गाँव के आखिरी छोर पर एक टूटी-सी झोपड़ी थी। बरसात में जिसकी छत टपकती थी और गर्मियों में जिसके अंदर बैठना भी मुश्किल हो जाता था। उसी झोपड़ी में सोलह साल की मीरा और उसका छोटा भाई सोनू रहते थे।
माँ-बाप दोनों को गुजरे कई साल हो चुके थे। रिश्तेदारों ने कुछ दिनों तक सहारा दिया, फिर सब अपने-अपने घर चले गए।
मीरा ने तभी तय कर लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह अपने भाई को कभी अकेला नहीं छोड़ेगी।
सुबह होते ही मीरा गाँव के बड़े घरों में बर्तन माँजने निकल जाती। बदले में कभी उसे पैसे मिलते, कभी बची हुई रोटियाँ।
सोनू भी खाली नहीं बैठता था। वह गाँव की सब्जी मंडी में बोरे उठाता और जो थोड़े पैसे मिलते, उन्हें अपनी बहन के हाथ पर रख देता।
एक दिन मीरा ने कहा—
“सोनू, तू अभी छोटा है। इतना काम मत किया कर।”
सोनू हँसकर बोला—
“और आप अकेले काम करेंगी तो मुझे अच्छा लगेगा?”
मीरा ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“तू बस पढ़ाई कर। मैं चाहती हूँ तू बड़ा आदमी बने।”
सोनू बोला—
“मैं बड़ा आदमी नहीं बनना चाहता।”
“तो क्या बनना चाहता है?”
“आपका सहारा।”
मीरा कुछ नहीं बोल पाई।
उसने सोनू को सीने से लगा लिया।
उनके पास गरीबी बहुत थी, लेकिन प्यार की कोई कमी नहीं थी।
रक्षाबंधन आने वाला था।
गाँव के बाजार में राखियों की दुकानें सज गई थीं।
सोनू अपनी बहन के लिए राखी खरीदना चाहता था।
उसने कई दिनों तक पैसे बचाए थे।
एक दिन वह बाजार गया।
एक सुंदर-सी राखी उसे पसंद आई।
दुकानदार ने कहा—
“दस रुपये की है।”
सोनू ने अपनी जेब टटोली।
उसके पास सिर्फ आठ रुपये थे।
वह उदास होकर दुकान से लौट आया।
घर पहुँचकर मीरा ने पूछा—
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं।”
“मुझसे झूठ मत बोल।”
सोनू ने धीरे से कहा—
“आपके लिए राखी खरीदना चाहता था, लेकिन पैसे कम पड़ गए।”
मीरा मुस्कुराई।
“मेरे लिए राखी की जरूरत नहीं है।”
सोनू बोला—
“क्यों?”
“क्योंकि तू मेरे लिए ही तो सबसे कीमती है।”
सोनू ने कहा—
“लेकिन राखी तो बाँधनी पड़ेगी।”
मीरा ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा—
“ठीक है, इस बार मैं खुद बना लूँगी।”
उस रात मीरा ने अपनी पुरानी लाल चुनरी का एक टुकड़ा निकाला।
उसने उसे धागे में बाँधा और बीच में गेहूँ का एक छोटा-सा दाना चिपका दिया।
सोनू ने देखा तो हँस पड़ा।
“ये कैसी राखी है?”
मीरा ने कहा—
“गरीबों की राखी।”
सोनू ने राखी को हाथ में लिया।
“नहीं दीदी, ये सबसे अमीर राखी है।”
मीरा मुस्कुराई।
लेकिन अगले दिन घर में खाने के लिए कुछ नहीं था।
दोनों सुबह से भूखे थे।
शाम को मीरा को एक घर से दो रोटियाँ मिलीं।
वह रोटियाँ लेकर झोपड़ी में आई।
सोनू की आँखें चमक उठीं।
“दीदी, आज तो दावत है।”
मीरा हँस पड़ी।
“हाँ, आज दावत है।”
उसने एक रोटी सोनू को दी और दूसरी खुद रख ली।
सोनू ने अपनी रोटी का आधा हिस्सा तोड़कर मीरा की तरफ बढ़ाया।
“आप भी खाओ।”
“नहीं, मुझे भूख नहीं है।”
“झूठ।”
“सच कह रही हूँ।”
सोनू बोला—
“आप हमेशा झूठ बोलती हो जब खाना कम होता है।”
मीरा चुप हो गई।
उसकी आँखें भर आईं।
सोनू ने रोटी का आधा टुकड़ा उसकी हथेली पर रख दिया।
“आपने मुझे माँ की तरह पाला है। अब मुझे भी आपका ख्याल रखने दो।”
मीरा रोते हुए रोटी खाने लगी।
उस रात दोनों ने पहली बार महसूस किया कि गरीबी पेट को भूखा रख सकती है, लेकिन दिल को गरीब नहीं बना सकती।
रक्षाबंधन का दिन आ गया।
सुबह मीरा ने सोनू को नहलाया।
घर में मिठाई नहीं थी।
उसने गुड़ का छोटा-सा टुकड़ा पानी में घोलकर उसे मीठा पानी पिला दिया।
फिर सोनू के सामने बैठकर उसकी कलाई पर वही राखी बाँध दी।
मीरा ने कहा—
“भगवान से बस यही चाहती हूँ कि तू हमेशा खुश रहे।”
सोनू ने पूछा—
“और आप?”
“मेरी खुशी तो तू है।”
सोनू ने बहन के पैर छुए।
फिर अपनी जेब से कुछ निकाला।
वह पाँच रुपये थे।
मीरा ने पूछा—
“ये क्या है?”
“आपके लिए।”
“मेरे पास तो सब कुछ है।”
“क्या?”
“तू।”
सोनू मुस्कुराया।
दोनों गले लग गए।
कुछ महीने बाद गाँव में भयंकर बाढ़ आ गई।
नदी का पानी धीरे-धीरे गाँव की ओर बढ़ने लगा।
लोग अपने घर छोड़कर ऊँची जगहों पर जाने लगे।
मीरा ने सोनू का हाथ पकड़ा और बोली—
“चल, हमें भी निकलना होगा।”
लेकिन सोनू का पैर कीचड़ में फिसल गया।
वह पानी में गिर पड़ा।
मीरा बिना सोचे पानी में कूद गई।
उसने सोनू को पकड़ लिया।
पानी का बहाव बहुत तेज था।
मीरा ने पूरी ताकत लगाकर भाई को किनारे की ओर धकेला।
“सोनू! भाग!”
सोनू रोते हुए बोला—
“दीदी, आप भी चलो!”
मीरा ने उसे धक्का देकर सुरक्षित जगह पहुँचा दिया।
लेकिन खुद पानी के तेज बहाव में बह गई।
“दीदी!”
सोनू चीखता रहा।
गाँव के लोगों ने मीरा को खोजने की बहुत कोशिश की।
कई घंटे बाद उसे नदी के किनारे बेहोश हालत में पाया गया।
सोनू उसके पास बैठकर लगातार रो रहा था।
“दीदी, आँखें खोलो…”
कुछ देर बाद मीरा ने आँखें खोलीं।
सोनू ने उसे गले लगा लिया।
“आप मुझे छोड़कर मत जाना।”
मीरा ने उसके आँसू पोंछे।
“पगले, तुझे छोड़कर कहाँ जाऊँगी?”
उस दिन सोनू ने मन ही मन फैसला किया कि अब वह अपनी बहन को कभी दुखी नहीं होने देगा।
समय बीतता गया।
सोनू ने पढ़ाई के साथ मेहनत भी की।
वह बड़ा हुआ और शहर में नौकरी करने लगा।
पहली तनख्वाह मिलते ही वह गाँव आया।
मीरा झोपड़ी के बाहर बैठी थी।
सोनू ने उसके सामने एक नया घर बनाने के कागज रख दिए।
मीरा हैरान रह गई।
“ये क्या है?”
सोनू मुस्कुराया।
“हमारा नया घर।”
मीरा की आँखें भर आईं।
“लेकिन इतने पैसे?”
“आपने मुझे बचपन में दो रोटियाँ देकर बड़ा किया था। आज मेरी बारी है आपका पेट भरने की।”
अगले रक्षाबंधन पर सोनू ने अपनी बहन के सामने एक बड़ी-सी मिठाई की दुकान से खरीदी हुई राखी रखी।
मीरा ने उसे देखा और मुस्कुराकर पूछा—
“इतनी महंगी राखी?”
सोनू बोला—
“नहीं दीदी। महंगी तो वह राखी थी जो आपने मेरी कलाई पर उस दिन बाँधी थी।”
मीरा ने पूछा—
“वह?”
सोनू ने अपनी जेब से वही पुरानी, सूखी और थोड़ी-सी टूटी राखी निकाली।
“मैंने इसे आज तक संभालकर रखा है।”
मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।
सोनू बोला—
“उस राखी में आपका प्यार बंधा था। और वही प्यार मुझे आज यहाँ तक लेकर आया।”
मीरा ने भाई की कलाई पर नई राखी बाँधी।
दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया।
उस दिन उनके घर में बहुत सारी मिठाई थी।
लेकिन दोनों ने सबसे पहले दो रोटियाँ बनाई।
एक मीरा ने खाई।
एक सोनू ने।
क्योंकि उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी दौलत आज भी वही दो रोटियाँ थीं, जिनमें एक-दूसरे के लिए बचाया हुआ प्यार था।
सीख:
गरीबी इंसान से बहुत कुछ छीन सकती है, लेकिन सच्चा प्यार नहीं छीन सकती। भाई-बहन का रिश्ता तब और मजबूत हो जाता है जब दोनों अपनी जरूरत से पहले एक-दूसरे की जरूरत के बारे में सोचते हैं। जीवन में पैसा कम हो सकता है, लेकिन अगर घर में प्रेम और अपनापन है, तो इंसान कभी सच में गरीब नहीं होता।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।