अध्याय 7 — सुदामा की द्वारका की ओर यात्रा
सूरज निकलने से पहले ही सुदामा अपने घर से निकल पड़े।
गाँव अभी पूरी तरह जागा भी नहीं था। कहीं-कहीं घरों से धुएँ की पतली लकीरें उठ रही थीं। पक्षियों की आवाज धीरे-धीरे वातावरण में फैल रही थी। सुदामा ने एक बार पीछे मुड़कर अपने छोटे से घर को देखा।
वही मिट्टी की दीवारें।
वही साधारण आँगन।
वही घर, जहाँ उसने जीवन के कितने ही सुख-दुख देखे थे।
दरवाजे पर उसकी पत्नी खड़ी थी।
उसकी आँखों में चिंता भी थी और उम्मीद भी।
सुदामा ने मुस्कुराकर कहा, “मैं जल्द लौटने की कोशिश करूँगा।”
पत्नी ने धीरे से कहा, “रास्ते का ध्यान रखिएगा।”
सुदामा ने सिर हिलाया।
फिर उसकी पत्नी ने उसके हाथ में रखी छोटी सी पोटली को देखा।
उसमें वही थोड़ा सा चिवड़ा था, जो वह कृष्ण के लिए लेकर जा रहा था।
पत्नी ने कहा, “इसे संभालकर रखिएगा।”
सुदामा ने पोटली को अपने सीने से लगाया।
“यह मेरे पास सबसे कीमती चीज है।”
पत्नी मुस्कुराई।
सुदामा ने एक बार फिर अपने घर की ओर देखा और फिर आगे बढ़ गया।
अब उसके सामने एक लंबी यात्रा थी।
द्वारका बहुत दूर थी।
सुदामा ने कभी इतनी लंबी यात्रा अकेले नहीं की थी। लेकिन इस बार उसके मन में एक ऐसी शक्ति थी, जो उसके पैरों को आगे बढ़ाती जा रही थी।
वह शक्ति थी—
अपने मित्र कृष्ण से मिलने की इच्छा।
चलते-चलते उसे गुरुकुल की बातें याद आने लगीं।
उसे याद आया जब वह पहली बार आश्रम पहुँचा था।
वह कितना चुप और संकोची था।
उसे किसी से बात करने की आदत नहीं थी।
तभी कृष्ण उसके पास आए थे और पूछा था—
“तुम नए आए हो?”
सुदामा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“कृष्ण…” उसने धीरे से कहा।
उसका मन जैसे वर्षों पीछे चला गया।
उसे याद आया कि कृष्ण कैसे छोटी-छोटी बातों में भी खुशी ढूँढ लेते थे।
जब वह परेशान होता, कृष्ण उसे हँसा देते।
जब उसे डर लगता, कृष्ण उसका हाथ पकड़ लेते।
और जब वह स्वयं को दूसरों से छोटा समझता, कृष्ण उसे समझाते—
“मित्रता में कोई बड़ा या छोटा नहीं होता।”
सुदामा की आँखें हल्की नम हो गईं।
वह सोचने लगा—
क्या कृष्ण आज भी वैसे ही होंगे?
फिर उसने स्वयं से कहा—
“कृष्ण बदल भी गए होंगे, तो क्या हुआ? मैं उनसे मिलने जा रहा हूँ।”
रास्ता आसान नहीं था।
दिन चढ़ते ही धूप तेज हो गई।
सुदामा कई कोस तक चलता रहा।
उसके पास यात्रा के लिए अधिक भोजन नहीं था।
कभी वह किसी पेड़ की छाया में बैठ जाता और कुछ देर आराम करता।
फिर उठकर चल पड़ता।
एक दोपहर वह एक छोटे से गाँव के पास पहुँचा।
वहाँ एक कुआँ था।
सुदामा ने पानी पिया और वहीं कुछ देर बैठ गया।
कुछ लोग उसके पास आए।
उनमें से एक व्यक्ति ने पूछा,
“बाबा, आप कहाँ जा रहे हैं?”
सुदामा ने कहा,
“द्वारका।”
वह व्यक्ति हैरान हुआ।
“द्वारका? इतनी दूर?”
सुदामा मुस्कुराया।
“हाँ।”
“वहाँ किससे मिलने जा रहे हैं?”
सुदामा कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला,
“अपने मित्र से।”
उस व्यक्ति ने पूछा,
“कौन है आपका मित्र?”
सुदामा ने शांत स्वर में कहा,
“कृष्ण।”
कुछ लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
एक व्यक्ति मुस्कुराते हुए बोला,
“हमारे द्वारकाधीश श्री कृष्ण?”
सुदामा ने सिर हिला दिया।
कुछ लोग हँस पड़े।
“आप उनसे मिलने जा रहे हैं?”
सुदामा ने बिना बुरा माने कहा,
“हाँ।”
एक वृद्ध व्यक्ति ने पूछा,
“और वह आपको पहचानेंगे?”
यह प्रश्न सुनकर सुदामा कुछ क्षण चुप हो गया।
फिर उसने कहा,
“यह मुझे नहीं पता।”
लोगों की हँसी धीरे-धीरे शांत हो गई।
सुदामा आगे बोला,
“लेकिन मैं उन्हें पहचानता हूँ।”
उसके शब्दों में इतना विश्वास था कि कोई आगे कुछ नहीं कह पाया।
कुछ देर आराम करने के बाद वह फिर चल पड़ा।
लेकिन अब उसके मन में वही प्रश्न बार-बार आने लगा—
क्या कृष्ण मुझे पहचानेंगे?
उसने अपने साधारण कपड़ों की ओर देखा।
उसके पैरों में धूल लगी हुई थी।
उसके कंधे पर एक पुराना सा थैला था।
उसने सोचा—
“द्वारका के लोग मुझे देखकर क्या सोचेंगे?”
फिर उसने अपनी छोटी पोटली को छुआ।
और उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“मैं वहाँ किसी को प्रभावित करने नहीं जा रहा।”
उसने मन ही मन कहा,
“मैं अपने मित्र से मिलने जा रहा हूँ।”
यात्रा के कई दिन बीत गए।
सुदामा लगातार आगे बढ़ता रहा।
कभी किसी गाँव में रात बिताता।
कभी किसी पेड़ के नीचे आराम करता।
कभी रास्ते में मिलने वाले लोगों से द्वारका का रास्ता पूछता।
हर दिन उसके पैरों की थकान बढ़ती जाती।
लेकिन हर दिन कृष्ण से मिलने की इच्छा भी और मजबूत होती जाती।
एक शाम वह एक नदी के किनारे बैठा था।
सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था।
आकाश का रंग बदल रहा था।
सुदामा ने नदी के पानी में अपना चेहरा देखा।
वह पहले जैसा नहीं था।
बालों में सफेदी आ चुकी थी।
चेहरे पर समय की लकीरें थीं।
उसने धीरे से कहा,
“कृष्ण, अगर तुम मुझे देखोगे तो क्या पहचान पाओगे?”
अचानक उसे वर्षों पुरानी बात याद आ गई।
गुरुकुल से विदा होते समय उसने कृष्ण से पूछा था—
“अगर मैं कभी तुम्हारे पास आया तो तुम मुझे पहचानोगे?”
और कृष्ण ने कहा था—
“सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं, दिल से होती है।”
सुदामा की आँखें भर आईं।
उसने सिर उठाकर आसमान की ओर देखा।
“मैं तुम्हें याद दिलाने नहीं आ रहा, कृष्ण,” उसने कहा।
“मैं बस यह देखने आ रहा हूँ कि हमारी मित्रता आज भी वैसी ही है या नहीं।”
अगले दिन यात्रा फिर शुरू हुई।
अब रास्ते में लोग अधिक दिखाई देने लगे।
कुछ व्यापारी द्वारका की ओर जा रहे थे।
सुदामा उनके साथ कुछ दूर तक चलता रहा।
एक व्यापारी ने उससे पूछा,
“आप अकेले कहाँ जा रहे हैं?”
सुदामा ने फिर वही उत्तर दिया,
“द्वारका।”
“काम से?”
“मित्र से मिलने।”
“कौन मित्र?”
“कृष्ण।”
इस बार व्यापारी हँसा नहीं।
उसने सुदामा को ध्यान से देखा।
फिर पूछा,
“क्या आप वास्तव में उन्हें जानते हैं?”
सुदामा ने मुस्कुराकर कहा,
“एक समय था जब हम दोनों एक-दूसरे को रोज देखते थे।”
व्यापारी कुछ क्षण चुप रहा।
सुदामा की बातों में कोई दिखावा नहीं था।
उसने कहा,
“अगर यह सच है, तो आप बहुत भाग्यशाली हैं।”
सुदामा ने उत्तर दिया,
“सच्चा मित्र मिलना ही सबसे बड़ा सौभाग्य है।”
यात्रा आगे बढ़ती रही।
कुछ दिनों बाद सुदामा पहली बार एक ऊँची जगह पर पहुँचा, जहाँ से दूर तक फैली भूमि दिखाई देती थी।
वह कुछ देर वहीं खड़ा रहा।
एक यात्री ने उसकी ओर इशारा करते हुए कहा,
“वहीं आगे द्वारका है।”
सुदामा की साँस जैसे कुछ क्षणों के लिए रुक गई।
उसने दूर देखा।
उसके सामने वह नगरी थी, जहाँ उसका बचपन का मित्र रहता था।
वर्षों की दूरी।
अनेक यादें।
अनगिनत प्रश्न।
सब जैसे एक ही क्षण में उसके मन में उमड़ आए।
उसके कदम अचानक भारी हो गए।
अब तक वह लगातार कृष्ण से मिलने के लिए चल रहा था।
लेकिन द्वारका को सामने देखकर उसके मन में संकोच लौट आया।
“क्या मैं सचमुच अंदर जा पाऊँगा?”
उसने अपने वस्त्रों की ओर देखा।
फिर उस पोटली को छुआ, जिसमें चिवड़ा रखा था।
उसे लगा जैसे उसकी छोटी सी भेंट उस विशाल नगरी के सामने बहुत साधारण है।
वह कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा।
तभी उसके मन में कृष्ण की मुस्कान उभर आई।
और उसे याद आया—
“अगर यादें कम पड़ जाएँ, तो मुझे ढूँढने आ जाना।”
सुदामा ने गहरी साँस ली।
“मैं आ गया हूँ, मित्र।”
वह धीरे-धीरे द्वारका की ओर बढ़ने लगा।
जैसे-जैसे वह नगर के पास पहुँचता गया, उसकी आँखों में आश्चर्य बढ़ता गया।
द्वारका बहुत सुंदर और विशाल थी।
साफ रास्ते।
भव्य भवन।
चारों ओर लोगों की चहल-पहल।
सुदामा ने ऐसा नगर पहले कभी नहीं देखा था।
उसे एक क्षण के लिए लगा जैसे वह किसी दूसरे संसार में आ गया हो।
लेकिन फिर उसने स्वयं को याद दिलाया—
“इस नगर में कहीं मेरा मित्र कृष्ण रहता है।”
वह आगे बढ़ता गया।
लोग उसे देखकर अपने काम में व्यस्त रहते।
किसी को नहीं पता था कि साधारण कपड़ों में चल रहा यह व्यक्ति वर्षों बाद द्वारका के राजा से मिलने आया है।
आखिरकार सुदामा उस स्थान के पास पहुँचा जहाँ कृष्ण का महल था।
महल के ऊँचे द्वार देखकर उसके कदम रुक गए।
उसने कभी इतने बड़े महल की कल्पना भी नहीं की थी।
वह द्वार के बाहर खड़ा होकर भीतर देखने लगा।
अंदर पहरेदार थे।
लोग आते-जाते दिखाई दे रहे थे।
सुदामा ने अपने पुराने वस्त्र ठीक किए।
उसने अपनी पोटली को संभाला।
फिर धीरे-धीरे द्वार की ओर बढ़ा।
लेकिन उसके मन में एक ही प्रश्न था—
क्या इन विशाल द्वारों के पीछे रहने वाला द्वारकाधीश अब भी वही कृष्ण है, जो कभी जंगल में उसके साथ बारिश में भीगा था?
वह पहरेदारों के सामने पहुँच गया।
एक पहरेदार ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।
“कौन हो तुम?”
सुदामा के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
वर्षों बाद वह क्षण आ ही गया था।
उसने शांत स्वर में कहा—
“मेरा नाम सुदामा है।”
पहरेदार ने पूछा,
“और तुम यहाँ किससे मिलने आए हो?”
सुदामा ने महल की ओर देखा।
उसकी आँखों में वर्षों पुरानी मित्रता की चमक थी।
फिर उसने कहा—
“मैं अपने मित्र कृष्ण से मिलने आया हूँ।”
पहरेदार कुछ क्षण उसे देखता रहा।
और यहीं से शुरू होने वाला था…
- वर्षों बाद दो मित्रों के मिलन का सबसे भावुक प्रसंग।