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टैग: #रक्षाबंधन स्टोरी#रक्षाबंधन पर लौट आया भाई#love in brother and sister

  • रक्षाबंधन पर लौट आया भाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    गाँव के एक छोटे-से घर में कमला अपनी बेटी आरती के साथ रहती थी। घर की हालत बहुत खराब थी। मिट्टी की दीवारों में जगह-जगह दरारें थीं और बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता था।

     

    कमला के पति की मृत्यु कई साल पहले हो चुकी थी। उनकी दो संतानें थीं—बड़ी बेटी आरती और छोटा बेटा रवि।

     

    पिता के जाने के बाद रवि ने बहुत छोटी उम्र में ही घर छोड़ दिया था।

     

    उसने जाते समय अपनी बहन से कहा था—

     

    “आरती, मैं शहर जा रहा हूँ। खूब मेहनत करूँगा और एक दिन इतना पैसा कमाऊँगा कि तुझे कभी किसी चीज की कमी नहीं होगी।”

     

    आरती उस समय सिर्फ दस साल की थी।

     

    उसने रोते हुए पूछा—

     

    “भैया, कब वापस आओगे?”

     

    रवि ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “अगले रक्षाबंधन पर।”

     

    लेकिन वह रक्षाबंधन कभी नहीं आया।

     

    एक साल बीता।

     

    फिर दूसरा।

     

    फिर तीसरा।

     

    हर रक्षाबंधन आरती एक राखी खरीदती और दरवाजे पर बैठकर भाई का इंतजार करती।

     

    माँ कहती—

     

    “बेटी, शायद इस बार नहीं आ पाएगा।”

     

    आरती कहती—

     

    “माँ, भैया ने वादा किया है।”

     

    धीरे-धीरे गाँव वालों ने कहना शुरू कर दिया—

     

    “रवि शहर जाकर बदल गया।”

     

    “शायद उसे अपना गाँव याद ही नहीं।”

     

    लेकिन आरती को विश्वास था कि उसका भाई उसे भूला नहीं होगा।

     

    एक रक्षाबंधन पर उसने पूरे दिन इंतजार किया।

     

    शाम हो गई।

     

    कोई नहीं आया।

     

    उसने राखी को अपनी मुट्ठी में दबाया और रोते हुए बोली—

     

    “भैया, आपने अपना वादा क्यों तोड़ दिया?”

     

    माँ ने उसे सीने से लगा लिया।

     

    अगले साल भी यही हुआ।

     

    रवि नहीं आया।

     

    फिर कई साल गुजर गए।

     

    आरती बड़ी हो गई।

     

    उसकी शादी हो गई।

     

    वह माँ के साथ उसी गाँव में रहने लगी।

     

    लेकिन हर रक्षाबंधन पर वह अपने भाई के लिए राखी जरूर रखती।

     

    एक दिन डाकिया एक पत्र लेकर आया।

     

    पत्र पर लिखा था—

     

    “आरती के नाम।”

     

    आरती के हाथ काँपने लगे।

     

    उसने पत्र खोला।

     

    अंदर लिखा था—

     

    “मेरी प्यारी बहन,

     

    मुझे नहीं पता कि तू मुझे याद करती है या नहीं। लेकिन मैं हर दिन तुझे याद करता हूँ।

     

    जिस दिन मैं गाँव से निकला था, उसी दिन मैंने तय किया था कि मैं वापस तभी लौटूँगा जब तेरे लिए कुछ बन पाऊँगा।

     

    शहर में मुझे एक होटल में काम मिला। बहुत कम पैसे मिलते थे। फिर एक दिन होटल बंद हो गया।

     

    मैं सड़क पर आ गया।

     

    कुछ लोगों ने मदद की। मुझे एक गोदाम में काम मिल गया।

     

    वहाँ से जिंदगी धीरे-धीरे सुधरने लगी।

     

    लेकिन एक दिन दुर्घटना में मेरा पैर बुरी तरह घायल हो गया।

     

    डॉक्टरों ने कहा कि मैं पहले की तरह काम नहीं कर पाऊँगा।

     

    मैं बहुत टूट गया।

     

    मैंने सोचा कि अगर मैं खाली हाथ घर लौटूँगा तो तू मुझे क्या समझेगी?

     

    इसी शर्म ने मुझे तुमसे दूर रखा।

     

    लेकिन एक बात सच है।

     

    हर रक्षाबंधन मैं अपनी कलाई पर तेरी राखी महसूस करता रहा।

     

    मुझे माफ कर देना।

     

    तुम्हारा भाई—रवि।”

     

    पत्र पढ़ते-पढ़ते आरती की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    माँ ने पूछा—

     

    “क्या लिखा है?”

     

    आरती ने पत्र माँ को दे दिया।

     

    माँ ने पढ़ते ही आँखें बंद कर लीं।

     

    “मेरा बेटा जिंदा है।”

     

    कुछ दिनों बाद रवि का दूसरा पत्र आया।

     

    इस बार उसमें शहर का पता था।

     

    आरती तुरंत अपनी माँ के साथ शहर चली गई।

     

    वे एक छोटी-सी बस्ती में पहुँचीं।

     

    वहाँ एक कमरे के बाहर एक आदमी लकड़ी के सहारे बैठा था।

     

    उसका एक पैर कमजोर था।

     

    बाल बिखरे हुए थे।

     

    चेहरा बहुत दुबला था।

     

    आरती उसे देखकर कुछ पल रुक गई।

     

    फिर धीरे से बोली—

     

    “भैया…”

     

    रवि ने सिर उठाया।

     

    उसकी आँखों में आँसू भर आए।

     

    “आरती…”

     

    आरती दौड़कर उसके गले लग गई।

     

    रवि रोते हुए बोला—

     

    “मुझे माफ कर दे।”

     

    आरती ने कहा—

     

    “किस बात की माफी?”

     

    “मैं इतने साल तुझे राखी बाँधने नहीं आया।”

     

    आरती ने उसका चेहरा दोनों हाथों से पकड़ लिया।

     

    “मैंने हर साल तुम्हारी कलाई के लिए राखी खरीदी है।”

     

    रवि रो पड़ा।

     

    “तूने मुझे भुलाया नहीं?”

     

    आरती बोली—

     

    “भाई को कोई बहन भूल सकती है क्या?”

     

    रवि ने सिर झुका लिया।

     

    “मैं गरीब हो गया था।”

     

    आरती ने कहा—

     

    “तो क्या हुआ?”

     

    “मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं था।”

     

    आरती ने उसके आँसू पोंछे।

     

    “मुझे तुमसे कभी कुछ चाहिए ही नहीं था। मुझे सिर्फ मेरा भाई चाहिए था।”

     

    रवि ने अपनी बहन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “लेकिन मैंने तुझे बहुत इंतजार करवाया।”

     

    आरती मुस्कुराई।

     

    “वो इंतजार भी मेरे लिए प्यार था।”

     

    अगले दिन रक्षाबंधन था।

     

    आरती ने अपने बैग से एक राखी निकाली।

     

    वह बहुत साधारण थी।

     

    रवि ने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    आरती ने राखी बाँधते हुए कहा—

     

    “इस बार सात साल की राखी एक साथ बाँध रही हूँ।”

     

    रवि की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    उसने बहन के हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा रखा।

     

    आरती ने खोला।

     

    अंदर एक पुरानी, टूटी हुई चूड़ी थी।

     

    “ये क्या है?”

     

    रवि बोला—

     

    “तूने बचपन में मुझे अपनी चूड़ी का एक टुकड़ा दिया था और कहा था कि इसे संभालकर रखना। मैंने इसे आज तक रखा है।”

     

    आरती उस चूड़ी के टुकड़े को सीने से लगाकर रोने लगी।

     

    रवि बोला—

     

    “मैं तुझे महंगा तोहफा नहीं दे सकता।”

     

    आरती ने कहा—

     

    “ये मेरे लिए दुनिया का सबसे कीमती तोहफा है।”

     

    कुछ समय बाद आरती ने अपने पति और माँ की मदद से रवि को गाँव वापस ले आने का फैसला किया।

     

    गाँव लौटते समय रवि की आँखों में आँसू थे।

     

    उसे डर था कि लोग उसका मजाक उड़ाएँगे।

     

    लेकिन गाँव पहुँचते ही बूढ़ी माँ ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मेरा बेटा वापस आ गया।”

     

    रवि माँ के पैरों में गिर पड़ा।

     

    गाँव के लोग भी उसे देखकर भावुक हो गए।

     

    जिस भाई के बारे में लोग कहते थे कि वह बदल गया है, वह असल में अपनी गरीबी और मजबूरी से लड़ रहा था।

     

    आरती ने घर के पास एक छोटी-सी दुकान शुरू करवाई, जिसे रवि बैठकर चला सके।

     

    धीरे-धीरे उसका जीवन फिर से संभलने लगा।

     

    अब हर साल रक्षाबंधन पर रवि अपनी बहन के घर सबसे पहले पहुँचता।

     

    एक दिन आरती ने हँसकर पूछा—

     

    “अब तो हर साल आओगे ना?”

     

    रवि मुस्कुराया।

     

    “अब अगर भगवान भी मुझे कहीं भेजेंगे ना, तो मैं पहले तुझसे पूछकर जाऊँगा।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    फिर रवि ने बहन की कलाई पर एक छोटी-सी चाँदी की राखी बाँधी।

     

    “आज भाई की तरफ से भी राखी।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “भाई बहन को राखी बाँधता है?”

     

    रवि बोला—

     

    “जब बहन भाई का इंतजार करके भी रिश्ता नहीं छोड़ती, तो भाई भी उसका साथ निभाने का वादा कर सकता है।”

     

    आरती की आँखों में आँसू आ गए।

     

    दोनों भाई-बहन एक-दूसरे से लिपट गए।

     

    सीख:

     

    मुश्किल परिस्थितियाँ इंसान को अपनों से दूर कर सकती हैं, लेकिन सच्चा रिश्ता दिल से कभी दूर नहीं होता। कभी किसी अपने को उसकी गरीबी, असफलता या मजबूरी के कारण गलत मत समझिए। हो सकता है वह आपसे दूर होकर भी हर पल आपको याद कर रहा हो। रिश्तों में सबसे जरूरी चीज पैसा नहीं, बल्कि विश्वास, इंतजार और अपनापन है।