चखा और तुरंत पानी पीने लगा। “दीदी… ये सब्जी नहीं… नमक का समंदर है!”

    अब मम्मी ने रोटी उठाई। उन्होंने तोड़ने की कोशिश की…

    लेकिन रोटी इतनी सख्त थी कि वह टूटी ही नहीं।

    पापा बोले, “ये रोटी है या ढाल?”

    सोनू बोला,“अगर चोर घर में आ जाए तो इससे मार सकते हैं।”

    मैं गुस्से में बोली, “इतनी भी खराब नहीं है!”फिर मैंने खुद खाया… और अगले ही सेकंड पानी के लिए ऐसे भागी जैसे मेरे 10th  का एग्जाम हो। “अरे इस में तो सच में बहुत नमकीन है!”

    घर में सब हंसने लगे।पापा बोले “बेटा… आज का अनुभव बहुत अच्छा था… लेकिन अगली बार हम सब पहले से अस्पताल का नंबर तैयार रखेंगे।”मम्मी मुस्कुराते हुए बोलीं, “कोई बात नहीं… पहली कुकिंग ऐसी ही होती है सब की।”

    सोनू बोला, “दीदी… एक बात बोलूं?”

    “क्या?”

    “आप कविता और कहानी ही लिखो… खाना मत बनाओ।”बस फिर क्या था… पूरे घर में हंसी गूंजने लगी। उस दिन हमने आखिर में क्या किया? सबने मिलकर बाहर से पिज्जा ऑर्डर कर लिया।और मैंने मन ही मन फैसला किया “अगली बार कुकिंग करने से पहले… मम्मी से ट्रेनिंग जरूर लूंगी।”लेकिन आज भी जब घर में कोई बहुत ज्यादा नमक डाल देता है… तो पापा तुरंत कहते हैं —“लगता है आज फिर तुम्हारी पहली कुकिंग वाली रेसिपी याद आ गई!” और फिर पूरे घर में हंसी शुरू हो जाती है।

    Lakshmi Kumari……

  • 💞💞 प्यार का नशा 💞💞

    💞💞 प्यार का नशा 💞💞

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    ## जुहू बिच ( मुंबई ) ##

    समुद्र के किनारे जुहू बीच पर, मुंबई की एक सुबह , सूरज की पहली किरणें समुद्र से निकलती हुई लग रही थीं।

          “” रिशाल अग्निहोत्री, जो एक अमीर बिजनेसमैन है, की कार आकर उस जुहू बिच के किनारे लगती है और फिर रिशाल अग्निहोत्री , अपनी कार से उतरते हुए, जुहू बीच की ओर चल देता है । वो यहाँ एक इम्पोर्टेन्ट मीटिंग के लिए आया हूआ था, जो उसके बिजनेस के फ्यूचर को बदल सकती थी।

    जैसे ही वह बीच पर एंट्री लेता है सबही उसकी तरफ देखने लगते है, आखिर रिशाल अग्निहोत्री था ही इतना डेसिंग और चार्म बिलकुल किसी हीरो के तरह उसकी चेहरे पर पैसे का रोव जो होता है, वो साफ नजर आ रहा था, थोड़ा खड़ूस ओर थोड़ा अड़ियल सा रिशाल अग्निहोत्री ,

    वही दूसरी और एक मासूम सी भोली भाली लड़की अमानत , जो अपने भाई के साथ समुद्र के किनारे घूमने आई हुई थी, छोटी छोटी खुशियों को इक्क्ठा करने वाली हमारी अमानत, जो अपने भाई के साथ अपने जन्मदिन की शाम मनाने आई थी, अपने भाई के चेहरे पर खुशियाँ लाने आई थी, आखिर था ही कौन उसका इस जहा मे उसकी छोटे भाई व्योम के अलावे ।

    एक तरफ RA अपनी मीटिंग की तैयारी में था, की तभी उसकी कान मे एक आवाज़ आई और उसने अपनी नजर उठा कर उस आवाज़ के तरफ देखा, वह उसकी मासूमियत और सुंदरता से आकर्षित हो गया। लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कर पाता, अमानत उसके साथ आकर गलती से टकरा गई।

    अमानत के हाथ से उसका फोन और पर्स गिर गए, और रिशाल ने जल्दी से अमानत को पकड़ लिया पर इन सब मे रिशाल आमनात को ले उस बिच के किनारे गिर जाता है जहा अंदर रिशाल और ऊपर अमानत दोनों उस बिच की मिट्टी मे लोट पोत हो जाते है,दोनों एक दूसरे के आँखों मे कुछ पल देखते है, रिशाल के आँखों मे जहा एक जूनून और गुस्सा था वही अमानत के आँखों मे डर साफ नजर आ रहा था, तभी जल्दी से अमानत खरी हो जाती है और रिशाल से माफ़ी मांगती है, रिशाल का चेहरा जो काफ़ी गुस्से से भर चूका था |” 

     रिशाल को नहीं पता था कि यह छोटी सी मुलाकात उसकी जिंदगी को कैसे बदल देगी…

    रिशाल से टकराते ही, अमानत को लगा कि वह गुस्से में आ जाएगा। लेकिन उसने नहीं सोचा था कि रिशाल का गुस्सा इतना ज्यादा होगा।

    रिशाल ने अमानत को देखा और उसकी आँखें गुस्से से भर गईं। “तुम्हारी इतनी हिम्मत ?

    तुम्हें देखकर नहीं चलना आता है क्या?” रिशाल ने अमानत से कहा।

    अमानत ने माफी मांगी और कहा, “मुझे माफ कर दीजिए, मैं अनजाने में आपके साथ टकरा गई।”वो में अपने भाई के साथ खेल रही थी तो अनजाने में ये सब हो गया… सॉरी मे आपकी ड्रेस अभी साफ कर देती हु ये कहते हुए अमानत अपने दुपट्टे से रिशाल का ड्रेस साफ करने लगती है जहा वो साफ होने के बजाय और गन्दा ही हो जाता है, अब तो अमानत की सांस हलक मे थी उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था |” 

    इधर रिशाल का गुस्सा कम नहीं हुआ। “तुम्हें पता नहीं है कि मैं कौन हूँ?

     मैं रिशाल अग्निहोत्री हूँ, और मेरे पास बहुत इम्पोर्टेन्ट काम है। तुम्हारी इस लापरवाही से मेरा कितना समय बर्बाद हो गया पता भी है तुम्हे?”और ये क्या किया तुमने?” 

    •  

    … to be continue…