सावरी का कॉलेज का पहला दिन था। सुबह की हल्की धूप पूरे कैंपस में फैली हुई थी। नए छात्रों के चेहरों पर उत्साह साफ दिखाई दे रहा था। कोई नए दोस्तों से मिल रहा था, तो कोई अपनी क्लास ढूँढ़ने में व्यस्त था।
इन्हीं भीड़भाड़ के बीच सावरी धीरे-धीरे कॉलेज के गेट से अंदर आई। उसकी नाक पर एक साधारण-सा चश्मा था और चेहरे पर एक हल्का-सा स्कार्फ़ बंधा हुआ था। वह हमेशा की तरह पूरे चेहरे को स्कार्फ़ से ढककर आई थी। यह स्कार्फ़ अब उसकी आदत नहीं, बल्कि उसकी पहचान बन चुका था। इसके पीछे एक ऐसा दर्द छिपा था, जिसके बारे में कोई नहीं जानता था।
जैसे ही वह कैंपस में पहुँची, कई निगाहें उसकी ओर उठ गईं।
“देखो… इतनी गर्मी में भी स्कार्फ़ बाँध रखा है।”
“लगता है मॉडल बनने आई है!”
“शायद अपना चेहरा छिपा रही है…”
लोगों की धीमी आवाज़ें उसके कानों तक पहुँच रही थीं। उसने अनसुना करने की कोशिश की, लेकिन हर शब्द उसके दिल में चुभ रहा था।
वह जानती थी कि लोग उसके स्कार्फ़ को देखकर बातें कर रहे हैं, लेकिन उसके मन में सबसे बड़ा डर कुछ और था। उसे डर था कि अगर किसी ने उसके चेहरे पर पड़े एसिड अटैक के निशान देख लिए, तो लोग उससे नफ़रत करने लगेंगे।
क्लास में उसकी मुलाकात जिया से हुई। जिया हँसमुख और मिलनसार लड़की थी। कुछ ही देर में दोनों की अच्छी बातचीत होने लगी।
थोड़ी देर बाद जिया मुस्कुराकर बोली,
“एक बात पूछूँ… अगर बुरा न मानो तो?”
सावरी ने हल्के से सिर हिलाया।
“तुम हमेशा स्कार्फ़ क्यों पहनती हो? यहाँ तो कोई भी इस तरह चेहरा ढककर नहीं आता।”
सवाल सुनते ही सावरी कुछ पल के लिए चुप हो गई। उसने नज़रें झुका लीं। होंठों पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों में दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
“बस… मेरी आदत है।”
इतना कहकर उसने बात वहीं खत्म कर दी।
कुछ दिनों बाद लाइब्रेरी में उसकी मुलाकात आयशा से हुई। आयशा बहुत समझदार और संवेदनशील लड़की थी।
वह सावरी के पास आकर बोली,
“क्या मैं तुम्हारे पास बैठ सकती हूँ?”
“हाँ… बिल्कुल।”
कुछ देर दोनों किताबें पढ़ती रहीं। फिर आयशा ने धीरे से पूछा,
“तुम हमेशा खुद को क्यों छिपाती हो?”
सावरी चौंक गई।
“मैं… मैं कुछ नहीं छिपाती।”
आयशा मुस्कुराई।
“आँखें कभी झूठ नहीं बोलतीं। तुम्हारी आँखों में बहुत दर्द है।”
सावरी की आँखें भर आईं।
आयशा ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा,
“अगर हम अपनी पहचान छिपाते रहेंगे, तो दुनिया कभी हमें असली रूप में जान ही नहीं पाएगी।”
उस दिन पहली बार किसी ने उसके दर्द को महसूस किया था।
समय बीतता गया। सावरी ने कुछ अच्छे दोस्त बना लिए, लेकिन कॉलेज में उसकी पहचान अब भी “स्कार्फ़ वाली लड़की” बन चुकी थी।
कुछ छात्र उसका मज़ाक उड़ाते।
“अरे… स्कार्फ़ वाली मैडम आ गई।”
वह मुस्कुरा देती, लेकिन अंदर ही अंदर टूट जाती।
कुछ हफ्तों बाद कॉलेज में “अपनी कहानी, अपनी पहचान” विषय पर एक वर्कशॉप आयोजित की गई। हर छात्र को अपनी ज़िंदगी का कोई ऐसा अनुभव साझा करना था जिसने उसे बदल दिया हो।
जब सावरी का नाम पुकारा गया, तो उसके कदम जैसे रुक गए।
उसका दिल बहुत तेज़ धड़क रहा था।
वह मंच पर पहुँची।
कुछ क्षण तक पूरे हॉल में सन्नाटा छाया रहा।
फिर उसने धीरे-धीरे अपने चेहरे से स्कार्फ़ हटा दिया।
पूरा सभागार एकदम शांत हो गया।
हर कोई उसके चेहरे पर पड़े गहरे जले हुए निशानों को देख रहा था।
कुछ लोगों ने आश्चर्य से साँस रोक ली।
कुछ की आँखें नम हो गईं।
सावरी ने काँपती आवाज़ में कहना शुरू किया—
“मेरा नाम सावरी है… और ये निशान मेरी हार नहीं, मेरी जीत की कहानी हैं।”
वह कुछ पल रुकी।
“कई साल पहले, जब मैं स्कूल जा रही थी, तब मेरे ही एक परिचित ने मेरे ऊपर एसिड फेंक दिया। उस एक पल ने मेरा चेहरा बदल दिया… लेकिन मेरे सपने नहीं बदल पाए।”
उसकी आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार उसने उन्हें पोंछा नहीं।
वह आगे बोली—
“मैंने खुद को आईने में देखना छोड़ दिया था। लोगों की नज़रों से डरने लगी थी। मुझे लगता था कि अगर दुनिया ने मेरा चेहरा देख लिया, तो कोई मुझे अपनाएगा नहीं। इसलिए मैंने इस स्कार्फ़ के पीछे खुद को छिपा लिया।”
पूरा हॉल बिल्कुल शांत था।
“लेकिन आज मुझे एहसास हुआ है कि मुझे अपने चेहरे से नहीं, अपने डर से लड़ना था।”
उसने स्कार्फ़ को अपने हाथ में पकड़ लिया।
“यह स्कार्फ़ कभी मेरी मजबूरी था, लेकिन आज यह मेरे संघर्ष की निशानी है। मैं अब अपने चेहरे से शर्मिंदा नहीं हूँ। क्योंकि ये निशान बताते हैं कि मैं टूटी नहीं… बल्कि हर दर्द से लड़कर और मज़बूत बनकर खड़ी हुई हूँ।”
इतना सुनते ही पूरे हॉल में ज़ोरदार तालियाँ गूँज उठीं।
जिया की आँखों से आँसू बह रहे थे।
आयशा गर्व से मुस्कुरा रही थी।
एक छात्र खड़ा हुआ और बोला,
“आज आपने हमें सिखाया है कि खूबसूरती चेहरे में नहीं, इंसान की हिम्मत में होती है।”
धीरे-धीरे कई और छात्रों ने भी अपनी-अपनी कहानियाँ साझा कीं। किसी ने अपने रंग को लेकर मिले तानों के बारे में बताया, तो किसी ने गरीबी और संघर्ष की बात कही।
उस दिन वह वर्कशॉप केवल एक कार्यक्रम नहीं रही, बल्कि आत्मस्वीकृति और हौसले का उत्सव बन गई।
उस दिन के बाद कॉलेज में लोग सावरी को उसके चेहरे के निशानों से नहीं, बल्कि उसके साहस, आत्मविश्वास और मुस्कान से पहचानने लगे।
सावरी ने भी तय कर लिया कि अब वह कभी अपने चेहरे को शर्म की वजह नहीं बनने देगी।
क्योंकि उसने समझ लिया था—
चेहरे पर पड़े निशान इंसान की पहचान नहीं होते, बल्कि उन निशानों के साथ जीने का साहस ही उसकी असली पहचान बनता है।

NSW अनुभवी लेखक -🥇
