अध्याय 8 — महल के द्वार पर सुदामा और कृष्ण तक पहुँची खबर
द्वारका के विशाल महल के सामने सुदामा चुपचाप खड़े थे।
उनकी आँखें महल के ऊँचे द्वार पर टिकी थीं।
वर्षों पहले जिस कृष्ण के साथ उन्होंने गुरुकुल की छोटी सी कुटिया में बैठकर भोजन किया था, आज वही कृष्ण इस विशाल राजमहल में रहते थे।
सुदामा के मन में तरह-तरह के विचार उठ रहे थे।
पहरेदार अब भी उन्हें देख रहा था।
उसने फिर पूछा,
“तुमने कहा कि तुम कृष्ण से मिलने आए हो?”
सुदामा ने सिर झुकाकर कहा,
“हाँ।”
“क्या तुम्हारे पास कोई संदेश है?”
सुदामा कुछ पल चुप रहे।
फिर मुस्कुराकर बोले,
“संदेश?”
पहरेदार ने कहा,
“हाँ। द्वारकाधीश से मिलने हर व्यक्ति सीधे अंदर नहीं जा सकता।”
सुदामा ने अपनी छोटी सी पोटली को हाथ में कसकर पकड़ लिया।
“मेरे पास कोई संदेश नहीं है।”
पहरेदार ने पूछा,
“फिर?”
सुदामा ने धीरे से कहा,
“बस उनसे कहना कि उनका पुराना मित्र सुदामा उनसे मिलने आया है।”
पहरेदार ने एक-दूसरे की ओर देखा।
उनमें से एक को शायद विश्वास नहीं हुआ।
उसने पूछा,
“तुम सच में उनके मित्र हो?”
सुदामा मुस्कुरा दिए।
“यह बात अब वही बता सकते हैं।”
पहरेदार ने कुछ क्षण उन्हें देखा।
सुदामा के कपड़े साधारण थे। पैरों में यात्रा की धूल थी। कंधे पर पुराना थैला था और हाथ में छोटी सी पोटली।
उनका रूप किसी बड़े व्यक्ति जैसा नहीं था।
लेकिन उनकी आँखों में ऐसा अपनापन था, जिसे देखकर पहरेदार भी कुछ पल के लिए चुप हो गया।
आखिरकार उसने कहा,
“ठहरो। मैं भीतर जाकर सूचना देता हूँ।”
पहरेदार अंदर चला गया।
सुदामा वहीं खड़े रहे।
उनका दिल तेजी से धड़क रहा था।
अब तक वह रास्ते भर कृष्ण से मिलने की कल्पना करते आए थे।
लेकिन अब जब वह महल के सामने खड़े थे, तो अचानक उनके मन में संकोच भर गया।
उन्होंने मन ही मन कहा,
“कृष्ण… अगर तुमने मुझे पहचान लिया तो?”
फिर उनके मन में दूसरा विचार आया—
“और अगर नहीं पहचाना तो?”
यह विचार आते ही उनका चेहरा उदास हो गया।
उन्होंने तुरंत स्वयं को समझाया,
“नहीं। वह कृष्ण हैं। मेरे मित्र हैं। वह मुझे जरूर पहचानेंगे।”
उधर महल के भीतर कृष्ण अपने राजकार्य में व्यस्त थे।
उनके सामने कई लोग अपनी समस्याएँ लेकर उपस्थित थे।
कृष्ण सबकी बातें ध्यान से सुन रहे थे।
तभी एक सेवक तेजी से अंदर आया।
उसने हाथ जोड़कर कहा,
“महाराज…”
कृष्ण ने उसकी ओर देखा।
“कहो।”
सेवक कुछ पल झिझका।
“महल के द्वार पर एक व्यक्ति आपसे मिलने आया है।”
कृष्ण ने पूछा,
“कौन?”
सेवक ने कहा,
“उन्होंने अपना नाम सुदामा बताया है।”
बस…
इतना सुनना था कि कृष्ण जैसे एक पल के लिए बिल्कुल स्थिर हो गए।
उनके चेहरे पर जो गंभीरता थी, वह अचानक गायब हो गई।
आँखों में एक अलग ही चमक आ गई।
उन्होंने दोबारा पूछा,
“क्या कहा तुमने?”
सेवक ने कहा,
“सुदामा।”
कृष्ण तुरंत अपने आसन से उठ खड़े हुए।
पास बैठे लोग हैरान रह गए।
कृष्ण ने कहा,
“मेरा सुदामा?”
सेवक ने सिर झुका दिया।
“जी।”
कृष्ण के चेहरे पर ऐसी मुस्कान आई, जैसी वर्षों से किसी ने नहीं देखी थी।
उन्हें अचानक गुरुकुल का वह छोटा सा आँगन याद आ गया।
उन्हें सुदामा की आवाज याद आई।
वह दिन याद आया जब दोनों एक पेड़ के नीचे बैठे थे।
वह बारिश याद आई, जिसमें दोनों भीगते हुए भी हँस रहे थे।
उन्हें वह विदाई याद आई, जब सुदामा ने पूछा था—
“क्या तुम मुझे पहचानोगे?”
और कृष्ण ने कहा था—
“सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं, दिल से होती है।”
कृष्ण की आँखें नम हो गईं।
उन्होंने बिना एक पल गँवाए कहा,
“उन्हें यहीं लेकर आओ।”
सेवक ने कहा,
“जी महाराज।”
लेकिन कृष्ण तुरंत आगे बढ़े।
“नहीं।”
सब उनकी ओर देखने लगे।
कृष्ण ने कहा,
“उन्हें लाने की जरूरत नहीं।”
उन्होंने स्वयं महल के द्वार की ओर कदम बढ़ा दिए।
सेवक और अन्य लोग उनके पीछे चल पड़े।
उधर सुदामा अभी भी महल के बाहर खड़े थे।
उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अंदर से क्या उत्तर आएगा।
कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि महल के भीतर से बहुत से लोग उनकी ओर आ रहे हैं।
सुदामा ने सोचा,
“शायद अब मुझे अंदर बुलाया जाएगा।”
लेकिन तभी भीड़ के बीच उन्हें एक परिचित चेहरा दिखाई दिया।
उनके कदम वहीं रुक गए।
वह चेहरा…
वह मुस्कान…
वह आँखें…
सुदामा की साँस जैसे थम गई।
“कृष्ण…”
उनके मुँह से बस इतना ही निकला।
कृष्ण भी उन्हें देखते ही रुक गए।
कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
समय जैसे ठहर गया था।
सुदामा की आँखों में आँसू आ गए।
कृष्ण की आँखें भी नम थीं।
फिर कृष्ण अचानक आगे बढ़े।
उन्होंने सुदामा को अपने गले से लगा लिया।
सुदामा कुछ क्षण तक बिल्कुल शांत रहे।
फिर उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“कृष्ण…”
कृष्ण ने कहा,
“सुदामा!”
दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे को पकड़े रहे।
वर्षों की दूरी उस एक आलिंगन में समाप्त हो गई।
महल के आसपास खड़े लोग यह दृश्य देखकर स्तब्ध थे।
किसी ने शायद पहली बार देखा था कि उनका राजा किसी साधारण वस्त्र पहने व्यक्ति से इतनी आत्मीयता से मिल रहा है।
कृष्ण ने सुदामा के कंधे पर हाथ रखा।
“तुमने आने में इतनी देर क्यों कर दी?”
सुदामा ने आँसू पोंछते हुए कहा,
“तुमने भी तो कभी बुलाया नहीं।”
कृष्ण हँस पड़े।
“तो क्या मित्रों के बीच बुलावा भेजना पड़ता है?”
सुदामा भी मुस्कुरा दिए।
“मुझे लगा… तुम्हारा जीवन बदल गया होगा।”
कृष्ण ने तुरंत कहा,
“जीवन बदला है, सुदामा। मित्रता नहीं।”
सुदामा की आँखें फिर भर आईं।
कृष्ण ने उन्हें ध्यान से देखा।
“तुम बहुत बदल गए हो।”
सुदामा ने कहा,
“तुम भी।”
कृष्ण मुस्कुराए।
“लेकिन तुम मुझे पहचान गए।”
सुदामा ने कहा,
“तुम्हें कैसे नहीं पहचानता?”
कृष्ण ने हँसकर कहा,
“तो फिर गुरुकुल वाली बात सच निकली।”
सुदामा ने पूछा,
“कौन सी?”
“कि सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं होती।”
दोनों हँस पड़े।
कृष्ण ने सुदामा का हाथ पकड़ लिया।
“चलो।”
“कहाँ?”
“अंदर।”
सुदामा अचानक रुक गए।
उन्होंने महल की ओर देखा।
“मैं?”
कृष्ण ने कहा,
“हाँ, तुम।”
सुदामा झिझकते हुए बोले,
“कृष्ण, मैं ऐसे ही…”
कृष्ण ने उनकी बात पूरी नहीं होने दी।
“जैसे आए हो, वैसे ही मेरे साथ चलो।”
सुदामा ने कहा,
“लेकिन लोग क्या सोचेंगे?”
कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,
“लोगों को सोचने दो।”
फिर उन्होंने सुदामा का हाथ पकड़ा और स्वयं उन्हें महल के अंदर ले गए।
महल के भीतर कदम रखते ही सुदामा ने चारों ओर देखा।
सब कुछ बहुत भव्य था।
लेकिन कृष्ण के लिए वह सब जैसे कुछ भी नहीं था।
उनके लिए उस समय सबसे कीमती चीज सामने खड़ी थी—
उनका मित्र।
कृष्ण उन्हें एक कक्ष में ले गए।
वहाँ पहुँचकर उन्होंने सुदामा को आसन पर बैठाया।
सुदामा तुरंत उठने लगे।
“नहीं कृष्ण, मैं यहाँ कैसे…”
कृष्ण ने उन्हें बैठाते हुए कहा,
“आज तुम मेरे अतिथि नहीं हो।”
सुदामा ने पूछा,
“तो?”
कृष्ण मुस्कुराए।
“आज तुम मेरे पुराने मित्र हो। और पुराने मित्रों को औपचारिकता की जरूरत नहीं होती।”
सुदामा बैठ गए।
कृष्ण स्वयं उनके सामने बैठ गए।
दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर कृष्ण ने पूछा,
“बताओ, गुरुकुल के बाद क्या हुआ?”
सुदामा ने हँसते हुए कहा,
“इतने वर्षों की बातें एक साथ कैसे बताऊँ?”
कृष्ण ने कहा,
“आज हमारे पास समय ही समय है।”
सुदामा ने अपनी जिंदगी के बारे में बताना शुरू किया।
गाँव।
घर।
परिवार।
बच्चे।
छोटी-छोटी खुशियाँ।
और संघर्ष।
कृष्ण ध्यान से सुनते रहे।
उन्होंने बीच में एक बार भी सुदामा को रोका नहीं।
फिर कृष्ण ने पूछा,
“और तुम्हें मेरी याद आई?”
सुदामा ने मुस्कुराकर कहा,
“क्या तुम सच में यह पूछ रहे हो?”
कृष्ण हँस पड़े।
“मैं तो बस सुनना चाहता हूँ।”
सुदामा ने कहा,
“हर बार जब जीवन कठिन हुआ।”
कृष्ण की मुस्कान कुछ पल के लिए शांत हो गई।
उन्होंने सुदामा की आँखों में देखा।
उन्हें समझ आ गया कि उनके मित्र ने बहुत कुछ सहा है।
लेकिन कृष्ण ने कोई प्रश्न नहीं किया।
उन्होंने बस सुदामा का हाथ पकड़ लिया।
फिर उनकी नजर सुदामा की छोटी सी पोटली पर पड़ी।
कृष्ण ने शरारत से पूछा,
“यह क्या है?”
सुदामा तुरंत पोटली को पीछे करने लगे।
“कुछ नहीं।”
कृष्ण ने कहा,
“इतने वर्षों बाद मिले हो और अब भी मुझसे कुछ छिपा रहे हो?”
सुदामा ने हँसते हुए कहा,
“यह बहुत साधारण चीज है।”
कृष्ण ने कहा,
“मेरे लिए?”
सुदामा चुप हो गए।
कृष्ण ने पोटली की ओर हाथ बढ़ाया।
“मुझे दिखाओ।”
सुदामा झिझकते रहे।
आखिरकार उन्होंने वह छोटी पोटली कृष्ण के हाथ में दे दी।
कृष्ण ने उसे खोला।
अंदर थोड़ा सा चिवड़ा था।
कृष्ण की आँखों में चमक आ गई।
उन्होंने कहा,
“सुदामा…”
सुदामा शर्माते हुए बोले,
“बहुत थोड़ा है।”
कृष्ण ने कहा,
“मेरे लिए तो यह संसार की सबसे बड़ी भेंट है।”
उन्होंने चिवड़ा अपने हाथ में लिया।
एक मुट्ठी खाई।
उनके चेहरे पर वही बचपन वाली खुशी थी।
सुदामा उन्हें देखता रहा।
उसकी आँखों से आँसू निकल आए।
कृष्ण ने पूछा,
“रो क्यों रहे हो?”
सुदामा ने कहा,
“क्योंकि मुझे लग रहा है कि इतने वर्षों बाद भी मेरा कृष्ण वैसा ही है।”
कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,
“और मुझे लग रहा है कि मेरा सुदामा भी वैसा ही है।”
दोनों फिर हँस पड़े।
लेकिन उस मिलन के पीछे सुदामा के मन में एक बात अब भी छिपी थी।
वह कृष्ण से कुछ माँगने नहीं आया था।
लेकिन उसके घर की स्थिति…
उसके परिवार की परेशानी…
सब उसके मन में था।
कृष्ण शायद यह बात समझ चुके थे।
उन्होंने सुदामा की आँखों में देखकर धीरे से पूछा,
“सुदामा, तुम मेरे पास केवल मिलने आए हो… या तुम्हारे मन में कोई और बात भी है?”
सुदामा चुप हो गया।
उसने कृष्ण की ओर देखा।
और पहली बार उसे लगा…
शायद उसे अपने मित्र से कुछ कहने की जरूरत ही नहीं।
कृष्ण पहले से सब समझ चुके थे।