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लेखक: Alka Singh

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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  • नन्हा दीपक और अँधेरे का डर😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    Q 

    एक छोटे-से गाँव में मोहन नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत समझदार और प्यारा बच्चा था, लेकिन उसे एक चीज़ से बहुत डर लगता था—अँधेरे से।

     

    जैसे ही शाम होती और सूरज आसमान से विदा लेने लगता, मोहन अपनी माँ के पास जाकर बैठ जाता।

     

    “माँ, आज जल्दी दिया जला दो ना,” वह डरते हुए कहता।

     

    माँ मुस्कुराकर कहतीं, “बेटा, अँधेरा डरने की चीज़ नहीं है। अँधेरे के बाद ही तो उजाला आता है।”

     

    लेकिन मोहन को माँ की बात समझ नहीं आती थी।

     

    एक दिन गाँव में बहुत तेज़ आँधी आई। पेड़ हिलने लगे, खिड़कियाँ जोर-जोर से बजने लगीं और कुछ ही देर में पूरे गाँव की बिजली चली गई।

     

    घर में चारों तरफ अँधेरा छा गया।

     

    मोहन डरकर माँ से लिपट गया।

     

    “माँ, बहुत अँधेरा है।”

     

    माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “डर मत बेटा। हमारे पास एक छोटा-सा दीपक है।”

     

    माँ ने अलमारी से मिट्टी का एक पुराना दीपक निकाला। उसमें तेल डाला और बाती जलाकर उसे मोहन के हाथ में दे दिया।

     

    दीपक की छोटी-सी लौ कमरे में हल्की रोशनी फैलाने लगी।

     

    मोहन ने आश्चर्य से दीपक को देखा।

     

    “इतना छोटा दीपक और इतनी रोशनी?”

     

    माँ हँसते हुए बोलीं, “हाँ बेटा, रोशनी हमेशा बड़ी चीज़ से नहीं होती। कभी-कभी एक छोटी-सी लौ भी बहुत बड़े अँधेरे को हरा देती है।”

     

    मोहन देर तक दीपक को देखता रहा।

     

    उसी रात उसने मन ही मन तय किया कि अब वह अपने डर से भागेगा नहीं।

     

    अगली सुबह आँधी रुक चुकी थी। गाँव में जगह-जगह पेड़ों की टहनियाँ गिरी थीं। रास्ते भी कीचड़ से भर गए थे।

     

    मोहन अपने दोस्तों के साथ बाहर खेलने निकला। तभी उसे रास्ते के किनारे एक छोटी बच्ची दिखाई दी। वह रो रही थी।

     

    मोहन उसके पास गया।

     

    “तुम क्यों रो रही हो?”

     

    बच्ची ने आँसू पोंछते हुए कहा, “मेरा नाम रानी है। मैं रास्ता भूल गई हूँ। मुझे घर नहीं मिल रहा।”

     

    मोहन ने चारों तरफ देखा। रास्ता सुनसान था। थोड़ी दूर पर एक कच्चा रास्ता जंगल की तरफ जाता था।

     

    मोहन को भी डर लग रहा था, लेकिन उसने रानी को अकेला नहीं छोड़ा।

     

    “डरो मत। हम दोनों मिलकर तुम्हारा घर ढूँढ़ेंगे।”

     

    दोनों आगे बढ़ने लगे।

     

    कुछ दूर जाते ही रास्ता और अँधेरा हो गया। पेड़ों की घनी शाखाओं के कारण सूरज की रोशनी भी जमीन तक नहीं पहुँच रही थी।

     

    मोहन के मन में फिर डर पैदा हुआ।

     

    उसे माँ की बात याद आई—“डर के आगे ही साहस छिपा होता है।”

     

    उसने रानी का हाथ पकड़ा और बोला, “हम डरेंगे नहीं।”

     

    तभी उसे अपनी जेब में कुछ महसूस हुआ।

     

    वह वही छोटा दीपक था, जिसे उसकी माँ ने सुबह उसे रास्ते के लिए दे दिया था। माँ ने जाते समय कहा था, “कभी किसी को इसकी जरूरत पड़े तो इसे जरूर जलाना।”

     

    मोहन ने दीपक जलाया।

     

    छोटी-सी लौ ने उनके आसपास का रास्ता रोशन कर दिया।

     

    रानी मुस्कुराई।

     

    “मोहन, तुम तो बहुत बहादुर हो!”

     

    मोहन भी मुस्कुरा दिया।

     

    कुछ दूर चलने के बाद उन्हें एक बूढ़े बाबा मिले। उन्होंने रानी को पहचान लिया।

     

    “अरे, तुम तो रामू काका की बेटी हो! तुम्हारा घर तो गाँव के दूसरी तरफ है।”

     

    बाबा दोनों बच्चों को गाँव तक लेकर आए।

     

    रानी को देखते ही उसके माता-पिता की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।

     

    रानी की माँ ने मोहन को गले लगाकर कहा, “बेटा, आज तुमने मेरी बच्ची को घर पहुँचाया है। भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे।”

     

    मोहन चुपचाप मुस्कुराता रहा।

     

    उस दिन उसे पहली बार समझ आया कि बहादुर वह नहीं होता जिसे डर नहीं लगता। बहादुर तो वह होता है जो डर लगने के बाद भी सही काम करने की हिम्मत रखता है।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव में एक और घटना हुई।

     

    गाँव के स्कूल में बच्चों को पौधे लगाने के लिए कहा गया। सभी बच्चों ने एक-एक पौधा लगाया, लेकिन कुछ दिनों बाद कई बच्चे अपने पौधों को पानी देना भूल गए।

     

    मोहन रोज अपने पौधे को पानी देता।

     

    उसका दोस्त सोनू बोला, “मोहन, तुम रोज-रोज इतना काम क्यों करते हो? पौधा अपने आप बड़ा हो जाएगा।”

     

    मोहन ने कहा, “अगर हम उसकी देखभाल नहीं करेंगे, तो वह कैसे बड़ा होगा?”

     

    दिन बीतते गए।

     

    कुछ महीनों बाद मोहन का पौधा एक सुंदर पेड़ बन गया, जबकि बाकी कई पौधे सूख गए।

     

    स्कूल के अध्यापक ने मोहन को बुलाकर कहा, “बच्चों, मोहन ने हमें एक बहुत अच्छी बात सिखाई है। किसी भी चीज़ को बड़ा बनने के लिए मेहनत, धैर्य और देखभाल की जरूरत होती है।”

     

    सोनू ने सिर झुकाकर कहा, “अब मैं भी अपने पौधे की देखभाल करूँगा।”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    समय बीतता गया। अब मोहन बड़ा हो रहा था। उसका अँधेरे का डर भी धीरे-धीरे खत्म हो चुका था।

     

    एक रात वह अपनी माँ के साथ घर के बाहर बैठा था। आसमान में बहुत सारे तारे चमक रहे थे।

     

    मोहन ने माँ से कहा, “माँ, अब मुझे अँधेरे से डर नहीं लगता।”

     

    माँ ने पूछा, “ऐसा क्यों?”

     

    मोहन ने मुस्कुराकर कहा, “क्योंकि अब मुझे पता है कि अँधेरा कितना भी बड़ा हो, अगर हम एक छोटी-सी रोशनी जलाने की हिम्मत रखें, तो रास्ता जरूर मिल जाता है।”

     

    माँ ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बिल्कुल बेटा। और जिंदगी में भी ऐसा ही होता है। मुश्किलें अँधेरे की तरह होती हैं। हमें उनसे भागना नहीं चाहिए। हमें अपने अंदर की छोटी-सी उम्मीद को जलाए रखना चाहिए।”

     

    मोहन ने आसमान की तरफ देखा।

     

    उसे लगा जैसे सारे तारे भी उसी की बात सुनकर मुस्कुरा रहे हों।

     

    उस दिन से मोहन ने एक बात हमेशा याद रखी—

     

    “मुश्किल समय में हार मान लेना आसान है, लेकिन उम्मीद की छोटी-सी लौ जलाए रखना ही असली हिम्मत है।”

     

    और वह छोटा-सा दीपक?

     

    मोहन ने उसे संभालकर अपने कमरे में रख लिया।

     

    जब भी कोई बच्चा डरकर उसके पास आता, वह दीपक दिखाकर कहता—

     

    “देखो, रोशनी कितनी छोटी है… लेकिन अँधेरे से लड़ने के लिए इतनी ही काफी है।”

     

    सीख

     

    हमें मुश्किलों और डर से भागना नहीं चाहिए। साहस, मेहनत और उम्मीद के साथ आगे बढ़ने वाला इंसान बड़ी से बड़ी परेशानी को भी पार कर सकता है। साथ ही, हमें जरूरत के समय दूसरों की मदद जरूर करनी चाहिए।

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  • तुम लौट आओ🥹🫂

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तुम लौट आओ
    इतनी-सी ही तो इच्छा है,
    पर जाने क्यों
    यह इच्छा हर दिन
    एक लंबी प्रतीक्षा बन जाती है ।।

     

    दरवाज़ा खुलता है तो लगता है,
    शायद तुम हो…
    हवा आती है तो लगता है,
    शायद तुम्हारी आहट है…
    हर कदम की आवाज़ में
    मैं तुम्हें खोजता हूँ,
    हर शाम की खामोशी में
    तुम्हें पुकारता हूँ ।।

     

    तुम्हारे बिना
    यह घर घर नहीं लगता,
    दीवारें चुप हैं,
    खिड़कियाँ उदास हैं,
    और मेरी आँखें
    हर रास्ते पर
    तुम्हारा इंतज़ार करती हैं ।।

     

    कितनी रातें बीत गईं
    तुम्हारे लौटने की उम्मीद में,
    चाँद ढल गया,
    सितारे थक गए,
    पर मेरी प्रतीक्षा
    अब भी वहीं खड़ी है ।।

     

    कभी तो तुम्हें भी
    मेरी याद आती होगी..?
    कभी तो तुम्हारा मन भी
    उसी रास्ते पर मुड़ता होगा
    जहाँ से तुम गए थे…?

     

    लौट आओ…
    इससे पहले कि
    इंतज़ार की यह लौ
    मेरे भीतर ही जलकर बुझ जाए ।।

     

    लौट आओ
    क्योंकि तुम्हारे बिना
    मैं जी तो रहा हूँ,
    पर हर साँस में
    तुम्हें लौटाने की तड़प है ।।

     

    और अगर लौटना संभव न हो,
    तो बस इतना कर देना…
    किसी रात चुपके से
    मेरे सपने में आ जाना,
    मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं…
    बस थोड़ी देर
    तुम्हारे पास बैठकर
    अपनी सारी अधूरी बातें
    पूरी कर लेना चाहता हूँ ।‌।

     

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  • इस कदर मेरी दोस्ती का_.इम्तेहान तो मत लिजीये

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    इस कदर मेरी दोस्ती का…

    .इम्तेहान तो मत लिजीये… .

     

    खफा हो क्यों… .

    *ये तो बता दीजिये… .*

     

    माफ कर दो अगर… .

    हो गई हो हमसे कोई भूल… .

     

    पर ऎसे याद ना कर के… .

    *हमे सजा तो मत दीजिये!!*

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  • रात में तुम ख्वाब नहीं, *नशा बनकर उतरती हो,*

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    रात में तुम ख्वाब नहीं,

    *नशा बनकर उतरती हो,*

     

    छुए बिना ही तुम मेरी 

    *रूह तक बिखरती हो…!!🌹*

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  • बस कभी-कभी मुझे अपना कहा कर

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    ❤️🌷

     

    तू हक़ जताया कर, अच्छा लगता है,

    यूँ अपना सा बताया कर, अच्छा लगता है।

     

    दुनिया भर की मोहब्बत नहीं चाहिए मुझे,

    बस कभी-कभी मुझे अपना कहा कर,

    अच्छा लगता है। 🌷🍀❤️

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  • मैंने इश्क़ को लिखना चाहा था अल्फ़ाज़ों में

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    मैंने इश्क़ को 

    लिखना चाहा था अल्फ़ाज़ों में,

     

    पर हर दफ़ा 

    काग़ज़ पर बस तेरा नाम उतर आया…💘

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    Alka Singh

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  • करते हो इश्क़ भरी शायरी

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    करते हो इश्क़ भरी शायरी,

    चलो हम भी इश्क़ भरी शायरी कर लें।

    आँखों से आँखें, निगाहों से निगाहें चार कर लें।

     

    ये दुनिया नहीं समझेगी हमारे दरमियाँ की बातें,

    क्यों न आज फिर से प्यार भरी बातें चार कर लें। 

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    Alka Singh

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  • तू मिले या न मिले…..!! 🥀

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तेरी मोहब्बत में खुद को इस कदर खोना है,

    तू मिले या न मिले , बस तेरा होकर रहना है.!!🥀.

     

     

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    Alka Singh

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  • ❤️ तुम बिन — भाग 2 ❤️

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

     

     

    राजवंशी हवेली में अब फिर से खुशियाँ लौट आई थीं।जिस आँगन में कभी आरोही अकेली बैठकर आँसू बहाया करती थी, वहीं अब उसकी हँसी गूँजती थी।

     

    काव्या अब आरोही को बेटी नहीं, अपनी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा मानती थी।

     

    नैना और आरोही की बहन जैसी मोहब्बत और भी गहरी हो गई थी।

     

    और अर्जुन…

     

    वह तो आरोही की दुनिया बन चुका था।

     

    सुबह आरोही की आँख खुलने से पहले अर्जुन उसके लिए चाय रख देता।

     

    “आपको कैसे पता कि मुझे आज चाय चाहिए?”

     

    अर्जुन मुस्कुराता।

     

    “तुम्हारे चेहरे को पढ़ना सीख गया हूँ।”

     

    आरोही हँसते हुए कहती,

     

    “और अगर कभी मेरा चेहरा पढ़ नहीं पाए तो?”

     

    अर्जुन उसका हाथ पकड़कर कहता,

     

    “तब तुम्हारा हाथ पकड़ लूँगा… क्योंकि तुम्हारा हाथ हमेशा सच बोलता है।”

     

    आरोही की आँखों में प्यार उतर आता।

     

    लेकिन उसे नहीं पता था…

     

    उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य अभी खुलना बाकी था।

     

    एक रात अचानक हवेली की बिजली चली गई।

     

    पूरी हवेली अंधेरे में डूब गई।

     

    आरोही खिड़की के पास खड़ी थी।

     

    तभी उसे नीचे पुराने बरगद के पास किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

     

    वह चौंक गई।

     

    “इस वक्त कौन हो सकता है?”

     

    आरोही ने अर्जुन को जगाया।

     

    दोनों नीचे गए।

     

    बरगद के पास कोई नहीं था।

     

    लेकिन वहाँ जमीन पर एक पुराना लिफाफा पड़ा था।

     

    लिफाफे पर सिर्फ एक नाम लिखा था—

     

    “आरोही के लिए।”

     

    आरोही के हाथ काँपने लगे।

     

    अर्जुन ने लिफाफा उठाया।

     

    “इसे अभी मत खोलो।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    अर्जुन कुछ पल चुप रहा।

     

    “क्योंकि मुझे लगता है… इसमें तुम्हारे अतीत से जुड़ी कोई बात है।”

     

    आरोही ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “अगर अतीत में कुछ गलत हुआ है तो मुझे जानना होगा।”

     

    उसने लिफाफा खोल दिया।

     

    अंदर सिर्फ एक कागज था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “तुम्हें जिस माँ की मौत के बारे में बताया गया था… उसकी मौत प्राकृतिक नहीं थी।”

     

    आरोही के हाथ से कागज गिर गया।

     

    “मेरी… माँ?”

     

    अर्जुन ने उसे संभाल लिया।

     

    “आरोही…”

     

    वह रोते हुए बोली,

     

    “मेरी माँ की मौत कैसे हुई थी?”

     

    अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    अगली सुबह आरोही सीधे धीरेंद्र के कमरे में पहुँची।

     

    “पापा, मुझे अपनी माँ के बारे में सब कुछ जानना है।”

     

    धीरेंद्र का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “किसने तुमसे ये सब कहा?”

     

    आरोही ने वह कागज उनके सामने रख दिया।

     

    धीरेंद्र की आँखों में डर उतर आया।

     

    काव्या भी वहीं थी।

     

    कागज देखते ही उसके हाथ से कप गिर गया।

     

    आरोही ने पहली बार महसूस किया कि…

     

    काव्या कुछ जानती है।

     

    “माँ… आपको पता है ना?”

     

    काव्या की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी धीरेंद्र ने पुरानी अलमारी खोली और एक तस्वीर निकालकर आरोही के हाथ में रख दी।

     

    तस्वीर में उसकी माँ सविता थीं।

     

    उनके साथ एक अनजान आदमी खड़ा था।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “ये कौन हैं?”

     

    धीरेंद्र ने धीमे स्वर में कहा,

     

    “तुम्हारे मामा।”

     

    आरोही चौंक गई।

     

    “मेरे मामा?”

     

    “हाँ… लेकिन वह कई साल पहले गायब हो गए थे।”

     

    अर्जुन ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    फिर उसकी नजर तस्वीर के पीछे लिखे शब्दों पर गई।

     

    “अगर मुझे कुछ हो जाए तो मेरी बेटी को सच बता देना।”

     

    अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    उसी रात अर्जुन ने अपने आदमी राघव को बुलाया।

     

    “मुझे सविता के भाई के बारे में पूरी जानकारी चाहिए।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “मैंने पता लगाया है। उनका नाम विक्रम सिंह था।”

     

    “और अब?”

     

    “पंद्रह साल से कोई खबर नहीं।”

     

    अर्जुन ने पूछा,

     

    “क्या वह जिंदा हैं?”

     

    राघव ने कुछ सेकंड चुप रहने के बाद कहा,

     

    “एक आदमी ने दावा किया है कि उसने उन्हें कुछ महीने पहले देखा था।”

     

    अर्जुन की आँखें सिकुड़ गईं।

     

    “कहाँ?”

     

    “इसी शहर 

     

    अगली सुबह आरोही के कमरे के दरवाजे पर एक और चिट्ठी मिली।

     

    “सच के बहुत करीब मत जाना।”

     

    आरोही डर गई।

     

    लेकिन अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “अब कोई तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचा सकता।”

     

    “अगर खतरा तुम्हारे सामने आ गया तो?”

     

    अर्जुन ने उसकी आँखों में देखकर कहा,

     

    “तो मैं तुम्हारे सामने खड़ा हो जाऊँगा।”

     

    आरोही की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “मुझे डर लगता है…”

     

    अर्जुन ने उसे अपनी बाँहों में ले लिया।

     

    “डरना मत। जब तक मैं हूँ, तुम्हें अकेले नहीं लड़ना पड़ेगा।”

     

    उस पल आरोही ने पहली बार महसूस किया—

     

    प्यार सिर्फ किसी के साथ हँसना नहीं होता… प्यार वह है जो डर के समय ढाल बन जाए।

     

    रात को काव्या अकेली बैठी रो रही थी।

     

    आरोही उसके पास गई।

     

    “माँ…”

     

    काव्या ने उसकी ओर देखा।

     

    “मैंने तुम्हें बहुत दर्द दिया है।”

     

    आरोही उसके पास बैठ गई।

     

    “जो बीत गया उसे भूल जाइए।”

     

    काव्या ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं बेटी… अब मुझे तुम्हें सच बताना होगा।”

     

    आरोही का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    काव्या ने कहा,

     

    “तुम्हारी माँ की मौत के पीछे किसी और का हाथ था।”

     

    “किसका?”

     

    काव्या की आवाज काँपने लगी।

     

    “धीरेंद्र का नहीं…”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    काव्या ने धीरे से कहा—

     

    “विक्रम का।”

     

    आरोही स्तब्ध रह गई।

     

    “मेरे मामा?”

     

    काव्या ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम्हारे मामा को लगता था कि तुम्हारे पिता ने उनकी सारी संपत्ति छीन ली। उन्होंने बदला लेने की कोशिश की थी।”

     

    तभी दरवाजे के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई।

     

    दोनों चुप हो गईं।

     

    दरवाजा खुला।

     

    लेकिन वहाँ कोई उसी रात हवेली के बाहर एक काली कार आकर रुकी।

     

    एक अधेड़ उम्र का आदमी कार से उतरा।

     

    उसने हवेली की तरफ देखा।

     

    उसकी आँखों में नफरत थी।

     

    “पंद्रह साल…”

     

    उसने धीमे से कहा।

     

    “अब हिसाब पूरा होगा।”

     

    लेकिन उसे नहीं पता था कि हवेली में कोई और भी था जो उसका इंतजार कर रहा था।

     

    अर्जुन।

     

    अर्जुन ने उसे दूर से देख लिया था।

     

    उसने तुरंत राघव को फोन किया।

     

    “वह वापस आ गया है।”

     

    “कौन?”

     

    अर्जुन ने कहा—

     

    “विक्रम।”

     

    उस रात अर्जुन कमरे में आया तो आरोही खिड़की के पास खड़ी थी।

     

    “आप मुझसे कुछ छिपा रहे हैं?”

     

    अर्जुन चुप रहा।

     

    आरोही उसकी तरफ मुड़ी।

     

    “आपने मुझसे वादा किया था कि मेरे सामने कभी झूठ नहीं बोलेंगे।”

     

    अर्जुन उसके करीब आया।

     

    “मैं तुमसे झूठ नहीं बोल रहा।”

     

    “फिर?”

     

    अर्जुन ने उसका हाथ थाम लिया।

     

    “मैं तुम्हें खोने से डरता हूँ।”

     

    आरोही की आँखें भर आईं।

     

    “आप मुझे खो नहीं सकते।”

     

    “क्यों?”

     

    आरोही ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि मैंने अपना दिल आपको दे दिया है।”

     

    अर्जुन ने उसके माथे को चूमते हुए कहा,

     

    “और मैं वादा करता हूँ… तुम्हारे इस दिल को कभी टूटने नहीं दूँगा।”अगले दिन विक्रम हवेली में घुस आया।धीरेंद्र उसे देखकर स्तब्ध रह गए।“विक्रम!”

     

    विक्रम हँसा।

     

    “हाँ… मैं जिंदा हूँ।”

     

    काव्या पीछे हट गई।

     

    आरोही ने काँपते हुए पूछा,

     

    “आप मेरी माँ के साथ क्या करने वाले थे?”

     

    विक्रम की आँखें झुक गईं।

     

    कुछ सेकंड बाद उसने कहा,

     

    “मैंने तुम्हारी माँ को नुकसान पहुँचाने की योजना बनाई थी… लेकिन मैंने उन्हें नहीं मारा।”

     

    सभी चौंक गए।

     

    “फिर?”

     

    विक्रम ने एक नाम लिया।

     

    “कबीर।”

     

    अर्जुन की आँखें फैल गईं।

     

    कबीर?

     

    जिसे वह पहले ही धोखेबाज साबित कर चुका था।

     

    विक्रम ने बताया कि कबीर ने वर्षों पहले परिवार के भीतर दुश्मनी पैदा की थी और सविता की मौत के मामले में भी उसने परिस्थितियों का फायदा उठाया था।

     

    लेकिन उसके पास पूरी सच्चाई साबित करने के लिए एक आखिरी सबूत था।

     

    एक पुरानी रिकॉर्डिंग।

     

    रिकॉर्डिंग में कबीर की आवाज साफ सुनाई दे रही थी।

     

    सच सामने आ गया।

     

    विक्रम ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने बदला लेने में अपनी जिंदगी बर्बाद कर दी। मुझे माफ कर दो।”

     

    धीरेंद्र ने कुछ नहीं कहा।

     

    लेकिन आरोही आगे बढ़ी।

     

    “मामा… अगर मेरी माँ होतीं तो शायद वो भी यही कहतीं कि नफरत को यहीं खत्म कर दो।”

     

    विक्रम की आँखों से आँसू बह निकले।कुछ महीनों बाद हवेली में फिर उत्सव था।इस बार कोई राज नहीं था।

     

    कोई झूठ नहीं था।

     

    सिर्फ प्यार था।

     

    धीरेंद्र ने परिवार को अपने पास बुलाया।

     

    काव्या, नैना, आरोही और अर्जुन सभी साथ बैठे थे।

     

    धीरेंद्र ने कहा,

     

    “आज से इस घर में कोई सौतेला नहीं होगा।”

     

    काव्या ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    नैना ने दूसरी तरफ से उसका हाथ थाम लिया।

     

    और अर्जुन ने पीछे से उसकी हथेली पकड़ ली।

     

    आरोही की आँखों में आँसू थे।

     

    अर्जुन ने धीरे से पूछा,

     

    “फिर रो रही हो?”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “खुशी के आँसू हैं।”

     

    “किस बात की खुशी?”

     

    आरोही ने पूरे परिवार की ओर देखा।

     

    “इस बात की… कि अब मुझे किसी चीज की कमी नहीं।”

     

    अर्जुन ने पूछा,

     

    “और मुझसे?”

     

    आरोही ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “आपसे?”

     

    वह उसके करीब आई।

     

    “आप तो मेरी जरूरत नहीं…”

     

    अर्जुन ने हैरानी से देखा।

     

    आरोही ने उसका हाथ अपने दिल पर रख दिया।

     

    “आप मेरी जिंदगी हैं।”

     

    अर्जुन मुस्कुराया।

     

    “और तुम?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा—

     

    “मैं… तुम्हारे बिना कुछ भी नहीं।”

     

    हवेली के आँगन में फूल बरसने लगे।

     

    परिवार हँस रहा था।

     

    और बरगद के पेड़ के नीचे दो दिल एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े थे।

     

    उनके बीच अब कोई राज नहीं था।

     

    कोई डर नहीं था।

     

    कोई दूरी नहीं थी।

     

    सिर्फ मोहब्बत थी…

     

    क्योंकि कुछ प्रेम कहानियाँ खत्म नहीं होतीं।

     

    वे हर सच के सामने आने के बाद और मजबूत होती जाती हैं।

     

    और आरोही की जिंदगी ने उसे एक बात सिखा दी—

     

    ❤️ “जिस प्यार में साथ निभाने का वादा हो, वहाँ तूफान भी रास्ता बदल देता है।” ❤️

     

    और अर्जुन के लिए आरोही हमेशा वही रहेगी—

     

    “तुम बिन…”

     

    “मेरी हर खुशी अधूरी है।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 💞 तुम बिन 💞

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    एक ऐसी मोहब्बत की कहानी, जहाँ रिश्ते खून से नहीं, दिल से बनते हैं…

     

    शहर से थोड़ी दूर एक ऊँची पहाड़ी पर बनी थी “राजमहल हवेली”।

     

    सफेद संगमरमर से बनी वह हवेली दूर से किसी सपने जैसी दिखाई देती थी। बड़े-बड़े झूमर, फूलों से सजा आँगन, चारों तरफ हरियाली और हवेली के बीचों-बीच लगा वह पुराना बरगद का पेड़… जिसके नीचे बैठकर कभी हवेली के मालिक धीरेंद्र राजवंशी अपनी पत्नी और दोनों बेटियों के साथ चाय पिया करते थे।

     

    धीरेंद्र शहर के सबसे अमीर और सम्मानित कारोबारियों में से एक थे।

     

    उनकी पहली पत्नी सविता बहुत शांत और सरल स्वभाव की थीं। उनकी एक बेटी थी—आरोही।

     

    आरोही बचपन से ही बेहद मासूम, समझदार और प्यार बाँटने वाली लड़की थी।

     

    लेकिन किस्मत ने धीरेंद्र से सविता को बहुत जल्दी छीन लिया।

     

    कुछ वर्षों बाद धीरेंद्र ने दूसरी शादी काव्या से की। काव्या से उन्हें एक बेटी हुई—नैना।

     

    शुरुआत में सब कुछ बहुत अच्छा था।

     

    दोनों बच्चियाँ साथ खेलतीं।

     

    आरोही नैना को अपनी छोटी बहन से भी बढ़कर चाहती थी।

     

    “दीदी, मैं बड़ी होकर आपके जैसी बनूँगी,” नैना अक्सर कहती।

     

    आरोही हँसकर उसके बालों में हाथ फेरती और कहती,

     

    “तुम मुझसे भी अच्छी बनना… क्योंकि मेरी छोटी बहन सबसे अच्छी है।”

     

    लेकिन वक्त के साथ काव्या का व्यवहार बदलने लगा।

     

    उसे अपनी बेटी नैना से बहुत प्यार था, लेकिन आरोही उसे अपनी सौतेली बेटी से ज्यादा कुछ नहीं लगती थी।

     

    धीरे-धीरे आरोही से घर के सारे काम करवाए जाने लगे।

     

    महंगे कपड़ों से भरी हवेली में आरोही के हिस्से में साधारण कपड़े आने लगे।

     

    नैना के जन्मदिन पर पूरा घर सजता, लेकिन आरोही के जन्मदिन की तारीख तक किसी को याद नहीं रहती।

     

    फिर भी आरोही के दिल में काव्या के लिए कोई शिकायत नहीं थी।

     

    एक दिन काव्या ने गुस्से में कहा,

     

    “आरोही! मेरी साड़ी अभी तक प्रेस क्यों नहीं हुई?”

     

    “माँ… अभी कर देती हूँ।”

     

    काव्या कुछ पल उसे देखती रही।

     

    “तुम मुझे माँ मत कहा करो।”

     

    आरोही की आँखें नम हो गईं।

     

    लेकिन उसने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मेरे लिए तो आप हमेशा माँ ही रहेंगी।”

     

    काव्या ने मुँह फेर लिया।

     

    आरोही चुपचाप चली गई।

     

    उसे क्या पता था कि उसकी यही मासूम मोहब्बत एक दिन पूरे परिवार की किस्मत बदलने वाली थी।

     

    एक बरसात की रात धीरेंद्र अचानक बहुत बीमार पड़ गए।

     

    हवेली के डॉक्टर ने उन्हें देखकर कहा,

     

    “इनकी हालत गंभीर है।”

     

    आरोही पूरी रात उनके सिरहाने बैठी रही।

     

    “पापा… आप ठीक हो जाइए। मैं आपसे कुछ नहीं माँगूँगी। बस आप ठीक हो जाइए।”

     

    धीरेंद्र ने कमजोर हाथ से उसका हाथ पकड़ा।

     

    “बेटी… तूने कभी मुझसे कुछ माँगा ही नहीं।”

     

    आरोही की आँखों से आँसू गिरने लगे।

     

    “मुझे कुछ चाहिए भी नहीं पापा… बस आपका आशीर्वाद चाहिए।”

     

    धीरेंद्र मुस्कुराए।

     

    “तू मेरी बेटी नहीं… मेरा गर्व है।”

     

    कुछ दिनों बाद धीरेंद्र स्वस्थ तो हो गए, लेकिन उन्होंने महसूस किया कि हवेली में कुछ बदल चुका था।

     

    उन्हें पता चला कि काव्या धीरे-धीरे सारी संपत्ति नैना के नाम करवाने की कोशिश कर रही थी।

     

    धीरेंद्र ने पहली बार काव्या से पूछा,

     

    “तुम्हें आरोही से इतनी नफरत क्यों है?”

     

    काव्या ने कोई जवाब नहीं 

     

    कुछ साल बीत गए।

     

    आरोही अब बेहद खूबसूरत और समझदार युवती बन चुकी थी।

     

    इसी दौरान काव्या ने उसकी शादी एक गरीब युवक अर्जुन से तय कर दी।

     

    अर्जुन शांत, साधारण कपड़े पहनने वाला और बहुत कम बोलने वाला युवक था।

     

    काव्या ने धीरेंद्र से कहा,

     

    “आरोही की शादी अर्जुन से कर देते हैं। लड़का गरीब है, इसलिए हमारी संपत्ति पर उसकी नजर नहीं होगी।”

     

    धीरेंद्र ने बेटी की ओर देखा।

     

    “आरोही, क्या तुम इस शादी के लिए तैयार हो?”

     

    आरोही ने सिर झुका लिया।

     

    “अगर आप खुश हैं पापा… तो मैं भी खुश हूँ।”

     

    काव्या मन ही मन खुश हुई।

     

    उसे लगा उसने आरोही को हमेशा के लिए हवेली से दूर कर दिया।

     

    लेकिन वह एक बात नहीं जानती थी…

     

    अर्जुन गरीब था ही नहीं।

     

     

     

    शादी के बाद अर्जुन आरोही को अपने घर ले गया।

     

    आरोही ने देखा कि घर बाहर से बेहद साधारण था।

     

    वह मुस्कुराकर बोली,

     

    “हमारे पास ज्यादा कुछ नहीं है… लेकिन अगर हम दोनों साथ हैं तो मेरे लिए यही सबसे बड़ी दौलत है।”

     

    अर्जुन उसकी ओर देखने लगा।

     

    उसकी आँखों में पहली बार प्यार साफ दिखाई दिया।

     

    “आरोही, अगर तुम मेरे साथ हो… तो मुझे दुनिया की कोई दौलत नहीं चाहिए।”

     

    आरोही ने धीरे से पूछा,

     

    “आप मुझसे इतना प्यार क्यों करते हैं?”

     

    अर्जुन मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि तुम वो इंसान हो जिसे प्यार पाने के लिए कभी किसी से कुछ माँगना नहीं पड़ा… तुमने हमेशा दूसरों को प्यार दिया।”

     

    धीरे-धीरे दोनों के बीच सच्चा प्रेम जन्म लेने लगा।

     

    लेकिन अर्जुन के पास एक रहस्य था।

     

    वह कोई गरीब युवक नहीं था।

     

    वह देश की बड़ी कंपनियों में से एक राजवीर ग्रुप का मालिक था।

     

    उसने जानबूझकर अपनी पहचान छिपाई थी।

     

    क्यों?

     

    क्योंकि कुछ महीनों पहले उसे पता चला था कि धीरेंद्र की कंपनी को बर्बाद करने की साजिश चल रही है।

     

    और उस साजिश के पीछे था—

     

    कबीर मल्होत्रा।

     

    वही अमीर युवक जिसे काव्या नैना के लिए पसंद करती थी।

     

    कबीर का असली उद्देश्य नैना से शादी करके राजवंशी परिवार की पूरी संपत्ति पर कब्जा करना |

     

    एक रात अर्जुन ने अपने पुराने दोस्त राघव से कहा,

     

    “अब वक्त आ गया है कि सच सामने आए।”

     

    राघव ने पूछा,

     

    “क्या आरोही को सब पता है?”

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    अर्जुन कुछ देर चुप रहा।

     

    “क्योंकि मैं नहीं चाहता कि वह अपने परिवार को टूटते हुए देखे।”

     

    उसी रात अर्जुन ने सारे दस्तावेज इकट्ठे किए।

     

    उसे पता चला कि कबीर ने धीरेंद्र की कंपनी के कई कागजात में धोखाधड़ी की थी।

     

    कबीर का लक्ष्य सिर्फ पैसा नहीं था।

     

    वह राजवंशी हवेली भी अपने नाम करवाना चाहता था।

     

     

    कुछ दिनों बाद धीरेंद्र को बैंक से नोटिस मिला।

     

    हवेली और कंपनी पर भारी कर्ज दिखाया गया था।

     

    धीरेंद्र के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “मैंने ऐसा कोई कर्ज लिया ही नहीं!”

     

    काव्या घबरा गई।

     

    नैना रोने लगी।

     

    उसी समय हवेली के दरवाजे पर अर्जुन आया।

     

    उसके साथ कई वकील और अधिकारी थे।

     

    काव्या चौंक गई।

     

    “तुम यहाँ क्यों आए हो?”

     

    अर्जुन ने शांत आवाज में कहा,

     

    “इस घर को बचाने।”

     

    तभी पीछे से आरोही आई।

     

    “अर्जुन?”

     

    अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

     

    “आज मुझे तुम्हारे सामने अपना सच बताना होगा।”

     

    उसने अपना परिचय दिया।

     

    पूरा परिवार स्तब्ध रह गया।

     

    धीरेंद्र की आँखें फैल गईं।

     

    “तुम… राजवीर ग्रुप के मालिक हो?”

     

    अर्जुन ने सिर झुका दिया।

     

    “जी।”

     

    नैना को विश्वास नहीं हुआ।

     

    काव्या के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    अर्जुन ने सारे दस्तावेज मेज पर रख दिए।

     

    “कबीर ने कंपनी के कागजात में धोखाधड़ी की है। वह इस परिवार की संपत्ति हड़पना चाहता था।”

     

    तभी कबीर भी वहाँ पहुँच गया।

     

    वह चिल्लाया,

     

    “ये सब झूठ है!”

     

    राघव ने तुरंत स्क्रीन पर सारे सबूत चला दिए।

     

    कबीर की सारी साजिश सामने आ गई।

     

    धीरेंद्र की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उन्होंने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “बेटा… तुमने मेरी बेटी से शादी करके सिर्फ उसका जीवन नहीं बचाया… तुमने मेरा पूरा परिवार बचा लिया।”

     

     

    काव्या चुपचाप आरोही के सामने खड़ी थी।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “आरोही…”

     

    आरोही ने कुछ नहीं कहा।

     

    काव्या उसके सामने घुटनों पर बैठ गई।

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    आरोही घबरा गई।

     

    “माँ… आप ये क्या कर रही हैं?”

     

    काव्या रोते हुए बोली,

     

    “जिस बेटी ने मुझे हमेशा माँ कहा… मैंने उसी बेटी को कभी बेटी नहीं माना।”

     

    आरोही की आँखें भर आईं।

     

    काव्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया। तुम्हें नौकरानी की तरह रखा… तुम्हारा प्यार नहीं समझा।”

     

    आरोही कुछ पल चुप रही।

     

    फिर उसने काव्या को उठाया और गले लगा लिया।

     

    “माँ… माँ से कोई बदला नहीं लेता।”

     

    काव्या फूट-फूटकर रो पड़ी।

     

    “तुम मुझे अब भी माँ कह रही हो?”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि मैंने आपको कभी सौतेली माँ माना ही नहीं।”

     

    —

     

    ❤️ एक परिवार फिर से पूरा हुआ

     

    धीरेंद्र ने अर्जुन को गले लगा लिया।

     

    “आज से तुम मेरे दामाद नहीं… मेरे बेटे हो।”

     

    नैना भी आगे आई।

     

    “दीदी… मुझे भी माफ कर दो। मैंने भी कभी आपका साथ नहीं दिया।”

     

    आरोही ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तुम मेरी बहन हो। बहनों के बीच माफी कैसी?”

     

    हवेली में पहली बार वर्षों बाद ऐसी खुशी लौटी थी जिसमें किसी के दिल में कोई शिकायत नहीं थी।

     

    कुछ दिनों बाद धीरेंद्र ने अपनी पूरी संपत्ति का फैसला किया।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “मेरी संपत्ति मेरी दोनों बेटियों की है। प्यार में हिस्सा नहीं होता।”

     

    काव्या ने भी सिर झुकाकर हामी भर दी।

     

    —

     

    🌹 कुछ महीनों बाद

     

    राजमहल हवेली फिर से फूलों से सज गई।

     

    इस बार कोई दुख नहीं था।

     

    आरोही और अर्जुन हवेली के उसी बरगद के नीचे बैठे थे।

     

    अर्जुन ने आरोही का हाथ अपने हाथों में लिया।

     

    “अगर उस दिन तुम्हारी शादी मुझसे नहीं होती तो?”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “तो शायद मेरी कहानी अधूरी रह जाती।”

     

    “और अगर मैं तुम्हें अपना सच पहले बता देता?”

     

    आरोही ने शरारत से कहा,

     

    “तो शायद मैं तुमसे शादी ही नहीं करती।”

     

    अर्जुन चौंका।

     

    “क्यों?”

     

    आरोही हँस पड़ी।

     

    “क्योंकि मुझे अमीर लड़का नहीं चाहिए था…”

     

    अर्जुन मुस्कुराया।

     

    “तो फिर क्या चाहिए था?”

     

    आरोही ने उसका हाथ अपने सीने पर रख दिया।

     

    “बस ऐसा इंसान चाहिए था… जिसके दिल में मेरे लिए जगह हो।”

     

    अर्जुन ने धीरे से कहा,

     

    “वो जगह तो तुम्हारे लिए हमेशा से थी।”

     

    आरोही ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “मेरे बिना रह सकते हो?”

     

    अर्जुन ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि…”

     

    वह थोड़ा करीब आया।

     

    “तुम बिन मैं अधूरा हूँ।”

     

    आरोही की आँखों में आँसू आ गए।

     

    लेकिन इस बार वे आँसू दर्द के नहीं थे।

     

    वे उस प्यार के थे जो उसे देर से मिला था…

     

    लेकिन हमेशा के लिए मिला था।

     

    हवेली की बालकनी से धीरेंद्र, काव्या और नैना दोनों को देख रहे थे।

     

    काव्या ने धीरे से कहा,

     

    “देखिए… हमारी बेटी कितनी खुश है।”

     

    धीरेंद्र मुस्कुराए।

     

    “हाँ… क्योंकि अब इस घर में दौलत से ज्यादा प्यार है।”

     

    और उस दिन राजमहल हवेली में सिर्फ एक शादीशुदा जोड़ा नहीं था…

     

    बल्कि एक टूटा हुआ परिवार फिर से जुड़ चुका था।

     

    जहाँ कभी सौतेले रिश्तों की दीवार थी…

     

    वहाँ अब माँ-बेटी का प्यार था।

     

    जहाँ कभी संपत्ति का लालच था…

     

    वहाँ अब अपनापन था।

     

    और जहाँ कभी आरोही अकेली रोया करती थी…

     

    वहीं अब अर्जुन उसके साथ खड़ा था।

     

    क्योंकि सच्चा प्यार वही है… जो मुश्किल वक्त में हाथ छोड़े नहीं, बल्कि और मजबूती से थाम ले।

     

    और आरोही की कहानी हमेशा के लिए एक बात कह गई—

     

    **“कुछ रिश्ते खून से बनते हैं, कुछ किस्मत से…

     

    लेकिन सबसे खूबसूरत रिश्ते वो होते हैं, जो सच्चे प्यार से बनते हैं।”**

     

    तुम बिन… मैं भी अधूरा, तुम बिन… मेरी हर खुशी अधूरी। ❤️

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।