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टैग: Vikash Vinay Ki Kahani

  • बारिश में गरीब के घर मेहमान

    बारिश में गरीब के घर मेहमान

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    गाँव के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में रामू अपनी पत्नी सीता और दस साल के बेटे सोनू के साथ रहता था। रामू मजदूरी करके किसी तरह अपने परिवार का पेट पालता था। घर में न पक्का छप्पर था, न ज्यादा सामान और न ही जमा पूँजी।

     

    उस दिन सुबह से ही आसमान में काले बादल छाए हुए थे। शाम होते-होते तेज बारिश शुरू हो गई। हवा इतनी तेज थी कि झोपड़ी की खपरैल जगह-जगह से हिलने लगी।

     

    सीता ने घर के कोने में रखे अनाज को देखते हुए कहा,

    “आज बस इतनी ही दाल और थोड़ा-सा आटा बचा है। कल का पता नहीं।”

     

    रामू ने मुस्कुराकर कहा,

    “चिंता मत करो, कल कुछ काम मिल जाएगा।”

     

    तभी दरवाजे पर किसी ने जोर से दस्तक दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सोनू डरकर बोला,

    “बाबा, इतनी रात में कौन आया है?”

     

    रामू ने दरवाजा खोला तो सामने एक बूढ़ा आदमी बारिश में पूरी तरह भीगा हुआ खड़ा था। उसके कपड़े फटे हुए थे और वह ठंड से काँप रहा था।

     

    बूढ़े ने हाथ जोड़कर कहा,

    “बेटा, बहुत दूर से आ रहा हूँ। बारिश ने रास्ता रोक दिया। क्या आज रात तुम्हारे घर में थोड़ी जगह मिल सकती है?”

     

    रामू ने एक पल के लिए घर के अंदर देखा। झोपड़ी में पहले ही जगह बहुत कम थी और खाने के लिए भी पर्याप्त सामान नहीं था।

     

    फिर उसने मुस्कुराकर कहा,

    “बाबा, यह आपका ही घर समझिए। अंदर आइए।”

     

    सीता ने जल्दी से अपनी पुरानी चादर निकालकर बूढ़े को दे दी।

     

    सोनू ने पूछा,

    “माँ, हमारी तो सिर्फ एक ही सूखी चादर थी।”

     

    सीता बोली,

    “बेटा, ठंड हमें थोड़ी देर और लग जाएगी, लेकिन किसी जरूरतमंद को रातभर ठंड में छोड़ देना उससे बड़ा दुख होगा।”

     

    कुछ देर बाद सीता ने बची हुई दाल और आटे से चार रोटियाँ बनाईं। उसने तीन रोटियाँ परिवार के लिए और एक रोटी बूढ़े के लिए रखी।

     

    लेकिन रामू ने अपनी रोटी बूढ़े की थाली में रख दी।

     

    सीता ने धीरे से कहा,

    “आप क्या खाएँगे?”

     

    रामू मुस्कुराकर बोला,

    “आज भूखे सो जाएँगे, लेकिन किसी मेहमान को भूखा नहीं सुलाएँगे।”

     

    सोनू ने भी अपनी आधी रोटी बूढ़े की थाली में रख दी।

     

    बूढ़े की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने कहा,

    “मैंने बड़े-बड़े घर देखे हैं बेटा, लेकिन इतनी बड़ी दौलत कहीं नहीं देखी।”

     

    रातभर बारिश होती रही। झोपड़ी की छत से पानी टपकता रहा, लेकिन उस छोटे से घर में इंसानियत की गर्माहट बनी रही।

     

    सुबह बारिश रुक गई।

     

    बूढ़ा आदमी जाने लगा। दरवाजे पर पहुँचकर उसने रामू से कहा,

    “तुमने मुझे रात में सिर्फ छत नहीं दी, बल्कि इंसानियत पर मेरा विश्वास भी लौटा दिया।”

     

    रामू ने कहा,

    “बाबा, हमने तो अपना फर्ज निभाया है।”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया और वहाँ से चला गया।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव में खबर फैली कि शहर से एक बड़ा व्यापारी गाँव में जमीन देखने आया है। वह वही बूढ़ा आदमी था।

     

    उसने रामू को बुलाकर कहा,

    “मैंने तुम्हारी परीक्षा नहीं ली थी। उस रात मैं बस बारिश से बचने के लिए तुम्हारे घर पहुँचा था। लेकिन तुम्हारी गरीबी में भी तुम्हारी इंसानियत देखकर मैं प्रभावित हुआ।”

     

    व्यापारी ने रामू को अपने गोदाम में काम दे दिया और रहने के लिए एक छोटा पक्का घर भी दिलवा दिया।

     

    रामू की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने कहा,

    “बाबा, आपने हमारी जिंदगी बदल दी।”

     

    बूढ़े ने जवाब दिया,

    “नहीं बेटा, तुम्हारी जिंदगी तुम्हारी अच्छाई ने बदली है। याद रखना—जिस घर में पैसा कम हो सकता है, लेकिन दिल बड़ा हो, वहाँ भगवान खुद मेहमान बनकर आते हैं।”

     

    उस दिन के बाद रामू के घर में कभी किसी जरूरतमंद को खाली हाथ नहीं लौटाया गया।

     

    सीख

     

    गरीबी इंसान को छोटा नहीं बनाती। इंसान की सोच और व्यवहार उसे बड़ा बनाते हैं। मुसीबत में किसी की मदद करना ही सच्ची इंसानियत है।

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    Vikash Vinay

    गरीबी इंसान को छोटा नहीं बनाती। इंसान की सोच और व्यवहार उसे बड़ा बनाते हैं। मुसीबत में किसी की मदद करना ही सच्ची इंसानियत है।

  • सिगरेट की लत ने बदल दी दुनिया

    सिगरेट की लत ने बदल दी दुनिया

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    रवि एक मेहनती और खुशमिजाज लड़का था। वह अपने परिवार के साथ रहता था और भविष्य में कुछ बड़ा करने का सपना देखता था।

     

    कॉलेज के दिनों में उसके कुछ दोस्तों ने मज़ाक-मज़ाक में उसे सिगरेट पीने के लिए कहा। रवि ने पहले मना किया, लेकिन दोस्तों के दबाव में आकर उसने एक सिगरेट पी ली।

     

    उसे लगा कि यह बस एक बार की बात है। लेकिन धीरे-धीरे वही एक सिगरेट उसकी रोज़ की आदत बन गई।

     

    कुछ महीनों बाद रवि बिना सिगरेट के बेचैन रहने लगा। पढ़ाई और काम में उसका मन कम लगने लगा। घरवालों ने समझाया, लेकिन वह हर बार कहता, “मैं जब चाहूँगा, छोड़ दूँगा।”

     

    समय बीतता गया। उसकी सेहत और पैसे दोनों पर असर पड़ने लगा। सबसे ज्यादा दुख उसके माता-पिता को होता था, जो अपने बेटे को इस आदत से परेशान देखते थे।

     

    एक दिन रवि ने अपने पिता को चुपचाप रोते हुए देखा। पिता ने सिर्फ इतना कहा, “बेटा, हमें तुम्हारे पैसों की नहीं, तुम्हारी जिंदगी की चिंता है।”

     

    ये शब्द रवि के दिल में उतर गए।

     

    उसने उसी दिन फैसला किया कि वह अपनी इस आदत से बाहर निकलने की कोशिश करेगा। शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन उसने परिवार का साथ लिया और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से मदद भी ली।

     

    कई दिनों की मेहनत के बाद रवि ने सिगरेट से दूरी बनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसकी जिंदगी फिर पटरी पर आने लगी।

     

    रवि ने समझ लिया कि लत कभी छोटी नहीं होती। शुरुआत चाहे मज़ाक में हो, लेकिन उसका असर जिंदगी पर बहुत बड़ा हो सकता है।

     

    सीख: गलत आदत को “बस एक बार” कहकर शुरू करना आसान है, लेकिन उससे बाहर निकलने के लिए हिम्मत, परिवार का साथ और सही मदद जरूरी होती है।

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    Vikash Vinay

    गरीबी इंसान को छोटा नहीं बनाती। इंसान की सोच और व्यवहार उसे बड़ा बनाते हैं। मुसीबत में किसी की मदद करना ही सच्ची इंसानियत है।