हेल्लो दोस्तों…
आज मैंने एक ऑनलाइन प्यार वाली कहानी पढ़ी। कहानी खत्म हुई तो पता नहीं क्यों, मुझे भी किसी की याद आ गई।
प्यार क्या होता है, ये तो आज तक मुझे नहीं पता। शायद मैंने कभी किसी से प्यार किया भी नहीं। लेकिन हाँ… एक दोस्त ज़रूर ऐसा मिला, जिसकी याद आज भी मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है। इसलिए आज मैं अपनी ही एक ऑनलाइन दोस्त की कहानी लिख रही हूँ।
ये कहानी शुरू होती है लगभग तीन साल पहले… 21 – सावन 2023 से उस समय मैंने पहली बार कहानियाँ लिखना शुरू किया था। लिखने का बहुत शौक था, लेकिन लिखना उतना अच्छा नहीं आता था। शब्दों में ढेर सारी गलतियाँ होती थीं। कई बार तो खुद अपनी कहानी दोबारा पढ़ती, तो लगता कि पता नहीं लोग इसे पढ़ते भी कैसे होंगे।
लगभग तीन महीने बाद मुझे एक इंस्टाग्राम ग्रुप में पता चला कि प्रतिलिपि जैसा भी एक ऐप है। उस समय लफ्ज़ो की कहानी ऐप नहीं आई थी और मैं पॉकेट नोबेल पर लिखना शुरू किया था। उसके बाद में प्रतिलिप पर लिखना शुरू किया।
जो लोग मुझे शुरू से जानते होंगे, उन्हें ये तो पता होगा कि मेरी स्टोरी में गलती कितनी होती थी। लेकिन शायद किस्मत को यही मंज़ूर था कि मेरी वही गलतियाँ मुझे मेरी ज़िंदगी के सबसे खास ऑनलाइन दोस्त से मिलवा दें।
एक दिन मैं प्रतिलिपि पर अपनी कहानी लिख रही थी। तभी अचानक मेरे inbox में एक मैसेज आया।
मुझे थोड़ा अजीब लगा, क्योंकि उस समय कोई भी सीधे inbox में मैसेज नहीं करता था। मैंने मैसेज खोला।
उसने सबसे पहले लिखा था,
“sorry में आपको inbox में मैसेज कर रहा हु”
मैं कुछ देर तक बस स्क्रीन को देखती रही। फिर मैंने जवाब दिया, “कोई बात नहीं” और inbox बंद करने लगी। तभी उसका दूसरा मैसेज आया।
“आप की स्टोरी बहुत अलग है और अच्छी है पर कुछ जगह गलती है आप डालने से पहले चेक कर लीजिए गा। मैं ये बात कमेंट में भी बोल देता पर वह बोलता तो लोग आपकी स्टोरी को गलत कहने लगते पर आपकी स्टोरी बहुत अच्छी है।”
उसका मैसेज पढ़कर मुझे बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा। क्योंकि उसने मेरी कमी बताई थी, लेकिन मेरा आत्मविश्वास नहीं तोड़ा था। उसने मेरी गलती सबके सामने नहीं, बल्कि अकेले में बताई थी।
मैंने बस “थैंक यू” कहा और “सॉरी” भी बोलकर निकल गई।
असल में उस समय मेरे घर में शादी होने वाली थी। पूरे घर में मेहमान थे। हर तरफ भागदौड़ थी। इसलिए मैं किसी से ज़्यादा बात नहीं करती थी।
लेकिन उसके बाद एक चीज़ रोज़ होने लगी। जब भी मैं प्रतिलिपि खोलती, उसका एक मैसेज ज़रूर होता। “आज का एपिसोड अच्छा था” और मैं हर बार बस “thank you” बोल देती।
एक दिन उसने कहा, “मेरी स्टोरी भी पढ़ना में राइटर नहीं हु बस कभी लिखने का मन होता है तो लिख लेतीहु”
मैंने उसकी कहानी पढ़ी। फिर कभी मेरी कहानी की बातें होतीं… कभी उसकी कहानी की… और धीरे-धीरे हमारी बातें बढ़ने लगीं।
मुझे पता चला कि वो गुजरात से था और मैं बिहार से। दो अलग-अलग राज्यों के दो बिल्कुल अनजान लोग… जिन्हें शायद कभी मिलना भी नहीं था।
लेकिन दोस्ती की शुरुआत हो चुकी थी। एक दिन उसने कहा,
“लिपि पर ऑनलाइन का पता नहीं चलता है क्या आपका इंस्ट्राग्राम id है”
मैंने बिना ज़्यादा सोचे अपना इंस्टाग्राम आईडी दे दिया। बस… शायद वहीं से हमारी असली दोस्ती शुरू हुई। अब हमारी सुबह गुड मॉर्निंग से होती और रात गुड नाइट पर खत्म होती।
या यूँ कहूँ… खत्म ही नहीं होती थी। क्योंकि रात के दो-दो, तीन-तीन बजे तक बातें चलती रहती थीं। कभी कहानी…
कभी सपने… कभी बचपन… कभी भविष्य… तो कभी बिल्कुल बेकार की बातें।
लेकिन मज़े की बात ये थी कि हमें उन बेकार की बातों में भी बहुत मज़ा आता था। उसी दौरान मेरे घर में भाई की शादी थी।
हर समय कोई ना कोई मेहमान घर में रहता था। मेरे हाथ में फोन देखकर कभी पापा डाँट देते कभी भैया कुछ बोल देते।
मैं भी गुस्से में इंस्टाग्राम पर नोट डाल दिया, “मुझे कोई मैसेज नहीं करेगा में इंट्रा छोड़ कर जा रही हु” असल में वो मैसेज मैंने इंस्टाग्राम ग्रुप के लिए डाला था।
लेकिन जैसे ही उसने वो नोट पढ़ा वो परेशान हो गया। उसे लगा कि शायद उसकी वजह से मैं इंस्टाग्राम छोड़ रही हूँ।
उसने लगातार मैसेज करने शुरू कर दिए। कॉल भी किए।
जब रात में पापा सो गए, तब मैंने मम्मी से फोन लिया।
कम से कम कहानी तो लिखनी थी। मैंने जैसे ही इंस्टाग्राम खोला इतने सारे मैसेज इतनी सारी मिस्ड कॉल…
कि आज भी गिन नहीं सकती। मैंने उसे पूरी बात बताई कि आखिर हुआ क्या था। तब जाकर वो शांत हुआ।
उस दिन मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मेरी दोस्ती किसी के लिए इतनी मायने रखती है।
फिर आया वो दिन जिस दिन मेरे भैया की हल्दी थी। और उसी दिन उसका जन्मदिन भी था। उसने मुझे पहले ही बता दिया था। लेकिन घर में इतने मेहमान इतनी भागदौड़ थी कि मैं भूल गई।
रात के लगभग ग्यारह बजे जब मैं ऑनलाइन आई तब मुझे याद आया। मैंने तुरंत उसे “sorry” बोला। लेकिन मुझे पता था ग्यारह से बारह के बीच उसका डिनर करने का समय होता था।
उसने मेरे सॉरी का कोई जवाब नहीं दिया। मैं परेशान हो गई।
लगभग तीस मिनट तक लगातार “सॉरी” बोलती रही। साथ में एक अच्छा सा happy birthday wishes भी लिखा।
और 11:30 बजे भेज दिया। लेकिन उसने 11:57 पर जाकर देखा। और आखिरकार मान गया। उस दिन मेरी जान में जान आई। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती और गहरी होती चली गई।
कभी स्टोरी की बातें कभी इधर-उधर की बातें तो कभी हम truth or dare खेलते। कभी घंटों हँसते तो कभी बिना वजह एक-दूसरे को चिढ़ात और झगड़ा वो तो पूछो ही मत ऐसा एक दिन भी नहीं गुजरता था जब में झगड़ती नहीं थी।
देखते ही देखते दो साल कब बीत गए पता ही नहीं चला।
हाँ एक बार मैं उसका जन्मदिन भूल गई थी। वो बहुत नाराज़ हो गया था। लेकिन मज़ेदार की बात ये है कि तीन साल में उसे मेरा जन्मदिन एक बार भी याद नहीं रहा।
दो बार तो मेरा इंस्टाग्राम नोट और स्टोरी देखकर उसे याद आया। जब मैं नाराज़ होती तो वो बस इतना बोल देता, “मुझे याद तो आया पर तुम तो भूल ही गई थी।”
अब क्या ही जवाब दूँ मैं जनाब को। और इस साल उसने विश भी नहीं किया। शायद अब बातें पहले जैसी नहीं रहीं।
लगभग एक साल पहले मैं बीमार थी।
और उसी समय उसकी नई जॉब भी शुरू हो गई। वो अपने काम में व्यस्त रहने लगा। हमारी बातें कम होने लगीं। पहले जहाँ हर छोटी बात शेयर होती थी…
अब पूरे-पूरे दिन निकल जाते थे। धीरे-धीरे ये दूरी इतनी बढ़ गई कि जो दोस्त कभी बिना Good Morning के दिन शुरू नहीं करते थे और बिना रात के दो या तीन बजे Good Night बोले सोते नहीं थे…
आज वही दोस्त सिर्फ एक-दूसरे की रील देखकर आगे बढ़ जाते हैं। पहले ऐसा होता था रात के बारह बजे Good Night बोलते। फिर कोई नई बात याद आ जाती और फिर बातें शुरू हो जातीं।
फिर दोबारा Good Night। फिर हँसी, फिर कोई नया किस्सा। और पता ही नहीं चलता था कि कब रात के तीन बज गए।
लेकिन अब बस एक रील भेज देते हैं। सामने वाला देख ले तो ठीक न देखे तो भी ठीक। कभी किसी रील पर हँसने वाली इमोजी भेज दी…
बस वहीं बात खत्म। जब वो अपनी नई नौकरी में बिज़ी हुआ तब उसने मुझसे सिर्फ इतना कहा था, “तुम्हे जब भी बात करने का मन हो बात कर लेना”
आज तक मुझे समझ नहीं आया वो कहना क्या चाहता था?
क्या उसे सच में मेरी दोस्ती चाहिए थी? या फिर वो सिर्फ औपचारिकता निभा रहा था? मैं तो दोस्त से बात करना चाहती थी।
लेकिन क्या सिर्फ मैं ही बात करना चाहती थी? क्या उसका मन नहीं करता था मुझसे बात करने का? शायद इन सवालों के जवाब कभी नहीं मिलेंगे।
उस दिन के बाद मैंने खुद से मैसेज करना लगभग बंद कर दिया। कभी-कभी कर देती थी लेकिन अब नहीं। हाँ रील्स आज भी भेज देती हूँ।
शायद इसलिए कि कहीं न कहीं दोस्ती अभी भी बाकी है।
कुछ दिन पहले मैंने उसे एक रील भेजी। कई दिनों बाद उसका टेक्स्ट आया।
इतने दिनों बाद उसका मैसेज देखकर मैं सच में बहुत खुश हो गई। इतनी खुश कि समझ ही नहीं आया क्या जवाब दूँ।
दिल बहुत कुछ लिखना चाहता था। पूछना चाहता था कि कैसे हो? इतने दिन कहाँ थे? याद आती है क्या हमारी पुरानी बातें?
लेकिन उँगलियाँ कुछ भी नहीं लिख पाईं। और मैंने बस 🤣🤣 ये वाली इमोजी भेज दी।
शायद इसलिए क्योंकि कभी-कभी इमोजी वो बातें कह देते हैं, जिन्हें शब्द नहीं कह पाते।
आज भी जब पुरानी चैट पढ़ती हूँ तो लगता है जैसे वो दिन किसी और दुनिया के थे। जहाँ वक्त बहुत था बातें बहुत थीं हँसी बहुत थी और उम्मीदें भी एक दूसरे का ऑनलाइन आने का इंतजार बहुत थी
अब न शिकायत है न कोई गिला। बस एक खूबसूरत याद है।
तो अब आप ही बताइए इसे ऑनलाइन प्यार कहेंगे या दोस्ती या फिर कुछ भी नहीं?
मुझे आज भी नहीं पता। लेकिन मेरे लिए वो हमेशा मेरा एक बहुत अच्छा ऑनलाइन दोस्त रहेगा।
कुछ रिश्तों को नाम देने की ज़रूरत नहीं होती है। वो बस यादों में रह जाते हैं और जब भी याद आते हैं चेहरे पर एक छोटी-सी मुस्कान छोड़ जाते हैं।

NSW अनुभवी लेखक -🥇


