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टैग: दर्द दोस्ती..

  • Dil sabhal ja jara part – 1

    Dil sabhal ja jara part – 1

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 1 khoi Hui pahchan 

    हिमाचल की ऊंची पहाड़ियों के बीच बसा छोटा सा कस्बा था, जहां सर्दियों में कोहरा इतना घना होता कि दिन में भी रात जैसा लगता। इसी कस्बे के बाहरी इलाके में एक पुराना अनाथ आश्रम था – “संत जोसेफ बालिका आश्रम”। इमारत पुरानी थी, दीवारें जगह-जगह से सीलन खा चुकी थीं, और छत पर टपकती बारिश की बूंदें रात-रात भर संगीत बजाती रहतीं।

    उस रात भी बारिश हो रही थी। तेज़ हवा खिड़कियों को हिला रही थी, और बूंदें छत से टप-टप करके नीचे गिर रही थीं। प्रिया अपनी पतली सी कंबल ओढ़े बिस्तर पर लेटी थी। उसकी आंखें बंद थीं, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। उसके दिमाग में बस एक ही सवाल घूम रहा था – आज स्कॉलरशिप का रिजल्ट आएगा। अगर मिल गई तो शिमला के बड़े कॉलेज में एडमिशन हो जाएगा। अगर नहीं मिली तो… तो फिर यही आश्रम, यही पुरानी किताबें, यही छोटी सी दुनिया।

    प्रिया अठारह साल की थी। लंबी, पतली, गेहुंआ रंग, और आंखें इतनी बड़ी कि लगता था सारी उदासी उनमें समा गई हो। आश्रम की पचास लड़कियों में वो सबसे स्मार्ट थी। टॉप करती थी हर एग्जाम में, लेकिन सबसे चुप भी थी। वो कभी शोर नहीं मचाती, कभी शिकायत नहीं करती। बस पढ़ती रहती। किताबें उसकी सबसे अच्छी दोस्त थीं।

    “प्रिया… उठ ना बेटी, सुबह की प्रेयर हो रही है,” सुलेखा आंटी की धीमी लेकिन प्यार भरी आवाज़ आई। सुलेखा आंटी आश्रम की वार्डन थीं। पचास के करीब उम्र, लेकिन चेहरा इतना शांत कि देखते ही मन को सुकून मिलता। प्रिया उनके लिए मां थीं – असली मां नहीं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा।

    प्रिया ने धीरे से कंबल हटाई और उठ बैठी। कमरे में दस बिस्तर थे, दस लड़कियां सो रही थीं। वो सबसे कोने वाले बिस्तर पर सोती थी, खिड़की के पास। उसे खिड़की से बाहर देखना अच्छा लगता था। पहाड़, पेड़, कोहरा – सब कुछ इतना शांत।

    वो उठी, जल्दी से चेहरा धोया। ठंडा पानी चेहरे पर पड़ते ही सिहरन हुई। फिर अपनी छोटी सी अलमारी खोली। अलमारी में बस तीन सलवार-कमीज, दो स्वेटर, और एक डायरी थी। वो डायरी निकाली। उसमें सिर्फ एक पेज भरा हुआ था। बाकी पेज खाली थे, जैसे उसकी जिंदगी।

    उस पेज पर एक पुरानी फोटो चिपकी थी। फोटो में एक चार-पांच साल की छोटी लड़की थी, गुलाबी फ्रॉक पहने, किसी बड़े बगीचे में झूला झूल रही थी। बगीचे में फूलों की क्यारियां थीं, दूर एक बड़ा सा बंगला दिख रहा था। लड़की हंस रही थी, लेकिन उसकी आंखें… प्रिया की आंखें। फोटो के नीचे किसी ने पेंसिल से लिखा था – “तेरा नाम प्रिया है, लेकिन ये घर तेरा नहीं रहा।”
    ये फोटो प्रिया को तेरह साल पहले मिली थी। जब वो पांच साल की थी, तब किसी ने आश्रम के गेट पर उसे छोड़ दिया था। साथ में बस ये फोटो और एक छोटा सा सोने का पेंडेंट था – एक अनोखा डिजाइन, जिस पर “P” लिखा था। पेंडेंट अब भी उसके गले में था। वो कभी नहीं उतारती थी।

    प्रिया ने फोटो को छुआ। उंगलियां कांप रही थीं। “मैं कौन हूं?” ये सवाल उसके अंदर इतना गहरा था कि कभी-कभी रातों में नींद उड़ा देता। आश्रम की बाकी लड़कियां भी अनाथ थीं, लेकिन कम से कम उन्हें याद था कि उनके माता-पिता कैसे थे, कैसे मरे। प्रिया को कुछ याद नहीं। बस एक धुंधली सी याद – किसी की गोद, किसी की लोरी, और फिर अंधेरा।

    “प्रिया, देर हो रही है,” सुलेखा आंटी ने फिर पुकारा। प्रिया ने डायरी बंद की और प्रेयर रूम की ओर चल दी। प्रेयर रूम छोटा सा था, दीवार पर यीशु की तस्वीर, और नीचे सब लड़कियां घुटनों पर बैठी थीं। प्रिया भी बैठ गई। प्रेयर शुरू हुई। सुलेखा आंटी ने बाइबिल से एक वचन पढ़ा – “भगवान तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ता।”
    प्रिया ने आंखें बंद कीं। मन ही मन प्रार्थना की – “भगवान, आज स्कॉलरशिप मिल जाए। मुझे बाहर की दुनिया देखनी है। मुझे अपनी पहचान ढूंढनी है।”
    प्रेयर के बाद नाश्ता। सादा – रोटी, आलू की सब्जी, और चाय। प्रिया ने जल्दी-जल्दी खाया और स्कूल के लिए निकल पड़ी। स्कूल आधा किलोमीटर दूर था। रास्ते में बारिश रुक चुकी थी, लेकिन कीचड़ था। प्रिया ने अपने पुराने जूते सावधानी से रखे। जूते फटने की कगार पर थे।
    स्कूल में आज आखिरी पेपर था – इंग्लिश। प्रिया ने अच्छा लिखा। पेपर देकर जब बाहर निकली तो दिल तेज़ धड़क रहा था। अब बस रिजल्ट का इंतज़ार। स्कूल से लौटते वक्त वो आश्रम के पुराने लैंडलाइन के पास रुकी। आश्रम में सिर्फ एक फोन था, वो भी वार्डन रूम में।

    लेकिन स्कॉलरशिप का रिजल्ट ईमेल पर आने वाला था। प्रिया ने सुलेखा आंटी से कहा था कि वो चेक कर लें।
    आश्रम पहुंचते ही वो सीधे वार्डन रूम में गई। सुलेखा आंटी कंप्यूटर पर थीं – पुराना कंप्यूटर, जो कभी-कभी हैंग हो जाता।

    “आंटी… रिजल्ट?” प्रिया की आवाज़ कांपी।
    सुलेखा आंटी ने मुस्कुराते हुए स्क्रीन घुमाई। वहां लिखा था – “Congratulations, Priya Sharma. You have been selected for full scholarship at Shimla Women’s College. Admission confirmed.”

    प्रिया की आंखें भर आईं। वो चीखना चाहती थी, कूदना चाहती थी, लेकिन बस खड़ी रह गई। सुलेखा आंटी ने उसे गले लगा लिया। “बधाई हो बेटी। तूने कर दिखाया।”
    प्रिया ने रोते हुए कहा, “आंटी… मैं जा रही हूं ना? सच में?”

    “हां बेटी। अगले हफ्ते से सेशन शुरू। तुझे हॉस्टल मिल जाएगा।”
    शाम को आश्रम में उत्सव सा माहौल था। लड़कियां इकट्ठी हुईं। किसी ने गाना गाया, किसी ने नाच दिखाया। छोटी मीरा – दस साल की नटखट लड़की – प्रिया के पास आई और बोली, “प्रिया दीदी, तुम कॉलेज जाओगी तो हमें भूल मत जाना। तुम तो स्टार बनोगी ना? डॉक्टर या इंजीनियर?”

    प्रिया ने मीरा को गोद में उठाया और कहा, “नहीं भूलूंगी। और स्टार तो तुम सब बनोगी। मैं बस पढ़ने जा रही हूं।”
    लेकिन अंदर से प्रिया उदास थी। आश्रम उसकी दुनिया था। यहां सब उसे जानते थे, प्यार करते थे। बाहर की दुनिया? वो नहीं जानती थी। वहां लोग कैसे होंगे? क्या वो उसे अपनाएंगे? एक अनाथ लड़की को, जिसके पास न फैमिली है, न बैकग्राउंड।

    रात को सब सो गए। प्रिया फिर खिड़की के पास बैठी। उसने पेंडेंट को छुआ। सोने की चेन ठंडी थी। “मां… पापा… तुम कहां हो?” उसने मन ही मन पूछा। फोटो फिर निकाली। उस बगीचे को देखा। वो घर… क्या वो उसका था कभी? क्यों छोड़ा गया उसे?
    सुलेखा आंटी रात को उसके पास आईं। “सो नहीं रही?”
    “नहीं आंटी। डर लग रहा है।”

    “डर तो लगेगा बेटी। नई जगह, नए लोग। लेकिन याद रख, तेरी ताकत तेरे अंदर है। तेरी पहचान बाहर के लोग नहीं बताएंगे। तू खुद ढूंढेगी।”
    प्रिया ने सिर हिलाया। लेकिन दिल में सवाल फिर गूंजा – अगर पहचान ही खो गई तो कैसे ढूंढूंगी?

    अगले कुछ दिन तैयारी में बीते। कपड़े सिले गए – दो नई सलवार-कमीज। किताबें पैक की गईं। सुलेखा आंटी ने कुछ पैसे दिए – अपनी सेविंग से। “खर्चा करना बेटी।”
    आखिरकार वो दिन आया। सुबह-सुबह बस स्टेशन। प्रिया का बैग छोटा सा था – दो जोड़ी कपड़े, एक स्वेटर, कुछ किताबें, डायरी, और वो फोटो। सुलेखा आंटी और सारी लड़कियां छोड़ने आईं। मीरा रो रही थी। “दीदी मत जाओ।”

    प्रिया ने सबको गले लगाया। सुलेखा आंटी की आंखें भी नम थीं। “ज्यादा मत सोचना बेटी। बस पढ़ाई पर ध्यान देना। और हफ्ते में एक फोन जरूर करना।”
    बस आई। प्रिया चढ़ी। खिड़की से हाथ हिलाया। बस चली। आश्रम पीछे छूटता गया। पहाड़ियां आगे बढ़ती गईं। शिमला की ओर। नई जिंदगी की ओर।
    बस में प्रिया खिड़की सीट पर थी। बाहर का नजारा देख रही थी। पेड़, नदियां, गांव। दिल में उत्साह था, लेकिन डर भी। तभी उसका फोन बजा। आश्रम में फोन नहीं था, लेकिन सुलेखा आंटी ने एक पुराना नोकिया दिया था – सिर्फ कॉल के लिए।

    अनजान नंबर से फोन आया, प्रिया ने हेलो कहा।
    दूसरी तरफ से एक भारी, डरी हुई आवाज़ आई – “प्रिया? तुम्हें याद है वो रात? जिस रात तुम्हें छोड़ा गया था? कॉलेज मत जाना। आना मत शिमला। वरना… वरना सब खतरे में पड़ जाएगा।”

    आवाज़ कट गई। प्रिया का फोन हाथ से छूटते-छूटते बचा। दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। कौन था वो? कैसे जानता था उसका नाम? वो रात… कौन सी रात?
    बस आगे बढ़ रही थी। शिमला करीब आ रहा था। लेकिन अब प्रिया को लगा – उसका नया सफर खुशी का नहीं, खतरे का शुरुआत है।

     

  • टूटी दोस्ती

    टूटी दोस्ती

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    टूटी दोस्ती

     

    विद्युत और वेदांत। दो नाम जो एक समय में एक ही साँस की तरह जुड़े हुए थे। छोटे से कस्बे की वह गली आज भी वैसी ही है, जहाँ दोनों ने बचपन के अनगिनत दिन बिताए थे। गली के कोने वाला नीम का पेड़ अभी भी खड़ा है, हालाँकि उसकी छाया अब उतनी घनी नहीं रही। उस पेड़ के नीचे बैठकर दोनों ने कितनी कहानियाँ गढ़ी थीं, कितने सपने देखे थे, और कितने वादे किए थे कि हम हमेशा साथ रहेंगे।

     

    विद्युत का घर गली के शुरू में था और वेदांत का बिलकुल आखिर में। दोनों की उम्र में मुश्किल से छह महीने का अंतर था। कक्षा पहली से ही एक ही बेंच पर बैठना शुरू किया था। विद्युत थोड़ा शरारती था भागना, चढ़ना, लड़ना उसकी आदत थी। वेदांत शांत और सोचने वाला। जहाँ विद्युत दीवार फाँदकर स्कूल के बगीचे से आम तोड़ लाता, वहाँ वेदांत खड़ा रहकर पहरा देता और फिर दोनों मिलकर खाते। एक की जेब में यदि पाँच रुपये होते तो दोनों के हिस्से में आ जाते। एक के घर में यदि रोटी कम पड़ती तो दूसरा चुपचाप अपनी थाली से बाँट लेता।

     

    गर्मियों की दोपहरें नीम की छाया में बीततीं। दोनों पत्थरों से घर बनाते, कागज़ की नावें बनाकर नाले में छोड़ते, और शाम को क्रिकेट खेलते। विद्युत हमेशा बल्लेबाज बनना चाहता, वेदांत गेंदबाजी करता। हार-जीत का कोई अर्थ नहीं होता था। हारने वाला भी हँसता और जीतने वाला भी। रात को छत पर लेटकर तारे गिनते। विद्युत कहता, “वेदांत, जब बड़े होंगे तो एक साथ शहर जाएँगे। बड़ा मकान लेंगे, और हमेशा साथ रहेंगे।” वेदांत सिर हिलाता, “हाँ, हमेशा।” उस ‘हमेशा’ में कितना विश्वास था, आज याद करके भी दिल बैठ जाता है।

     

    स्कूल के दिनों में दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे लगते। विद्युत की माँ कहतीं, “वेदांत को बुला ला, वरना तू खाना नहीं खाएगा।” वेदांत के पिता कहते, “विद्युत के बिना तू चुप क्यों रहता है?” दोनों के परिवार भी एक-दूसरे से घुल-मिल गए थे। त्योहार एक साथ मनाए जाते, बीमार होने पर एक के घर का व्यक्ति दूसरे के घर पहुँच जाता।

     

    कक्षा आठवीं तक सब कुछ वैसा ही रहा। फिर धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। विद्युत का परिवार आर्थिक तंगी से गुज़र रहा था। उसके पिता की नौकरी चली गई। घर में तनाव बढ़ गया। विद्युत पहले जैसा खुश नहीं रहता था। वह बातें कम करने लगा। वेदांत पूछता, “क्या हुआ?” विद्युत टाल देता, “कुछ नहीं।” एक दिन विद्युत ने स्कूल की फीस नहीं भरी। मास्टर साहब ने कक्षा में नाम पुकारा। विद्युत का चेहरा लाल हो गया। वेदांत ने उस दिन अपनी जमा पूँजी से फीस भर दी। विद्युत ने कहा था, “मैं वापस कर दूँगा।” वेदांत ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “दोस्तों में हिसाब नहीं होता।”

     

    लेकिन समय के साथ दूरी बढ़ने लगी। विद्युत को ट्यूशन के पैसे कमाने के लिए एक दुकान पर काम करना पड़ा। वह स्कूल के बाद सीधे दुकान चला जाता। वेदांत खेलने जाता, अकेला। पहले तो इंतज़ार करता, फिर आदत पड़ गई। विद्युत थककर घर लौटता, बात करने का मन नहीं होता। वेदांत नई दोस्ती बनाने लगा कक्षा के अन्य लड़कों से। विद्युत को यह अच्छा नहीं लगा। एक दिन उसने कह दिया, “तुम अब हमें भूल गए हो।” वेदांत ने जवाब दिया, “तुम खुद समय नहीं निकालते।” छोटी-सी बात थी, लेकिन दिल में चुभ गई।

     

    कक्षा दसवीं में बात और बिगड़ी। स्कूल में वार्षिक समारोह था। नाटक होना था। दोनों को मुख्य भूमिकाएँ मिलीं। रिहर्सल के दौरान विद्युत बार-बार लेट आता। एक दिन निर्देशक ने उसे डाँटा। वेदांत ने बीच में कहा, “सर, इनके घर की स्थिति ठीक नहीं है। थोड़ी छूट दे दीजिए।” विद्युत को यह बात नागवार गुज़री। शाम को उसने वेदांत से कहा, “मुझे दया की ज़रूरत नहीं। तुम सबके सामने मेरी बेइज़्ज़ती क्यों करते हो?” वेदांत हैरान रह गया। उसने समझाया, “मैंने मदद की थी।” लेकिन विद्युत ने सुनना ही नहीं चाहा। “तुम हमेशा खुद को बड़ा समझते हो। मुझे तुम्हारी सलाह की ज़रूरत नहीं।” उस दिन दोनों में पहली बार तीखी बहस हुई। नीम के पेड़ के नीचे बैठे-बैठे आवाज़ें ऊँची हो गईं। आसपास के लोग सुन रहे थे। विद्युत ने गुस्से में कहा, “दोस्ती खत्म।” वेदांत चुप रहा। उसकी आँखें भर आई थीं, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

     

    उसके बाद दोनों ने एक-दूसरे से बात करना बंद कर दिया। एक ही कक्षा में बैठते, लेकिन नज़रें नहीं मिलाते। पहले जो बेंच साझा करते थे, अब अलग-अलग कोनों में बैठने लगे। दोस्त पूछते, “क्या हुआ तुम दोनों को?” दोनों जवाब देते, “कुछ नहीं।” लेकिन अंदर कुछ टूट चुका था।

     

    बारहवीं के बाद विद्युत ने पढ़ाई छोड़ दी। घर की ज़िम्मेदारी संभालनी थी। वह एक कारखाने में काम करने लगा। वेदांत कॉलेज चला गया शहर। जाने से पहले उसने एक बार विद्युत के घर का चक्कर लगाया। विद्युत बाहर खड़ा था। दोनों की नज़रें मिलीं। वेदांत ने मुँह खोला, कुछ कहना चाहा, लेकिन विद्युत ने मुँह फेर लिया। वेदांत चला गया। उस दिन नीम के पेड़ की पत्तियाँ ज़ोर-ज़ोर से हिल रही थीं, जैसे कोई पुरानी याद झड़ रही हो।

     

    साल बीतते गए। वेदांत ने शहर में अच्छी नौकरी कर ली। शादी हुई, बच्चे हुए। जीवन व्यवस्थित हो गया। लेकिन कभी-कभी रात में नींद नहीं आती तो बचपन याद आ जाता। विद्युत कहाँ होगा? क्या करता होगा? उसने कई बार कस्बे लौटने की सोची, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया। अंदर एक डर था क्या विद्युत अब भी नाराज़ होगा? क्या वह मिलना भी चाहेगा?

     

    विद्युत कस्बे में ही रहा। मेहनत की, छोटे स्तर का व्यापार शुरू किया। शादी हुई, एक बेटा हुआ। जीवन चलता रहा, लेकिन अकेलापन उसका साथी बन गया। वह कभी-कभी नीम के पेड़ के नीचे बैठ जाता। पुरानी बातें याद आतीं कागज़ की नावें, आम के पेड़, छत पर तारे। दिल भारी हो जाता। एक बार उसने वेदांत का नंबर किसी से पूछा। नंबर मिल गया। फ़ोन उठaya, नंबर दबाया, लेकिन कॉल कट कर दी। हिम्मत नहीं हुई।

     

    बीस साल बाद एक दिन वेदांत को अपने पिता की बीमारी की खबर मिली। वह कस्बे लौटा। अस्पताल में पिता भर्ती थे। शाम को वह पुरानी गली में पहुँचा। नीम का पेड़ अभी भी खड़ा था। उसके नीचे एक आदमी बैठा था बाल सफ़ेद, चेहरा थका हुआ। वेदांत ने पहचाना विद्युत। दिल ज़ोर से धड़का। वह पास गया।

     

    “विद्युत…” आवाज़ में कंपन था।

     

    विद्युत ने सिर उठाया। दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। बीस साल का सन्नाटा उनके बीच खड़ा था। वेदांत बोला, “कैसे हो?”

     

    विद्युत ने हल्के से मुस्कुराया, “जी रहा हूँ। तुम?”

     

    “ठीक हूँ।”

     

    बातें रुक-रुक कर हुईं। पुरानी यादों का ज़िक्र किसी ने नहीं किया। जैसे दोनों जानते हों कि वह ज़ख़्म अभी भी कच्चा है। वेदांत ने कहा, “बाबा बीमार हैं। मैं कुछ दिन रुकूँगा।” विद्युत ने सिर हिलाया, “अगर कुछ ज़रूरत हो तो बताना।”

     

    अगले कुछ दिनों में दोनों कभी-कभी मिलते। चाय पीते, मौसम की बात करते, बच्चों की बात करते। लेकिन बचपन वाली वह आसानी नहीं थी। बातों में एक दीवार सी खड़ी रहती। एक शाम वेदांत ने हिम्मत जुटाई। नीम के पेड़ के नीचे बैठे-बैठे बोला, “उस दिन की बात… नाटक वाली… मुझे माफ़ कर दो। मैंने तुम्हें छोटा नहीं समझा था। सिर्फ़ मदद करनी थी।”

     

    विद्युत देर तक चुप रहा। फिर धीरे से बोला, “मैं जानता था। लेकिन उस समय इतना गुस्सा था कि सुन नहीं पाया। घर की हालत, पैसे की तंगी… सब कुछ मिलकर गुस्सा बन गया था। तुम पर निकाल दिया। बाद में पछताया, लेकिन तुम चले गए थे।”

     

    वेदांत की आँखें भर आईं। “मैं भी हठी था। एक बार बात कर लेता।”

     

    दोनों चुप हो गए। हवा में नीम की खुशबू तैर रही थी। विद्युत बोला, “दोस्ती टूट गई थी उस दिन। अब उसे जोड़ा नहीं जा सकता। बहुत समय बीत गया।”

     

    वेदांत ने सिर हिलाया। “हाँ। कुछ चीज़ें वापस नहीं आतीं। बचपन वाली वह बेफिक्री, वह विश्वास… अब कहाँ?”

     

    वे बात करते रहे। पुरानी शरारतें याद कीं, हँसे भी। लेकिन हँसी में वह पुरानापन नहीं था। जैसे कोई पुरानी किताब खोलकर पढ़ रहे हों, जिसके पन्ने पीले पड़ चुके हों।

     

    वेदांत के पिता ठीक हो गए। लौटने का समय आ गया। स्टेशन पर विद्युत पहुँचा। दोनों ने हाथ मिलाया। वेदांत बोला, “ख्याल रखना।” विद्युत ने जवाब दिया, “तुम भी।” ट्रेन चली। विद्युत देर तक प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा रहा।

     

    वापस गली में आकर वह नीम के पेड़ के नीचे बैठ गया। आँखें बंद कीं। यादों का सैलाब आ गया कागज़ की नावें बहती हुई, आम के पेड़ पर चढ़ना, छत पर लेटकर सपने देखना, और वह वादा “हमेशा साथ रहेंगे।” आँखें खुल गईं। पेड़ की पत्तियाँ हिल रही थीं। विद्युत ने धीरे से कहा, “हमेशा… कितना आसान लगता था तब।”

     

    दूर शहर में वेदांत ट्रेन की खिड़की से बाहर देख रहा था। मन में वही बात घूम रही थी। दोस्ती टूट गई थी। सालों बाद मिलना हुआ, बातें हुईं, माफ़ी भी माँगी गई। लेकिन जो टूट चुका था, वह जुड़ नहीं पाया। बस एक हल्की सी गर्माहट रह गई थी पुरानी राख में दबी हुई।

     

    बचपन की दोस्ती अनोखी होती है। उसमें कोई शर्त नहीं होती, कोई हिसाब नहीं होता। बस एक विश्वास होता है कि दूसरा हमेशा रहेगा। लेकिन जीवन के रास्ते कभी-कभी इतने अलग हो जाते हैं कि वह विश्वास टूट जाता है। और एक बार टूट जाए तो फिर चाहे कितनी भी कोशिश कर लो, वह पुराना रूप वापस नहीं आता। बस यादें रह जाती हैं मीठी भी, कड़वी भी। और एक सवाल काश उस दिन थोड़ा और समझदार होते।

     

     

     

    विद्युत और वेदांत की कहानी अब सिर्फ़ यादों में बची है। गली का नीम का पेड़ अभी भी खड़ा है। कभी-कभी शाम को जब हवा चलती है तो लगता है जैसे दो बच्चे अभी भी उसकी छाया में बैठे हों हँस रहे हों, सपने देख रहे हों, और कह रहे हों, “हमेशा साथ रहेंगे।” लेकिन हकीकत में वे दोनों अब अलग-अलग दुनिया में हैं। दोस्ती टूट चुकी है। और कुछ टूटी हुई चीज़ें जीवन भर अधूरी ही रह जाती हैं।

  • ख़्वाब जरूरी है..

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    जीवन में जब तक ख़्वाब रहेंगे, 

    तब तक उनके पूरे होने की संभावनाएँ भी बनी रहेंगी ! ✨️