बरसात की हल्की-हल्की फुहारें शहर की सड़कों को जैसे कोई पुराना गीत सुना रही थीं। हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू घुली हुई थी, और उसी खुशबू के बीच खड़ा था आरव—अपनी छतरी को थामे, जैसे किसी का इंतज़ार कर रहा हो।
वो इंतज़ार किसी साधारण व्यक्ति का नहीं था, बल्कि उसकी “संगिनी” का था—मीरा।
मीरा… एक नाम, जो उसके दिल में धड़कनों की तरह बस गया था।
आरव और मीरा की मुलाकात कोई फिल्मी अंदाज़ में नहीं हुई थी। न कोई टकराना, न कोई किताब गिरना। उनकी कहानी शुरू हुई थी एक साधारण-सी लाइब्रेरी में, जहाँ दोनों किताबों के बीच अपने-अपने ख्वाब ढूंढने आते थे।
पहली बार जब आरव ने मीरा को देखा था, वो खिड़की के पास बैठी थी। बारिश की बूंदें कांच पर गिर रही थीं, और वो अपनी डायरी में कुछ लिख रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी, जैसे वो इस दुनिया में होते हुए भी कहीं और हो।
आरव ने कई बार चाहा कि वो उससे बात करे, लेकिन हर बार कुछ न कुछ उसे रोक देता। शायद झिझक, या शायद डर कि कहीं वो उस खूबसूरत खामोशी को तोड़ न दे।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
एक दिन, मीरा की डायरी अचानक उसके हाथ से गिर गई। आरव पास ही खड़ा था, उसने तुरंत डायरी उठाकर उसे दी।
“थैंक यू,” मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा।
उस मुस्कान में कुछ ऐसा था, जिसने आरव के दिल को छू लिया।
“तुम… रोज़ यहां आती हो?” आरव ने हिम्मत जुटाकर पूछा।
मीरा ने हल्का-सा सिर हिलाया, “हाँ, ये जगह मुझे सुकून देती है।”
उस दिन से शुरू हुई उनकी बातचीत धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गई।
दोनों घंटों साथ बैठते, किताबों पर चर्चा करते, और कभी-कभी बस चुपचाप खिड़की से बाहर गिरती बारिश को देखते रहते।
मीरा को कविताएं लिखना पसंद था, और आरव को उन कविताओं को पढ़ना।
“तुम्हारी कविताओं में इतनी गहराई क्यों होती है?” एक दिन आरव ने पूछा।
मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, “क्योंकि हर शब्द में एक अधूरी कहानी छुपी होती है।”
आरव को ये जवाब हमेशा सोच में डाल देता।
धीरे-धीरे, उसे एहसास होने लगा कि मीरा सिर्फ उसकी दोस्त नहीं रही। वो उसकी आदत बन गई थी। उसकी हर सुबह, हर शाम, हर ख्वाब में बस मीरा ही थी।
लेकिन मीरा… वो हमेशा थोड़ी रहस्यमयी रहती।
कभी बहुत करीब, तो कभी अचानक दूर।
एक दिन, जब बारिश हो रही थी, दोनों लाइब्रेरी से बाहर निकले।
“चलो, आज बिना छतरी के भीगते हैं,” मीरा ने अचानक कहा।
आरव हैरान था, “तुम्हें बारिश पसंद है?”
“बहुत… क्योंकि ये हर दर्द को धो देती है,” मीरा ने आसमान की ओर देखते हुए कहा।
दोनों भीगते हुए सड़क पर चलते रहे। उस दिन, पहली बार आरव ने मीरा का हाथ पकड़ा।
मीरा ने उसे नहीं रोका।
उस पल में, जैसे समय ठहर गया था।
लेकिन हर खूबसूरत कहानी में एक मोड़ जरूर आता है।
कुछ दिनों बाद, मीरा अचानक लाइब्रेरी आना बंद कर दी।
आरव हर दिन उसका इंतज़ार करता, लेकिन वो नहीं आई।
उसने फोन किया, मैसेज किए—लेकिन कोई जवाब नहीं।
उसकी दुनिया जैसे थम गई थी।
एक दिन, आखिरकार उसे मीरा का एक मैसेज मिला—
“मुझसे मिलने मत आना… ये हमारी आखिरी बात है।”
आरव के हाथ कांप गए।
“क्यों?” उसने तुरंत जवाब दिया।
लेकिन कोई जवाब नहीं आया।
दिन बीतते गए, और आरव अंदर से टूटता गया।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि मीरा ने ऐसा क्यों किया।
आखिरकार, उसने तय किया कि वो सच्चाई जानकर ही रहेगा।
वो मीरा के घर पहुंचा।
दरवाजा उसकी माँ ने खोला।
“तुम आरव हो?” उन्होंने पूछा।
“जी…”
उनकी आंखों में आंसू थे।
“मीरा… अब इस शहर में नहीं है,” उन्होंने धीमे से कहा।
आरव का दिल जैसे रुक गया।
“क्या मतलब?”
उन्होंने उसे अंदर बुलाया और एक डायरी उसके हाथ में दी।
“ये उसने तुम्हारे लिए छोड़ी है।”
आरव ने कांपते हाथों से डायरी खोली।
उसमें लिखा था—
“आरव,
अगर तुम ये पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि मैं तुमसे बहुत दूर जा चुकी हूं।
मैंने तुम्हें सच नहीं बताया… क्योंकि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती थी।
मुझे एक गंभीर बीमारी है, और मेरे पास ज्यादा समय नहीं है।
मैं नहीं चाहती थी कि तुम मुझे इस हालत में देखो।
तुम्हारी जिंदगी में सिर्फ खुशियां होनी चाहिए, दर्द नहीं।
तुम मेरी सबसे खूबसूरत याद हो… और हमेशा रहोगे।
तुम्हारी संगिनी,
मीरा।”
हर शब्द के साथ आरव की आंखों से आंसू गिरते गए।
अब उसे समझ आया कि मीरा क्यों दूर हो गई थी।
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
कुछ महीनों बाद…
वही लाइब्रेरी, वही खिड़की, वही बारिश।
आरव अकेला बैठा था, हाथ में मीरा की डायरी लिए।
वो हर दिन वहां आता, जैसे मीरा अब भी वहीं बैठी हो।
उसने धीरे से डायरी खोली और एक नई कविता लिखी—
“तुम गई नहीं हो,
तुम यहीं कहीं हो…
हर बारिश की बूंद में,
हर खामोशी के सुकून में।
तुम मेरी संगिनी थी,
हो… और हमेशा रहोगी।”
उसने खिड़की से बाहर देखा।
बारिश अब भी हो रही थी।
और उस बारिश में, उसे ऐसा लगा जैसे मीरा मुस्कुरा रही हो।
क्योंकि कुछ प्यार कहानियां खत्म नहीं होतीं…
वो बस यादों में बदल जाती हैं—हमेशा के लिए।

NSW. उभरते लेखक 🥈
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।






