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टैग: #Jadui pariyo ki kahani

  • 🧚‍♀️ जादुई परियों की कहानी 🧚‍♀️

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के ठीक बारह बजे, जब पूरा गाँव गहरी नींद में सो रहा था, तभी आसमान से एक चमकता हुआ सितारा टूटकर धरती पर आ गिरा। लेकिन वह साधारण सितारा नहीं था। उसके गिरते ही जंगल के बीचों-बीच हजारों सुनहरी रोशनियाँ जगमगा उठीं और हवा में किसी के धीरे-धीरे हँसने की आवाज़ सुनाई दी।

     

    “ही… ही… ही… क्या कोई हमें ढूँढ़ पाएगा?”

     

    अगली सुबह दस साल की मीरा ने अपने खिड़की के पास एक चमकीला सुनहरा पंख पड़ा देखा। पंख को हाथ में लेते ही वह गर्म हो गया और उसमें से एक बहुत धीमी आवाज़ आई—

     

    “मीरा… हमें तुम्हारी मदद चाहिए।”

     

    मीरा की आँखें आश्चर्य से बड़ी हो गईं।

     

    “क… कौन हो तुम?”

     

    पंख से आवाज़ आई, “हम जादुई परियाँ हैं… और हमारा जादुई राज्य खतरे में है!”

     

    मीरा डरने के बजाय उत्साहित हो गई। उसने पंख को अपनी छोटी-सी लाल थैली में रखा और बिना किसी को बताए जंगल की ओर चल पड़ी।

     

    गाँव के बाहर एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था। दादी हमेशा कहती थीं कि उसके आगे वाला जंगल रहस्यमयी है और वहाँ कभी अकेले नहीं जाना चाहिए। लेकिन आज मीरा के मन में डर से ज्यादा उस आवाज़ को जानने की इच्छा थी।

     

    जैसे ही वह बरगद के पेड़ के पास पहुँची, पेड़ के तने पर एक चमकता हुआ दरवाज़ा दिखाई दिया। दरवाज़े पर लिखा था—

     

    “जिसके मन में सच्चाई और दया हो, वही अंदर आ सकता है।”

     

    मीरा ने दरवाज़े को छुआ।

     

    अचानक तेज रोशनी हुई और वह एक अनोखी दुनिया में पहुँच गई।

     

    वहाँ आसमान गुलाबी था, बादल रुई जैसे सफेद थे और पेड़ों पर फूलों की जगह छोटे-छोटे सितारे खिले हुए थे। नदियों का पानी चाँदी की तरह चमक रहा था। रंग-बिरंगी तितलियाँ हवा में उड़ रही थीं और छोटे-छोटे खरगोश अपने कानों से जादुई घंटियाँ बजा रहे थे।

     

    तभी सामने से चार सुंदर परियाँ उड़ती हुई आईं।

     

    सबसे आगे नीले पंखों वाली परी थी। उसने मुस्कुराकर कहा, “स्वागत है, मीरा। मैं नीलपरी हूँ।”

     

    उसके साथ गुलाबी पंखों वाली परी बोली, “मैं फूलपरी हूँ।”

     

    पीले पंखों वाली परी ने कहा, “मेरा नाम सूरजपरी है।”

     

    और सबसे छोटी हरे पंखों वाली परी बोली, “मैं वनपरी हूँ।”

     

    मीरा ने पूछा, “आप लोगों को मेरी मदद क्यों चाहिए?”

     

    नीलपरी का चेहरा अचानक उदास हो गया।

     

    “हमारे जादुई राज्य का ‘सतरंगी रत्न’ चोरी हो गया है। उसके बिना हमारे जंगल के फूल मुरझा रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं और हमारी जादुई रोशनी धीरे-धीरे खत्म हो रही है।”

     

    “रत्न किसने चुराया?” मीरा ने पूछा।

     

    वनपरी ने धीरे से कहा, “काली गुफा में रहने वाला छायादानव।”

     

    मीरा थोड़ी घबराई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं छोड़ी।

     

    “अगर मैं आपकी मदद कर सकती हूँ, तो मैं जरूर करूँगी।”

     

    चारों परियाँ खुशी से उसके चारों ओर उड़ने लगीं।

     

    उन्होंने मीरा को एक जादुई नक्शा दिया। नक्शे पर तीन जगह चमक रही थीं—फुसफुसाती नदी, उल्टा पहाड़ और चाँदनी गुफा।

     

    “इन तीन स्थानों को पार करके ही छायादानव की गुफा तक पहुँचा जा सकता है,” नीलपरी ने बताया।

     

    सबसे पहले वे फुसफुसाती नदी के पास पहुँचे। नदी का पानी लगातार बातें कर रहा था।

     

    “जो सच बोलेगा, वही आगे जाएगा… जो झूठ बोलेगा, वह यहीं रह जाएगा…”

     

    नदी ने मीरा से पूछा, “तुम यहाँ क्यों आई हो?”

     

    मीरा ने कहा, “मैं अपने लिए कोई जादू लेने नहीं आई। मैं इन परियों की मदद करने आई हूँ।”

     

    नदी चमक उठी और उसके बीच एक पुल बन गया।

     

    इसके बाद वे उल्टे पहाड़ के पास पहुँचे। वहाँ पेड़ नीचे और जड़ें ऊपर थीं। पहाड़ का रास्ता बहुत कठिन था। मीरा कई बार फिसली, लेकिन सूरजपरी और वनपरी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    आखिर वे चाँदनी गुफा तक पहुँच गए।

     

    गुफा के अंदर इतनी अंधेरी थी कि कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। तभी मीरा ने अपनी थैली से सुनहरा पंख निकाला। पंख चमका और पूरा रास्ता रोशन हो गया।

     

    अचानक एक भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “कौन है जो मेरी गुफा में आने की हिम्मत कर रहा है?”

     

    सामने एक विशाल काला साया दिखाई दिया।

     

    वह छायादानव था।

     

    उसके हाथ में सतरंगी रत्न चमक रहा था।

     

    परियाँ डरकर पीछे हट गईं, लेकिन मीरा आगे बढ़ी।

     

    “वह रत्न वापस कर दो।”

     

    दानव जोर से हँसा।

     

    “तुम मुझे आदेश दोगी? मैं इस रत्न की शक्ति से पूरे जादुई राज्य को अपना गुलाम बना सकता हूँ!”

     

    मीरा ने ध्यान से उसे देखा। उसकी आँखों में गुस्सा था, लेकिन कहीं न कहीं बहुत गहरी उदासी भी थी।

     

    मीरा ने पूछा, “तुमने यह रत्न चुराया क्यों?”

     

    दानव कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने धीमी आवाज़ में कहा, “क्योंकि… मुझे कोई अपना नहीं मानता।”

     

    सभी परियाँ चौंक गईं।

     

    दानव ने कहा, “मैं भी कभी इस जादुई राज्य का रक्षक था। लेकिन एक दिन मेरी जादुई शक्ति खत्म हो गई। सभी परियों ने मुझे कमजोर समझकर दूर कर दिया। तब से मैं इस अंधेरी गुफा में अकेला रहता हूँ।”

     

    मीरा को उस पर दया आ गई।

     

    उसने कहा, “गलती करने पर किसी को हमेशा के लिए अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। अगर तुम रत्न वापस कर दो, तो क्या तुम हमारे साथ वापस चलोगे?”

     

    छायादानव ने पहली बार किसी को अपने लिए इतना प्यार से बोलते सुना था।

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    उसने सतरंगी रत्न मीरा के हाथ में रख दिया।

     

    “क्या… क्या परियाँ मुझे स्वीकार करेंगी?”

     

    नीलपरी आगे आई और मुस्कुराई।

     

    “अगर तुम सच में बदलना चाहते हो, तो तुम्हारे लिए हमारे राज्य में हमेशा जगह है।”

     

    छायादानव ने सिर झुका दिया।

     

    “मैं वादा करता हूँ।”

     

    जैसे ही सतरंगी रत्न अपने स्थान पर वापस रखा गया, पूरे जादुई राज्य में अद्भुत परिवर्तन होने लगा।

     

    सूखे फूल फिर से खिल उठे। नदियाँ चाँदी की तरह चमकने लगीं। आसमान में सात रंगों का विशाल इंद्रधनुष बन गया। हजारों छोटी परियाँ आसमान में उड़ने लगीं और चारों ओर घंटियों जैसी मधुर आवाज़ गूँजने लगी।

     

    परियों की रानी भी वहाँ आईं। उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ रखकर कहा—

     

    “तुमने केवल हमारा राज्य नहीं बचाया, बल्कि एक अकेले हृदय में भी रोशनी जलाई है। यही सच्चा जादू है।”

     

    रानी ने मीरा को एक छोटी-सी चमकती हुई डिबिया दी।

     

    “जब भी किसी जरूरतमंद की सच्चे मन से मदद करोगी, यह डिबिया एक सुनहरी रोशनी से भर जाएगी।”

     

    मीरा ने डिबिया अपने पास रख ली।

     

    अब उसे अपने घर लौटना था।

     

    नीलपरी ने उसे वही सुनहरा पंख दिया और कहा, “जब भी तुम्हें हमारी याद आए, इसे चाँदनी में रखना।”

     

    मीरा मुस्कुराई और अपने गाँव लौट आई।

     

    सुबह जब उसकी आँख खुली तो वह अपने बिस्तर पर थी। उसे लगा शायद यह सब सपना था।

     

    लेकिन उसकी मुट्ठी में सुनहरा पंख अब भी मौजूद था।

     

    मीरा खिड़की के पास गई। दूर जंगल के ऊपर एक छोटा-सा इंद्रधनुष चमक रहा था।

     

    तभी हवा में एक परिचित आवाज़ आई—

     

    “सच्चे दिल से किया गया अच्छा काम कभी जादू से कम नहीं होता।”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    उस दिन से उसने हर जरूरतमंद की मदद करना शुरू कर दिया। और हर बार उसकी छोटी-सी जादुई डिबिया थोड़ी और चमकने लगती।

     

    कहते हैं, आज भी उस गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के पास रात में कभी-कभी सुनहरी रोशनी दिखाई देती है।

     

    शायद वे परियाँ आज भी वहाँ रहती हैं।

     

    और शायद वे ऐसे ही किसी बच्चे का इंतज़ार कर रही हैं, जिसके दिल में सच्चाई, दया और दूसरों की मदद करने का साहस हो।

     

    क्योंकि असली जादू परियों के पंखों में नहीं…

     

    हमारे अच्छे दिल में छिपा होता है।