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टैग: रक्षाबंधन स्टोरी#बहन की फीस और भाई की कलाई#bhai-bahan ka pyar

  • बहन की फीस और भाई की कलाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    एक छोटे से गाँव में राजेश और उसकी छोटी बहन पूजा रहते थे। उनका घर मिट्टी का था और घर के सामने एक पुराना नीम का पेड़ था। पिता की मृत्यु के बाद माँ ही किसी तरह दोनों बच्चों का पालन-पोषण कर रही थीं।

     

    माँ गाँव के लोगों के खेतों में मजदूरी करती थीं। राजेश भी स्कूल के बाद खेतों में काम करने चला जाता था।

     

    पूजा पढ़ाई में बहुत तेज थी। उसकी इच्छा थी कि वह बड़ी होकर अध्यापिका बने और गाँव के गरीब बच्चों को पढ़ाए।

     

    राजेश हमेशा उसकी पढ़ाई को लेकर बहुत गंभीर रहता था।

     

    एक दिन स्कूल से लौटकर पूजा चुपचाप बैठी थी।

     

    राजेश ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    पूजा ने अपनी किताब बंद कर दी।

     

    “भैया, स्कूल की फीस जमा करनी है।”

     

    “तो कर देंगे।”

     

    “कब?”

     

    राजेश कुछ पल चुप रहा।

     

    उसकी जेब में सिर्फ तीस रुपये थे।

     

    फीस दो सौ रुपये थी।

     

    पूजा बोली—

     

    “अगर पैसे नहीं हैं तो मैं अगले महीने से स्कूल नहीं जाऊँगी।”

     

    राजेश ने उसकी बात सुनते ही कहा—

     

    “तू स्कूल जाएगी। चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े।”

     

    अगले दिन से राजेश ने खेतों के साथ-साथ रात में भी मजदूरी शुरू कर दी।

     

    दिनभर खेत में काम करने के बाद वह गाँव की अनाज मंडी में बोरे उठाता।

     

    उसका शरीर थक जाता, लेकिन जब वह पूजा की किताबें देखता तो उसकी सारी थकान गायब हो जाती।

     

    कुछ दिनों बाद फीस जमा हो गई।

     

    पूजा को पता चला कि भैया ने रात-रात भर काम किया है।

     

    उसने कहा—

     

    “भैया, मैं इतनी पढ़ाई नहीं करूँगी कि आपको इतना काम करना पड़े।”

     

    राजेश ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तू जितना पढ़ना चाहती है, उतना पढ़। मेरे लिए इससे बड़ी खुशी कोई नहीं।”

     

    समय बीतता गया।

     

    पूजा दसवीं में पहुँची।

     

    उसकी परीक्षा में पूरे जिले में बहुत अच्छे अंक आए।

     

    स्कूल के प्रधानाचार्य ने कहा—

     

    “इस बच्ची में बहुत प्रतिभा है। इसे शहर में पढ़ाना चाहिए।”

     

    लेकिन शहर की पढ़ाई के लिए बहुत पैसे चाहिए थे।

     

    पूजा ने डरते हुए राजेश से कहा—

     

    “भैया, मैं गाँव में ही पढ़ लूँगी।”

     

    राजेश ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं।”

     

    राजेश मुस्कुराया।

     

    “पैसों की चिंता तू मत कर।”

     

    उसने यह बात तो कह दी, लेकिन रातभर सोचता रहा कि इतने पैसे आएँगे कहाँ से?

     

    अगले दिन उसने अपनी सबसे कीमती चीज बेचने का फैसला किया।

     

    वह चीज थी उसके पिता की पुरानी साइकिल।

     

    वही साइकिल जिसे उसके पिता ने मरने से कुछ महीने पहले राजेश को दी थी।

     

    राजेश उस साइकिल से बहुत जुड़ा हुआ था।

     

    लेकिन उसने उसे बेच दिया।

     

    साइकिल बेचकर मिले पैसों से पूजा की शहर की फीस जमा कर दी।

     

    जब पूजा को पता चला तो वह रो पड़ी।

     

    “भैया, आपने पिताजी की आखिरी निशानी भी बेच दी?”

     

    राजेश ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तेरी पढ़ाई से बड़ी कोई निशानी नहीं है।”

     

    पूजा शहर चली गई।

     

    राजेश गाँव में रहकर मजदूरी करता रहा।

     

    हर महीने वह अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा पूजा को भेज देता।

     

    कई बार उसके पास खुद खाने के पैसे नहीं होते, फिर भी वह बहन को कभी नहीं बताता।

     

    एक बार पूजा ने फोन किया—

     

    “भैया, मेरे कॉलेज में किताबों के लिए पैसे चाहिए।”

     

    राजेश ने कहा—

     

    “कल भेज दूँगा।”

     

    उस रात उसने अपना मोबाइल तक बेच दिया।

     

    अगले दिन पैसे पूजा के खाते में पहुँच गए।

     

    पूजा ने पूछा—

     

    “पैसे कहाँ से आए?”

     

    राजेश ने झूठ बोला—

     

    “कुछ ज्यादा मजदूरी मिल गई थी।”

     

    पूजा को कुछ पता नहीं था।

     

    फिर रक्षाबंधन आ गया।

     

    पूजा ने कहा—

     

    “भैया, इस बार मैं घर आ रही हूँ।”

     

    राजेश बहुत खुश हुआ।

     

    उसने बहन के लिए मिठाई खरीदने के लिए पैसे बचाने शुरू कर दिए।

     

    लेकिन रक्षाबंधन से दो दिन पहले राजेश काम करते हुए गिर गया।

     

    उसकी कमर में गंभीर चोट लगी।

     

    डॉक्टर ने आराम करने को कहा।

     

    पूजा को खबर मिली तो वह तुरंत गाँव आई।

     

    उसने भाई को चारपाई पर पड़े देखा तो उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “भैया…”

     

    राजेश मुस्कुराया।

     

    “तू आ गई?”

     

    “हाँ।”

     

    “पढ़ाई छोड़कर तो नहीं आई?”

     

    पूजा ने रोते हुए कहा—

     

    “आपको मेरी पढ़ाई की चिंता है और मैं आपको यहाँ छोड़कर शहर में बैठी थी।”

     

    राजेश ने कहा—

     

    “तेरी पढ़ाई मेरी जिम्मेदारी है।”

     

    पूजा उसके पास बैठ गई।

     

    उसने भाई की कलाई अपने हाथ में ली।

     

    “आज मैं आपको राखी बाँधूँगी।”

     

    राजेश मुस्कुराया।

     

    “इसमें रोने वाली क्या बात है?”

     

    पूजा ने राखी बाँधते हुए कहा—

     

    “क्योंकि आज मुझे पता चला कि मेरी हर किताब के पीछे आपकी मेहनत थी।”

     

    राजेश चुप हो गया।

     

    पूजा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आपने मेरे लिए क्या-क्या नहीं किया।”

     

    राजेश बोला—

     

    “मैंने कुछ नहीं किया। तूने बस मेरे सपने को बड़ा कर दिया।”

     

    “कौन-सा सपना?”

     

    “मैं चाहता हूँ कि हमारे गाँव का कोई बच्चा सिर्फ गरीबी की वजह से पढ़ाई न छोड़े।”

     

    पूजा की आँखों में चमक आ गई।

     

    उसने कहा—

     

    “भैया, मैं आपका यह सपना जरूर पूरा करूँगी।”

     

    कुछ साल बाद पूजा सरकारी स्कूल में अध्यापिका बन गई।

     

    पहली तनख्वाह मिलते ही वह गाँव आई।

     

    उसने राजेश के हाथ में एक लिफाफा रखा।

     

    राजेश ने पूछा—

     

    “क्या है?”

     

    पूजा बोली—

     

    “हमारे गाँव में गरीब बच्चों के लिए शाम की मुफ्त पाठशाला शुरू करने के लिए पैसे।”

     

    राजेश की आँखें भर आईं।

     

    “तूने मेरा सपना सच कर दिया।”

     

    पूजा मुस्कुराई।

     

    “नहीं भैया, आपने मेरी जिंदगी बदलकर मेरा सपना बनाया था। मैंने तो बस आपका सपना आगे बढ़ाया है।”

     

    उस दिन गाँव के नीम के पेड़ के नीचे पहली बार बच्चों की मुफ्त कक्षा लगी।

     

    राजेश दूर बैठा अपनी बहन को बच्चों को पढ़ाते हुए देख रहा था।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    पूजा ने बच्चों से कहा—

     

    “बच्चों, याद रखना… गरीबी पढ़ाई रोक सकती है, लेकिन मेहनत और हिम्मत के सामने ज्यादा देर नहीं टिक सकती।”

     

    फिर उसने दूर बैठे भाई की ओर देखा।

     

    राजेश मुस्कुरा रहा था।

     

    अगले रक्षाबंधन पर पूजा ने भाई की कलाई पर राखी बाँधी।

     

    इस बार उसने कोई महंगा उपहार नहीं दिया।

     

    उसने सिर्फ एक कागज राजेश के हाथ में रखा।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मेरे भाई के नाम—

    आपने मेरी फीस भरकर सिर्फ मेरी पढ़ाई नहीं बचाई थी, आपने मेरा भविष्य बचाया था।”

     

    राजेश ने कागज को सीने से लगा लिया।

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    सीख:

     

    सच्चा प्यार वही है जिसमें इंसान अपने प्रिय के भविष्य के लिए अपनी वर्तमान खुशियों का त्याग कर दे। भाई का त्याग तभी सार्थक होता है जब बहन उसकी मेहनत की कद्र करे और आगे बढ़कर दूसरों के जीवन में भी रोशनी फैलाए। गरीबी रास्ता कठिन कर सकती है, लेकिन सपनों को खत्म नहीं कर सकती।