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  • रिश्तों के बाजार में

    रिश्तों के बाजार में

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    जन्म लेते ही इंसान,

    रिश्तों के एक अनजाने बाज़ार में आ जाता है।

    जहाँ हर रिश्ता,

    अपनी-अपनी कीमत लगाने लगता है।

    माँ हो, बाप हो,

    या भाई-बहन का प्यार,

    वक़्त के साथ अक्सर

    हर रिश्ता अपनी कीमत बताने लगता है।

    जिसके साथ जैसा व्यवहार करो,

    वैसी ही उसकी कीमत तय होने लगती है।

    ज़रा-सी अपनापन कम हो जाए,

    तो रिश्तों की दूरियाँ बढ़ने लगती हैं।

    धीरे-धीरे एहसास पीछे छूट जाते हैं,

    और हिसाब-किताब आगे आ जाता है।

    इस रिश्तों के बाज़ार में

    इंसान अपना संस्कार तक भूल जाता है।

    कौन अपना है, कौन पराया,

    ये भी अक्सर यहीं तय होता है।

    किस रिश्ते की कितनी कीमत है,

    वो इस रिश्तों के बाज़ार में ही दिखता है।

    काश… रिश्ते कीमत से नहीं,

    दिल से निभाए जाते,

    तो शायद दुनिया में

    हर रिश्ता अनमोल कहलाता।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇