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टैग: #वोअजनबीमेरा_हमसफ़र #RomanticStory #HindiKahani #IshqAurRaaz

  • वो अजनबी मेरा हमसफ़र

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

     

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे। आसमान में बादल इस तरह गरज रहे थे, जैसे किसी पुराने राज़ को उजागर करने की जिद पर हों। सुनसान पहाड़ी रास्ते पर आर्या की कार तेज़ी से आगे बढ़ रही थी। बारिश इतनी तेज़ थी कि कुछ मीटर आगे का रास्ता भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आर्या ने घबराकर फोन देखा।

     

    कोई नेटवर्क नहीं।

     

    उसने गहरी साँस ली और कार की रफ्तार थोड़ी कम कर दी।

     

    तभी अचानक…

     

    धड़ाम!

     

    कार का पिछला पहिया फट गया।

     

    आर्या ने किसी तरह कार संभाली और सड़क के किनारे रोक दी। उसने बाहर देखा। चारों तरफ घना जंगल था। दूर-दूर तक कोई घर, कोई रोशनी, कोई इंसान नहीं।

     

    उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई।

     

    वह कार से बाहर निकलने ही वाली थी कि उसे पीछे से किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई दी।

     

    छप… छप… छप…

     

    बारिश में कोई उसकी तरफ बढ़ रहा था।

     

    आर्या का गला सूख गया।

     

    “क… कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    कुछ ही सेकंड बाद एक लंबा, भीगा हुआ आदमी उसकी कार के सामने आकर खड़ा हो गया। काले रंग की शर्ट, चेहरे पर बारिश की बूंदें और आँखों में एक अजीब-सी गंभीरता।

     

    उसने कार की तरफ देखा और शांत आवाज़ में कहा—

     

    “आप यहाँ अकेली नहीं रह सकतीं।”

     

    आर्या ने तुरंत दरवाज़ा लॉक कर लिया।

     

    “आप… कौन हैं?”

     

    अजनबी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “अभी के लिए इतना समझ लीजिए कि मैं आपकी मदद करने आया हूँ।”

     

    “मुझे आपकी मदद नहीं चाहिए।”

     

    वह हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “अगर मदद नहीं चाहिए होती, तो आप इतनी देर से मुझे देखकर काँप नहीं रही होतीं।”

     

    आर्या चुप हो गई।

     

    उस आदमी ने कार का पिछला टायर देखा और कहा—

     

    “टायर बदलने में वक्त लगेगा। और ये जगह सुरक्षित नहीं है।”

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    उसने सड़क के दूसरी तरफ अंधेरे जंगल की ओर देखा।

     

    “क्योंकि मैं इस रास्ते को आपसे बेहतर जानता हूँ।”

     

    उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जिसने आर्या को बेचैन कर दिया।

     

    “आपका नाम?”

     

    कुछ पल की खामोशी के बाद उसने कहा—

     

    “कबीर।”

     

    “और मैं आप पर भरोसा क्यों करूँ?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आपको भरोसा करने की जरूरत नहीं है। बस मेरे साथ चलिए।”

     

    आर्या ने मना करने के लिए मुँह खोला ही था कि अचानक जंगल की तरफ से किसी गाड़ी की हेडलाइट दिखाई दी।

     

    कबीर का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “अब आपके पास मेरे साथ चलने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो लोग आपको ढूँढ रहे हैं।”

     

    आर्या के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “कौन लोग?”

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ा और उसे कार से बाहर खींच लिया।

     

    “चलो!”

     

    “मेरा हाथ छोड़िए!”

     

    “अगर जिंदा रहना है तो अभी सवाल मत कीजिए।”

     

    दोनों बारिश में जंगल के अंदर भागने लगे।

     

    आर्या का पैर फिसला और वह गिरते-गिरते बची। कबीर ने तुरंत उसकी कमर थाम ली।

     

    एक पल के लिए दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब थे।

     

    बारिश की ठंडी बूंदों के बीच आर्या ने पहली बार उसकी आँखों को इतनी करीब से देखा।

     

    उन आँखों में अजीब-सी बेचैनी थी।

     

    जैसे वह उसे बहुत पहले से जानता हो।

     

    कबीर ने धीरे से कहा—

     

    “ठीक हो?”

     

    आर्या ने उसकी बाँह से खुद को अलग किया।

     

    “हाँ।”

     

    “तो चलो।”

     

    कुछ दूर चलने के बाद दोनों एक पुरानी हवेली के सामने पहुँचे।

     

    हवेली बाहर से डरावनी थी, लेकिन अंदर पहुँचते ही आर्या को हैरानी हुई। कमरों में बिजली थी, आग जल रही थी और सब कुछ व्यवस्थित था।

     

    कबीर ने उसे एक तौलिया दिया।

     

    “कपड़े सुखा लीजिए। आपको सर्दी लग जाएगी।”

     

    आर्या ने तौलिया लेते हुए पूछा—

     

    “ये घर आपका है?”

     

    कबीर ने कुछ नहीं कहा।

     

    “कबीर?”

     

    “हाँ।”

     

    “और आप यहाँ अकेले रहते हैं?”

     

    उसने उसकी तरफ देखा।

     

    “पहले अकेला रहता था।”

     

    “पहले?”

     

    कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आर्या ने ध्यान दिया कि दीवार पर कई पुरानी तस्वीरें लगी थीं।

     

    एक तस्वीर के सामने जाकर वह रुक गई।

     

    तस्वीर में एक जवान लड़की थी।

     

    चेहरा देखकर आर्या के कदम जैसे जमीन में जम गए।

     

    वह लड़की…

     

    बिल्कुल उसी जैसी दिख रही थी।

     

    “ये कौन है?”

     

    कबीर चुप रहा।

     

    आर्या ने उसकी ओर देखा।

     

    “कबीर, ये लड़की कौन है?”

     

    वह धीरे-धीरे तस्वीर के पास आया।

     

    “मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा।”

     

    “और अब?”

     

    “अब… सिर्फ एक याद।”

     

    आर्या ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    “इसका नाम?”

     

    कबीर ने धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “आर्या।”

     

    उसके हाथ से तौलिया गिर गया।

     

    “क्या?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “उसका नाम भी आर्या था।”

     

    आर्या के भीतर जैसे तूफान उठ गया।

     

    “ये मजाक है?”

     

    “काश होता।”

     

    कुछ देर तक दोनों के बीच खामोशी रही।

     

    फिर अचानक बाहर गोली चलने की आवाज़ आई।

     

    धाँय!

     

    आर्या चीख पड़ी।

     

    कबीर ने तुरंत लाइट बंद कर दी।

     

    “नीचे झुको।”

     

    कुछ सेकंड बाद हवेली के मुख्य दरवाज़े पर जोरदार चोट हुई।

     

    कबीर ने आर्या का हाथ पकड़ा और उसे एक गुप्त कमरे में ले गया।

     

    “यहाँ रहो। जब तक मैं वापस न आऊँ, बाहर मत आना।”

     

    “आप कहाँ जा रहे हैं?”

     

    “उन लोगों को रोकने।”

     

    “लेकिन आप अकेले—”

     

    “मुझ पर भरोसा करो।”

     

    कबीर चला गया।

     

    करीब दस मिनट तक बाहर संघर्ष की आवाज़ें आती रहीं।

     

    फिर अचानक सब शांत हो गया।

     

    आर्या डरते-डरते बाहर आई।

     

    कबीर सीढ़ियों के पास खड़ा था। उसके माथे पर हल्की चोट थी।

     

    आर्या दौड़कर उसके पास पहुँची।

     

    “आप ठीक हैं?”

     

    कबीर ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम्हें मेरी चिंता हो रही है?”

     

    आर्या कुछ पल उसे देखती रही।

     

    “हाँ… शायद।”

     

    कबीर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “यही तो डर है।”

     

    “किस बात का?”

     

    “कि इतिहास खुद को दोहरा न दे।”

     

    आर्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे सच बताइए।”

     

    कबीर ने लंबी साँस ली।

     

    “तीन साल पहले मेरी जिंदगी में एक लड़की थी। उसका नाम आर्या था। हम एक-दूसरे से प्यार करते थे। लेकिन एक रात उसे उन लोगों ने मारने की कोशिश की, जिनसे मैं आज भी लड़ रहा हूँ।”

     

    “और वो?”

     

    “वो मर गई।”

     

    आर्या की आँखें भर आईं।

     

    “आपने उसकी मौत देखी?”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “फिर मैं…?”

     

    कबीर ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम उसके जैसी दिखती हो। बहुत ज्यादा।”

     

    आर्या के दिल में एक अजीब-सी हलचल हुई।

     

    “और अगर मैं वो नहीं हूँ?”

     

    कबीर ने धीरे से कहा—

     

    “तो शायद तुम मेरी जिंदगी में आई दूसरी आर्या हो।”

     

    उस रात दोनों हवेली की बालकनी में बैठे रहे। बारिश धीरे-धीरे थम चुकी थी। बादलों के पीछे से चाँद निकल आया था।

     

    आर्या ने पूछा—

     

    “कबीर, अगर मैं कल यहाँ से चली गई तो?”

     

    “तो मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं।”

     

    “और अगर मैं रुकना चाहूँ?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो मैं तुम्हें फिर कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।”

     

    आर्या मुस्कुरा दी।

     

    “आप जानते हैं? जब मैं पहली बार आपसे मिली थी, मुझे लगा था आप बहुत अजीब हैं।”

     

    “और अब?”

     

    “अब लगता है… आप खतरनाक हैं।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “बस?”

     

    आर्या ने धीरे से कहा—

     

    “और थोड़े अच्छे भी।”

     

    दोनों की आँखें मिलीं।

     

    उस पल में जैसे पूरी दुनिया थम गई।

     

    लेकिन तभी आर्या की नजर कबीर के कमरे में रखी एक पुरानी डायरी पर पड़ी।

     

    उसने डायरी उठाई।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर कभी आर्या वापस आए, तो उसे सच जरूर बताना।”

     

    आर्या के हाथ काँपने लगे।

     

    “कबीर… ये क्या है?”

     

    कबीर ने डायरी देखी और उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “इसे मत पढ़ो।”

     

    “क्यों?”

     

    आर्या ने अगला पन्ना खोला।

     

    वहाँ उसकी तस्वीर थी।

     

    लेकिन तस्वीर आज से तीन साल पुरानी थी।

     

    आर्या की साँस रुक गई।

     

    “ये… मैं हूँ।”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन ये कैसे संभव है?”

     

    कबीर कुछ कहता, उससे पहले हवेली के बाहर कार रुकने की आवाज़ आई।

     

    इस बार कबीर नहीं घबराया।

     

    उसने सिर्फ इतना कहा—

     

    “वे लोग आ गए हैं।”

     

    “कौन?”

     

    “तुम्हारे अतीत का सच।”

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    एक बुजुर्ग आदमी अंदर आया। उसे देखते ही कबीर पीछे हट गया।

     

    बुजुर्ग ने आर्या को देखा और उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “मेरी बेटी… तुम जिंदा हो।”

     

    आर्या स्तब्ध रह गई।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    बुजुर्ग ने काँपती आवाज़ में कहा—

     

    “तुम्हारा पिता।”

     

    आर्या ने कबीर की ओर देखा।

     

    “ये क्या हो रहा है?”

     

    कबीर की आँखों में दर्द था।

     

    “तीन साल पहले जो लड़की मरी थी… वो तुम नहीं थी।”

     

    “फिर कौन थी?”

     

    “तुम्हारी हमशक्ल बहन।”

     

    आर्या के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “मेरी… बहन?”

     

    बुजुर्ग ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम्हें बचाने के लिए हमने तुम्हारी मौत की झूठी खबर फैलाई थी। लेकिन तुम्हारी याददाश्त चली गई थी। तुम्हें दूर भेज दिया गया।”

     

    आर्या की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उसने कबीर की ओर देखा।

     

    “और तुम?”

     

    कबीर धीरे-धीरे उसके पास आया।

     

    “मैंने तुम्हें पहली नजर में पहचान लिया था।”

     

    “फिर तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि सच तुम्हें फिर खतरे में डाल देगा।”

     

    आर्या ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “और अगर मुझे कुछ हो जाता?”

     

    कबीर ने उसका हाथ थाम लिया।

     

    “तो इस बार मैं खुद को कभी माफ नहीं करता।”

     

    आर्या कुछ पल चुप रही।

     

    फिर उसने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी।”

     

    कबीर की आँखों में पहली बार सुकून दिखाई दिया।

     

    “पक्का?”

     

    आर्या मुस्कुराई।

     

    “हाँ। क्योंकि अजनबी तो तुम उस रात थे…”

     

    वह उसके करीब आई।

     

    “लेकिन अब तुम मेरे हमसफ़र हो।”

     

    बाहर फिर बारिश शुरू हो गई।

     

    मगर इस बार उस बारिश में डर नहीं था।

     

    सिर्फ मोहब्बत थी।

     

    और दो ऐसे दिल थे, जिन्होंने अतीत के अंधेरे को पीछे छोड़कर एक नई कहानी लिखने का फैसला किया था।

     

    कभी-कभी जिंदगी हमें जिस अजनबी से मिलाती है, वही इंसान हमारी पूरी दुनिया बन जाता है।

     

    और आर्या की कहानी में…

     

    वो अजनबी उसका हमसफ़र बन चुका था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।