पहाड़ों की ढलान पर बसा वह छोटा सा गाँव शाम ढलते ही धुंध की चादर ओढ़ लेता था।
अक्टूबर की ठिठुरन महसूस होने लगी थी, गाँव के मोड़ पर बनी पुरानी चाय की टपरी पर हर शाम कुछ चेहरे जुटते थे, इन्हीं चेहरों में एक चेहरा था माधव का।
माधव अपनी उम्र का पचास पड़ाव पार कर चुका था, उदास आँखें, बिखरे सफेद बाल और कंधे पर लटकता एक पुराना कैनवास का थैला, यह उसकी पहचान थी। गाँव के लोग जानते थे कि माधव कभी शहर का जाना-माना चित्रकार हुआ करता था। लेकिन पिछले दस सालों से उसने ब्रश को हाथ भी नहीं लगाया था। दस साल पहले एक सड़क हादसे में उसने अपनी इकलौती बेटी, स्नेहा को खो दिया था। उस हादसे ने न सिर्फ उसकी बेटी को छीना, बल्कि उसके भीतर के कलाकार को भी हमेशा के लिए सुला दिया।
तब से माधव गाँव की इस चाय की दुकान पर बैठता, अलाव के उठते धुएँ को ताकता और खामोश रहता। उसकी ज़िंदगी उस रुकी हुई घड़ी की तरह हो गई थी, जिसकी सुइयां एक ही जगह ठहर गई हों।
उस दिन भी हवा में गलन थी, चाय वाले रामू काका ने अलाव में कुछ सूखी लकड़ियाँ और डालीं। तभी बस स्टैंड की तरफ से एक छोटी सी लड़की चलती हुई टपरी के पास आई। उम्र यही कोई सात-आठ साल होगी। कंधे पर बड़ा सा स्कूल बैग, हाथ में एक स्केचबुक और चेहरे पर बेफ़िक्र मुस्कान।
उसने रामू काका से पूछा, “काका, थोड़ा गरम पानी मिलेगा? मेरी बोतल का पानी बर्फ जैसा ठंडा हो गया है।”
रामू काका ने मुस्कुराकर उसे पानी दिया और पूछा, “बिटिया, तुम यहाँ नई आई हो क्या? पहले तो कभी नहीं देखा।”
”हाँ काका! मेरे पापा का यहाँ फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में ट्रांसफर हुआ है। हम कल ही आए हैं, मेरा नाम दिशा है,” उसने चहकते हुए जवाब दिया।
दिशा की नज़र पास ही बेंच पर बैठे माधव पर पड़ी, माधव अपनी धुन में अलाव की लपटों को देख रहा था। दिशा बिना झिझक के उसके बगल में जाकर बैठ गई। उसने अपनी स्केचबुक खोली और पेंसिल से अलाव का स्केच बनाने लगी।
माधव ने अनमने ढंग से उसकी तरफ देखा, तो बच्ची के हाथ कांप रहे थे, पेंसिल की रेखाएँ टेढ़ी-मेढ़ी बन रही थीं, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सा जुनून था।
”रेखाएँ सीधी नहीं बन रहीं,” माधव के मुँह से अचानक निकल गया।
दिशा ने चौंक कर उसकी तरफ देखा, फिर अपनी ड्राइंग को देखा, वह मुस्कुराई और बोली, “हाँ अंकल, पेंसिल बहुत छोटी है और मेरे हाथ ठंड से कांप रहे हैं। पर मुझे बनाना अच्छा लगता है। क्या आप मेरी मदद करेंगे?”
माधव ने एक पल के लिए हिचकिचाया, दस साल… दस साल से उसने किसी स्केचबुक को नहीं छुआ था। पर फिर भी उसने उसने धीरे से अपना कांपता हाथ बढ़ाया और दिशा के हाथ से पेंसिल ले ली।
माधव की उंगलियों ने जैसे ही पेंसिल को छुआ, उसकी स्मृति में पुरानी यादें तैर गईं। उसकी बेटी स्नेहा भी ठीक इसी उम्र में ऐसे ही ज़िद किया करती थी।
माधव ने स्केचबुक के पन्ने पर पेंसिल चलाई, और एक ही मिनट में, उस टेढ़ी-मेढ़ी ड्राइंग ने एक नया रूप ले लिया। अलाव की लपटें, उससे निकलता धुआं और पीछे धुंध में लिपटा पहाड़, सब कुछ कागज़ पर ज़िंदा हो उठा।
दिशा की आँखें फटी की फटी रह गईं, और उसके मुँह से निकला, “अरे वाह अंकल! आप तो जादूगर हैं! ये स्केच तो बिल्कुल असली लग रहा है।”
माधव ने स्केचबुक वापस दिशा की तरफ बढ़ा दी, उसके हाथों में एक हल्की सी थरथराहट थी। बहुत दिनों बाद उसके सीने में दबी उदासी की चट्टान थोड़ी खिसकी थी।
”अंकल, क्या आप मुझे रोज़ ड्राइंग सिखाएंगे?” दिशा ने बड़े ही मासूम भाव से पूछा।
माधव ने गहरी सांस ली, फिर अलाव के धुएँ को देखा और धीमे से कहा, “नहीं बेटा, मैं अब पेंटिंग नहीं करता, मैंने यह सब बहुत पहले छोड़ दिया।”
”क्यों? इतनी अच्छी चीज़ को कोई कैसे छोड़ सकता है?” दिशा का सीधा सवाल माधव के दिल में तीर की तरह चुभा। वह बिना कोई जवाब दिए, अपना थैला उठाकर वहाँ से उठकर चला गया।
अगले कुछ दिनों तक माधव टपरी पर नहीं आया, वह अपने पुराने, सीलन भरे कमरे में बंद रहा। पर दिशा कहाँ मानने वाली थी। उसने रामू काका से माधव का घर पूछ लिया और एक दोपहर सीधे उसके घर पहुँच गई।
घर का दरवाज़ा आधा खुला था, जिसके कारण दिशा चुपके से अंदर गई, तो देखा कमरा धूल से भरा हुआ था। कोने में कई कैनवास कपड़े से ढके रखे थे। उनको देख दिशा ने उत्सुकता में एक बड़े से कैनवास से कपड़ा हटा दिया।
वह एक अधूरी पेंटिंग थी, एक छोटी लड़की की मुस्कुराती हुई तस्वीर, जिसके चारों तरफ चमकीले रंग थे, लेकिन चेहरा अधूरा छोड़ दिया गया था।
तभी पीछे से माधव की सख्त आवाज़ आई, “तुम यहाँ क्या कर रही हो?”
दिशा उसकी आवाज़ सुन डरने की बजाय पलटकर सवाल पूछा, “अंकल, यह लड़की कौन है? और यह पेंटिंग अधूरी क्यों है?”
माधव का चेहरा गुस्से और दर्द से लाल हो गया, उसने उसी लहजे में कहा, “यह मेरी बेटी है… स्नेहा! और यह अधूरी इसलिए है क्योंकि रंगों का कोई मतलब नहीं बचा। जब रोशनी ही चली जाए, तो रंगों से क्या सजाना?”
माधव की आँखों में आँसू आ गए थे इतना कहते – कहते। उसने सोचा था कि बच्ची डरकर भाग जाएगी, लेकिन दिशा चलकर उसके पास आई। और फिर उसने अपने बैग से अपनी स्केचबुक निकाली और उसमें से एक पन्ना फाड़कर माधव के हाथ में थमा दिया।
”अंकल, मेरी मम्मी कहती हैं कि जब शाम को अंधेरा होता है, तो सूरज मरता नहीं है… वह बस दूसरी तरफ रोशनी देने चला जाता है। अगर आप रंग भरना बंद कर देंगे, तो यह अंधेरा कभी खत्म ही नहीं होगा।”
माधव ने उस फटे हुए पन्ने को देखा, उस पर दिशा ने एक स्केच बनाया था, एक बूढ़ा आदमी और एक छोटी लड़की अलाव के पास बैठे थे, और हवा में उड़ते धुएँ के बीच ऊपर बादलों में एक छोटी सी परी मुस्कुरा रही थी।
उस बचकाने स्केच में जो भावना थी, उसने माधव के पत्थर बन चुके दिल को पिघलाकर रख दिया। वह घुटनों के बल बैठ गया और उस छोटे से पन्ने को सीने से लगाकर फूट-फूटकर रो पड़ा। दस सालों का जमा हुआ दर्द आँसुओं के रास्ते बह निकला।
क्योंकि उसे उस स्केच में वह बादलों में मुस्कराती हुई परी को अपनी बेटी समझ कर देख रहा था।
अगली सुबह पहाड़ पर एक अलग ही ताज़गी थी, सूरज की पहली किरणें जब धुंध को चीरती हुई बाहर निकलीं, तो चाय की टपरी पर रामू काका एक अनोखा नज़ारा देख रहे थे।
माधव अलाव के पास बैठा था, उसके सामने एक नया कैनवास रखा था और हाथ में रंगों की प्लेट थी। उसके बगल में दिशा बैठी हुई अपनी स्केचबुक में रंग भर रही थी।
माधव ने ब्रश उठाया और कैनवास पर पहला स्ट्रोक लगाया और उसने वही दस साल पुरानी अधूरी पेंटिंग पूरी करनी शुरू की थी। लेकिन इस बार वह उदास चेहरा नहीं बना रहा था। उसने स्नेहा के चेहरे पर वही मुस्कान उकेरी जो दिशा के चेहरे पर थी, और पृष्ठभूमि में गाँव के पहाड़ों पर उगते हुए नए सूरज को चित्रित किया।
रामू काका ने मुस्कुराते हुए दो कप कड़क चाय उनके सामने रखी।
माधव ने दिशा की तरफ देखा और कहा, “दिशा, आज तुम्हें सिखाऊंगा कि जब धुंध गहरी हो, तो कैनवास पर रोशनी कैसे बनाई जाती है।”
दिशा खिलखिलाकर हँस पड़ी, “आप मुझे सब सीख दो!”
उस दिन अलाव का धुआं हवा में गायब हो रहा था, पर माधव के जीवन का अंधेरा हमेशा के लिए छट चुका था। उसने समझ लिया था कि अपनों की यादों को दर्द में नहीं, बल्कि उन रंगों और खुशियों में ज़िंदा रखा जाता है जो वे हमारे लिए छोड़ जाते हैं।
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आपको क्या लगता है कि जाने वाले की यादों को याद करके दर्द में रहना चाहिए। या अपने आप को एक नई उड़ान देनी चाहिए और जाने वाले को मुस्कुरा कर याद करना चाहिए।
मगर क्या जाने वाले को भुला देना इतना आसान होता है?
