लेखक: Lakshmi Kumari

  • अंत की शुरुआत

    अंत की शुरुआत

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    गाँव का नाम था ‘सपनों की नगरी’। यहाँ लोग अपने अपने सपनों के पीछे भागते थे। इस गाँव की रौनक वहाँ के चौक में लगी हाट से होती थी, जहाँ हर सप्ताह स्थानीय किसान अपनी उपज बेचने आते थे। लेकिन इस हाट से सभी का ध्यान खींचता था एक छोटा सा पत्थर का मंदिर, जिसे ‘सपनों का मंदिर’ कहा जाता था। मान्यता थी कि इस मंदिर में जो भी व्यक्ति सच्चे मन से अपनी इच्छाएँ माँगता, उसकी इच्छाएँ पूरी होती थीं।

    रीता, एक जिज्ञासु और साहसी लड़की थी, जो अपने सपनों को साकार करने के लिए जी जान से मेहनत कर रही थी। उसकी एक साल की छोटी बहन, नीतू, हमेशा उसकी छाया बनकर रहती थी। रीता का सपना एक दिन एक बड़ी विद्या केंद्र खोलने का था, जहाँ गाँव के सारे बच्चे पढ़ाई कर सकें। उसके पास कुछ इरादा और सपने थे, लेकिन पैसे और संसाधनों की कमी ने उसके रास्ते में रुकावट डाल रखी थी।

    एक दिन, रीता ने तय किया कि वह सपनों के मंदिर में जाकर अपनी इच्छा मांगेगी। उसने सोचा, “अगर मेरी इच्छा पूरी हो जाए और मुझे धन मिल जाए, तो मैं गाँव के बच्चों के लिए एक अच्छा स्कूल खोल सकूंगी।” वह डरती थी, लेकिन उसकी इच्छा ने उसे साहस दिया।

    वह मंदिर पहुँची और आँखें बंद करके प्रार्थना करने लगी। “हे भगवान, मुझे अपने सपने को पूरा करने के लिए मदद करो। कृपया मुझे धन और संसाधन दो ताकि मैं अपनी बहन और दोस्तों के लिए एक स्कूल खोल सकूं।”

    तभी अचानक एक हल्की ऊर्जा फैली। रीता ने आँखें खोलीं और देखा कि उसके पास एक पुराना आदमी खड़ा था। वह उसे देखकर मुस्कुराया। “बेटी, मैंने तुम्हारी प्रार्थना सुनी। लेकिन तुम्हें यह समझना होगा कि सपने सच करने के लिए केवल इच्छाएँ माँगने से नहीं, बल्कि मेहनत और संकल्प से पूरे होते हैं।”

    रीता ने गंभीरता से उसकी बात सुनी। “लेकिन कैसे, बाबाजी? मुझे नहीं पता कि मैं कहाँ से शुरू करूँ।”

    बाबाजी ने कहा, “तुम्हारे सपने की शुरुआत यहीं से होती है, अपने इरादे और मेहनत से। जो तुम्हारी असली यात्रा है, वही अंत हैं।”

    रीता ने उसकी बात सुनी और सोचने लगी। बाबाजी ने कहा, “तुम्हें तुम्हारी यात्रा में साहस और सहारा देने के लिए कुछ कदम उठाने होंगे।”

    रीता ने अगले दिन से अपनी योजना बनाने की ठानी। उसने गाँव में बच्चों के लिए एक छोटे से ट्यूशन क्लास खोला। वह जानती थी कि यह एक चुनौतीपूर्ण काम होगा, लेकिन उसने कभी हार मानने की सोची नहीं। उसने अपने घर के आँगन में ही ट्यूशन क्लास शुरू किया।

    पहला दिन आया। बहुत कम बच्चे आए। उन्हें शिक्षिका की कमी के कारण डर लगा। लेकिन रीता ने निराश नहीं हुई। उसने अपने तरीके से सबको तंग करने के बजाय प्यार से पढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ाया। धीरे-धीरे, बच्चे आने लगे। उसकी मेहनत रंग लाई।

    कुछ महीने बाद, राजू, जो गाँव का सबसे गरीब लड़का था, उसके पास आया। “दीदी, मैं भी पढ़ना चाहता हूँ, लेकिन मेरे पास पैसे नहीं हैं।” रीता ने उसे देखा और कहा, “कोई बात नहीं राजू, तुम यहाँ आ सकते हो। पढ़ाई भी मुफ्त होगी।”

    इस तरह, गाँव के और भी बच्चे आने लगे। रीता ने उनके लिए न केवल शिक्षा का आदान-प्रदान किया, बल्कि उनके जीवन में सकारात्मकता भरने का कार्य किया। उसकी कड़ी मेहनत से अब गाँव के बच्चों में शिक्षा के प्रति रुचि जागृत हुई।

    एक दिन, रीता ने सोचा कि उसे अब एक बड़ी जगह की आवश्यकता है।

    रीता ने अपने छोटे ट्यूशन क्लास से जो सफलता प्राप्त की थी, उसके बल पर उसने एक योजना बनाई। वह सोचने लगी, “अगर मैं एक बड़ी जगह की व्यवस्था कर सकूं, तो और भी बच्चे यहाँ पढ़ने आ सकते हैं।” लेकिन उसे समझ आ गया कि इसके लिए उसे अधिक संसाधनों की जरूरत होगी।

    वह अपनी छोटी बहन नीतू को लेकर फिर से सपनों के मंदिर गई। वहाँ पहुँचकर उसने फिर से प्रार्थना की। “हे भगवान, मुझे मार्गदर्शन दो। मैं कड़ी मेहनत करूँगी, लेकिन मुझे एक अच्छी जगह की आवश्यकता है।” प्रार्थना के बाद, उसने अपने दोस्तों और पड़ोसियों से बात करने का निर्णय लिया।

    गाँव के बुजुर्गों के पास जाकर उसने बताया कि वह बड़ा स्कूल खोलने का इरादा रखती है। गाँव के लोगों ने उसके जज़्बे की सराहना की, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इसके लिए बड़ा धन और जमीन की आवश्यकता होगी।

    तब उसने एक विचार किया। “यदि मैं यहाँ के सभी किसानों से संपर्क करूँ और उनसे कहूँ कि वे अपनी फसलें स्कूल के विकास के लिए योगदान दें, तो शायद यह काम आसान हो सकता है।”

    वह गाँव में सबसे पहले अपने पड़ोसी किसान, चंदर भैया के पास गई। “चंदर भैया, क्या आप मेरी बात सुन सकते हैं? मैं गाँव में एक स्कूल खोलना चाहती हूँ और इसके लिए आपकी मदद की आवश्यकता है। क्या आप अपनी फसल में से थोड़ा सा दान कर सकते हैं?”

    चंदर भैया ने उसकी बात सुनी और कहा, “बेटी, यह बहुत अच्छा विचार है। मैं अपनी फसल का एक हिस्सा तुम्हें दूंगा। लेकिन बस यह सुनिश्चित करो कि तुम बच्चों को अच्छी शिक्षा दें।”

    रीता को चंदर भैया का समर्थन मिला। उसके बाद, उसने धीरे-धीरे और किसानों से संपर्क किया और आश्चर्यजनक रूप से गाँव के कई किसानों ने उसकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया। कुछ ने अनाज दिया, जबकि कुछ ने पैसे।

    एक महीने के भीतर, रीता के पास कुछ पैसे इकट्ठा हो गए, और अब उसे जमीन के लिए सोचना था। वह गांव के बाहर एक छोटे से खाली मैदान की ओर गई, जो पहले से ही इस्तेमाल नहीं हो रहा था। उसने अपने विचार को वहाँ के निवासियों के सामने रखा।

    “अगर हम यह जगह एक स्कूल के लिए इस्तेमाल करें, तो यह सारे गाँव के बच्चों के भविष्य के लिए बेहतर होगा। हम यहाँ खेतों से मिली फसल को बेचकर स्कूल के लिए अनुदान इकट्ठा कर सकते हैं।”

    गाँव के लोग रीता के उत्साह से प्रभावित हुए और उन्होंने सामूहिक रूप से यह जगह स्कूल के लिए देने का निर्णय लिया। अब रीता को यकीन हो गया था कि उसकी मेहनत और इरादे रंग लाने लगे थे।

    अब रीता ने प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर दिया। उसने एक बोर्ड का निर्माण किया और उसमें स्कूल का नाम ‘सपनों का स्कूल’ रखा। उसके बाद, उसने बच्चों के लिए ट्यूशन स्टाफ का चयन किया। गाँव में और भी कई शिक्षित लोग थे, जिन्होंने रीता के लिए मदद करने का आश्वासन दिया।

    वित्तीय मदद प्राप्त करने के लिए, उन्होंने एक कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय लिया। गाँव के लोग उत्सुकता से कार्यक्रम में शामिल हुए, जिसमें नितू ने एक नृत्य पेश किया और अन्य बच्चों ने गीत गाए।

    इस कार्यक्रम का उद्देश्य गाँव वाले को स्कूल के महत्व और शिक्षा के लाभों के बारे में जागरूक करना था। जैसे ही कार्यक्रम समाप्त हुआ, गाँव के प्रमुख ने घोषणा की, “हम सभी को मिलकर सपनों के स्कूल को सफल बनाना होगा।”

    कार्यक्रम के बाद, रीता ने गाँव के लोगों से फिर से संपर्क किया और अपनी जरूरतों के बारे में बताया। गाँव के लोगों ने अपना-अपना सहयोग देने का वादा किया।

    अब स्टाफ में शिक्षक और शिक्षिकाओं की भर्ती शुरू हुई। कई लोग आगे आए और अपने अनुभव साझा किए।

    ऐसे ही रीता अंत से शुरुआत की एक सपने की जो उसने पूरा भी किया।

    Lakshmi Kumari 

     

     

     

  • मेरी पहली कुकिंग

    मेरी पहली कुकिंग

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रविवार की सुबह थी। घर में बड़ा ही शांत माहौल था। मम्मी मंदिर गई हुई थीं, पापा अखबार पढ़ते-पढ़ते सोफे पर ही खर्राटे मार रहे थे, और छोटा भाई सोनू मोबाइल में गेम खेलते-खेलते दुनिया से बेखबर था।

    मैं किचन के दरवाजे पर खड़ी होकर सबको देख रही थी। अचानक मेरे दिमाग में एक खतरनाक… नहीं-नहीं… “महान” आइडिया आया।

    “आज मैं खाना बनाऊंगी ओर सब को खुश कर दुगी!”

    बस फिर क्या था… मेरे इस फैसले से मुझे तो बहुत खुशी हो रही थी, लेकिन मुझे नहीं पता था कि कुछ ही घंटों बाद घर वालों की हालत ऐसी होने वाली है कि वे भगवान से प्रार्थना करेंगे, “हे प्रभु, इसे दोबारा किचन में मत भेजना!”

    मैंने पूरे आत्मविश्वास से एक थाली ओर चम्मच लेकर पीटते हुए ऐलान किया “सुनो सब लोग! आज का खाना मैं बनाऊंगी।”

    पापा ने आधी नींद में ही पूछा “कौन… खाना बनाएगा…?”

    “मैं!” खुशी से ताली बजाते ही कहा,  इतना सुनते ही पापा की नींद ऐसे गायब हुई जैसे मोबाइल से बैटरी।

    मम्मी भी तभी मंदिर से लौट आई थीं। उन्होंने जैसे ही मेरी बात सुनी, उनके हाथ से प्रसाद की थाली लगभग गिर ही गई।

    “क्या कहा तुमने?”

    मैं खुशी से मम्मी के पास जाके कहा, “मम्मी… आज मैं खाना बनाऊंगी। आपको आराम दूंगी।”

    मम्मी ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं कोई बहुत बड़ा मजाक कर रही हूं।

    “बेटा… तुम्हें पता है किचन में गैस कैसे जलाते हैं?”

    मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा, “यूट्यूब है ना मम्मी! और chatgtp गुरु भी तो है”

    अब तो घर में सन्नाटा छा गया।

    सोनू धीरे से बोला, “मम्मी… आज हम लोग बाहर खाना खा लें क्या?”

    लेकिन अब तो मैं ठान चुकी थी। मैं सीधे किचन में घुस गई। सबसे पहले मैंने सोचा, क्या बनाऊं?

    बहुत सोचने के बाद मैंने chatgtp  पूछा , पर उसकी आधी बातें मेरे दिमाग से निकल गई फिर मैने खुद ही फैसला किया, आलू की सब्जी और रोटी,

    वैसे मेरा मन तो था सही पनीर और पलाऊ, लेकिन फिर सोचा अरे अरे रुक जा पहले दिन ही इतना अच्छा खिलाओगी तो सब को हार्डटेक ही ना आ जाए।

    इसलिए आलू की सब्जी और रोटी बनाने का फैसला किया।  मैंने मोबाइल निकाला और यूट्यूब पर वीडियो चालू किया “5 मिनट में स्वादिष्ट आलू की सब्जी कैसे बनाएं।”

    वीडियो देखकर मुझे लगा, “बस इतना सा काम है?” वो तो में यू चुटकी बजाते ही कर लूंगी। लेकिन असली फिल्म तो अब शुरू होने वाली थी।

    मैंने गैस जलाई… पहले ही कोशिश में “फूsss…” की आवाज आई और मैं डरकर दो कदम पीछे कूद गई।

    बाहर से पापा की आवाज आई , “सब ठीक है ना?”

    मैं बोली “हां हां सब… कंट्रोल में है!”

    हालांकि कंट्रोल में कुछ भी नहीं था। फिर मैंने कड़ाही चढ़ाई और उसमें तेल डाला। अब वीडियो में कहा गया —

    “तेल गर्म होने दें।”

    मैंने इंतजार किया… लेकिन मुझे लगा तेल तो बहुत देर से गर्म हो रहा है, तो मैंने गैस पूरी तेज कर दी।

    बस फिर क्या था… तेल इतना गर्म हो गया कि जैसे ही मैंने जीरा डाला —

    छन्न्न्न्न!!!!

    तेल उछल कर बाहर आने लगा। मैं घबरा गई और चिल्लाई, “मम्म्म्म्म्मी!” मम्मी दौड़कर आईं। “क्या हुआ?”

    मैं बोली, “ये तेल मुझ पर हमला कर रहा है!”

    मम्मी ने माथा पकड़ लिया। “अरे गैस कम कर!”

    मैंने जल्दी से गैस कम की और फिर किसी तरह आलू डाल दिए। अब अगला स्टेप था मसाले डालना।

    लेकिन यहाँ से कहानी और मजेदार होने वाली थी।वीडियो में बोला गया, “एक चम्मच नमक डालें।”

    मैंने नमक का डिब्बा उठाया… लेकिन पता नहीं कैसे मेरा हाथ फिसला और पूरा नमक कड़ाही में गिर गया।

    मैंने सोचा “कोई बात नहीं… पानी डाल देंगे।” मैंने आधा जग पानी डाल दिया।

    अब आलू की सब्जी नहीं… आलू का सूप बन गया था।

    तभी सोनू किचन में आया। “दीदी… क्या बना रही हो?”

    मैंने गर्व से कहा, “आलू की सब्जी।”

    वह कड़ाही में देखकर बोला, “ये तो लग रहा है आलू तैरने की प्रैक्टिस कर रहे हैं।”

    मैंने उसे घूरकर देख कर बोली “बाहर जा!”

    अब बारी थी रोटी बनाने की। मैंने आटा निकाला और गूंधना शुरू किया। लेकिन मुझे अंदाजा नहीं था कि आटे में पानी कितना डालना होता है।

    मैंने थोड़ा पानी डाला… फिर लगा सूखा है… और पानी डाल दिया… फिर लगा अभी भी सूखा है… और पानी डाल दिया। कुछ ही देर में आटा नहीं… आटे का दलदल बन गया। मेरा हाथ उसमें फंस गया था।

    सोनू फिर आया और बोला “दीदी… ये रोटी बनेगी या दीवार की पेंट?”

    मैंने गुस्से में कहा “अगर और एक शब्द बोला ना… तो तुझे ही बेल कर तवे पर डाल दूंगी। और उसे भी नहीं सुधरा तो दीवार समझ के इसी आटे से पेंट कर दुगी”

    सोनू डर कर भाग गया मैंने किसी तरह आटा संभाला और रोटी बेलने लगी।

    पहली रोटी बनी… लेकिन वह गोल नहीं थी। वह भारत के नक्शे जैसी लग रही थी।

    दूसरी रोटी… वह ऑस्ट्रेलिया जैसी लग रही थी।

    तीसरी रोटी… वह तो पता नहीं किस ग्रह का नक्शा थी।

    मम्मी चुपचाप दरवाजे से देख रही थीं।

    उन्होंने पापा से धीरे से कहा “आज भूखे रहना पड़ेगा।”

    आखिरकार खाना तैयार हो गया।

    मैंने गर्व से सबको टेबल पर बुलाया। “आइए… आज का स्पेशल खाना तैयार है!”

    पापा, मम्मी और सोनू ऐसे बैठ गए जैसे कोई परीक्षा देने जा रहे हों। सबसे पहले पापा ने सब्जी चखी।

    जैसे ही उन्होंने पहला निवाला खाया… उनका चेहरा अचानक बदल गया। आंखें बड़ी हो गईं। पसीना आने लगा।

    मैंने पूछा, “कैसी है?”

    पापा बोले, “बेटा… नमक थोड़ा… ज्यादा है।” सोनू ने चखा और तुरंत पानी पीने लगा। “दीदी… ये सब्जी नहीं… नमक का समंदर है!”

    अब मम्मी ने रोटी उठाई। उन्होंने तोड़ने की कोशिश की…

    लेकिन रोटी इतनी सख्त थी कि वह टूटी ही नहीं।

    पापा बोले, “ये रोटी है या ढाल?”

    सोनू बोला,“अगर चोर घर में आ जाए तो इससे मार सकते हैं।”

    मैं गुस्से में बोली, “इतनी भी खराब नहीं है!”फिर मैंने खुद खाया… और अगले ही सेकंड पानी के लिए ऐसे भागी जैसे मेरे 10th  का एग्जाम हो। “अरे इस में तो सच में बहुत नमकीन है!”

    घर में सब हंसने लगे।पापा बोले “बेटा… आज का अनुभव बहुत अच्छा था… लेकिन अगली बार हम सब पहले से अस्पताल का नंबर तैयार रखेंगे।”मम्मी मुस्कुराते हुए बोलीं, “कोई बात नहीं… पहली कुकिंग ऐसी ही होती है सब की।”

    सोनू बोला, “दीदी… एक बात बोलूं?”

    “क्या?”

    “आप कविता और कहानी ही लिखो… खाना मत बनाओ।”बस फिर क्या था… पूरे घर में हंसी गूंजने लगी। उस दिन हमने आखिर में क्या किया? सबने मिलकर बाहर से पिज्जा ऑर्डर कर लिया।और मैंने मन ही मन फैसला किया “अगली बार कुकिंग करने से पहले… मम्मी से ट्रेनिंग जरूर लूंगी।”लेकिन आज भी जब घर में कोई बहुत ज्यादा नमक डाल देता है… तो पापा तुरंत कहते हैं —“लगता है आज फिर तुम्हारी पहली कुकिंग वाली रेसिपी याद आ गई!” और फिर पूरे घर में हंसी शुरू हो जाती है।

    Lakshmi Kumari……

  • हवेली की भूतनी

    हवेली की भूतनी

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    डर की दस्तक

    गाँव का नाम था सहरपुर, जो अपनी शांति और सुंदरता के लिए जाना जाता था। यह गाँव चारों ओर हरी-भरी पहाड़ियों से घिरा हुआ था। यहाँ के लोग मेहनती और मिलनसार थे। लेकिन, गाँव के बाहर एक पुरानी खंडहर वाली हवेली थी, जिसे कोई भी पास नहीं जाता था। लोग कहते थे कि यह हवेली भूतिया है। वहाँ रात में अजीबो-गरीब आवाजें सुनाई देती थीं।

    गाँव के बच्चों को इस हवेली के बारे में कई डरावनी कहानियाँ सुनाई गई थीं। कहा जाता था कि हवेली में एक महिला रहती थी, जिसकी आत्मा उस जगह पर रोड़ी थी। कुछ साल पहले, गाँव के एक युवक ने बहादुरी दिखाई और हवेली में दाखिल हो गया। लेकिन, वह कभी वापस नहीं लौटा। इस घटना ने गाँव में एक अजीब सा खौफ फैला दिया।

    इस हवेली के बारे में सुनकर गाँव के सबसे साहसी लड़के, अर्जुन ने उसका सामना करना तय किया। वह हमेशा से साहसी और निडर था, और अपने दोस्तों के बीच उसे सबसे बड़ा बहादुर माना जाता था। उसने अपने दोस्तों राधिका, संजय, और मीना को अपने साथ चलने के लिए मनाया।

    “चलो, हम सब मिलकर उस हवेली का सच जानते हैं,” अर्जुन ने कहा। उसके दोस्तों ने थोड़ी चिंता जताई, लेकिन अंततः उन्होंने अर्जुन के जोश में आकर उसके साथ जाने का फैसला किया।

    एक शाम, जब सूरज ढल रहा था, चारों दोस्त हवेली की ओर बढ़ने लगे। हवेली की दीवारें घास और काई से ढकी हुई थीं, और वहाँ की खिड़कियाँ टूट चुकी थीं। जैसे ही वे हवेली के दरवाजे तक पहुँचे, एक ठंडी हवा का झोंका आया, जिससे सबके मन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई।

    “क्या तुम सब डर गए हो?” अर्जुन ने हंसते हुए कहा।

    “नहीं!” सबने एक साथ कहा, हालाँकि उनकी आवाज़ में थोड़ी थरथराहट थी।

    उन्होंने दरवाजा धीरे से खोला, और अंधेरे में कदम रखा। कमरे में धूल और जाले का गुड़ बन चुका था। उन्हें अंधेरे में चलने में थोड़ी मुश्किल हो रही थी। अर्जुन ने अपनी टॉर्च जलाकर चारों ओर देखा। कमरे के हर कोने में पुरानी किताबें पड़ी थीं, और दीवारों पर अजीब चित्र बने हुए थे।

    “क्या तुमने ये चित्र देखे?” मीना ने कहा। “ये बहुत ही डरावने हैं।”

    “चिंता मत करो। यहाँ कुछ नहीं है,” अर्जुन ने हिम्मत बंधाई।

    इसी बीच, अचानक एक चीख सुनाई दी। सब चौंके और देखे की राधिका अलमारी के पास खड़ी थी। “क्या वो… वो वहाँ कोई है?” उसने कहा, उसकी आँखों में भय की चमक थी।

    अर्जुन ने टॉर्च को उस दिशा में घुमाया, लेकिन वहाँ कुछ नहीं था। सबने राहत की साँस ली, लेकिन राधिका अभी भी डर रही थी। उन्होंने फैसला किया कि उन्हें हवेली के ऊपर वाले कमरे में जाना चाहिए, जहाँ सबसे पहले युवक गायब हुआ था।

    वे धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़े। सीढ़ियों पर धूल भरी और दरवाजों की पीली होती लकड़ी उनके कदमों के नीचे चरमराती गई। जैसे ही वे कमरे के दरवाजे के पास पहुँचे, अर्जुन ने दरवाजा खोला।

    कमरा अंधेरे में डूबा हुआ था। अर्जुन ने टॉर्च जलाया और सबने देखा कि कमरे के बीच में एक पुराना बिस्तर था। बिस्तर पर एक पुराना कंबल रखा था। अचानक, कंबल के नीचे से एक साया बाहर निकला, और

    साया बाहर निकलते ही चारों की चीखें निकल गईं। वह एक भयानक, डरावनी महिला थी, जिसके आँखों में एक अद्भुत तेज था और चेहरे पर एक खालीपन। उसकी खूबसूरत समेत खौफनाक उपस्थिति ने सबको जड़वत कर दिया।

    “क्या तुम यहाँ आये हो?” महिला की आवाज़ गहरी और डरावनी थी, जैसे वह समय के पार से आई हो। “क्या तुम अपने अंधेरों को सामने लेकर आए हो?”

    अर्जुन, जो पहले से ही खौफ का सामना कर रहा था, हिम्मत एकत्रित करते हुए बोला, “हम सिर्फ सच जानना चाहते थे। हम सुनते आए हैं कि यह जगह भूतिया है, और हम यहाँ आते ही देखना चाहते थे कि क्या यह सच है।”

    महिला ने एक हंसती हुई मुस्कान दी, लेकिन उसकी आँखों में कोई भावना नहीं थी। “सच है या झूठ, यह तुम पर निर्भर करता है। लेकिन अगर तुमने यहाँ मेरे साथ आया है, तो तुम्हें यहाँ रहना पड़ेगा।”

    सभी दोस्त एक-दूसरे को देखने लगे, उनकी आँखों में डर और घबराहट थी। संजय ने कहा, “हमें यहाँ से भागना चाहिए।” लेकिन जैसे ही उन्होंने मुड़ने की कोशिश की, दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

    महिला ने एक कदम और बढ़ाया। “तुम्हें मेरे साथ रहना ही होगा।” उसके शब्दों में जैसे एक गहरी शक्ति थी, जो सबको और भी डराने लगी।

    “नहीं! हमें यहाँ से जाना है!” मीना ने दर्द से चिल्लाया। लेकिन उसकी आवाज़ हवेली के अंधेरों में गुम हो गई।

    महिला ने पास आते हुए कहा, “मैं तुम्हें तब तक नहीं छोड़ सकती जब तक तुम यहाँ के राज का सामना नहीं करते।” एक पल के लिए सब कुछ शांत हो गया।

    तभी एक भयानक आवाज सुनाई दी, और कमरा अजीब सी धुंध में ढकने लगा। अर्जुन ने अपनी टॉर्च की रोशनी को यहाँ-वहाँ घुमाया, लेकिन धुंध धीरे-धीरे बढ़ती गई।

    “हम क्या करें?” राधिका ने कहा। “हमें यहाँ से भागने का कोई रास्ता नहीं दिखता।”

    अर्जुन ने हिम्मत करके कहा, “हम इस महिला का सामना करेंगे और देखेंगे कि वह क्या चाहती है। हम सच्चाई जानने नहीं आए हैं तो फिर हम डरने क्यों लगे?”

    “तु…तुम सही हो,” संजय ने कहा। “हमें इसकी चुनौती स्वीकार करनी चाहिए।”

    महिला ने हल्की मुस्कान दी, और अचानक उस धुंध में कुछ काले साये उभरने लगे।

    “यहाँ की सच्चाई जानने के लिए तुम्हें एक सवाल का सामना करना होगा। जवाब सही हुआ तो तुम जा सकते हो, नहीं तो तुम यहाँ फँस जाओगे,” महिला ने कहा।

    अर्जुन ने अपने दोस्तों की ओर देखा, और फिर महिला से पूछा, “क्या सवाल है?”

    महिला ने अपनी आँखें बंद कीं और बोली, “एक प्रश्न है जो सदियों से अनुत्तरित रहा है: ‘क्या मृत्यु एक अंत है, या एक नया आरंभ?’”

    चारों दोस्तों ने एक-दूसरे की ओर देखा। यह सवाल उन्हें हैरान कर गया।

    “मृत्यु एक अंत नहीं है,” मीना ने कहा। “यह एक नया आरंभ है। यह केवल एक दरवाजा है, जो दूसरी दुनिया में खुलता है।”

    महिला ने अपनी आँखें खोलीं, और उन पर एक गहरी नज़र डाली। फिर उसने कहा, “तुम्हारा उत्तर आधा सच है, लेकिन तुम्हें इसके निहितार्थ को समझना होगा।”

    एक पल के लिए सब कुछ थम गया। फिर, बिस्तर की ओर एक पुराना आइना चमकने लगा। जैसे ही वे सब उसकी ओर देखे, उन्हें अपनी परछाईं नजर आई।

    “यहाँ रहना तुम्हारे डर का सामना करने के लिए है,” महिला ने कहा। “देखो, तुम्हारी परछाइयाँ क्या कहती हैं।”

    अर्जुन, राधिका, संजय और मीना ने आइने में अपनी परछाइयों को देखा। लेकिन उनकी परछाइयाँ उनसे अलग थीं; वह अंधेरे में लिपटी हुई और भयभीत दिख रहीं थीं।

    “ये हमारी परछाइयाँ हैं,” संजय ने कहा। “लेकिन ये डर और अनिश्चितता का प्रतीक हैं।”

    महिला ने कहा, “ये परछाइयाँ आपके अतीत के गुनाह हैं। वह डर, वह दर्द, और वह आत्म-संदेह, सब कुछ आपके भीतर का है। तुम्हें खुद से लड़ना होगा। अगर तुम अपने अंधेरों से भागोगे, तो तुम हमेशा यहाँ फँसे रहोगे।”

    अर्जुन ने सोचा, “सच में, हम हमेशा अपने भीतर के डर से भागते रहे हैं। लेकिन अब हमें उनका सामना करना होगा।” उसने गहरी सांस ली और अपने दोस्तों की ओर देखा।

    “हमें अपने डर का सामना करना होगा। हमें समझना होगा कि हम अकेले नहीं हैं।” उसने सभी को प्रोत्साहित किया।

    सभी ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और अपनी परछाइयों की ओर बढ़े। अचानक, अंधकार में एक चमक दिखी और उन्होंने देखा कि उनकी परछाइयाँ अब उनकी तरह दिखने लगीं, लेकिन उनमें आत्मविश्वास और शक्ति का आभास था।

    महिला ने मुस्कुराते हुए कहा, “अब तुम तैयारी कर चुके हो। अपने डर से लड़ो, और अपनी सच्चाई को पहचानो।”

    जैसे ही उन्होंने अपनी परछाइयों से संपर्क किया, एक शक्ति का अनुभव हुआ। डर और घबराहट ने उन्हें छोड़ दिया। उनकी परछाइयाँ अब उनके साथ थीं, न कि खिलाफ।

    महिला की आवाज़ अब और नरम हो गई, “तुमने अपने डर का सामना किया है। अब तुम्हें यहाँ से जाने की अनुमति है। लेकिन याद रखो, सच केवल तुम्हारे डर के पार है।”

    अर्जुन, राधिका, संजय और मीना ने एक साथ कहा, “हम यहाँ से जाने के लिए तैयार हैं!”

    आइना प्रकाश की एक चमक में बदल गया, और अचानक कमरे में रोशनी फैलने लगी। दरवाजे का लॉक अपने आप खुल गया। चारों दोस्त एकजुट होकर बाहर की ओर दौड़ पड़े।

    उनकी आँखों के सामने हवेली के चारों ओर की काली रात ने एक नई उषा का रंग ले लिया। जैसे ही वे हवा में सांस लेते हुए गाँव की ओर बढ़े, सब कुछ पहले से अधिक स्पष्ट लग रहा था।

    वे गाँव में लौट आए और अपनी कहानी साझा की। बाकी गाँव वालों ने उनकी बातों पर विश्वास नहीं किया, लेकिन उन्होंने अपनी परछाई में सुरक्षा की भावना महसूस की।

    गाँव से दूर उनकी एक अलग पहचान बन गई थी। अर्जुन और उसके दोस्त अब छोटे बच्चों को साहस और आत्म-विश्वास की कहानियाँ सुनाते थे। उन्होंने सीखा कि डर केवल एक भावना है, जिसे हमें समझने और स्वीकार करने की जरूरत है।

    गाँव के बच्चे अब कभी भी उस भूतिया हवेली से डरते नहीं थे। उन्होंने समझ लिया था कि डर का सामना करना ही असली साहस है।

    अर्जुन ने एक दिन कहा, “हमने अपनी सबसे बड़ी चुनौती का सामना किया। डर और अंधकार के पार जाकर हमने अपनी शक्ति को पहचाना। अब, हम कभी वापस नहीं लौटेंगे उस डर की ओर।”

    और इस तरह, सहरपुर गाँव में बसने वाले चार दोस्तों ने अपनी कहानी को अपने अगले पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखा, ताकि वे भी अपने डर का सामना कर सकें।

    Lakshmi Kumari