उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में मिट्टी की दीवारों वाला एक छोटा-सा घर था। घर इतना गरीब था कि बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता था और गर्मियों में मिट्टी की दीवारें भी तपने लगती थीं। उस घर में बारह साल की राधा और उसका छोटा भाई मोहन रहते थे।
माँ को गुजरे पाँच साल हो चुके थे और पिता भी बीमारी के कारण दुनिया छोड़ चुके थे। अब दोनों भाई-बहन ही एक-दूसरे का सहारा थे।
मोहन उम्र में राधा से दो साल छोटा था, लेकिन अपनी बहन का ख्याल बिल्कुल एक बड़े भाई की तरह रखता था।
राधा गाँव के घरों में काम करके किसी तरह दोनों के लिए खाना जुटाती थी। कभी उसे दो रोटियाँ मिलतीं, कभी आधी रोटी से ही गुजारा करना पड़ता।
मोहन गाँव के पास एक चाय की दुकान पर काम करता था। सुबह से शाम तक गिलास धोता, चाय पहुँचाता और बदले में उसे थोड़े-से पैसे मिलते।
उनकी गरीबी बहुत थी, लेकिन दोनों के बीच प्यार उससे भी बड़ा था।
रक्षाबंधन आने वाला था।
गाँव की सभी लड़कियाँ बाजार से रंग-बिरंगी राखियाँ खरीद रही थीं। किसी की राखी पर मोती लगे थे, किसी पर चमकदार फूल।
राधा भी बाजार के सामने से गुजरी।
उसकी नजर एक सुंदर-सी लाल राखी पर जाकर रुक गई।
दुकानदार ने कहा, “ले लो बिटिया, बहुत सुंदर है। सिर्फ बीस रुपये की है।”
राधा ने अपनी मुट्ठी में दबे सिक्के देखे।
उसके पास सिर्फ सात रुपये थे।
वह मुस्कुराई और बोली, “अगली बार ले लूँगी।”
दुकानदार ने उसे जाते हुए देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा।
राधा घर लौट आई।
मोहन ने पूछा, “दीदी, बाजार गई थीं?”
“हाँ।”
“मेरे लिए राखी लाई?”
राधा ने मुस्कुराकर कहा, “तुम्हें कैसी राखी चाहिए?”
मोहन हँसते हुए बोला, “ऐसी राखी जिसमें सबसे ज्यादा प्यार हो।”
राधा ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“फिर तो मैं तुम्हारे लिए दुनिया की सबसे अच्छी राखी बनाऊँगी।”
रात को मोहन सो गया।
राधा ने घर के कोने में रखे पुराने कपड़ों को देखा। उसने अपनी माँ की पुरानी लाल साड़ी का एक छोटा टुकड़ा निकाला।
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
उसे माँ की याद आ गई।
माँ हर रक्षाबंधन पर मोहन की कलाई में राखी बाँधते हुए कहती थीं—
“मेरे बेटे, अपनी बहन का हमेशा ख्याल रखना।”
राधा ने साड़ी के उस टुकड़े को धीरे-धीरे काटा और उससे राखी बनाने लगी।
उसने एक पुराने धागे में लाल कपड़ा बाँधा और बीच में अपनी टूटी हुई चूड़ी का छोटा-सा टुकड़ा लगा दिया।
राखी सुंदर नहीं थी।
लेकिन उसमें माँ की याद, बहन का प्यार और पूरे घर की भावनाएँ बंधी थीं।
रक्षाबंधन की सुबह राधा ने मोहन को नहलाया।
घर में मिठाई नहीं थी।
उसने चूल्हे पर थोड़ा-सा गुड़ गर्म किया और आटे की छोटी-सी मीठी रोटी बना दी।
मोहन ने पूछा, “दीदी, आज इतना अच्छा खाना?”
राधा मुस्कुराई।
“आज रक्षाबंधन है ना।”
मोहन चुप हो गया।
उसने अपनी जेब से पाँच रुपये निकाले।
“ये लो।”
राधा ने पूछा, “कहाँ से आए?”
मोहन बोला, “कल दुकान मालिक ने दिए थे।”
“लेकिन तुमने अपने लिए कुछ नहीं खरीदा?”
“नहीं।”
“क्यों?”
मोहन ने हँसकर कहा—
“मुझे क्या चाहिए? मेरी दीदी मेरे पास है, वही काफी है।”
राधा की आँखों से आँसू निकल पड़े।
उसने मोहन को अपने सामने बैठाया।
उसकी कलाई पर वही लाल राखी बाँधी जो उसने माँ की साड़ी से बनाई थी।
राखी बाँधते हुए राधा बोली—
“भगवान से मेरी बस एक ही प्रार्थना है कि अगले जन्म में भी तू ही मेरा भाई बने।”
मोहन ने तुरंत कहा—
“और मैं हर जन्म में तेरा भाई बनूँगा।”
दोनों गले लगकर रोने लगे।
लेकिन उस दिन मोहन ने राधा से एक बात छिपाई थी।
वह पिछले कई दिनों से बहुत बीमार था।
चाय की दुकान पर काम करते समय उसे कई बार चक्कर आते थे। दुकान मालिक ने उसे आराम करने को कहा, लेकिन मोहन जानता था कि अगर वह काम नहीं करेगा तो घर में चूल्हा नहीं जलेगा।
रक्षाबंधन के दो दिन बाद मोहन अचानक दुकान पर बेहोश होकर गिर पड़ा।
दुकानदार उसे अस्पताल ले गया।
डॉक्टर ने बताया कि मोहन को गंभीर बीमारी है और इलाज के लिए बहुत पैसे चाहिए।
यह सुनकर राधा के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसने गाँव के लोगों से मदद माँगी।
किसी ने पाँच रुपये दिए, किसी ने दस।
लेकिन इलाज के लिए पैसे बहुत कम थे।
राधा ने अपनी माँ की बची हुई आखिरी निशानी—एक छोटी-सी चाँदी की पायल—बेच दी।
फिर भी पैसे पूरे नहीं हुए।
एक रात मोहन ने कमजोर आवाज में कहा—
“दीदी…”
“हाँ भाई?”
“अगर मैं ठीक न हो पाया तो रोना मत।”
राधा चिल्लाई—
“ऐसा मत बोल!”
मोहन मुस्कुराया।
“तूने मुझे हमेशा कहा है ना कि भगवान पर भरोसा रखना चाहिए।”
राधा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तू ठीक होगा। मैं भगवान से लड़कर भी तुझे वापस लाऊँगी।”
अगले दिन गाँव के स्कूल के शिक्षक को यह बात पता चली। उन्होंने गाँव वालों को इकट्ठा किया।
सभी ने मिलकर मोहन के इलाज के लिए पैसे जमा किए।
आखिरकार मोहन का इलाज शुरू हुआ।
कई दिनों बाद उसकी हालत सुधरने लगी।
राधा अस्पताल के बाहर बैठकर भगवान का धन्यवाद कर रही थी।
उसने अपनी कलाई देखी।
उसे याद आया कि मोहन ने रक्षाबंधन पर उससे कहा था—
“हर जन्म में तेरा भाई बनूँगा।”
राधा मुस्कुराई।
उसने आसमान की ओर देखकर कहा—
“भगवान, मेरा भाई मुझे दे दिया… अब मैं कुछ नहीं माँगती।”
कुछ महीनों बाद मोहन पूरी तरह ठीक हो गया।
वह फिर से चाय की दुकान पर जाने लगा।
लेकिन इस बार गाँव के शिक्षक ने उसकी पढ़ाई की जिम्मेदारी भी ले ली।
राधा को भी सिलाई का काम मिल गया।
धीरे-धीरे दोनों की जिंदगी बदलने लगी।
कई साल बीत गए।
मोहन बड़ा होकर शहर में नौकरी करने लगा।
पहली तनख्वाह मिलते ही वह गाँव आया।
उसके हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा था।
राधा ने पूछा, “इसमें क्या है?”
मोहन ने डिब्बा खोला।
उसमें एक सुंदर चाँदी की राखी थी।
मोहन ने वह राखी राधा के हाथ में रख दी।
“दीदी, उस साल तूने माँ की पुरानी साड़ी से मुझे राखी बाँधी थी। आज मैं चाहता हूँ कि तू मेरी तरफ से यह राखी रख ले।”
राधा की आँखें भर आईं।
मोहन ने कहा—
“उस दिन तूने मेरी कलाई पर सिर्फ राखी नहीं बाँधी थी। तूने मुझे जीने की वजह दी थी।”
राधा ने उसे गले लगा लिया।
दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।
लेकिन इस बार वे आँसू दुख के नहीं थे।
वे उस प्यार के आँसू थे जिसने गरीबी को हरा दिया था।
(सीख)
भाई-बहन का रिश्ता धन-दौलत से नहीं, बल्कि प्यार, त्याग और विश्वास से मजबूत होता है। महंगी राखी या बड़े उपहार रिश्ते की कीमत तय नहीं करते। सच्चा प्यार वह है जो मुश्किल समय में बिना किसी स्वार्थ के एक-दूसरे का हाथ थामे रखे।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।