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  • तेरे इश्क़ में….!!

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    महानगर के सबसे प्रतिष्ठित महाविद्यालय में उस दिन नए विद्यार्थियों के स्वागत का समारोह था। पूरा परिसर रंग-बिरंगे फूलों और रोशनी से सजा हुआ था। चारों ओर हँसी, संगीत और युवाओं की चहल-पहल थी।

     

    उसी भीड़ में एक युवक अपने मित्र के साथ प्रवेश कर रहा था।

     

    नाम था—आरव सिंह।

     

    लंबा कद, तेजस्वी व्यक्तित्व और आँखों में आत्मविश्वास। वह महाविद्यालय में अपनी पढ़ाई के साथ-साथ मार्शल आर्ट्स का भी अभ्यास करता था। लेकिन उसके स्वभाव में एक अजीब-सी शांति थी। वह बिना कारण किसी से उलझता नहीं था।

     

    दूसरी ओर, पुस्तकालय की सीढ़ियों से एक युवती नीचे उतर रही थी।

     

    नंदिनी शर्मा।

     

    लंबे काले बाल, शांत चेहरा और आँखों में ऐसी मासूमियत, जिसे देखकर कोई भी कुछ पल के लिए ठहर जाए।

     

    नंदिनी के हाथ में पुस्तकों का ढेर था।

     

    अचानक पीछे से किसी ने उसे धक्का दे दिया।

     

    पुस्तकें हवा में उछलकर फर्श पर बिखर गईं।

     

    नंदिनी घबरा गई।

     

    तभी एक हाथ आगे बढ़ा और सबसे पहले उसकी पुस्तक उठा ली।

     

    “आपकी पुस्तक।”

     

    नंदिनी ने ऊपर देखा।

     

    सामने आरव खड़ा था।

     

    “धन्यवाद।”

     

    आरव मुस्कराया।

     

    “केवल धन्यवाद से काम नहीं चलेगा।”

     

    नंदिनी ने भौंहें सिकोड़ लीं।

     

    “और क्या चाहिए?”

     

    “परिचय।”

     

    नंदिनी हँस पड़ी।

     

    “आप बहुत अजीब हैं।”

     

    “और आप बहुत जल्दी हँसती हैं।”

     

    “तो?”

     

    “तो अच्छा है।”

     

    दोनों कुछ क्षण एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    उन्हें तब नहीं पता था कि यह कुछ सेकंड उनके पूरे जीवन को बदलने वाले थे।

     

    —

     

    अगले कुछ सप्ताहों में दोनों की मित्रता गहरी होती चली गई।

     

    कभी पुस्तकालय में मुलाकात होती, कभी कैंटीन में।

     

    कभी दोनों घंटों महाविद्यालय के पुराने बरगद के नीचे बैठकर बातें करते।

     

    नंदिनी को बारिश पसंद थी।

     

    आरव को बारिश में भीगना।

     

    एक दिन अचानक तेज वर्षा शुरू हो गई।

     

    नंदिनी बरामदे में खड़ी होकर वर्षा को देखने लगी।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “भीगना है?”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन कपड़े खराब हो जाएँगे।”

     

    आरव मुस्कराया।

     

    “कभी-कभी जीवन में कपड़ों की चिंता छोड़कर बारिश में भीग लेना चाहिए।”

     

    नंदिनी ने उसकी ओर देखा।

     

    “और कभी-कभी?”

     

    “कभी-कभी किसी का हाथ पकड़कर भीगना चाहिए।”

     

    नंदिनी मुस्करा दी।

     

    दोनों बारिश में उतर गए।

     

    उस दिन पहली बार आरव ने उसका हाथ थामा था।

     

    और नंदिनी ने अपना हाथ वापस नहीं खींचा।

     

    —

     

    समय बीतता गया।

     

    दोनों के बीच मित्रता कब प्रेम में बदल गई, उन्हें स्वयं पता नहीं चला।

     

    एक शाम महाविद्यालय की छत पर सूर्य अस्त हो रहा था।

     

    नंदिनी रेलिंग के पास खड़ी थी।

     

    आरव उसके पास पहुँचा।

     

    “नंदिनी।”

     

    “हूँ?”

     

    “अगर मैं तुमसे एक बात कहूँ तो क्या तुम नाराज़ होगी?”

     

    “कहकर देखो।”

     

    आरव ने गहरी साँस ली।

     

    “मैं तुम्हें पसंद करता हूँ।”

     

    नंदिनी चुप रही।

     

    आरव घबरा गया।

     

    “कुछ कहोगी?”

     

    नंदिनी ने उसकी ओर देखकर धीरे से कहा,

     

    “मैं तो सोच रही थी कि तुम यह बात कहने में इतनी देर क्यों कर रहे हो।”

     

    आरव की आँखों में चमक आ गई।

     

    “तो इसका अर्थ…?”

     

    नंदिनी ने मुस्कराते हुए कहा,

     

    “हाँ, आरव। मुझे भी तुमसे प्रेम है।”

     

    उस क्षण दोनों के बीच कोई वादा नहीं हुआ।

     

    लेकिन दोनों ने मन ही मन जीवन भर साथ रहने का निर्णय कर लिया।

     

    —

     

    लेकिन उनकी प्रेम कहानी में एक ऐसा रहस्य छिपा था, जिसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं थी।

     

    नंदिनी के पिता शहर के बड़े उद्योगपति थे।

     

    उनके व्यवसाय पर कई लोगों की निगाह थी।

     

    उनके पुराने साझेदार का बेटा विक्रम नंदिनी से विवाह करना चाहता था। लेकिन नंदिनी ने उसे स्पष्ट रूप से मना कर दिया था।

     

    विक्रम को यह बात स्वीकार नहीं थी।

     

    जब उसे पता चला कि नंदिनी आरव से प्रेम करती है, तो उसके भीतर क्रोध भड़क उठा।

     

    एक रात उसने अपने साथियों से कहा,

     

    “अगर आरव रास्ते से हट गया तो नंदिनी स्वयं मेरे पास लौट आएगी।”

     

    उसके साथियों ने पूछा,

     

    “और अगर नहीं लौटी?”

     

    विक्रम ने ठंडी मुस्कान के साथ कहा,

     

    “तो उसे भी समझा देंगे कि मेरे विरुद्ध जाने की कीमत क्या होती है।”

     

    —

     

    कुछ ही दिनों बाद आरव और नंदिनी की तस्वीरें नंदिनी के घर पहुँच गईं।

     

    घर में तूफान आ गया।

     

    नंदिनी के पिता ने क्रोध में पूछा,

     

    “यह लड़का कौन है?”

     

    नंदिनी ने साहस करके उत्तर दिया,

     

    “जिससे मैं प्रेम करती हूँ।”

     

    एक पल के लिए पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    “तुम्हें पता भी है तुम क्या कह रही हो?”

     

    “हाँ, पिताजी।”

     

    “आज से महाविद्यालय बंद। उस लड़के से कोई संबंध नहीं रहेगा।”

     

    नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “आप मुझे उससे दूर कर सकते हैं, लेकिन मेरे मन से उसका प्रेम नहीं निकाल सकते।”

     

    यह सुनकर पिता और अधिक क्रोधित हो गए।

     

    उधर आरव के घर में भी उसे कड़ी डाँट पड़ी।

     

    “तुम्हें अपने भविष्य की चिंता है या नहीं?”

     

    आरव ने शांत स्वर में कहा,

     

    “मुझे अपने भविष्य की चिंता है। और मैं चाहता हूँ कि उस भविष्य में नंदिनी मेरे साथ हो।”

     

    उसके पिता ने कहा,

     

    “यदि वह लड़की तुम्हारे जीवन में आई तो हमसे संबंध तोड़ने पड़ेंगे।”

     

    आरव की आँखें नम हो गईं।

     

    “मैं नंदिनी को पाने के लिए अपने माता-पिता को नहीं खोना चाहता। मैं चाहता हूँ कि एक दिन आप दोनों स्वयं हमारा हाथ मिलाएँ।”

     

    —

     

    दोनों को अलग कर दिया गया।

     

    फोन छीन लिए गए।

     

    मुलाकात बंद कर दी गई।

     

    लेकिन प्रेम की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि दूरी उसे समाप्त नहीं करती—कई बार और गहरा कर देती है।

     

    एक रात नंदिनी की सहेली ने चुपके से आरव तक संदेश पहुँचाया।

     

    “मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगी।”

     

    आरव ने उत्तर दिया—

     

    “मैं तुम्हें लेने नहीं, तुम्हारे साथ अपना जीवन माँगने आऊँगा।”

     

    —

     

    इसी बीच विक्रम ने अपनी योजना का अगला चरण शुरू कर दिया।

     

    एक शाम नंदिनी के पिता को एक आवश्यक बैठक के बहाने शहर से बाहर बुलाया गया।

     

    वहाँ उन्हें धमकी दी गई कि यदि उन्होंने नंदिनी का विवाह विक्रम से नहीं किया तो उनका व्यवसाय बर्बाद कर दिया जाएगा।

     

    नंदिनी को जब यह पता चला तो उसने घर से निकलने का निर्णय लिया।

     

    लेकिन रास्ते में उसकी गाड़ी रोक ली गई।

     

    कुछ लोग उसे जबरन दूसरी गाड़ी में बैठाने लगे।

     

    नंदिनी ने संघर्ष किया।

     

    “मुझे छोड़ दो!”

     

    एक व्यक्ति ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    तभी पीछे से एक आवाज़ आई—

     

    “उसका हाथ छोड़।”

     

    सबने पलटकर देखा।

     

    आरव खड़ा था।

     

    उसके चेहरे पर क्रोध था।

     

    एक युवक ने उसकी ओर दौड़कर हमला किया।

     

    आरव ने उसका वार रोककर उसे जमीन पर गिरा दिया।

     

    दूसरा युवक पीछे से आया।

     

    आरव ने घूमकर उसका हाथ पकड़ा और उसे दूर धकेल दिया।

     

    लेकिन संख्या अधिक थी।

     

    चारों ओर से लोग आरव पर टूट पड़े।

     

    नंदिनी चीख उठी—

     

    “आरव!”

     

    आरव लड़ता रहा।

     

    उसे चोटें लगीं, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    अंततः उसने नंदिनी को अपने पीछे किया और कहा,

     

    “जब तक मैं खड़ा हूँ, कोई तुम्हें छू भी नहीं सकता।”

     

    तभी दूर से पुलिस के सायरन की आवाज़ सुनाई दी।

     

    हमलावर भागने लगे।

     

    लेकिन विक्रम वहाँ नहीं था।

     

    पुलिस ने कुछ लोगों को पकड़ लिया।

     

    पूछताछ में विक्रम का नाम सामने आया।

     

    —

     

    अब दोनों परिवारों को समझ आ गया कि मामला केवल प्रेम का नहीं था।

     

    नंदिनी के पिता ने पहली बार आरव से कहा,

     

    “तुम्हें चोट लगी है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “चोट की चिंता मत कीजिए। नंदिनी सुरक्षित है, मेरे लिए यही पर्याप्त है।”

     

    नंदिनी के पिता ने उसकी ओर लंबे समय तक देखा।

     

    उनकी कठोरता धीरे-धीरे पिघल रही थी।

     

    उन्होंने पूछा,

     

    “तुम मेरी बेटी से इतना प्रेम क्यों करते हो?”

     

    आरव ने उत्तर दिया,

     

    “क्योंकि वह मेरे जीवन को सुंदर बनाती है। लेकिन मैं उससे केवल इसलिए प्रेम नहीं करता कि वह मुझे खुश करती है। मैं इसलिए प्रेम करता हूँ क्योंकि मैं उसकी खुशी को अपनी खुशी से पहले रखना चाहता हूँ।”

     

    नंदिनी की माँ की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    —

     

    लेकिन कहानी अभी समाप्त नहीं हुई थी।

     

    विक्रम ने अंतिम चाल चली।

     

    उसने नंदिनी के पिता के कार्यालय से महत्वपूर्ण दस्तावेज चुरा लिए और उन पर ऐसा आरोप लगाने की तैयारी की, जिससे पूरा व्यवसाय संकट में पड़ सकता था।

     

    आरव को इसकी भनक लग गई।

     

    वह अकेला उन दस्तावेजों को वापस लेने पहुँचा।

     

    एक पुराने गोदाम में विक्रम उसका इंतज़ार कर रहा था।

     

    “तुम्हें क्या लगता है, नायक बन जाओगे?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मैं नायक बनने नहीं आया। केवल यह बताने आया हूँ कि नंदिनी तुम्हारी कभी नहीं होगी।”

     

    विक्रम ने क्रोध में हमला कर दिया।

     

    दोनों के बीच भयंकर संघर्ष हुआ।

     

    गोदाम की खिड़कियाँ टूट गईं।

     

    टेबल उलट गए।

     

    लेकिन आरव पीछे नहीं हटा।

     

    अंततः उसने दस्तावेज़ अपने हाथ में ले लिए।

     

    तभी पुलिस वहाँ पहुँच गई।

     

    विक्रम गिरफ्तार कर लिया गया।

     

    नंदिनी के पिता के विरुद्ध रचा गया पूरा षड्यंत्र सामने आ गया।

     

    —

     

    उस रात दोनों परिवार एक ही घर में बैठे थे।

     

    नंदिनी के पिता ने आरव के पिता की ओर देखा।

     

    “हम दोनों ने अपने बच्चों को अलग करने की कोशिश की।”

     

    आरव के पिता ने गहरी साँस ली।

     

    “हाँ। शायद हम दोनों डर गए थे।”

     

    नंदिनी के पिता ने कहा,

     

    “लेकिन इन दोनों ने हमें दिखा दिया कि प्रेम केवल भावुकता नहीं होता। यदि उसमें विश्वास और जिम्मेदारी हो, तो वह कठिन से कठिन परिस्थिति का सामना कर सकता है।”

     

    आरव की माँ ने नंदिनी को अपने पास बुलाया।

     

    “बेटी, क्या तुम सचमुच हमारे बेटे के साथ जीवन बिताना चाहती हो?”

     

    नंदिनी की आँखों में आँसू थे।

     

    उसने सिर झुका लिया।

     

    “जी।”

     

    आरव के पिता ने मुस्कराकर कहा,

     

    “तो फिर हमें अब कोई आपत्ति नहीं।”

     

    आरव ने आश्चर्य से अपने पिता की ओर देखा।

     

    “सच?”

     

    पिता ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “हाँ। लेकिन एक शर्त है।”

     

    आरव मुस्कराया।

     

    “क्या?”

     

    “नंदिनी को हमेशा खुश रखना।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “यह शर्त मैं जीवन भर निभाऊँगा।”

     

    —

     

    कुछ महीनों बाद उसी महाविद्यालय में विवाह का भव्य आयोजन हुआ जहाँ दोनों पहली बार मिले थे।

     

    उसी बरगद के पेड़ के नीचे फूलों की सजावट की गई थी।

     

    नंदिनी लाल जोड़े में अत्यंत सुंदर लग रही थी।

     

    आरव ने उसे देखा तो कुछ पल के लिए उसकी आँखें वहीं ठहर गईं।

     

    नंदिनी ने मुस्कराकर पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “सोच रहा हूँ, जिस दिन तुम्हारी किताबें जमीन पर गिरी थीं, उसी दिन मेरा पूरा जीवन तुम्हारे कदमों में आ गया था।”

     

    नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “और आज?”

     

    आरव ने उसका हाथ थाम लिया।

     

    “आज मेरा पूरा जीवन तुम्हारे साथ खड़ा है।”

     

    मंडप में दोनों ने सात फेरे लिए।

     

    हर फेरे के साथ दोनों परिवारों की आँखों में खुशी थी।

     

    विवाह के बाद नंदिनी ने आरव से कहा,

     

    “हमारी कहानी कितनी कठिन थी।”

     

    आरव मुस्कराया।

     

    “हाँ।”

     

    “फिर भी हम जीत गए।”

     

    आरव ने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा,

     

    “हम किसी के विरुद्ध नहीं जीते, नंदिनी। हमने बस अपने प्रेम को हारने नहीं दिया।”

     

    नंदिनी ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।

     

    आकाश में आतिशबाज़ी चमक रही थी।

     

    नीचे दोनों परिवार एक साथ खड़े थे।

     

    और उसी रात आरव ने नंदिनी से कहा—

     

    “आज से तुम्हारा घर मेरा घर है और मेरा घर तुम्हारा।”

     

    नंदिनी मुस्कराई।

     

    “और हमारा प्रेम?”

     

    आरव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “वह हमारी सबसे बड़ी दौलत है।”

     

    दूर कहीं मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं।

     

    जिस प्रेम की शुरुआत एक महाविद्यालय की सीढ़ियों पर बिखरी हुई पुस्तकों से हुई थी, वह आज सात जन्मों के वचन में बदल चुका था।

     

    क्योंकि सच्चा प्रेम वह नहीं जो कठिनाइयों से बचकर निकल जाए।

    सच्चा प्रेम वह है जो हर तूफ़ान के सामने खड़ा होकर कहे—

     

    “तुम मेरे साथ हो, तो मुझे किसी तूफ़ान से डर नहीं।”

     

    और आरव तथा नंदिनी की कहानी इस बात की गवाही बन गई कि जब प्रेम में विश्वास हो, तो सबसे बड़ी दूरी भी छोटी पड़ जाती है और सबसे कठिन रास्ता भी मंज़िल तक पहुँचा देता है।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।